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Saturday, September 29, 2007

छोटी सी बुधिया


बाहर आँगन में सीताफल का पेड़ था
फल कच्चे थे, गुहार कर रहे थे
हमें मत तोड़ो ,हमें मत झंझोड़ो |
बड़े-बूढ़े कहते हैं..
यदि कच्चे सीताफल को भूसे में गाड़ दो
तो कुछ समय में वो पक जाता है,
बुधिया पंद्रह साल की हुई
तो उसका गौना हो जाता है |

छोटी सी उमर..
दिन भर सिर पर पल्ला
क्या सरल काम है ?
चूल्हे में फूँकनी से अंगारे सुलगाती बुधिया
और बुझे हुए अंगारों के साथ उड़ती
सपनों की कालिख ..
यह नज़ारे गावों में आज भी आम हैं |

नयी बहू आई है ..
सुहागलें हो रही थीं
सामने थाल में बाताशे रखे थे
बुधिया के मन में विचारों के भंवर चल रहे थे |
बताशे..
आह्!बापू यह मेरे लिए लाते थे
बुधिया..देख क्या लाया हूँ ,
इनके लिए मुझे कितना सताते थे !
अचानक उसने कुछ सोचा
फिर हाथ बढ़ाया
बड़ी सफ़ाई से एक बताशा उठाया
और घूँघट में छिपा लिया !
जो बीत जाता है..वो वापस क्यों नही आता ?
ज़िंदगी का हर सुख ..
इस बताशे-सा क्यों नहीं हो जाता!
दीपावली आ रही है
सास ने कहा आँगन छाबना है
बुधिया छाब रही है ..
और सोच रही है
काश मेरी ज़िंदगी भी इस आँगन-सी होती !

उसे नहीं पता
नवजात शिशुओं को
जलाया नहीं गाड़ा जाता है
तभी तो..
वो अपने अरमानों को
गोबर के साथ मिलाती है
बड़े प्यार से,जतन से
उनके कंडे बनाती है,
इन कंडों को चूल्हे में जलाती है!

नवजात शिशुओं से सपने ..
इन शिशुओं की चिता पर
वह रोज़ रोटी पकाती है ,
अपनी सास, ससुर और पति को
बड़े प्यार से खिलाती है !

उसका जी मचल रहा था
उलटी का मन कर रहा था
उस आँगन में
सीताफल के पेड़ के नीचे
आज गोद भराई का उत्सव हो रहा था |
आठ महीने बाद..
नाला पूर था,
शहर दूर था ,
गाँव में एक दाई थी
बुधिया ने एक लड़की जायी थी !

लड़की तो आई पर बुधिया चली गयी
मर गयी..
लड़की को जनमा था ,
ताने तो सुनने से बच गयी
पर इस बाल-विवाह की वेदी पर.
एक और बकरी,
कटने छोड़ गयी !

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16 कविताप्रेमियों का कहना है :

सजीव सारथी का कहना है कि -

वाह विपुल जी एक बार फ़िर आपकी बुधिया ने झंक्झोर दिया, कायल हो गया हूँ आपका, शुरुवात में जो सिताफल के कच्चे फलों की जो उपमा आपने दी है और उसके बाद बुधिया के किरदार को जिस तरह बुना है कहीँ भी प्रवाह नही टूटता एक साँस में पढ़ गया पूरी कविता एक एक लफ्ज़ सच और अन्त मार्मिक,
लड़की को जनमा था ,
ताने तो सुनने से बच गयी
पर इस बाल-विवाह की वेदी पर.
एक और बकरी,
कटने छोड़ गयी !
कविता ऐसी हो होनी चाहिए, बहुत बहुत बधाई आपको

Gita pandit का कहना है कि -

विपुल जी !
एक बार फ़िर....
बुधिया ने झंक्झोर दिया है |

लड़की को जनमा था ,
ताने तो सुनने से बच गयी
पर इस बाल-विवाह की वेदी पर.
एक और बकरी,
कटने छोड़ गयी !


वाह....
मार्मिक सच को दर्शाती एक अच्छी कविता ...... :-)

बधाई

tanha kavi का कहना है कि -

विपुल भाई,
तुम तो बुधिया को लेकर कमाल करते जा रहे हो। मेरे अनुसार बुधिया की यह चौथी कड़ी है। और हर कड़ी एक से बढ कर एक। तुमने सीता फल, नवजात शिशु को जलाना नहीं गाड़ना, बताशे , बकड़ी , इन सब बिंबों के माध्यम से बुधिया के पात्र को जीवित कर दिया है।
बुधिया की अगली कड़ी के इंतजार में-
विश्व दीपक 'तन्हा'

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

बिपुल जीं,
आपकी बुधिया तो देश का एक "सिम्बल" बनने जा रही है........
इस बार तो कमाल ही कर दिया.......
''ज़िंदगी का हर सुख ..
इस बताशे-सा क्यों नहीं हो जाता!'
"यदि कच्चे सीताफल को भूसे में गाड़ दो
तो कुछ समय में वो पक जाता है,
बुधिया पंद्रह साल की हुई
तो उसका गौना हो जाता है |"

क्या बात है.......मुझे कविता बड़ी पसंद आई.......आप ऐसा ही लिखते रहें......

निखिल...

