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बुधिया-9


डूबने के लिए सबको समंदर मिले
ज़रूरी नहीं ..
कभी कभी आँसुओं से भी
काम चलाना पड़ता है !
आख़िर स्वाद तो
दोनों का एक सा है ना !
लड़का नहीं लड़की होगी ..
कहकर निकला था वो
फिर नहीं लौटा!
प्रसव और विरह
दोनों वेदनाओं को
एक साथ झेला बुधिया ने !

माँग फिर सजी,
मेहन्दी रची
ससुराल वही था
पर पति दूसरा !
उसका अर्धविक्षिप्त पागल-सा देवर
बुरी बालाओं से बचने
पहन लिया उसने ताबीज़
नहीं,ताबीज़ नहीं..
महज़ ताबीज़ का नाम!

सुहागरात के दिन
पति को थपकियाँ दे कर सुलाया !
फिर बच्ची को दूध पिलाकर
ताकती रही खुला आसमान !
आस में..
वो दूर चमकता तारा आ गिरे
वापस उसकी झोली में !


खुश है बुधिया..
अब देख सकती है
गोद भराई की रस्म,
गा सकती है बधाये,
जा सकती है सुहागलों में
और हाथ भी फेर सकती है
किसी के नवजात बच्चे पर !
विधवा का कलंक मिट गया है अब
विधवा नही है वो !

खूब समझती है वो
उजड़े,बिखरे रंगों का मतलब
उसे सहेजना है
नन्हे सपनों को..
सजाना है उन्हें कोरे कैनवास पर,
भरना है नये रंग !
वो शक्ति है
पर शिव की तरह
रोककर रखती है सारा हलाहल
अपने कंठ में !
उसे ज़हर नहीं..
दूध पिलाना है
नन्हे सपने को !

प्याज़ काटते समय
वो झूठ-मूठ नहीं रोती !
पहली बारिश में नहाती
छोटी बच्ची को देख
सोचती है कुछ...
फिर उसे पकड़ने के बहाने
खूब भीगती है खुद भी !
उसकी आँखों में झाँकती है
और फूटकर रोती है..
अचानक अपने पति को देख
बिलख पड़ती है !
फिर संभलती है...
और सबको समेटकर
छुपा लेती है अपने आँचल में !
बस यूँ ही...
एकटक छत को ताकती
वो डबडबाई आँखें
सपनों के दुनिया में
कब चली जाती हैं..
पता ही नही चलता !

बुधिया-8


इंदौर के निकट धार रोड पर स्थित कलारिया नामक ग्राम में एक वृद्धा की हत्या कर दी गयी! १७-४- ००८ के नई दुनिया के मुख्य पृष्ठ पर मैने खबर पढ़ी| विस्तार से यह कविता बताएगी!


पता था उन्हे...
चिल्ला नही सकती
एक सौ दो साल की बुधिया
आधी रात,बरामदे से,
खटिया सहित उठाया
फिर ले गये
नहर के उस पार...
सुनसान खेत में!

वाह !
चाँदी के मोटे कड़े
खरी चाँदी !
बहुत खींचे..
फिर काट डाले पैर
कम्बख़्त पैर नहीं बिकते...
कड़े बिक जाएँगे
बेरहमी से नोंचे गये
सोने के कुंडल,
कान सहित!
नाक से नथनी...
चमड़ी के साथ आई!
कलाइयाँ..
कुछ पाँच फुट
दूर पड़ी थीं सुबह
कंगन कैसे छोड़ देते वो?
माला समझदार थी...
आराम से निकल गयी
वरना गला सिलना पड़ता
जलाने के पहले!
खून बहता रहा
बहता ही रहा....
सुबह अधखुले पोपले मुँह में
लहू भरा मिला
गंगाजल की जगह!
कटे पैरों का माँस...
रात भर नोंचते रहे कीड़े!
कलाईयों में चीटियाँ लग गयीं थीं!
बेहोश हो गये लोग
उसकी लाश देखकर
उफ्फ़!
कैसे जलाया होगा उसे ?
अख़बार मे पढ़ा मैने
लगा..
जीवन की सड़क पर घूमते
सुअर हैं हम!
गंदा खाते हैं..
वही पसंद है हमे,
वही बिखरा है
हमारे चारों ओर..
भरा पड़ा है पूरी दुनिया में
हमारे दिमाग़ों में भी!
बस..
अब कोई ट्रक आएगा
कुचल देगा हमें
अंतड़ियाँ बाहर निकल आएँगी..
राम-राम कहते
बाजू से निकल जाएँगे सब!
पिचले हुए अंग...
बिखरे होंगे सड़क पर
कुछ लाल-लाल सा
चिपचिपाता रहेगा
कुछ दिनों!
कुछ और भी गाड़ियाँ
रौंदती हुई..
निकल जाएँगी !
चिलचिलाती धूप में..
रूह चिपक जाएगी
पिघले कोलतार से
चिपकी ही रहेगी...हमेशा!
हाँ.. ऐसा ही होगा...
सुअर हैं हम!
यूँ ही सड़कों पर घूमते..
बददिमाग़ और नाकारा सुअर !

बुधिया-भाग 7


बेटा बहू रज़ाई में दुबके हैं
बुधिया कंबल ओढ़े खांस रही है
बाहर बरामदे से,
नीले आसमान को ताक रही है!

रधुआ..
दवाई करवाता है
तो एहसान जताता है
बुडढी जल्दी मरे ये दुआ मनाता है!
उसे जल्दी से जल्दी
कुछ पैसे बचाने हैं
अबकी सावन पर..
राधा को दो कंगन बनवाने हैं!

बुडढी को बस खुद की चिंता है
ना जाने क्या चाहती है?
हमेशा खाँसती रहती है..
राधा को दिन भर सताती है!

आँखें कमज़ोर हैं..
नाटक करती है!
अरे!राधा की साड़ी में
एक फाल तो लगा सकती है!
कामचोर है..
बस पड़ी रहती है
बर्तन धोने की कहो
तो कितना कलपती है!

बुधिया को याद है
जब रधुआ छोटा था
पल्लू पकड़ कर,
हर बात मनवाता था
रोज़ खाने के बाद
गुड की ढेली माँगता था!
अब वो लाचार है..
रोटी को तरसती है
खाना मिले ना मिले
गुड की ढेली की जगह,
तिरस्कार और गाली ज़रूर मिलती है!

