यूनिकवि के लिए प्रतिभागियों की कुल संख्या- २४
ज़ज़मेंट के लिए चरणों की कुल संख्या- ४
प्रथम चरण - ५ ज़ज़
द्वितीय चरण- ३ ज़ज़
तृतीय चरण- १ ज़ज़
अंतिम चरण- १ ज़ज़
निर्णय प्रणाली- अंकीय प्रणाली (तृतीय चरण में यह प्रणाली नहीं अपनाई गई)
प्रथम चरण के जजमेंट के बाद कुल औसत अंकों के आधार पर २४ कविताओं में से १६ कविताओं को दूसरे चरण में भेजा गया। दूसरे चरण में तीन ज़ज़ों ने १० में से उन्हें अंक दिये, दूसरे दौर के कुल अंक और प्रथम चरण के औसत अंक की गणित से टॉप १० कविताएँ चुनी गईं। टॉप १० कविताओं का निर्धारण इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि डॉ॰ कुमार विश्वास जी ने १० कवियों और २ पाठकों को अपनी काव्य-पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की स्वहस्ताक्षरित प्रति देने की उद्घोषणा किए थे।
फ़िर उन १० कविताओं को तृतीय चरण के निर्णयकर्ता के समक्ष रखा जिन्होंने ६ कविताओं को आखिरी दौर में जाने का अवसर दिया।
अंतिम दौर के निर्णयकर्ता के अनुसार तीन बार से यूनिकवि बनने को प्रयासरत, होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) निवासी श्री विपुल शुक्ला हमारे पाँचवें तथा सबसे कम आयु के यूनिकवि हुए। उनकी कविता 'बुधिया की विनती' को सभी १० ज़ज़ों ने खूब सराहा।
प्रथम चरण में यह कविता औसत अंकों के आधार पर दूसरे स्थान पर रही थी।
प्रथम चरण के अंक- ८॰२, ७, ८, ८॰५ और ८
औसत अंक- ७॰९४
मगर दूसरे चरण के बाद इसका स्थान प्रथम हो गया था।
दूसरे चरण के अंक- ९, ८॰१, १० और ७॰९४ (प्रथम चरण का औसत अंक)
औसत अंक- ८॰७६
तीसरे चरण के ज़ज़ ने भी इसे पसंद किया और अंतिम चरण की ओर अग्रेसित किया।
यूनिकवि- विपुल शुक्ला, होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)
परिचय-
इनका जन्म गाडरवारा जिला नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) में 28 मार्च सन् 1988 को हुआ। इनके पैदा होते ही इनका सारा परिवार भोपाल के निकट होशंगाबाद में आकर बस गया जहाँ कवि की पूरी शिक्षा-दीक्षा हुई। ये जिस विद्यालय में पढ़ते थे उसी में इनकी माताजी श्रीमती आभा शुक्ला हिन्दी की शिक्षिका थीं इसीलिये बचपन से ही हिन्दी विषय पर बहुत ध्यान दिया जाता थाइन्होंने अपनी पहली कविता विद्यालय-स्तरीय पत्रिका "प्रगति" के लिए कक्षा ग्यारहवीं में लिखी। उन दिनों अक्सर ये केमेस्ट्री (रसायन शास्त्र) की किताब में कविताओं की किताब रखकर पढ़ा करते थे और पकड़े जाने पर इन्हें अपनी माँ से डाँट भी खानी पड़ती थी।
कक्षा बारहवीं के पश्चात इन्दौर की आई.पी.एस. एकेडेमी में रसायन अभियांत्रिकी (केमिकल इंजीनियरिंग) में प्रवेश ले लिए और वर्तमान में द्वितिय वर्ष के छात्र हैं।
कॉलेज के प्रथम वर्ष में ही वहाँ की काव्य-पाठ प्रतियोगिता में पहला स्थान प्राप्त किया। इसके बाद तो हमेशा ही अच्छा मंच मिलने लगा। इन्हीं दिनों श्री हरिवंश राय बच्चनजी की कालजयी रचना "मधुशाला" की पेरोडी "मेरी मधुशाला" लिखी । जिसमें लगभग 45 छन्द थे। इसे मित्रों द्वारा काफ़ी सराहा गया ।
कॉलेज के समारोहों में अधिकांशत: सूत्रधार की भूमिका निभाने के कारण ये सिर्फ़ मंचीय कविताओं तक ही सीमित रह गये थे। हिन्द-युग्म का साथ मिला तो एक नई दिशा मिली।
संपर्क-
ई मेल :- vipul283@gmail.com
225, शिवम अपार्ट मेंट
धनवंतरी नगर, इंदौर
दूरभाष :- 9926363028
पृरस्कृत कविता- बुधिया की विनती
बुधिया...

हैज़े ने माँ-बाप छीन लिए ...
एक छोटा भाई था !
भाई ?
नहीं-नहीं ... ज़िम्मेदारी !
ज़िम्मेदारी,
जिसने नाज़ुक कंधे झुका दिए
बेबस..
दिन में बस चार घंटे सोती थी,
हाय ! भूखा रह गया फ़िर भी "भैया" ....
ख़ून के आँसू रोती थी ...!
उसका एहसान...
जैसे किसी कविता को पढ़े जाने का वरदान !
वो मासूम,
बारह की..
और "भैया" आठ का ...
वह चारपाई में बुनी रस्सी,
और दूसरा..!
कम्बख़्त ....
"ख़टमल" खाट का
छह साल...
निर्बलता की स्याही ,
ज़िंदगी का काग़ज़ ,
और भूख का कलाम
परिणाम..?
