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गद्दी की पसंद- कूल्हें नरम और जेब गर्म


सिरफिरे और सलीब

सिरफिरों ने जब भी चुना है,
सलीब को चुना है,
किसी सिरफिरे ने हथिया ली गद्दी,
आपने सुना, गलत सुना है।

गद्दी की पहचान,
उसे कहाँ,
जिसका सिर फिरा हो,
गद्दी को वो क्या जाने,
जो रोटी-रोजी के मसले से जुड़ा हो।
गद्दी भी,
पसंद करती है उन्हें,
जिनके कूल्हे नरम और जेब गर्म हो,
गद्दी को कब भाए हैं वो,
जो केवल हाड़ हों, चर्म हों।
गद्दी को,
कब पसंद आई हैं
झुकी हुई बोझल निगाहें,
गद्दी को चाहिएं,
वो नजरें जो बेशर्म हों।

यह आज की बात नहीं,
ये तो सदियों का सिलसिला है,
सोने की छड़ से क्या
गरीब का चूल्हा जला है।

ये सवाल सतही नहीं,
मेरे हुजूर दिल का है,
खनखनाते बलूरी ग्लासों का नहीं,
बनिए के बेहिसाब बढ़ते बिल का है।

हमेशा घाटे का पाया है,
गरीब का बजट,
मैंने तुमने चाहे जिसने गुना है,
सिरफिरों ने जब भी चुना है,
सलीब को चुना है।

--यूनिकवि डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'

क्या होगा कोई मनुष्य?


क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिसने
न उठाया हो लुत्फ
बादलों की लुकमींचणी का

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिसने
न देखा हो उल्काओं को
किशोरियों की तरह कूदते-फाँदते

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिस के पाँव
न जले हों जेठ की धूप में

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जो न नहाया हो
भादों की बरसात में

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिस की हड्डियाँ
न ठिठुरी हों पूष मास में

अगर होगा
कोई मनुष्य ऐसा
तो अवश्य ही
रहता होगा
वह किसी
साठ सत्तर मन्जिले कठघरे में
किसी महानगर
कहलाते चिडिय़ा घर में।


--यूनिकवि श्याम सखा 'श्याम'

देह तो मात्र जवान गठीली, उत्तेजक माशपेशियाँ तथा गोलाईयाँ हैं


जैसे-तैसे कट रही जिन्दगी।

पहले हम
सरदारों, नवाबों,
राजाओं के गुलाम थे
फिर संतरियों
तथा मंत्रियों के
गुलाम बने

अब हम
पदार्थोन्मुखी हैं
यानी
बाजार के
विज्ञापन के गुलाम हैं
गुलाम हैं
साबुन, तेल, टी.वी.
स्टीरियों, कार,
कम्प्यूटर बेचती
नंगी मादा देह के

इस मादा देह का
अवगुठन नहीं,
मात्र नाम बदलते हैं।
देह तो मात्र
जवान गठीली,
उत्तेजक माशपेशियाँ तथा गोलाईयाँ हैं
हाँ इनके
नाम बदलते रहते हैं
जैसे
ऐश्वर्य, सुष्मिता, लारा दत्ता,
करिश्मा या करीना कपूर
अक्षय, अजेय यौवन के ख्वाब बेचते
पच्चीस साल के बुड्ढे, या साठ साल के जवान के
या फिर अन्दर का मामला है
का गोविंदा
या के.बी.सी. को लॉक करने वाला
बुढ़ाता निरीह अमिताभ
जिसपर तरस खाकर
हम खरीदते हैं हिमानी तेल
हालाँकि मालिश के लिए
न हमारे पास वक्त है
न ही सिर
कबन्धों के पास कभी सिर हुआ है?
जो हमारे पास होता।
उसके धमकाने पर
हम पहुँच जाते है अस्पताल
अपने शिशुओं को
पोलियों ड्राप्स दिलवाने
बस इसी तरह
गुलामी में कटे हैं
हमारे पूर्व जन्म
और
कट रही है यह उम्र भी
जैसे
तैसे