वो छोटा था..
अंगुली पकड़ कर
चलना सिखाती थी
देखो..
अब दौड़ लगाता है!
माँ को मढिया तक ले जाने में
कितना झल्लाता है!
नवरात्री में उपास रखता है
कन्या भोज कराता है
एक माँ को दुखी करके
दूजी को खुश करना चाहता है!

बहू पेट से है
मनौती मानी कि लड़का हो
कुल आगे बढ़े
बुढ़ापे का सहारा हो..

भगवान सब देखता है
उन्हे लड़का हुआ है
राधा सोचती है
बुढ़ापा सुधार गया है
भोली है..नादान
देखो!कह रही है..
लड़का बिल्कुल बाप पर गया है!

बुधिया-भाग 6


सुबह ट्रक ने टक्कर मार दी
सिर पर गहरी चोट लगी है,
किसी समाज़ सेवी ने दया की
अम्मा अस्पताल में पड़ी है !

डाक्टर बोला,
ए लड़की..
तेरी माँ को ब्रेन हेमरेज हो गया है
अब हमेशा ही बिस्तर पर रहेगी,
अस्पताल ही घर बन गया है |
हर दिन हज़ार का ख़र्चा है
जुगाड़ कर पाएगी?
वरना ले जा इसे,
कल की मरने वाली
आज मर जाएगी!

माँ मर जाएगी..!
मुझे खिलाकर,
ख़ुद भूखे पेट सोने वाली
हमेशा को सो जाएगी?
माँ ही तो है जो बताती है
भूख लगे तो
पेट पर
गीला कपड़ा बाँध कर सो जाते हैं!
फटे हुए कपड़ों से,
कैसे पूरा तन छिपाते हैं!
माँ मर जाएगी..?

अम्मा ने हमेशा खिलाया,
पर आज
उसकी ज़िंदगी नहीं ख़रीद पाऊँगी
काली हूँ और बदसूरत भी
ख़ुद को बेचूंगी,
तो भी हज़ार नही पाऊँगी !

बुधिया..
खड़ी है मेडिकल स्टोर के बाहर
आस में..
कहीं भगवान को ज़ुकाम हो जाए,
वो दवा लेने आएँ
तो कुछ पैसे मुझे भी दे जाएँ!

नहीं!
वो क्यों देगा पैसे?
उसी ने तो यह सब करवाया है!
लगता है उसकी माँ नही है,
माँ का प्यार..
उसने नहीं पाया है !

तूने कभी कुछ नही दिया
ना बाप का नाम,
ना इज़्ज़त ना सम्मान,
ना अम्मा की एक मुस्कान,
ना ही सुख की कोई शाम!

तुझसे रहम की उम्मीद नहीं,
बस एक ज़ुल्म और कर दे!
फिर कभी कुछ ना माँगूँगी
बस एक बार झोली भर दे |

अभागी हूँ
जो ऐसी भीख मांगती हूँ,
दिल पर पत्थर रख के
यह मन्नत मानती हूँ!
सच..
तू पत्थर नहीं है
यह मान जाऊंगी
मुझे जितने जल्दी अनाथ करेगा
तेरे मंदिर में,
उतने नारियल चढ़ाऊंगी !

बुधिया और भी हैं..


अचानक पेट दुखा
और उसका मरद
चल बसा !
खेत में खड़ी फ़सल छोड़ कर ..
बुधिया को याद है
तब नहर चल रही थी ,
वो पानी नहीं दे पाया
वहाँ फ़सल सूख रही थी ..
यहाँ बुधिया लाश को गोद में रखे
सुबक रही थी !

जो आटा-दाल घर में पड़ा था
ग्यारह बाम्हनो को जिमा दिया
उसके मरद की तेरहवीं ने,
घर का एक-एक बासन तक बिकवा दिया !

उसने सोचा ..
दलिये में चूहेमार गोली मिलाऊँ
और मर जाऊँ
पर यह मुनिया
इसे किसके भरोसे छोड़ जाऊँ !
फिर सोचा ..
थोड़ा इसे भी खिला दूँगी
पर वो माँ है
कैसे दूध की जगह ज़हर देगी !

वो बर्तन मांज रही थी..
देखा..
एक भेड़िया उसे देख रहा था
बुधिया की विवशता में शायद
अपनी वासना की पूर्ती तलाश रहा था|
बुधिया को पता था
वो क्या चाहता है
पर मुनिया की खातिर
उसे उसके ही घर में
रोज़
बर्तन माँजने जाना पड़ता है !

सीमा पर कोई सैनिक
देश की खातिर जान जोखिम में डालता है
और यहाँ मुनिया की खातिर मुनिया
अपनी अस्मत को
आह् !
कैसी विवशता..
भले ही दारू पीता था
मारता था,पीटता था
पर जैसा भी था, था तो..
अब तो यहाँ इंसान नहीं..
बस भेड़िये हैं
बस ताक में बैठे है
कब नोच लें
अपने शिकार को !

बुधिया..
कोई सहानुभूती जताए,
तो डर लगता है..
कोई मुनिया को बिस्कुट दिलवाए,
तो डर लगता है..
कोई दरवाज़ा खटखटाए,
तो डर लगता है..
रात में बिल्ली गंजी गिराए,
तो डर लगता है..

एक दिन अचानक ..
जो ऊपर बैठा है उसकी आँख लग गयी ,
थोड़ी देर के लिए
बुधिया दुनिया में,
अकेली हो गयी!
कृष्ण उसके भाई नहीं थे
जो उसे बचाने आते ..
जब कोई दु:शासन चीर खींचता
तो उसे बढ़ाते जाते
यहाँ तो बस दु:शासन था
और बुधिया..
घर की कुठरिया में बंद
चीखती-चिल्लाती मुनिया!

पता है !
उस रात
बेबसी
माँ की ममता पर भारी पड़ी..
अगले दिन अख़बार में ख़बर छपी
"फलाने गाँव में
एक विधवा औरत,
अपनी लड़की के साथ ,
जल मरी " !