"अक्षमता का आत्मसम्मान" !
सचमुच.. सच्चा अभिमान
और "भैया"..?
कपड़ों के साथ..
भावनाओं से भी तंगहाल ...
अनर्थ.. !
"ख़टमल" ने अपना फ़र्ज़ निभाया ..
बाहर निकला... मासूम को काट ख़ाया !
बुधिया...
एक रात उसने ख़ुद को,
"रेड लाइट एरिए" में पाया
अविश्वसनीय, अकल्पनीय ...
पर .. सत्य
"भैया"..... .जैसे दुनिया की धूप से बचा ,
ममता की छाँव में पला,
कोई कीट..
हाँ-हाँ ..कीट..!
हाय !
झोंपड़ी की ईंट..!
ईंट...जिसने,
अपने गारे को ही बेंच दिया..
"भैया" की भूख..!
सचमुच..पराकाष्ठा को पा लिया
इक प्यारी सी बहना थी ,
"भोजन" बना लिया.....!!!
बुधिया का स्नेहिल दामन ,
जल गया
कारण ?
वही "भैया"
नहीं-नहीं ...
"दीपावली का दीया" ..!
धरती..
एक बार बंजर होती है ,
हर बार नहीं..
बुधिया बस उस रात रोई ,
हर बार नहीं...
मज़बूरी..
मोटर, भरी हो या ख़ाली..
पहिए को चलना पड़ता है
बुधिया प्यार पाए या नफ़रत..
उसे जलना पड़ता है
संवेदना..
कुछ नहीं..
कोई दर्द ,कोई कसक,
बाक़ी नहीं
कुछ भी कहो, करो ..
बुधिया की बस एक ही "विनती" है ,
"बाबू" , मुझे "अक्का" मत कहो..
पेंटिंग- स्मिता तिवारी
अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
कवि ने एक नग्न सत्य को सशक्तता के साथ प्रस्तुत किया है। सीधे संवाद की शैली में रचना को लिख कर एक सफल प्रयोग भी किया है।
“भाई ?
नहीं-नहीं ... ज़िम्मेदारी !
ज़िम्मेदारी ,
जिसने नाज़ुक कंधे झुका दिए”
”वह चारपाई में बुनी रस्सी,
और दूसरा..!
कम्बख़्त ....
"ख़टमल" खाट का “
कवि ने समाज की संवेदनहीनता के मुख पर करारा तमाचा जडा है:
”बुधिया की बस एक ही "विनती" है ,
"बाबू" , मुझे "अक्का" मत कहो..”
कला पक्ष: ८/10
भाव पक्ष: ८॰५/10
कुल योग: १६॰५/२०
पुरस्कार- रु ६०० (रु ३०० 'बुधिया की विनती' के लिए और रु ३०० आगामी तीन सोमवारों को आनी वाली ती कविताओं के लिए) का नक़द ईनाम, रु १०० की पुस्तकें और एक प्रशस्ति-पत्र।
पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है" की एक प्रति (डॉ॰ कुमार विश्वास की ओर से)
अभी तीन अन्य कविताओं की चर्चा करेंगे, लेकिन हिन्द-युग्म की ज़ान, पाठकों की बात कर ली जाय। पुणे में निवास कर रहीं (मूलतः सूरत, गुजरात से) श्रीमती स्वप्ना शर्मा से हमें यह बात पता चली कि हिन्द-युग्म पर वो पिछले २ महीने से आ रही हैं और तब से ही अपनी टिप्पणी लिखना चाह रही हैं, लेकिन अफ़सोस, उन्हें यह समझ में न आ सका कि टिप्पणी कैसे की जाय? हम १-२ दिनों में इस पर सम्पूर्ण टूटोरियल लगाने वाले हैं ताकि नियमित पाठकों की संख्या बढ़ाई जा सके। यद्यपि स्वपना जी ने अब कमेंट करना सीख लिया है और हमें नियमित कमेंट भी कर रही हैं।
अब बात करते हैं हमारे इस बार के यूनिपाठक श्री कुमार आशीष के बारे में, जिन्होंने हिन्द-युग्म को हाल ही में पढ़ना शुरू किया और इतनी ऊर्जा लगाए कि कई कवियों की पुरानी कविताएँ तक पढ़ डाले और कमेंट भी किया। इनकी टिप्पणियों की ख़ास बात यह रही कि देखने में ये तो छोटी थीं मगर पूरी समीक्षा का दम रखती थीं।
यूनिपाठक- कुमार आशीष, फ़ैज़ाबाद (उ॰ प्र॰)
परिचय-
नाम- कुमार आशीष
जन्मतिथि- 16 जून 1963

शिक्षा- बी.एससी., एम.ए. (अर्थशास्त्र), एलएल.बी., पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन कम्प्यूटर टेक्नालाजी एण्ड इंजिनीयरिंग।
जन्म जनपद सुलतानपुर के लालडिग्गी मोहल्ले में हुआ। आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा अपने पैतृक जनपद फ़ैज़ाबाद में हुई। साहित्य से गहरी अभिरुचि बचपन से ही रही। 12 वर्ष की उम्र में पहली कविता लिखी और उसके बाद साहित्य की विविध विधाओं यथा कहानी, कविता, गीत, गजल, नाटक, लघुकथा, लेख आदि में स्वान्त:सुखाय सृजन-कार्य किया। कुछ समय पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। आकाशवाणी में युववाणी की कम्पीयरिंग भी की। वर्तमान में जिला ग्राम्य विकास अभिकरण, फैजाबाद में कम्प्यूटर प्रोग्रामर के पद पर कार्यरत हैं।
चिट्ठा - http://suvarnveethika.blogspot.com
ई-मेल - asheesh.dube@gmail.com
सम्पर्क -
8/2/6, स्टेशन रोड, फैजाबाद-224001 (उ.प्र.)