-यूनिकवि श्याम सखा 'शयाम'

तारे ज़मीन के हैं या हैं आस्मान के


क्यों लड़खड़ाते लफ्ज़ हैं मेरी ज़बान के
आसार हैं बहुत मेरे दिल की थकान के

इस शह्र में कहाँ रहूँ लोगो बताओ तो
दीवारो-दर वो तोड़ गए हैं मकान के

दे कर ज़मीन घूम रहा कार में देखो
इस गांव में बदल गए हैं दिन किसान के

हक़ मांगते हैं आज यहाँ बच्चे मुल्क के
तारे ज़मीन के हैं या हैं आस्मान के

मनसूबे किस को हैं यहाँ हाकिम बनाने के
दरवाज़े बंद कर दिए सब ने दुकान के

शायद हमीं से भूख बढ़ी है ज़मीन पर
शिकवे मिले हैं आज ये सारे जहान के

*मनसूबे = इरादे

--प्रेमचंद सहजवाला

आ गयी है सल्तनत फौलाद की अब गांव में


ख्वाब मेरी आँखों को बस खुशनुमा देते रहें,
रोज़ तकरीरें मुझे ऐ मेहरबाँ देते रहें

सारी खुशबू आपकी और खार हों मेरे सभी
और कितने इश्क के हम इम्तिहाँ देते रहें

मुजरिमों में नाम कितना भी हो शामिल आपका
आप अपनी बेगुनाही के बयां देते रहें

कर्जदारों के न कर्जे अब चुका पाएंगे हम
बा-खुशी कुर्बानियां अपनी किसाँ देते रहें

आ गयी है सल्तनत फौलाद की अब गांव में
या ज़मीं दे दें इन्हें या अपनी जाँ देते रहें

कायदों का मैं नहीं हों कायदे मेरे गुलाम
फलसफा ये मुन्सिफों को हुक्मराँ देते रहें

(फलसफा = दर्शन, philosopy, मुंसिफ = न्यायधीश, judge तकरीरें = वक्तव्य, speeches)

--प्रेमचंद सहजवाला

हमारे गांव के सूखे हुए शजर क्यों हैं


यूनिकवि गुलशन सुखलाल के एक मित्र विनय गूदारी का ईमेल मिला कि गुलशन सुखलाल पिछले १ हफ़्ते से छुट्टी पर हैं और एक साथ दो बड़ी खुशियों के सरताज़ बने हैं। पहली खुशी तो ये कि पिता हो गये हैं और दूसरी कि हिन्द-युग्म के यूनिकवि। विनय ने बताया कि गुलशन आने वाले सोमवारों को अपनी कविता भेजना चाहते हैं, मगर रिमाइंडर भेजने के बाद भी कल शाम तक उनकी कविता नहीं प्राप्त हुई। इसलिए दूसरे स्थान के कवि प्रेमचंद सहजवाला से हमने निवेदन किया। प्रेमचंद सहजवाला विश्व पुस्तक मेला में मिला एक हीरा हैं जो बहुत बढ़िया-बढ़िया ग़ज़लों से हमें नवाज़ रहे हैं।

हरेक राह नज़र आते राह्बर क्यों हैं
ज़मीं पे इतने गरीबों के मोतबर क्यों हैं

तुम्हारे शहर का हर बाग़ लहलहाता है
हमारे गांव के सूखे हुए शजर क्यों हैं

उड़ान तय हुई थी आसमाँ तलक लेकिन
यहाँ परिंदों के कटते हुए ये पर क्यों हैं

तुम्हीं से हम को खुदा बेपनाह मुहब्बत है
हमारी आहें भला फिर भी बे असर क्यों हैं

नहीं थे ख्वाब कभी दह्शतों के आँखों में
वतन के नक्शे पे उजड़े हुए नगर क्यों हैं

हुई है रात जवाँ पांव थरथराने लगे
ये लोग नाचते यूँ रात रात भर क्यों हैं

कोई चमकता सा मंज़र नज़र नहीं आता
ये मेरी ऑंखें हुई ऐसी कमनज़र क्यों हैं

-प्रेमचंद सहजवाला

(राहबर = मार्गदर्शक, मोतबर = विश्वसनीय, शजर = पेड़, तलक = तक, दहशत = आतंक, मंज़र = दृश्य, कमनज़र = कमज़ोर दृष्टि)