छोटी सी बुधिया


बाहर आँगन में सीताफल का पेड़ था
फल कच्चे थे, गुहार कर रहे थे
हमें मत तोड़ो ,हमें मत झंझोड़ो |
बड़े-बूढ़े कहते हैं..
यदि कच्चे सीताफल को भूसे में गाड़ दो
तो कुछ समय में वो पक जाता है,
बुधिया पंद्रह साल की हुई
तो उसका गौना हो जाता है |

छोटी सी उमर..
दिन भर सिर पर पल्ला
क्या सरल काम है ?
चूल्हे में फूँकनी से अंगारे सुलगाती बुधिया
और बुझे हुए अंगारों के साथ उड़ती
सपनों की कालिख ..
यह नज़ारे गावों में आज भी आम हैं |

नयी बहू आई है ..
सुहागलें हो रही थीं
सामने थाल में बाताशे रखे थे
बुधिया के मन में विचारों के भंवर चल रहे थे |
बताशे..
आह्!बापू यह मेरे लिए लाते थे
बुधिया..देख क्या लाया हूँ ,
इनके लिए मुझे कितना सताते थे !
अचानक उसने कुछ सोचा
फिर हाथ बढ़ाया
बड़ी सफ़ाई से एक बताशा उठाया
और घूँघट में छिपा लिया !
जो बीत जाता है..वो वापस क्यों नही आता ?
ज़िंदगी का हर सुख ..
इस बताशे-सा क्यों नहीं हो जाता!
दीपावली आ रही है
सास ने कहा आँगन छाबना है
बुधिया छाब रही है ..
और सोच रही है
काश मेरी ज़िंदगी भी इस आँगन-सी होती !

उसे नहीं पता
नवजात शिशुओं को
जलाया नहीं गाड़ा जाता है
तभी तो..
वो अपने अरमानों को
गोबर के साथ मिलाती है
बड़े प्यार से,जतन से
उनके कंडे बनाती है,
इन कंडों को चूल्हे में जलाती है!

नवजात शिशुओं से सपने ..
इन शिशुओं की चिता पर
वह रोज़ रोटी पकाती है ,
अपनी सास, ससुर और पति को
बड़े प्यार से खिलाती है !

उसका जी मचल रहा था
उलटी का मन कर रहा था
उस आँगन में
सीताफल के पेड़ के नीचे
आज गोद भराई का उत्सव हो रहा था |
आठ महीने बाद..
नाला पूर था,
शहर दूर था ,
गाँव में एक दाई थी
बुधिया ने एक लड़की जायी थी !

लड़की तो आई पर बुधिया चली गयी
मर गयी..
लड़की को जनमा था ,
ताने तो सुनने से बच गयी
पर इस बाल-विवाह की वेदी पर.
एक और बकरी,
कटने छोड़ गयी !

एक और बुधिया


मैं रोता हूँ अगर मेरे सपने पूरे ना होते हैं
पर उसको पता ही नही ,
कि सपने कम्बख़्त क्या होते हैं !

बुधवार को पैदा हुई सो बुधिया नाम है ,
कचरे में ज़िंदगी तलाशे
बस यही काम है |
छोटी है,मासूम सी
उम्र कोई पंद्रह साल है|

कष्ट हों जीवन मे तो इच्छाएँ मर जाती हैं,
पर बुधिया की विडंबना ..
कोई आरज़ू पनप ही ना पाती है !

मासूम...
पता ही नही ज़िंदगी क्या होती है
बस पेट भर खाना मिल जाए ,
देवी माँ से रोज़ कहती है !

जो हमारे लिए कचरा है ,
वही ख़ुशियों का संसार है
उसे कैसी शर्म ...
घूरे पर शान से घूमती है
दिन भर प्लास्टिक बीने...
तब रात में रोटी खा पाती है !

घूरे पर पन्नी दिख जाए
तो ऐसे गर्व से उठाती है ,
मानो कोई शहीद की विधवा
परमवीर चक्र पाती है !

बस यूँ ही ,
बुधिया की ज़िंदगी चलती है
जैसे घिसे हुए टायर पर ,
कोई मोटर बेमन से बोझ ढोती है !

एक दिन वो घूम रही थी ,
कि सकपका गयी
शायद कोई चीज़ अनजाने में ,
उसके पैरों से टकरा गयी
झुकी,उठाया,
देखा..
पता है क्या हुआ फिर !
उसने पीठ पर लादी बोरी
फेंक दी |
कचरे की बोरी..
नहीं-नहीं
घुटन और विवशता की बोरी !
फेंक दी उसने

महसूस किया मैने ..
मेरी आँखे नम हो गयीं
उसकी वो चेष्टा कुछ आहत सी कर गयी
सच..
कुछ विचित्र सी घटना घट रही थी ,
मैने देखा ..
आज एक पोखर में भी लहरे चल रही थीं |

बुधिया ..
शायद ख़ुद की ही आँखों में कुछ ढूँढ रही थी ,
अपने गालों पर ढलका पसीना पोंछ रही थी ,
उसके होंठों पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर रही थी ,
शायद कोई आरज़ू आज अंगड़ाई ले रही थी|

उसके अंतस से कोई लड़की-सी
आज बाहर झाँक रही थी..
शरमा कर बड़े जतन से,
अपने बिखरे बालों को सँवार रही थी
आज बुधिया को नहीं,
मैने देखा था..
एक लड़की को..
जो ख़ुद को शीशे में निहार रही थी !

बुधिया मरने वाली है !


डॉक्टर,
रहम!
फीस कम कर लो ,
हम इतने पैसे नहीं दे सकते ,
भगवान से डरो,
मेरी बुधिया का इलाज़ कर दो |
वो रो रही है ..
पास में दस साल की छुटकी ,
खड़ी है,सूबक रही है !
"अम्मा ,जीजी मर जाएगी ?
ये देखो ,कुछ बोल ही नहीं रही है,
मुझसे ग़ुस्सा हो जीजी ?
बोलो ना..
अब मैं तुम्हारे हिस्से का भात नहीं खाऊंगी ,
जीजी सच ,
नये कपड़ों के लिए भी तुझे नहीं सताऊँगी |
बोल ना ,
अम्मा देख ,
लगता है इसको आज काम पर नहीं जाना ,
तभी नाटक कर रही है !
तूने कल डाँटा था ना ,
देख अभी तक भूकड़ कर बैठी है !