पुरस्कार- रु ३०० का नक़द ईनाम, रु २०० तक की पुस्तकें और एक प्रशस्ति-पत्र।
पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है" की एक प्रति (डॉ॰ कुमार विश्वास की ओर से)
एक अज़ीब बात भी रही। हमने यह उद्घोषणा की थी कि हम इस बार टॉप २ पाठकों को पुरस्कृत करेंगे। टिप्पणियों की संख्या के आधार पर श्री परमजीत बाली हमारे रनर-अप पाठक हैं। उन्होंने हमें खूब पढ़ा, प्रोत्साहित किया। मगर अफ़सोस कि उनके नाम के लिंक पर जाने पर, उनका पूरा प्रोफ़ाइल पढ़ने पर भी उनकी ईमेल हासिल नहीं की जा सकी। उन्होंने अपने ब्लॉग पर अनुभूति-हिन्दी याहू समूह का लिंक भी लगा रखा था, सोचा गया शायद वे इसके सदस्य हों। वहाँ सदस्य बना गया, सर्च किया गया, नहीं मिले, ऑरकुट पर इस नाम का एक आदमी मिला, मगर उसने कोई जवाब नहीं दिया। अंततः इनके चिट्ठे की एक पोस्ट पर कमेंट रूप में ई-मेल आई डी बताने का निवेदन किया गया मगर प्रतिउत्तर नहीं मिला।
हम उम्मीद करते हैं कि वो इस रिज़ल्ट को ज़रूर पढ़ेंगे। उनसे निवेदन है कि कृपया वो अपने डाक का पता hindyugm@gmail.com पर भेज दें ताकि श्री कुमार विश्वास उन्हें अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' भेंट कर सकें।
पिछली बार की यूनिपाठिका सुनीता चोटिया ने इस बार भी हमारी हर पोस्ट पर कमेंट किया। दावेदार वो भी थीं लेकिन हमारी कोशिश नए चेहरे तलाशना भी है, इसलिए उनसे विशेष अनुमति ली गई। इसके अतिरिक्त डीवाइन इंडिया, सजीव सारथी, स्वप्ना शर्मा, मेधा पुरानडरे, सुनील डोगरा ज़ालिम इत्यादि ने हमारा बहुत सहयोग दिया।
पुनः कविताओं की ओर लौटते हैं।
दूसरे स्थान की कविता को अलग-अलग चरण के ज़ज़ों ने अलग-अलग तरह से लिया। निखिल आनंद गिरि की कविता 'वक़्त लगता है' ८॰१, ६॰५, ६, ८॰५ और ६ अंकों (औसत ७॰०२) के साथ आठवें पायदान पर थी। दूसरे चरण में यह चार पायदान ऊपर ख़िसक गई। दूसरे चरण के तीन ज़ज़ों ने क्रमशः ८॰७५, ८॰३५ और ७॰५ अंक दिए। अंतिम ज़ज़ को इतनी अच्छी लगी कि इसने दूसरा स्थान सुनिश्चित कर लिया।
कविता- वक़्त लगता है
कवि- निखिल आनंद गिरि, समस्तीपुर (बिहार)
वक़्त लगता है मन पर पड़ी गर्द हटाने में,
हालाँकि, रोज़ होती है बारिश आँखों के दरीचे से
मन के कई हिस्से अब भी धुले-धुले से हैं
वक़्त लगता है बदलते हुए वक़्त का मिज़ाज़ समझने में
कोशिशें मुसल्लम ज़ारी हैं
यह तय करना आसान नहीं कि भीड़ का हिस्सा बनना कहाँ तक लाज़िमी है
भीड़ जो कभी किसी की नहीं होती, और न ही आप हो पाते हैं कभी भीड़ के
वक़्त मुट्ठी में फँसी रेत की तरह फिसलता है, और हम बने रहते हैं तमाशबीन
तमाशा ही तो है एक अच्छे रिश्ते का बनना
और उस थोड़े से वक़्त में, जब तक आप ये तय पायें कि कितनी शिद्दत के साथ निभाना है वो रिश्ता
टूट जाता है रिश्ता
ठीक वैसे ही
जैसे बादल से निकलता है सूरज पल भर के लिए,
और हम जब तक अपने गीले अरमानों की गठरी खोलकर पसार सकें
दिखा पायें थोड़ी-सी धूप
कहीं नहीं होता सूरज…..
कहीं नहीं..
गीले अरमान लिये,
मैं भी कर रहा हूँ इंतज़ार…
कि तुम जो ज़िंदगी के सबसे आसान मोड़ पर
मेरा सूरज साथ लिये खो गई हो
मैं खड़ा हूँ…
उफ़!! डर है कि तुम्हारी प्रतिक्षा में
जो खड़ा हूँ इस बवंडर में
और ढँक गया है मेरा पूरा अक़्स
धूल-गर्द से…….
तन भी, मन भी….
डर है कि तुम इधर से गुजरो और
मुझे पहचान भी न सके
तुम्हारी आँखें मेरे सूरज से चौंधाई-सी……
मुझे बस थोड़ा-सा वक़्त देना मेरे दोस्त…
मेरे मन के कई हिस्से अब भी धुले-धुले हैं…..
