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Saturday, February 16, 2008

चाँद - भाग 1


बुधिया की पूरी श्रंखला को आपने प्यार दिया और सराहा | इसी से प्रेरित हो कर आज एक नयी श्रंखला "चाँद" की शुरुआत करने जा रहा हूँ |
तो पेश है आज इसी की पहली कड़ी....


अंतहीन समुद्र
आँखें बंद
नीरव,शांत
पूनम की रात,
चंद्रिका से दीपित
कोमल गात!

लेटा समंदर,
थका-हारा सा!
हिलती लहरों पर चाँदनी का स्पर्श..
जैसे थपकी दे माँ
सो जा..
नींद की चौकीदारी,
आकाश में
चाँद की गश्त!

अचानक पवन गतिमान,
बादलों में छिपा चाँद
चौंका समंदर!
बैचैन घबराया सा
दौड़ पड़ा..
पथरीली ज़मीन पर
बदहवास हो कर
पागल..!

पैर छिल गये उसके,
लहूलुहान हो गया
कराहता रहा,
रोता रहा,
बड़ी देर तक
हिचकियाँ गूँजती रहीं
अनंत आकाश में..!
और फिर
सो गया वो
बिना थपकियों के
यूँ हीं..

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16 कविताप्रेमियों का कहना है :

रंजू का कहना है कि -

बड़ी देर तक
हिचकियाँ गूँजती रहीं
अनंत आकाश में..!
और फिर
सो गया वो
बिना थपकियों के
यूँ हीं..

बहुत सुंदर विपुल जी ..बधाई

mehek का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर
बधाई ,हर लफ्ज़ खूबसूरत

nitin का कहना है कि -

Great sir great......
बहुत-बढ़िया
आप कि कविता मातृप्रेम से ओत-प्रोत रहती है, जो कि आपके काव्य का
सबसे सुन्दर और मजबूत पक्ष है, सागर कि शांत लहरों में चांदनी के स्पर्श
को जो आपने माँ कि ममता से जोड़ा है सचमुच कमाल है, माँ और ईशवर पर
जितना लिखा जाय कम ही होगा....
बहुत प्यारी कविता है, इसके लिये आप बधाई के पात्र है, हिंदी कविता जगत के आसमान पर एक और नये सितारे का जन्म हो चुका है..........
-शुभेच्छु
नितिन शर्मा

seema gupta का कहना है कि -

बड़ी देर तक
हिचकियाँ गूँजती रहीं
अनंत आकाश में..!
और फिर
सो गया वो
बिना थपकियों के
यूँ हीं..

बहुत प्यारी कविता है,..बधाई
Regards

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

बहुत बहुत सुंदर रचना है |
जीतना जानता हूँ उसेक आधार पर -
रचना अभिधा और व्यंजना से लिप्त है |

बधाई

अवनीश तिवारी

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

वाह! क्या लिखा है भाई..

बड़ी देर तक
हिचकियाँ गूँजती रहीं
अनंत आकाश में..!
और फिर
सो गया वो
बिना थपकियों के
यूँ हीं..

बधाई...

vishal का कहना है कि -

Bhaisahab aap KAVI hai ye to sab jante hai par kitne BADE kavi hai ye bahut kam log jante hai.


Kavita padkar aisa laga mano kisi ne dil ki aseem gahraiyo me dubki lagakar ek MOTI chuna ho.


Bishwas nahi hota ki aise ek vyakti se main mila bhi hu jo itna achchha KAVI hai


Bhai aur to kya kahu par ye jarur kahunga ki agli KAVITA k bare me JARUR batana

सजीव सारथी का कहना है कि -

वाह विपुल वाह, बहुत अच्छा लगा तुम्हे वापस उसी अंदाज़ में पाकर, उत्कृष्ट रचना, बधाई ....

sonia का कहना है कि -

काफी अच्छा लिखा है आपने ,जैसा कि सभी ने सराहा ...keep it up.

अजय यादव का कहना है कि -

एक और सुंदर प्रस्तुति! आशा है कि यह श्रंखला भी ’बुधिया’ की तरह ही एक से एक सुंदर कविताओं से सजी होगी.

RAVI KANT का कहना है कि -

विपुल जी, अच्छा लिखा है। उम्मीद है बुधिया की तरह यह शृंखला भी पाठकॊं के दिल में जगह बनाने में सफ़ल रहेगी।

sahil का कहना है कि -

बहुत प्यारी कविता.
आलोक सिंह "साहिल"

tanha kavi का कहना है कि -

बहुत हीं उम्दा रचना है विपुल!
सबल भाव एवं कसा हुआ शिल्प!
माँ-बेटे के प्रेम को चाँद एवं समुंदर के माध्यम से आपने बढिया दर्शाया है।
बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

आलोक शंकर का कहना है कि -

दीपित- दीप्त ज्यादा सही होता ।
नीरव,शांत- दोनों शब्दो का एक ही अर्थ है

अचानक पवन गतिमान,-- फ़्लो में अचानक बदलाव
बैचैन घबराया सा-- बैचैन, घबराया सा
हिचकियाँ गूँजती रहीं - सिसकियाँ या हिचकियाँ ?
'वो' की जरूरत नहीं थी ।

अच्छा प्रयास , शब्द चयन और बेहतर हो सकता है ।

Alpana Verma का कहना है कि -

अच्छी रचना है.
सुंदर कल्पना के धागों में चुनिंदा शब्दों के मोती जैसे ख़ुद कविता गा रहे हैं.

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

मैं तो इस कविता से बिलकुल प्रभावित नहीं हुआ। आपके स्तर की रचना नहीं है। केवल शब्दों के ताने-बाने में पाठकों को फँसाया गया है।

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