बुधिया ...
परसों से ज्वर आ रहा था ,
आज बिगड़ गया ,
शायद मलेरिया के मच्छर ने काटा था |
बाप तो दारूख़ोर है !
पड़ा होगा कहीं .......
नाली में सुअरो के साथ ,
उन्ही के जैसा तो है वो !
अरे नहीं-नहीं !
वो तो फिर भी गंदगी साफ़ करते हैं ,
पर यह !
यह गंदगी फैलाता है ,
बेटी की कमाई दारू में उड़ाता है |
इसको सुअर बोलो ,
तो साला सुअर भी एक बार लजाता है |
बीवी अपाहिज़,चल नही सकती !
एक्सीडेंट के पहले मज़े में था वो ,
दो कमाने वाले थे ना ,
बीवी और बेटी !
एक बोतल रोज़ ही आ जाती थी ,
सारी रात दारू के अड्डे पर कट जाती थी |
ख़ैर अब पीने के बांदे हैं ,
बस बुधिया ही कमाती है ना !

बुधिया !
उम्र-तेरह साल,रंग-साँवला,
बदन भरा-भरा,आँखें-काली ,
और उनमे सपनों की लाशों का जमावड़ा !
सुबह से घरों में काम ,
बर्तन,झाड़ू,पोंछा ,
करते-करते मुरझा गया,
बचपन का पौधा !
यौवन की उमंगों के लिए दिल में जगह ही नहीं ,
वहाँ तो टीस है मज़बूरी और झुंझलाहट ,
बापू पूरे पैसे दारू में उड़ा देता है ,
छुटकी के कपड़े ढंग के नहीं !
स्कूल में मास्टर उस पर चिल्ला देता है !
छुटकी घर आकर चीखती है ,
बुधिया बर्तन धोते-धोते ,
कुछ सोचती है,अक्सर रोती है |
उसके अरमानों को धो डालती है मज़बूरी की बौछार ,
जैसे बर्तन में लगी हुई जूठन !
जैसे देश की रक्षा को तत्पर ,
सैनिकों की पल्टन ,
वैसे ही परिवार के लिए बुधिया |

बुधिया आज बीमार है ,
तीन दिन से कुछ खाया ही नही गया ,
पड़ी है बुख़ार में ,
डाक्टर कहता है,दो घंटे में मर जाएगी !
ग्लुकोज़ की बोतल चढ़ना है ,
अम्मा के पास पैसे नहीं ,
दो घंटे की मोहलत ,
एक में बदल जाएगी !
बुधिया मर गयी ,
तो अच्छा है,उसके लिए ,
बेचारी को मुक्ति मिल जाएगी !
पर छुटकी.....
छूट जाएगा सरकारी स्कूल ,
वो अब काम पर जाएगी !
नहीं-नहीं,वो ऐसा नहीं कर पाएगी
सिर्फ़ एक जोड़ कपड़े ही हैं उसके पास ,
ऊपर से कुर्ती फटी हुई ....
घर में तो अंदर ही रहती है ,
काम पर कैसे जाए !
यह दुविधा बाल-मन को कचोटती हुई !

"अम्मा,जीजी मर जाएगी ,
तो उसे जला देंगे ना "
डाक्टर अंकल ,
मेरी एक बात सुन लोगे ?
मुझ पर एक रहम कर दोगे ?
मैं काम पर कैसे जाऊंगी !
अम्मा के लिए रोटी,बापू के लिए दारू ,
कहाँ से लाऊंगी !
मेरे पास कपड़े नही हैं !
जीजी ने जो पहने हैं ,
वो पूरे साबुत हैं अच्छे हैं !
आप मुझ पर एक एहसान कर देना ,
मेरा बस एक छोटा सा क़ाम कर देना ,
सच!मैं सब कर लूंगी ,
सबको संभाल लूंगी ,
बस जब जीजी मर जाए ,
तो उसके कपड़े उतार कर,
चुपकें से..
मुझे दे देना " !

19 साल का यूनिकवि (मई अंक के परिणाम)


माह का प्रथम सोमवार, मतलब वह पोस्ट जिसमें यूनिकवि और यूनिपाठक का चेहरा छिपा होता है। जिनकी लेखनी में हिन्द-युग्म अंतरजालीय कविता का भविष्य देख रहा है। कौन कविता-प्रेमी नहीं चाहता कि उसे सुंदर कविताएँ पढ़ने और सुनने को मिले! हिन्द-युग्म प्रतियोगिता को आयोजित करके उन्हीं रणबांकुरों को एक जगह जमा करने की जुगत कर रहा है। शुरूआत हिन्द-युग्म के प्रगति-चार्ट से की जाय। पिछली बार ७ मई, २००७ के परिणाम में हमने बताया था कि हमने दैनिक पाठक संख्या में २५८॰६६ प्रतिशत का इज़ाफ़ा किया है और हमारा लक्ष्य १३८ यूनीक पाठक संख्या प्रतिदिन से बढ़ाकर २०० यूनीक पाठक संख्या प्रतिदिन करना होगा। हम अपने लक्ष्य के करीब तक पहुँच भी गये हैं। मई माह में हमें प्रतिदिन ५२१॰४५ पेज़ लोड के हिसाब से पाठक मिले जिसमें १९२॰१३ की संख्या से वो पाठक आए जिन्होंने हमें पहली बार पढ़ा। यह सब टीम वर्क के सुपरिणाम हैं। रंजना भाटिया जी के प्रयासों से हमने टिप्पणियों की संख्या को भी ५० के आँकड़े के पार लगा दिया है। हिन्दी-ब्लॉग की प्रविष्टियों पर टिप्पणियों की यह संख्या कोई आम बात नहीं है।

यूनिकवि के लिए प्रतिभागियों की कुल संख्या- २४

ज़ज़मेंट के लिए चरणों की कुल संख्या- ४

प्रथम चरण - ५ ज़ज़

द्वितीय चरण- ३ ज़ज़

तृतीय चरण- १ ज़ज़

अंतिम चरण- १ ज़ज़

निर्णय प्रणाली- अंकीय प्रणाली (तृतीय चरण में यह प्रणाली नहीं अपनाई गई)


प्रथम चरण के जजमेंट के बाद कुल औसत अंकों के आधार पर २४ कविताओं में से १६ कविताओं को दूसरे चरण में भेजा गया। दूसरे चरण में तीन ज़ज़ों ने १० में से उन्हें अंक दिये, दूसरे दौर के कुल अंक और प्रथम चरण के औसत अंक की गणित से टॉप १० कविताएँ चुनी गईं। टॉप १० कविताओं का निर्धारण इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि डॉ॰ कुमार विश्वास जी ने १० कवियों और २ पाठकों को अपनी काव्य-पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की स्वहस्ताक्षरित प्रति देने की उद्‌घोषणा किए थे।