और थोड़ा वक़्त दोगी तो झटक दूँगा बाकी गर्द भी….
वक़्त तो लगता है न,
मन पर पड़ी गर्द हटाने में………….
अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
असाधारण रचना है। बिम्ब तो इतने सुन्दर हैं कि कवि के लिये बरबस ही “वाह” निकलती है।
“यह तय करना आसान नहीं कि भीड़ का हिस्सा बनना कहाँ तक लाज़िमी है”
”वक़्त मुट्ठी में फँसी रेत की तरह फिसलता है, और हम बने रहते हैं तमाशबीन”
”और हम जब तक अपने गीले अरमानों की गठरी खोलकर पसार सकें
दिखा पायें थोड़ी-सी धूप
कहीं नहीं होता सूरज…..”
कला पक्ष: ७॰५/१०
भाव पक्ष: ८/१०
कुल योग: १५॰५/२०
पुरस्कार- सृजनगाथा की ओर से रु ३०० तक की पुस्तकें। कुमार विश्वास की ओर से उनकी अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की एक प्रति।
तीसरे स्थान की कविता 'आकांक्षा' बहुत दुर्भाग्यशाली रही। प्रथम चरण के ज़ज़ों ने इसे बहुत अधिक पसंद किया। ८॰५, ९॰५, ८, ९॰५ और ७ (औसत ८॰५) अंकों के साथ प्रथम चरण की यह नं॰ १ कविता थी। दूसरे चरण के ज़ज़ों के अंकों और पिछले चरण के औसत अंक (जो कि क्रमशः ९॰२५, ७ , ९॰४ और ८॰५ थीं) को जब सम्मिलित किया गया तो यह दूसरे स्थान पर ख़िसक गई। तीसरे ज़ज़ ने इसे अग्रेसित तो किया, मगर 'आकांक्षा' अंतिम ज़ज़ को 'बुधिया की विनती' और 'वक़्त लगता है' से कम पसंद आई।
कविता- आकांक्षा
कवि- दिनेश पारते, बैंगलूरू (कर्नाटक)
हे कृष्ण मुझे उन्माद नहीं, उर में उपजा उत्थान चाहिये
अब रास न आता रास मुझे, मुझको गीता का ज्ञान चाहिये
निर्विकार निर्वाक रहे तुम, मानव निहित संशयों पर
किंचित प्रश्नचिन्ह हैं अब तक, अर्धसत्य आशयों पर
कब चाह रही है सुदर्शन की, कब माँगा है कुरुक्षेत्र विजय
मैंने तो तुमसे माँगा, वरदान विजय का विषयों पर
मन कलुषित न हो, विचलित न हो, ऐसा एक वरदान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये
संचित कर पाता क्या कोई, इस क्षणभंगुर से जीवन में
न देह थके न स्नेह थके, थिरकन जब तक स्पंदन में
यह प्राण गात में है जब तक, निष्पादित हो निष्काम कर्म
है चाह नहीं आराधन का, अभिमान रहे अंतर्मन में
मुझे सर्वविदित सम्मान नहीं, अंतर्मन का अभिमान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये
हो साँसों में ताकत इतनी, कि शंखनाद हर शब्द बने
हो शक्ति भुजाओं में इतनी, दुर्गम दुर्लभ उपलब्ध बने
अवलम्ब बनूँ मैं अपना ही, खोजूँ आश्रय अपने अंदर
कह सकूँ जिसे मेरी अपनी, पहचान प्रखर प्रारब्ध बने
प्रारब्ध बने पुरुषार्थ प्रबल, ऐसी मुझको पहचान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये
कर्मबोध दे दो मुझको, नभ का जल का अचलाचल का
मर्मबोध दे दो मुझको, माँ के ममतामयी आँचल का
धर्मबोध दे दो मुझको, कर लूँ धारण वस्त्रास्त्र समझ
आत्मबोध दे दो मुझको, मन के मेरे अंतस्थल का
अनुसरण नहीं, अनुकरण नहीं, अंतस्थल का अभिज्ञान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये
अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
कविता के कथ्य गंभीर है और दर्शन से ओत-प्रोत हैं। “हे कृष्ण मुझे उन्माद नहीं, उर में उपजा उत्थान चाहिये” कह कर जिस अधिकार से गीता का ज्ञान चाहा है वह आत्मविश्वासी पहल है। अर्जुन अशक्त हो कर गीता का ज्ञान पा सके थे, कवि तो ओज से पूरित है:
“हो साँसों में ताकत इतनी, कि शंखनाद हर शब्द बने
हो शक्ति भुजाओं में इतनी, दुर्गम दुर्लभ उपलब्ध बने
अवलम्ब बनूँ मैं अपना ही, खोजूँ आश्रय अपने अंदर
कह सकूँ जिसे मेरी अपनी, पहचान प्रखर प्रारब्ध बने”
”अनुसरण नहीं, अनुकरण नहीं, अंतस्थल का अभिज्ञान चाहिये
मुझको गीता का ज्ञान चाहिये”
कला पक्ष: ७/१०
भाव पक्ष: ७॰५/१०
कुल योग: १४॰५/२०
पुरस्कार- सृजनगाथा की ओर से रु ३०० तक की पुस्तकें। कुमार विश्वास की ओर से उनकी अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की एक प्रति।
चौथे स्थान की कविता 'गीत गुनगुना मन' की कहानी भी 'वक़्त लगता है' से मिलती जुलती है। पहले चरण में औसत अंक ७॰५४ (८॰२, ७, ७, ९॰५ और ६) के आधार पर इसका स्थान चौथा रहा। दूसरे दौर में यह ८॰७५, ६॰९ और ९॰५ अंकों के आधार पर तीसरे स्थान पर आ गई। और अंत में भी इसने चौथा स्थान बनाए रखा।
कविता- गीत गुनगुना मन
कवि- श्रीकान्त मिश्र 'कान्त', चंडीगढ़
मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन
माना लहरें भँवर भयंकर
धीरज नैया डोले
आशा की पतवार उठा ले
माझी साहस कर ले
वैचारिक झंझावातों से
हार न बैठो मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन
थक कर चकनाचूर है फिर भी
बैठ न आँखें मीचे
अविचल नियम प्रकृति का निश दिन
चलते आगे पीछे
कहीं 'नित्य' का रथ रुकता है
सोच विहंस मेरे मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन
तारे घटा टोप में डूबे
'शशि' मेघों ने घेरा
घनीभूत नैराश्य हो चला
मन में डाले डेरा
'पौरूष' को ललकार 'कान्त' कर
नभ से प्रकट 'तड़ित' मन
कठिन तमस निश्चय जायेगा
गीत गुनगुना मन
मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन
अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
गुनगुनाने की इच्छा होती है यह रचना पढ़ते ही। कवि की भाषा और भाव पर पकड़ सराहनीय है। “कठिन तमस भी कट जायेगा, गीत गुनगुना मन” पूर्णत: आशावादी कथ्य है, जिसे ओजस्वी भावों से कवि ने प्रस्तुत भी किया है। वैचारिक झंझावातों से, हार न बैठो मन कह कर कवि आज के युग की परिस्थितियों से पाठक को जोड़ता भी है, उम्मीद भी भरता है। कविता उर्जावत करने में सक्षम है।
कला पक्ष: ७/१०
भाव पक्ष: ७/१०
कुल योग: १४/२०
पुरस्कार- सृजनगाथा की ओर से रु ३०० तक की पुस्तकें। कुमार विश्वास की ओर से उनकी अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की एक प्रति।
अब बात करते हैं उन ६ कवियों की जिनकी कविताएँ इन चार कविताओं के अतिरिक्त अंतिम १० में रहीं। उन कविताओं का प्रकाशन जून महीने के आने वाले शुक्रवारों और रिक्त वारों को हिन्द-युग्म पर होगा। इन ६ कवियों को भी डॉ॰ कुमार विश्वास अपनी पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की स्वहस्ताक्षरित प्रति भेज रहे हैं।
इनके अतिरिक्त जिन अन्य १४ कवियों ने भाग लिया, उनका भी हम हृदय से धन्यवाद करते हैं। हमारे सभी प्रयासों की सफलता आपकी भागीदारी, आपकी सक्रियता पर अवलम्बित है, अतः हम आप सभी के शुक्रगुजार हैं। सभी कवियों से निवेदन है कि परिणाम को सकारात्मकता के साथ लें। अच्छी से अचछी कविताएँ आप लिख सकते हैं, प्रयास करते रहिए। नई ऊर्जा के साथ जून माह की प्रतियोगिता में भाग लीजिए। हम उन के भी नाम प्रकाशित कर रहे हैं-
आप सभी को देवनागरी-प्रोत्साहन का हिस्सा बनने के लिए हार्दिक धन्यवाद।





























16 टिप्पणी:
विपुल शुक्ला जी को यूनिकवि चुने जाने पर हार्दिक बधाई। आप ने आखिरकार सबसे कम आयु का यूनिकवि बनने का अपना सपना पूरा कर ही लिया। मुझे खुशी है कि आप जैसे दृढ़निश्चय वाले लोग हिन्दी और देवनागरी के विकास और प्रसार के लिये प्रयासरत हैं। यूनिपाठक कुमार आशीष जी को भी बहुत बहुत बधाई। आखिरकार पाठक ही तो हमारे इस प्रयास की सफलता को सुनिश्चित कर सकते यहैं।
यूनिकवि के अतिरिक्त अन्य तीनों कवियों की रचनाएं भी उच्चकोटि की हैं। इनको पढ़कर यह अनुमान आसानी से लग जाता है कि यूनिकवि का फैसला करने में हमारे निर्णायकों को कितनी मुश्किल आई होगी। परंतु सभी कविताएं सुंदर होने के बावजूद यूनिकवि तो एक को ही होना था, अतः बाकी कवि मित्रों को शायद अभी कुछ और प्रतीक्षा करनी होगी।
दिनेश पारते जी ने इस बार भी पिछली बार की तरह ही सुंदर रचना लिखकर अपनी प्रतिभा का एक और परिचय दिया, परंतु इस बार विपुल शुक्ला जी ने शायद ज्यादा बेहतर लिखा। आशा है शायद अगली बार आप को यूनिकवि के रूप में देख सकें।
अंत में युग्म की बढ़ती लोकप्रियता तथा उसके प्रयासों की सफलता के लिये, युग्म संचालकों, साथी कवि मित्रों और पाठकों को भी शुभकामनाएं।
विपुल जी एवं कुमार आशीष जी को हार्दिक बधाई। विपुल जी ने इतनी कम उम्र में जो प्रतिभा दिखाई है वह बताती है कि वे कितनी संभावनाओं के कवि हैं। उनकी रचनाओं का अब युग्म पर इंतज़ार रहेगा। आशीष जी तो युग्म की रीढ की तरह हैं, अच्छे पाठक युग्म की सफलता के कारण हैं..।
*** राजीव रंजन प्रसाद
सबसे पहले यूनीकवि विपुल और यूनीपाठक कुमार आशीष जी को बधाई।
साथ ही मैं बाकी प्रतियोगियों और पाठकों को धन्यवाद देते हुए ये कहना चाहूँगा कि वे अगली बार भी
प्रतियोगिता में हिस्सा लें और इस सोच के साथ हिस्सा लें कि जीत उन्हीं की होगी।
हाँ, एक बात और मैने व्यक्तिगत रूप से यह महसूस किया किया है कि कई रचनायें
यद्यपि कि जीत तो नहीं पातीं, लेकिन वे जीतने वाली रचना को कड़ी टक्कर देतीं हैं।
वैसे भी जीत-हार तो ज़िन्दगी में लगा ही रहता है, लेकिन हम फिर भी जीवन को अच्छा
बनाने का प्रयास तो नहीं छोड़ते;इसका भी एक मज़ा है।
और सबसे ज़रूरी बात--हमारा प्रयास हिन्दी को बढ़वा देना है, वो तो हम और आप कर ही रहे हैं; है कि नहीं?