पत्थरों के पांव में रक्खा हुआ परसाद था


इस माह हम प्रति सोमवार ग़ज़लगो प्रेमचंद सहजवाला की ग़ज़लें प्रकाशित कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अंतिम कड़ी।

ग़ज़ल

वो खुदा से भी न डरता था वो इक जल्लाद था
लोग कहते हैं कि वो हिटलर की इक औलाद था

ईश्वर चौराहे पर कल कर रहा तक़रीर था
मेरी तकलीफों को ले कर जाने क्यों नाशाद था

जो पहाडों की तरफ़ जाता मिला था सैर को
वो नहीं था यार ये तो और कोई फरहाद था

इश्क के बारे में उस को कुछ पता तो था नहीं
शायरों से बोलता बस इक लफ़ज़ इरशाद था

मिलकियत घर में करोड़ों क्यों न रक्खे हुक्मरां
मुफलीसी की मुल्क में करता रहा इमदाद था

प्यार करने की तो उसको छूट पहले ही से थी
कत्ल महबूबा का करने को भी वो आज़ाद था

खेलने में खूब है वो मस्त सुंदर बालिका
चुस्त कपडों पर छिड़ा क्यों उस के वाद विवाद था

खूब किस्से और कहानी लिखने में माहिर है वो
सिर्फ़ लिख पाता नहीं तेरी मेरी रूदाद था

कामयाबी मिल गयी आख़िर उसी दह्कान को
रोज़ मरने के तरीके कर रहा ईजाद था

देवता लाखों करोड़ों देख कर हैरां हूँ मैं
गिन नहीं पाता कभी इन की मगर तादाद था

घर जला सकता था सब के एक ही आवाज़ में
अपने मज़हब का वो इक माना हुआ फौलाद था

भूख से बेहाल हो कर जब मैं बुतखाने गया
पत्थरों के पांव में रक्खा हुआ परसाद था

तक़रीर- बातचीत, बोलना, भाषण देना
नाशाद- नाखुश, दुःखी
फ़रहाद- शीरीं-फ़रहाद की जोड़ी का प्रेमी, फ़र्हाद (जैसे लैला-मजनूँ का मजनूँ)
इरशाद- इर्शाद, आदेश, हिदायत
हुक्मरां- हुक्म चलाने वाला
मुफ़लीसी- गरीबी, निर्धनता
इमदाद- मदद करना, सहायता
रूदाद- रूइदाद, बातें, कथन
दह्कान- किसान
ईजाद- बढ़ोत्तरी, वृद्धि

द्वारा - प्रेमचंद सहजवाला

राम भक्तों का बहुत होने लगा 'ड्रामा' यहाँ


६३ वर्षीय प्रेमचंद सहजवाला गद्य लेखन को पीछे छोड़ते हुए आजकल ग़ज़ल से प्रेम कर बैठे हैं और इस नाते हिन्द-युग्म के पाठकों का प्रेम भी पा रहे हैं। आज हम ईनामी कविता के रूप में इस माह प्रकाशित इनकी तीसरी ग़ज़ल लेकर आये हैं (प्रत्येक ग़ज़ल रु १०० के हिसाब से नकद ईनाम भी जीत रहे हैं)।

ग़ज़ल

छोटी छोटी बात पे होता है हंगामा यहाँ
चाहे कुर्ता तंग या छोटा हो पाजामा यहाँ

खौफ का माहौल है अब नींद कैसे आएगी
रोज़ सपनों में खड़ा रहता है ओसामा यहाँ

इस जग्ह मन्दिर बने और उस जग्ह सेतु रहे
राम भक्तों का बहुत होने लगा 'ड्रामा' यहाँ

लाठियों के ज़ोर पर ही हम विचरते मुल्क में
सभ्यता को हम ने ही कांधों पे है थामा यहाँ