फ़िर उन १० कविताओं को तृतीय चरण के निर्णयकर्ता के समक्ष रखा जिन्होंने ६ कविताओं को आखिरी दौर में जाने का अवसर दिया।

अंतिम दौर के निर्णयकर्ता के अनुसार तीन बार से यूनिकवि बनने को प्रयासरत, होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) निवासी श्री विपुल शुक्ला हमारे पाँचवें तथा सबसे कम आयु के यूनिकवि हुए। उनकी कविता 'बुधिया की विनती' को सभी १० ज़ज़ों ने खूब सराहा।

प्रथम चरण में यह कविता औसत अंकों के आधार पर दूसरे स्थान पर रही थी।

प्रथम चरण के अंक- ८॰२, ७, ८, ८॰५ और ८
औसत अंक- ७॰९४

मगर दूसरे चरण के बाद इसका स्थान प्रथम हो गया था।

दूसरे चरण के अंक- ९, ८॰१, १० और ७॰९४ (प्रथम चरण का औसत अंक)
औसत अंक- ८॰७६

तीसरे चरण के ज़ज़ ने भी इसे पसंद किया और अंतिम चरण की ओर अग्रेसित किया।

यूनिकवि- विपुल शुक्ला, होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)

परिचय-

इनका जन्म गाडरवारा जिला नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) में 28 मार्च सन् 1988 को हुआ। इनके पैदा होते ही इनका सारा परिवार भोपाल के निकट होशंगाबाद में आकर बस गया जहाँ कवि की पूरी शिक्षा-दीक्षा हुई। ये जिस विद्यालय में पढ़ते थे उसी में इनकी माताजी श्रीमती आभा शुक्ला हिन्दी की शिक्षिका थीं इसीलिये बचपन से ही हिन्दी विषय पर बहुत ध्यान दिया जाता था
इन्होंने अपनी पहली कविता विद्यालय-स्तरीय पत्रिका "प्रगति" के लिए कक्षा ग्यारहवीं में लिखी। उन दिनों अक्सर ये केमेस्ट्री (रसायन शास्त्र) की किताब में कविताओं की किताब रखकर पढ़ा करते थे और पकड़े जाने पर इन्हें अपनी माँ से डाँट भी खानी पड़ती थी।
कक्षा बारहवीं के पश्चात इन्दौर की आई.पी.एस. एकेडेमी में रसायन अभियांत्रिकी (केमिकल इंजीनियरिंग) में प्रवेश ले लिए और वर्तमान में द्वितिय वर्ष के छात्र हैं।
कॉलेज के प्रथम वर्ष में ही वहाँ की काव्य-पाठ प्रतियोगिता में पहला स्थान प्राप्त किया। इसके बाद तो हमेशा ही अच्छा मंच मिलने लगा। इन्हीं दिनों श्री हरिवंश राय बच्चनजी की कालजयी रचना "मधुशाला" की पेरोडी "मेरी मधुशाला" लिखी । जिसमें लगभग 45 छन्द थे। इसे मित्रों द्वारा काफ़ी सराहा गया ।
कॉलेज के समारोहों में अधिकांशत: सूत्रधार की भूमिका निभाने के कारण ये सिर्फ़ मंचीय कविताओं तक ही सीमित रह गये थे। हिन्द-युग्म का साथ मिला तो एक नई दिशा मिली।

संपर्क-
ई मेल :- vipul283@gmail.com
225, शिवम अपार्ट मेंट
धनवंतरी नगर, इंदौर
दूरभाष :- 9926363028


पृरस्कृत कविता- बुधिया की विनती

बुधिया...
हैज़े ने माँ-बाप छीन लिए ...
एक छोटा भाई था !
भाई ?
नहीं-नहीं ... ज़िम्मेदारी !
ज़िम्मेदारी,
जिसने नाज़ुक कंधे झुका दिए

बेबस..
दिन में बस चार घंटे सोती थी,
हाय ! भूखा रह गया फ़िर भी "भैया" ....
ख़ून के आँसू रोती थी ...!
उसका एहसान...
जैसे किसी कविता को पढ़े जाने का वरदान !

वो मासूम,
बारह की..
और "भैया" आठ का ...
वह चारपाई में बुनी रस्सी,
और दूसरा..!
कम्बख़्त ....
"ख़टमल" खाट का

छह साल...
निर्बलता की स्याही ,
ज़िंदगी का काग़ज़ ,
और भूख का कलाम
परिणाम..?
"अक्षमता का आत्मसम्मान" !
सचमुच.. सच्चा अभिमान
और "भैया"..?
कपड़ों के साथ..
भावनाओं से भी तंगहाल ...

अनर्थ.. !
"ख़टमल" ने अपना फ़र्ज़ निभाया ..
बाहर निकला... मासूम को काट ख़ाया !
बुधिया...
एक रात उसने ख़ुद को,
"रेड लाइट एरिए" में पाया
अविश्वसनीय, अकल्पनीय ...
पर .. सत्य

"भैया"..... .जैसे दुनिया की धूप से बचा ,
ममता की छाँव में पला,
कोई कीट..
हाँ-हाँ ..कीट..!
हाय !
झोंपड़ी की ईंट..!
ईंट...जिसने,
अपने गारे को ही बेंच दिया..

"भैया" की भूख..!
सचमुच..पराकाष्ठा को पा लिया
इक प्यारी सी बहना थी ,
"भोजन" बना लिया.....!!!
बुधिया का स्नेहिल दामन ,
जल गया
कारण ?
वही "भैया"
नहीं-नहीं ...
"दीपावली का दीया" ..!

धरती..
एक बार बंजर होती है ,
हर बार नहीं..
बुधिया बस उस रात रोई ,
हर बार नहीं...

मज़बूरी..
मोटर, भरी हो या ख़ाली..
पहिए को चलना पड़ता है
बुधिया प्यार पाए या नफ़रत..
उसे जलना पड़ता है

संवेदना..
कुछ नहीं..
कोई दर्द ,कोई कसक,
बाक़ी नहीं
कुछ भी कहो, करो ..
बुधिया की बस एक ही "विनती" है ,
"बाबू" , मुझे "अक्का" मत कहो..