सभी विजेताओओं को मेरी ओर से हार्दिक बधाई..।
दिनेश पारते की कविता हालांकि मुझे अधिक पसंद आई।
कवि कुलवंत सिंह
विपुल जी एवं आशीष जी, आपको विजेता बनने की हार्दिक बधाई...
विपुल, आपने आखिर इस बार बाजी जीत ही ली।आपका कड़वा सच हालांकि सच से कुछ अधिक कड़वाहट लिए हुए लगा।
वैसे दिनेश जी की 'आकांक्षा' मेरी व्यक्तिगत राय में बाकी कविताओं से कहीं बेहतर है।बहुत दिनो बाद मैंने इतनी सम्पूर्ण कविता पढ़ी..दिनेश जी, मेरी ओर से आपको अच्छा लिखने की बधाई।
शैलेश जी, मैं निवेदन करना चाहता हूं कि परिणामों को और सर्वसम्मत बनाने के लिए अंतिम निर्णयकर्त्ता भी एक से अधिक रखे जाएं।मैं विपुल को कम नहीं आँक रहा पर परिणाम जानकर मुझे अच्छा नहीं लगा।
हिन्द युग्म की ओर से मैं कुछ स्पष्टीकरण अवश्य देना चाहूँगा। पहली यह कि निर्णायको की मंशा पर प्रश्नचिन्ह ठीक नहीं, चूँकि कई दौर और कई मापदंडों से पूरी पारदर्शिता के साथ युग्म मे कोई रचना विजेता घोषित की जाती है। हर व्यक्ति की कविता पर अपनी समझ होती है और जब वह किसी रचना को निर्णय की दृश्टि से नहीं देख रहा होता है तो कभी रचना के भाव से तो कभी शिल्प से प्रभावित होता है। जब आपने एक कसौटी बना दी है और रचना को उस पर से खरा उतरना है तो मत भिन्नता के बावजूद जो रचना विजित घोषित की जाती है उसमे कुछ एसी विशेषतायें तो होती ही हैं जो अन्य कविताओं से अलग हों। मैने कई विवेचनायें देखी हैं जहाँ किसी रचना को भाव मे अधिक अंक दिये गये तो किसी रचना ने शिल्पगत सौष्ठव जब दोनों ही अंको को जोडा गया तो निर्णय तीसरा ही हो गया..यह तो प्रकृया है। कई कवि जैसे आलोक शंकर, गौरव सोलंकी जब विजेता हुए थे तो उन्होनें दोनों ही क्षेत्रों में इतनी जबरदस्त प्रतिभा का प्रदर्शन किया था कि निर्णयकर्ताओं को आसानी हो गयी। अजय जी की पिछली "विजित" रचना को देखें..यद्यपि उसकी पहली पंक्ति अन्य प्रसिद्ध पंक्ति से प्रभावित थी किंतु भावों के जो रंग उनके अलग अलग पदों में निकल कर आये उनकी जितनी प्रसंशा की जाये कम है। उनके मुकाबले कई रचनायें जो शिल्प की दृश्टि से अधिक दावेदार थी भावनाओं का मजबूत फर्श नहीं था उनके पास। विपुल जी की इस रचना में आप शैलीगत सौष्ठव और भावों की पकड से इनकार नहीं कर सकते। कविता आपसे बात करती हुई प्रतीत होनी है, अनूठा प्रयोग। कहीं ढीली नहीं है और देखा जाये तो चुपे शब्दों में आज के युग का दर्शन भी है वहाँ।
पंकज जी जब रचनायें इतनी अच्छी आ रही हों कि हर एक रचना में विजेता बनने की क्षमता हो तो एसी टक्कर स्वाभाविक है। युग्म को एसी टक्कर की हमेशा अपेक्षा रहेगी। कुलवंत जी, पारते जी की कविता बहुत अच्छी है। 24 रचनाओं में आरंभिक तीन रहना ही क्या यह नहीं दर्शाता?