हथकडी में तूलिका ले कर बनाओ चित्र सब
चित्रकारों से कहो लिक्खें हलफनामा यहाँ

भूख से भी है बड़ा ऐ दोस्त वंदे मातरम्
यह बताने के लिए आया हुक्मनामा यहाँ

आज पंचों ने दिया है गोत्र पर ये फ़ैसला
बाप ही कहलायेगा बेटे का अब मामा यहाँ

जल गयी मजबूर सी वह प्यार कर के भूल से
किस कदर बेबस हुई हर गांव की वामा यहाँ

-प्रेमचंद सहजवाला

कश्मीर


कल
धरा का स्वर्ग,श्वेतहिमाभिभूषित;
शिखर उत्तुंग , जिनपर वृक्ष शोभित।
कहीं डल झील के जीवित किनारे ,
प्रणय की भावना ढोते शिकारे।
रसीले बाग, सेवों के , फलों के;
यही , जो स्वर्ग के लगते झरोखे ।
यहाँ त्रिगुणा मनोरम वायु बहती,
कि कण - कण में अलौकिक शांति रहती।
सुविस्मित नेत्र कर देखो प्रकृति का ,
यहाँ पर रोज उत्सव चल रहा है ;
हुआ है दैव आज उदार कितना,
अमित सौन्दर्य का घट खुल रहा है ।
यही कश्मीर , भूषण जो अनोखा,
हमारे देश का हरदम रहा है;
यही वह प्रांत जिसमें मज़हबों का,
अनोखा सर्वदा संगम रहा है ।

अलौकिक संपदा , हम मूल्य जिसका जानते हैं,
कि भारतवर्ष का हम ताज़ इसको मानते हैं ;
भला किस देश में ऐसा प्रदेश विशेष होगा ,
जिसे बस देखकर ही स्वर्ग को भी द्वेष होगा ?


आज
यही कश्मीर है , जिसकी रगों में,
नहीं है रक्त, अब बारूद बहता ;
धवल हिम की पुरानी पत्रिका पर,
कहानी लिख , मनुज का रक्त बहता ।
धमाकों के नगाड़े शांति-सुख के,
किया करते हजारों रोज़ टुकड़े ;
बगल की ही सड़क पर एक बालक,
पिता का है विखंडित हाथ पकड़े ।
भयानक दृश्य है , रे शांत उपवन !
तुझे किसने अचानक डस लिया है ;
कि तूने भूल से अमृत समझकर ,
कहीं कोई हलाहल चख लिया है ?
सदा ही सौख्य-द्युति से दीप्त रहते,
दृगों की ज्योति जैसे खो गयी है ;
हमारी इस अलौकिक सुन्दरी की,
बड़ी दयनीय हालत हो गयी है ।

अब क्या कहें ? आतंक को , आतंक से आतंक है,
निश्चय यहाँ पर ही कहीं , कुछ चल रहा षडयंत्र है ।
अब कौन कितना जानता है , भूल थी किसकी यहाँ ?
किसने कहाँ शुरुआत की , है खो गयी खुशबू कहाँ ?
अब दोष देना है किसी को , तो वही दे लीजिये ,
पर देश की खातिर , अरे नेताजनों ? बस कीजिये !
है आपको भी ज्ञात, कितना फ़र्क राम- रहीम में,
बस कीजिये , इंसान को इंसान रहने दीजिये !!

-आलोक शंकर

शब्दार्थ-

श्वेतहिमाभिभूषित- सफ़ेद बर्फ़ का आभूषण पहने,
उत्तुंग- ऊचे,
त्रिगुणा - तीन गुण वाली, शांत , शीतल ,और सुरभित,
सुविस्मित -सुखद् आश्चर्य,
सौख्य-द्युति - भाईचारे, सद्‌भाव की रोशनी,
दृगों-आँखों