पेंटिंग- स्मिता तिवारी

अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
कवि ने एक नग्न सत्य को सशक्तता के साथ प्रस्तुत किया है। सीधे संवाद की शैली में रचना को लिख कर एक सफल प्रयोग भी किया है।
“भाई ?
नहीं-नहीं ... ज़िम्मेदारी !
ज़िम्मेदारी ,
जिसने नाज़ुक कंधे झुका दिए”
”वह चारपाई में बुनी रस्सी,
और दूसरा..!
कम्बख़्त ....
"ख़टमल" खाट का “


कवि ने समाज की संवेदनहीनता के मुख पर करारा तमाचा जडा है:

”बुधिया की बस एक ही "विनती" है ,
"बाबू" , मुझे "अक्का" मत कहो..”


कला पक्ष: ८/10
भाव पक्ष: ८॰५/10
कुल योग: १६॰५/२०

पुरस्कार- रु ६०० (रु ३०० 'बुधिया की विनती' के लिए और रु ३०० आगामी तीन सोमवारों को आनी वाली ती कविताओं के लिए) का नक़द ईनाम, रु १०० की पुस्तकें और एक प्रशस्ति-पत्र।

पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है" की एक प्रति (डॉ॰ कुमार विश्वास की ओर से)

अभी तीन अन्य कविताओं की चर्चा करेंगे, लेकिन हिन्द-युग्म की ज़ान, पाठकों की बात कर ली जाय। पुणे में निवास कर रहीं (मूलतः सूरत, गुजरात से) श्रीमती स्वप्ना शर्मा से हमें यह बात पता चली कि हिन्द-युग्म पर वो पिछले २ महीने से आ रही हैं और तब से ही अपनी टिप्पणी लिखना चाह रही हैं, लेकिन अफ़सोस, उन्हें यह समझ में न आ सका कि टिप्पणी कैसे की जाय? हम १-२ दिनों में इस पर सम्पूर्ण टूटोरियल लगाने वाले हैं ताकि नियमित पाठकों की संख्या बढ़ाई जा सके। यद्यपि स्वपना जी ने अब कमेंट करना सीख लिया है और हमें नियमित कमेंट भी कर रही हैं।

अब बात करते हैं हमारे इस बार के यूनिपाठक श्री कुमार आशीष के बारे में, जिन्होंने हिन्द-युग्म को हाल ही में पढ़ना शुरू किया और इतनी ऊर्जा लगाए कि कई कवियों की पुरानी कविताएँ तक पढ़ डाले और कमेंट भी किया। इनकी टिप्पणियों की ख़ास बात यह रही कि देखने में ये तो छोटी थीं मगर पूरी समीक्षा का दम रखती थीं।

यूनिपाठक- कुमार आशीष, फ़ैज़ाबाद (उ॰ प्र॰)

परिचय-
नाम- कुमार आशीष
जन्‍मतिथि- 16 जून 1963
शिक्षा- बी.एससी., एम.ए. (अर्थशास्‍त्र), एलएल.बी., पोस्‍ट ग्रेजुएट डिप्‍लोमा इन कम्‍प्‍यूटर टेक्‍नालाजी एण्‍ड इ‍ंजिनीयरिंग।
जन्‍म जनपद सुलतानपुर के लालडिग्‍गी मोहल्‍ले में हुआ। आरम्‍भिक शिक्षा-दीक्षा अपने पैतृक जनपद फ़ैज़ाबाद में हुई। साहित्‍य से गहरी अभिरुचि बचपन से ही रही। 12 वर्ष की उम्र में पहली कविता लिखी और उसके बाद साहित्‍य की विविध विधाओं यथा कहानी, कविता, गीत, गजल, नाटक, लघुकथा, लेख आदि में स्‍वान्‍त:सुखाय सृजन-कार्य किया। कुछ समय पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। आकाशवाणी में युववाणी की कम्‍पीयरिंग भी की। वर्तमान में जिला ग्राम्‍य विकास अभिकरण, फैजाबाद में कम्‍प्‍यूटर प्रोग्रामर के पद पर कार्यरत हैं।

चिट्ठा - http://suvarnveethika.blogspot.com

ई-मेल - asheesh.dube@gmail.com

सम्‍पर्क -
8/2/6, स्‍टेशन रोड, फैजाबाद-224001 (उ.प्र.)


पुरस्कार- रु ३०० का नक़द ईनाम, रु २०० तक की पुस्तकें और एक प्रशस्ति-पत्र।

पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है" की एक प्रति (डॉ॰ कुमार विश्वास की ओर से)

एक अज़ीब बात भी रही। हमने यह उद्‌घोषणा की थी कि हम इस बार टॉप २ पाठकों को पुरस्कृत करेंगे। टिप्पणियों की संख्या के आधार पर श्री परमजीत बाली हमारे रनर-अप पाठक हैं। उन्होंने हमें खूब पढ़ा, प्रोत्साहित किया। मगर अफ़सोस कि उनके नाम के लिंक पर जाने पर, उनका पूरा प्रोफ़ाइल पढ़ने पर भी उनकी ईमेल हासिल नहीं की जा सकी। उन्होंने अपने ब्लॉग पर अनुभूति-हिन्दी याहू समूह का लिंक भी लगा रखा था, सोचा गया शायद वे इसके सदस्य हों। वहाँ सदस्य बना गया, सर्च किया गया, नहीं मिले, ऑरकुट पर इस नाम का एक आदमी मिला, मगर उसने कोई जवाब नहीं दिया। अंततः इनके चिट्ठे की एक पोस्ट पर कमेंट रूप में ई-मेल आई डी बताने का निवेदन किया गया मगर प्रतिउत्तर नहीं मिला।

हम उम्मीद करते हैं कि वो इस रिज़ल्ट को ज़रूर पढ़ेंगे। उनसे निवेदन है कि कृपया वो अपने डाक का पता hindyugm@gmail.com पर भेज दें ताकि श्री कुमार विश्वास उन्हें अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' भेंट कर सकें।

पिछली बार की यूनिपाठिका सुनीता चोटिया ने इस बार भी हमारी हर पोस्ट पर कमेंट किया। दावेदार वो भी थीं लेकिन हमारी कोशिश नए चेहरे तलाशना भी है, इसलिए उनसे विशेष अनुमति ली गई। इसके अतिरिक्त डीवाइन इंडिया, सजीव सारथी, स्वप्ना शर्मा, मेधा पुरानडरे, सुनील डोगरा ज़ालिम इत्यादि ने हमारा बहुत सहयोग दिया।