मित्रों, शैलेष जी की अनुपस्थिति के कारण यह स्पष्टीकरण मैं दे रहा हूँ। आशा है युग्म मे आयोजित प्रतियोगिता की पारदर्शिता पर कोई संदेह नही है।
*** राजीव रंजन प्रसाद
विपुल जी एवं आशीष जी, आपको विजेता बनने की हार्दिक बधाई...तीनों कवियों की रचनाएं उच्चकोटि की हैं।
सभी विजेताओं का और हिस्सा लेने वाले कवियों का स्वागत और बधाई।
सबसे पहले यूनीकवि विपुल और यूनीपाठक कुमार आशीष जी को बधाई। मैं समझता हूँ कि आज हिन्द-युग्म उस जगह आ गया है, जहाँ से विविधताऐं और नये प्रयोग नये रास्ते भी बनाते हैं। मुझे विपोल जी के यूनिकवि बनने और उन्हें चुने जाने की प्रक्रिया और युग्म की पारदर्शिता पर कोई भी संशय नहीं है, बल्कि खुशी है कि बेहद जिम्मेदराना रवैया अपनाकर नये कवि को और नये कविता स्वरूप को विजयी स्वीकार किया।
ब्लोगर मीट के दौरान भी मौहल्ला से अविनाश जी ने यह बात उठाई थी कि युग्म पर कविताई कैसी हो, में समझता हूँ कि अब कविता को कुछ इक पैमानों पर माप कर न देखा जाय। युग्म पर लगभग बीस स्थाई कवि हैं, फिर प्रतियोगी कवितायें। कुल मिलाकर हम एक ढर्रे पर कविता की बात कर भी नहीं सकते।
सभी कवियों के तरीके अलग हैं भाव अलग हैं और कविता के लिये सबसे बडी बात, प्रस्तुतियों के ठंग अलग है।
और ये विविधता ही आवश्यक है।
विपुल की कविता में पर्याप्त नयापन है, विषय व शिल्प दौनों द्रष्टि से। हाँ , शीर्ष तीन में बढा मुश्किल है किसि को भी एक, दो या तीन पायदान पर बैठाना। पर नयेपन को तवज्जो कहीं भी गलत या संदेहास्पद नहीं हो सकती।
'खबरी'
विपुल जी
सर्व प्रथम आप हार्दिक बधाई स्वीकारें.. आप की कविता दिल को छू गई.. आप में असीमित प्रतीभा छुपी हुई है और आशा है कि इसे आप व्यर्थ नही जाने देंगे.. लिखते रहेंगे
अन्य कवियों की रचनायें भी कुछ कम नही थी परन्तु जजों के पास एक को प्रथम घोषित करने के अलावा कोई विकल्प नही है..इसलिये यह न समझे कि आप की रचना कुछ कम थी.
कुमार आशीष जी यूनिपाठक चुने जाने पर आपको हार्दिक बधायी... जैसे भगतों से भगवान है वैसे ही पाठकों से कवि..
एक बात कहना चाहूँगा ...ग़ौरवजी ने कहा है की यह सच यथार्थ से अधिक कड़वा प्रतीत होता है .
वास्तव मे यह कविता कपोल कल्पना नही है बल्कि यह वास्तविक घटना पर आधारित है ...
दैनिक भास्कर नाम के अख़बार मे जो रविवार को रसरंग प्रकाशित होता है इसमे लगभग एक माह पूर्व इन्फ़ोसिस के श्री नारायण मूर्ती की पत्नी श्रीमती सुधा मूर्ती जी का एक संस्मरण प्रकाशित हुआ था ...इसमे एक युवती की करूण कहानी थी जिसे उसके भाई ने बेच दिया था. और वह सूधाजी के पास अपनी पढ़ने की ललक के कारण आई थी...वह वास्तव मे उनसे लिखना-पढ़ना सीखना चाहती थी.. उसी कहानी को मैने कविता की शक्ल मे प्रस्तुत किया....
जिस प्रयोग की सभी बात कर रहे हैं की कविता को सीधे संवाद के शैली मे लिखा गया है तो वह भी महज़ इसीलिए क्योंकी इसे शायद मैने एक कहानी की ही शक्ल मे पढ़ा था...
ख़ैर जो भी हो...
ख़ुशी तो बहुत हो रही है यूनिकवी बनने पर... मगर डर भी लग रहा है की आप लोगो की उम्मी दो पर ख़रा उतर पाओँगा की नही..
अभी अभी शुरुआत की है लिखने की और हिंदी युग्म जैसे मंच का साथ मिल गया इससे बड़ा सौभाग्य और कुछ हो ही नही सकता..
आपने मुझे सराहा और प्यार दिया इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद
देर से आने के लिये क्षमा चाहूँगा।
सर्वप्रथम इस प्रतियोगिता से सम्बन्धित सभी लोगों को हार्दिक बधाई खास कर विजेताओं को।
मै गौरव जी की इस बात से इत्फाक नही रखता की निर्णायकों ने कविता चुनाव मे कोई त्रुटि हुई है। तथा राजीव रंजन जी से भी सहमत नही हूँ कि निर्णायकों के फैसलो पर पाठक अपनी राय न दे सकें।
चूकिं तीनों की कविता अपने आप में श्रेष्ठ है, तथा मुझे भी पढने की दृष्ठि से आकांक्षा बहुत ही अच्छी लगी।
परन्तु मै यह नही कहूँगा कि निर्णायकों का निर्णय ठीक नही है। क्योकि हर व्यक्ति के चश्मे का नम्बर अलग अलग होता है, और परखने का नजरिया भी
यूनिकवि विपुल शुक्ला को आशीर्वाद के साथ ढेर सारी शुभ-कामनाएं..वो हमेशा एसे ही प्रगती करते रहें..और कुमार आशीष जी को बधाई यूनि-पाठक बनने हेतु...कविता बाकी सभी कवियो की भी अच्छी लगी..सभी को बहुत-बहुत बधाई।
सुनीता(शानू)
विपुलजी और आशीष कुमारजी के साथ-साथ सभी प्रतिभागियों और पाठकों को हार्दिक बधाई!