अजय यादव का कहना है कि -

सुंदर रचना है, विपुल जी!
बधाई स्वीकारें!

anuradha srivastav का कहना है कि -

विपुल जी मार्मिक और अति सम्वेदनशील कविता।
उसे नहीं पता
नवजात शिशुओं को
जलाया नहीं गाड़ा जाता है
तभी तो..
वो अपने अरमानों को
गोबर के साथ मिलाती है
बड़े प्यार से,जतन से
उनके कंडे बनाती है,
इन कंडों को चूल्हे में जलाती है!
अधिकांशतः गांवों में कमोबेश लडकियों की यहीं स्थति आज भी है।
नवजात शिशुओं से सपने ..
इन शिशुओं की चिता पर
वह रोज़ रोटी पकाती है ,
अपनी सास, ससुर और पति को
बड़े प्यार से खिलाती है !
झकझोर देने वाली कविता।
आप सफल रहें ।

रंजू का कहना है कि -

बुधिया जब भी आती है कुछ न कुछ दिल में हलचल जरुर मचा जाती है.. बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है ..भाव बहुत ही दिल को छू लेने वाले हैं बधाई विपुल जी सुंदर रचना के लिए!!

RAVI KANT का कहना है कि -

विपुल जी,
बुधिया ने झकझोर दिया अंतर्मन को।

बड़े-बूढ़े कहते हैं..
यदि कच्चे सीताफल को भूसे में गाड़ दो
तो कुछ समय में वो पक जाता है,
बुधिया पंद्रह साल की हुई
तो उसका गौना हो जाता है |

बहुत सुन्दर बिम्ब है।

जो बीत जाता है..वो वापस क्यों नही आता ?
ज़िंदगी का हर सुख ..
इस बताशे-सा क्यों नहीं हो जाता!

वाह!वाह!...पूरी कविता ही अनूठी है,बधाई।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

विपुल जी,


आपकी बुधिया श्रृंखला की रचनाओं में इसे आपको बहुत उपर रखना होगा। आप साधुवाद के पार्त है कि इस झकझोरती हुई रचना में मार्मिकता और कथ्य दोनों को कहीं भी ढीला नहीं होने दिया है आपने। गलती से आपका फोन नंबर मेरे पास से कहीं गुम हो गया अन्यथा इस रचना पर मैं आप को व्यक्तिगत रूप से फोन भी कर प्रसन्नता प्रेषित करना चाहता था।


एक सुझाव है, चूंकि सीताफल के बिम्ब से तुमने बात आरंभ की थी अत: अंत में बकरी का बिम्ब यद्यपि कविता की संपूर्णता में कोई खलल नहीं डाल रहा तथापि सीताफल से ही कथ्य का अंत करते तो शायद ज्यादा कसावट होती रचना के अंत में।

*** राजीव रंजन प्रसाद

shivani का कहना है कि -

vipul ji.budhiya naam ki aapki yeh pehli rachna meine padhi hai....jaise jaise mein lines padhti ja rahi thi usko mehsoos bhi ker rahi thi ...aur ant tak to aankhon mein aansoo aa chuke they...aap badhai ke patr heinki aapne itne sunder tareeqe se samaj ki kureetiyon ko darshaya hai...badhai swekar karien...

विपुल का कहना है कि -

धन्यवाद.. मुझे पता नहीं था की आप सभी को यह कविता इतनी पसंद आएगी | ईमानदारी से कहूँ तो मुझे बुधिया श्रंखला की पिछली कविता "एक और बुधिया" ज़्यादा अच्छी लगी थी | इस कविता पर आई टिप्पणियों को पढ़कर बड़ा अच्छा लगा | विशेषकर राजीव जी की प्रशंसा पाना मेरे लिए दुर्लभ ही रहा है इस कविता ने यह मौक़ा प्रदान किया |
आपने सही कहा है की सीताफल वाले कथन से ही बात समाप्त होती तो ज़्यादा प्रभावी होती | अब मुझे ऐसा आभास हो रहा है | इन बातों का आगे से ध्यान रखने का पूरा प्रयास करूँगा |
सभी को एक बार फिर से धन्यवाद कहना चाहूँगा |

"राज" का कहना है कि -

विपुल जी!!!
बहुत ही सही मुद्दा चुना आपने.....आजकल ऐसे ही कवियों की जरूरत है जो असली मुद्दे को उभार के सामने लाये कविता के माध्यम से....
बहुत अच्छी है आप्की रचना...
बधाई हो!!

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

बिलकुल सही तस्वीर पेश की है आपने। मगर हाँ, एकरसता सी आ रही है।

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

विपुल जी,

एक बार फ़िर मार्मिक रचना.
बहुत ही सुन्दर शब्दों में आपने अपने भावों को पिरोया है.

परन्तु एक बात... सीताफल (काशीफल) का पेड नहीं, बेल होती है

राहुल पाठक का कहना है कि -

vipul ji bahut hi sashkt rachna hai..aur mujhr pichli budhiya se
bhi achhi lagi....sitafal ke bimb ka adbhut pryog kiya hai aapne........

jaisa ki aap kah rahe the ki mere vishay per aap budhiya likhne ki sonch rahe the...to mai janta hoon aapka praysh mujhe shahshtra guna accha hi to....aap ki lekhni me jadu hai.......
meri najar me hindiyugm ke sarvshrest kavinyo me se hai

Hanfee Sir IPS Wale Bhaijaan का कहना है कि -

Dear Vipul,

Aapki kavita ki har punkti main ek sandesh hain, Din bhar sir pur pulla kya saral kaam hain, bilkul theek usi tarah jis tarah ki, maa ki jali hui roti to dikh gayi, lakin uske jale hue haath kisi ne nahi dekhe, aap meri hi vichardhara ke hain,
meri shubh kamnaye, apni padai main bhi aap kamyaab ho aur sahitya main bhi bhagwati ki kripa rahe, esi hi kamna apse
Hanfee Sir IPSwale Bhaijaan

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