पुनः कविताओं की ओर लौटते हैं।
दूसरे स्थान की कविता को अलग-अलग चरण के ज़ज़ों ने अलग-अलग तरह से लिया। निखिल आनंद गिरि की कविता 'वक़्त लगता है' ८॰१, ६॰५, ६, ८॰५ और ६ अंकों (औसत ७॰०२) के साथ आठवें पायदान पर थी। दूसरे चरण में यह चार पायदान ऊपर ख़िसक गई। दूसरे चरण के तीन ज़ज़ों ने क्रमशः ८॰७५, ८॰३५ और ७॰५ अंक दिए। अंतिम ज़ज़ को इतनी अच्छी लगी कि इसने दूसरा स्थान सुनिश्चित कर लिया।

कविता- वक़्त लगता है

कवि- निखिल आनंद गिरि, समस्तीपुर (बिहार)

वक़्त लगता है मन पर पड़ी गर्द हटाने में,
हालाँकि, रोज़ होती है बारिश आँखों के दरीचे से
मन के कई हिस्से अब भी धुले-धुले से हैं

वक़्त लगता है बदलते हुए वक़्‍‍त का मिज़ाज़ समझने में
कोशिशें मुसल्लम ज़ारी हैं

यह तय करना आसान नहीं कि भीड़ का हिस्सा बनना कहाँ तक लाज़िमी है
भीड़ जो कभी किसी की नहीं होती, और न ही आप हो पाते हैं कभी भीड़ के

वक़्त मुट्ठी में फँसी रेत की तरह फिसलता है, और हम बने रहते हैं तमाशबीन

तमाशा ही तो है एक अच्छे रिश्ते का बनना
और उस थोड़े से वक़्त में, जब तक आप ये तय पायें कि कितनी शिद्दत के साथ निभाना है वो रिश्ता
टूट जाता है रिश्ता
ठीक वैसे ही
जैसे बादल से निकलता है सूरज पल भर के लिए,
और हम जब तक अपने गीले अरमानों की गठरी खोलकर पसार सकें
दिखा पायें थोड़ी-सी धूप
कहीं नहीं होता सूरज…..
कहीं नहीं..

गीले अरमान लिये,
मैं भी कर रहा हूँ इंतज़ार…
कि तुम जो ज़िंदगी के सबसे आसान मोड़ पर
मेरा सूरज साथ लिये खो गई हो
मैं खड़ा हूँ…
उफ़!! डर है कि तुम्हारी प्रतिक्षा में
जो खड़ा हूँ इस बवंडर में
और ढँक गया है मेरा पूरा अक़्स
धूल-गर्द से…….
तन भी, मन भी….
डर है कि तुम इधर से गुजरो और
मुझे पहचान भी न सके
तुम्हारी आँखें मेरे सूरज से चौंधाई-सी……
मुझे बस थोड़ा-सा वक़्त देना मेरे दोस्त…
मेरे मन के कई हिस्से अब भी धुले-धुले हैं…..
और थोड़ा वक़्त दोगी तो झटक दूँगा बाकी गर्द भी….
वक़्त तो लगता है न,
मन पर पड़ी गर्द हटाने में………….

अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
असाधारण रचना है। बिम्ब तो इतने सुन्दर हैं कि कवि के लिये बरबस ही “वाह” निकलती है।
“यह तय करना आसान नहीं कि भीड़ का हिस्सा बनना कहाँ तक लाज़िमी है”
”वक़्त मुट्ठी में फँसी रेत की तरह फिसलता है, और हम बने रहते हैं तमाशबीन”
”और हम जब तक अपने गीले अरमानों की गठरी खोलकर पसार सकें
दिखा पायें थोड़ी-सी धूप
कहीं नहीं होता सूरज…..”


कला पक्ष: ७॰५/१०
भाव पक्ष: ८/१०
कुल योग: १५॰५/२०

पुरस्कार- सृजनगाथा की ओर से रु ३०० तक की पुस्तकें। कुमार विश्वास की ओर से उनकी अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की एक प्रति।

तीसरे स्थान की कविता 'आकांक्षा' बहुत दुर्भाग्यशाली रही। प्रथम चरण के ज़ज़ों ने इसे बहुत अधिक पसंद किया। ८॰५, ९॰५, ८, ९॰५ और ७ (औसत ८॰५) अंकों के साथ प्रथम चरण की यह नं॰ १ कविता थी। दूसरे चरण के ज़ज़ों के अंकों और पिछले चरण के औसत अंक (जो कि क्रमशः ९॰२५, ७ , ९॰४ और ८॰५ थीं) को जब सम्मिलित किया गया तो यह दूसरे स्थान पर ख़िसक गई। तीसरे ज़ज़ ने इसे अग्रेसित तो किया, मगर 'आकांक्षा' अंतिम ज़ज़ को 'बुधिया की विनती' और 'वक़्त लगता है' से कम पसंद आई।

कविता- आकांक्षा

कवि- दिनेश पारते, बैंगलूरू (कर्नाटक)

हे कृष्ण मुझे उन्माद नहीं, उर में उपजा उत्थान चाहिये
अब रास न आता रास मुझे, मुझको गीता का ज्ञान चाहिये

निर्विकार निर्वाक रहे तुम, मानव निहित संशयों पर
किंचित प्रश्नचिन्ह हैं अब तक, अर्धसत्य आशयों पर
कब चाह रही है सुदर्शन की, कब माँगा है कुरुक्षेत्र विजय
मैंने तो तुमसे माँगा, वरदान विजय का विषयों पर

मन कलुषित न हो, विचलित न हो, ऐसा एक वरदान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये

संचित कर पाता क्या कोई, इस क्षणभंगुर से जीवन में
न देह थके न स्नेह थके, थिरकन जब तक स्पंदन में
यह प्राण गात में है जब तक, निष्पादित हो निष्काम कर्म
है चाह नहीं आराधन का, अभिमान रहे अंतर्मन में

मुझे सर्वविदित सम्मान नहीं, अंतर्मन का अभिमान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये

हो साँसों में ताकत इतनी, कि शंखनाद हर शब्द बने
हो शक्ति भुजाओं में इतनी, दुर्गम दुर्लभ उपलब्ध बने
अवलम्ब बनूँ मैं अपना ही, खोजूँ आश्रय अपने अंदर
कह सकूँ जिसे मेरी अपनी, पहचान प्रखर प्रारब्ध बने

प्रारब्ध बने पुरुषार्थ प्रबल, ऐसी मुझको पहचान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये

कर्मबोध दे दो मुझको, नभ का जल का अचलाचल का
मर्मबोध दे दो मुझको, माँ के ममतामयी आँचल का
धर्मबोध दे दो मुझको, कर लूँ धारण वस्त्रास्त्र समझ
आत्मबोध दे दो मुझको, मन के मेरे अंतस्थल का

अनुसरण नहीं, अनुकरण नहीं, अंतस्थल का अभिज्ञान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये

अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
कविता के कथ्य गंभीर है और दर्शन से ओत-प्रोत हैं। “हे कृष्ण मुझे उन्माद नहीं, उर में उपजा उत्थान चाहिये” कह कर जिस अधिकार से गीता का ज्ञान चाहा है वह आत्मविश्वासी पहल है। अर्जुन अशक्त हो कर गीता का ज्ञान पा सके थे, कवि तो ओज से पूरित है:
“हो साँसों में ताकत इतनी, कि शंखनाद हर शब्द बने
हो शक्ति भुजाओं में इतनी, दुर्गम दुर्लभ उपलब्ध बने
अवलम्ब बनूँ मैं अपना ही, खोजूँ आश्रय अपने अंदर
कह सकूँ जिसे मेरी अपनी, पहचान प्रखर प्रारब्ध बने”

”अनुसरण नहीं, अनुकरण नहीं, अंतस्थल का अभिज्ञान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये”

कला पक्ष: ७/१०
भाव पक्ष: ७॰५/१०
कुल योग: १४॰५/२०

पुरस्कार- सृजनगाथा की ओर से रु ३०० तक की पुस्तकें। कुमार विश्वास की ओर से उनकी अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की एक प्रति।

चौथे स्थान की कविता 'गीत गुनगुना मन' की कहानी भी 'वक़्त लगता है' से मिलती जुलती है। पहले चरण में औसत अंक ७॰५४ (८॰२, ७, ७, ९॰५ और ६) के आधार पर इसका स्थान चौथा रहा। दूसरे दौर में यह ८॰७५, ६॰९ और ९॰५ अंकों के आधार पर तीसरे स्थान पर आ गई। और अंत में भी इसने चौथा स्थान बनाए रखा।

कविता- गीत गुनगुना मन

कवि- श्रीकान्त मिश्र 'कान्त', चंडीगढ़


मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

माना लहरें भँवर भयंकर
धीरज नैया डोले
आशा की पतवार उठा ले
माझी साहस कर ले
वैचारिक झंझावातों से
हार न बैठो मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

थक कर चकनाचूर है फिर भी
बैठ न आँखें मीचे
अविचल नियम प्रकृति का निश दिन
चलते आगे पीछे
कहीं 'नित्य' का रथ रुकता है
सोच विहंस मेरे मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

तारे घटा टोप में डूबे
'शशि' मेघों ने घेरा
घनीभूत नैराश्य हो चला
मन में डाले डेरा
'पौरूष' को ललकार 'कान्त' कर
नभ से प्रकट 'तड़ित' मन
कठिन तमस निश्चय जायेगा
गीत गुनगुना मन

मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
गुनगुनाने की इच्छा होती है यह रचना पढ़ते ही। कवि की भाषा और भाव पर पकड़ सराहनीय है। “कठिन तमस भी कट जायेगा, गीत गुनगुना मन” पूर्णत: आशावादी कथ्य है, जिसे ओजस्वी भावों से कवि ने प्रस्तुत भी किया है। वैचारिक झंझावातों से, हार न बैठो मन कह कर कवि आज के युग की परिस्थितियों से पाठक को जोड़ता भी है, उम्मीद भी भरता है। कविता उर्जावत करने में सक्षम है।

कला पक्ष: ७/१०
भाव पक्ष: ७/१०
कुल योग: १४/२०

पुरस्कार- सृजनगाथा की ओर से रु ३०० तक की पुस्तकें। कुमार विश्वास की ओर से उनकी अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की एक प्रति।

अब बात करते हैं उन ६ कवियों की जिनकी कविताएँ इन चार कविताओं के अतिरिक्त अंतिम १० में रहीं। उन कविताओं का प्रकाशन जून महीने के आने वाले शुक्रवारों और रिक्त वारों को हिन्द-युग्म पर होगा। इन ६ कवियों को भी डॉ॰ कुमार विश्वास अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की स्वहस्ताक्षरित प्रति भेज रहे हैं।

  • कवि कुलवंत सिंह

  • कमलेश नाहता नीरव

  • अमिता मिश्र 'नीर'

  • तपन शर्मा

  • प्रिया सुदरानिया

  • सजीव सारथी


  • इनके अतिरिक्त जिन अन्य १४ कवियों ने भाग लिया, उनका भी हम हृदय से धन्यवाद करते हैं। हमारे सभी प्रयासों की सफलता आपकी भागीदारी, आपकी सक्रियता पर अवलम्बित है, अतः हम आप सभी के शुक्रगुजार हैं। सभी कवियों से निवेदन है कि परिणाम को सकारात्मकता के साथ लें। अच्छी से अचछी कविताएँ आप लिख सकते हैं, प्रयास करते रहिए। नई ऊर्जा के साथ जून माह की प्रतियोगिता में भाग लीजिए। हम उन के भी नाम प्रकाशित कर रहे हैं-

  • शलभ जैन

  • कुमार आशीष

  • डॉ॰ गरिमा तिवारी

  • वरुण कुमार

  • डॉ॰ महेश चंद्र ख़लिश

  • स्वर्ण ज्योति

  • विशाखा

  • डॉ॰ सुरेखा भट्ट

  • ऋषिकेश खोड़के 'रूह'

  • प्रिंस जैन

  • संध्या भगत

  • अजय सोहनी

  • सुनील डोगरा 'जालिम'

  • मेधा पुरानडरे


  • आप सभी को देवनागरी-प्रोत्साहन का हिस्सा बनने के लिए हार्दिक धन्यवाद।