टिप्पणियों को पढ़ने के बाद में मात्र इतना कहना चाहूँगा कि पाठकों और निर्णयकर्ता का नज़रिया एक होने की संभावनाएँ कम ही होती है, क्योंकि पाठक अनेक हैं और निर्णयकर्ता एक, प्रत्येक पाठक की अपनी रूची होती है और उसे वैसी ही रचना अच्छी लगती है। मगर एक निर्णयकर्ता को अपनी व्यक्तिगत सोच/रूची से ऊपर उठकर निर्णय करना होता है और यह कार्य कदापी आसान नहीं।
फिर भी दिनेश पारतेजी की काव्य शैली बहुत शानदार है, उनका शिल्प और शब्दों का चुनाव उम्दा होता है। कोई भी लेख़न इस कारण कदापी नहीं करता कि उसे प्राइज मिले मगर हाँ, प्रशंसा का भूखा अवश्य होता है, दिनेश पारतेजी की रचना इस श्रेत्र में विजेता प्रतित हो रही है, वे खुश हो रहें होगे।
इस बार की प्रतियोगिता में सभी की रचनाएँ दमदार थी, ऐसे में निर्णयकर्ता को कितना पसीना बहाना पड़ा, मैं जानता हूँ।
एक बार पुनश्च सभी को बधाई!
सस्नेह,
- गिरिराज जोशी "कविराज"
इस हिंदी युग्म मे आने पर प्रसन्नता हो रही है .......मेरे मित्र विपुल शुक्ला को मैं धन्यवाद देना चाहूँगा कि उन्होने मुझे इस अदभुत और प्रतिभाओं से परिपूर्ण संसार का रासास्वादन करने दिया.......ख़ैर अभी ही आया हूँ सो अधिक कविताएँ तो नही पड़ी पर जो भी पढ़ी है उनके द्वारा मेरे और अजय जी, सुनीता जी और विपुल जी के मस्तिष्को से एक तादात्म्य जन्म ले चुका है और मेरे अंतरमन मे बैठा कवि जो इस मनित विश्वविद्यालय मे आकर विश्रमित था वो अब कपड़ों से धूल झाड़कर खड़ा हो गया है कुछ सरजन करने के लिए .....बस यहाँ उपस्थित ज्येष्ठो से आशीर्वाद चाहिए. सो आशा है की वो आप लोग भरपूर देंगे जो मेरे विद्यालाईन मित्र विपुल को दिया है .....
मुझे याद आता है की जब विपुल हमारे विद्यालय का साहित्यिक सचिव निर्विरोध चुना गया था तब मैं भी चाहता था की काश मैं भी होता सचिव पर पढ़ाई को देखते हुए मुझे झुकना पड़ा तब ही यह तय हो गया था की इस के ये पंख गगन छुएंगे.......... और अब यूनी कवि बनकर वो भी सबसे युवा यूनी कवि बनकर विपुल ने अपने इन स्वप्न रूपी पँखो को सँवारा है ...........विपुल को बधाइयाँ.......
और अंत मे इस ही आशा के साथ कि हिंदी आबाध गति से उपर और उपर उठे हम और हमारी आगे आने वाली पीढ़ी इसे बढ़ाए क्यूँकी kavi kahta hai........................
अमावस की तममय रात,
घनघटाटोप ।
चाँद का अभाव औ'
प्रकाश की चाह,
प्रेरित करते हैं सृजन को,
एक नए चाँद का ।
हुनर भी है, लगन भी ।
बन पाते हैं पर कुछ ही चाँद
क्योंकि,
कालसीमा तो यही है,
मैं अमर नहीं ।
सर्वप्रथम सभी प्रतियोगियों का बहुत-बहुत धन्यवाद, जिन्होंने प्रतियोगिता में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया। जिस तरह से पिछले तीन बार से विपुल शुक्ला से अपनी उत्कृष्टता साबित की, वह प्रसंशीय है। और जो अभी भी बेहतर लिखकर प्रयासरत हैं, वे वंदनीय हैं। यद्यपि रोज़ कविता पढ़ना भी अपने आप में एक व्यायाम है, वैसे में जिस तरह से आशीष जी ने हिन्द-युग्म का प्रोत्साहन किया, उसके लिए हम आभारी हैं।
जहाँ तक ज़ज़मेंट की बात है तो यह भी सुखद आश्चर्य है कि १० में से ८ ज़ज़ों ने बुधिया की विनती को ही अत्यधिक पसंद किया, जबकि किसी भी ज़ज़ को यह नहीं पता होता कि कौन सी कविता किस कवि की है? मतलब हमारे यहाँ कविता जीतती है, कवि नहीं।
मैं हमेशा ज़ज़मेंट को अधिक से अधिक सर्वसम्मत बनाना चाहता हूँ, मगर अंतिम निर्णयकर्ता अभी तक एक से अधिक इसलिए भी नहीं रखे गये हैं क्योंकि हमारे पास कविता की अत्यधिक समझ रखने वालों का अभाव है। यह कोई ज़रूरी भी नहीं है कि ५ लोग मिलकर अच्छा ही निर्णय लेंगे। निर्णय की समझ तभी होगी जब आप हर तरह की कविता को एक्सेप्ट करें। मैं हमेशा बेहतर से बेहतर करने को प्रयासरत हूँ, धीरे-धीरे आप देखेंगे कि हमें सफलता मिलती जा रही है।
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