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तुम्हारे प्यार की खुशबू


हम हर माह के तीन सोमवारों को उस माह के यूनिकवि की रचनाएँ प्रकाशित करते रहे हैं। उसी परम्परा मे प्रस्तुत है हमारे मई माह के यूनिकवि मृत्युंजय ’साधक’ का यह मधुर गीत, जो प्रेम-गीतों की वासंती-बगिया के एक मनोहर पुष्प सी मोहकता लिये है।



तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे;
सुबह हो शाम हो दिन हो, सदा रहती मुझे घेरे॥

तुम्हारी याद में खोया रहा मैं, क्यों यहाँ अक्सर
मिले जो खत मुझे तुमसे, निकलता हूँ उन्हें पढ़कर
तुम्हारी राह तकता हूँ, मुझे भी तक रही है वह
बनाऊँ किस तरह उन पर, तुम्हारे ख्वाब के डेरे
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे...॥

बहुत बेचैन होता हूँ, अगर तुमको ना देखूँ तो
ये फूलों का मुकद्दर है, तुम्हारे पास फेंकूँ तो
उमंगों की कली, खिलकर मचलती है यहां अक्सर
तुम्हारे बिन सबेरे भी सताते हैं नजर फेरे
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे ..॥

तुम्हें अब हो गई फुरसत, ह्रदय में छा रहे हो तुम
हिमालय से बही गंगा, बहाये जा रहे हो तुम
चलो अब सीपियाँ ढूढ़ें, चलो मोती कहीं चुन लें
तुम्हारे साथ चलकर हम, उतर जायें कहीं गहरे
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे...॥


मेजर गौतम राजऋषि- हिन्द-युग्म के नये यूनिकवि


हिन्द-युग्म की यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में पिछली बार हमने ग़ज़ल लेखक पराग अग्रवाल को हमने यूनिकवि चुना था। सितम्बर माह की प्रतियोगिता के लिए आईं ग़ज़ल प्रविष्टियों का मूल्यांकन अलग से कराया गया। ४४ कविताओं में से ९ कविताओं को ग़ज़ल के पैमाने पर मापा गया। अन्य कविताओं के प्राप्तांकों के साथ ग़ज़लों के अंकों को शामिल करते वक़्त उनका सामान्यीकरण (Normalisation) किया गया। इस प्रकार प्रथम चरण के ६ जजों द्वारा दिये गये अंकों के औसत के आधार पर २२ कविताओं को दूसरे चरण के जजमेंट के लिए भेजा गया, जहाँ दो जजों के द्वारा दिये गये अंकों और प्रथम चरण के औसत के औसत के आधार पर गौतम राजऋषि की ग़ज़ल को यूनिकविता चुना गया।

गौतम राजऋषि

Gautam Rajrishiउम्र के बत्तीसवें पायदान पर खड़े गेतम राजऋषि जीवन के छोटे-मोटे अनुभवों को बस शब्दों में बाँध लेने की कोशिश करते हैं। सेना में हैं। जन्म और प्रारम्भिक शिक्षा बिहार के कोशी प्रभावित सहरसा में. इंटरमीडियेट करने के पश्‍चात राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, पुणे में दाखिला ले लिया जहाँ तीन साल के सैन्य-प्रशिक्षण के बाद भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में फिर एक साल का विशिष्ट प्रशिक्षण और तब से भारतीय सेना की पैदल-वाहिनी (इन्फैन्ट्री) में हैं। "मेजर" के पद पर हैं फिलहाल। विगत दस सालों की सैन्य-सेवा आधे से ज्यादा कश्मीर घाटी में अनाम लड़ाइयाँ लड़ते हुये बीती है। एक साल के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ की शांति-सेना के साथ अफ्रीका के कांगो गणराज्य में सेवारत थे और अभी पिछले डेढ़ सालों से उत्‍तराखंड की इस मनोरम वादी देहरादून में हैं- उसी भारतीय सैन्य अकादमी में प्रशिक्षक के तौर पर जहाँ कभी खुद ये एक कैडेट हुआ करते थे। साहित्य से जुडा़व बचपन से रहा। कविता और ग़ज़ल पढ़ते-सुनते एक रोज अहसास हुआ कि खुद भी लिख सकते हैं। बशीर बद्र, निदा फाजली, वसीम बरेलवी, राहत इंदौरी, मुक्तीबोध, दुष्यंत कुमार, अहमद फ़राज़, गुलज़ार, फ़िराक...ये कुछ नाम हैं जिन्हें पढ़ते-गुनते बड़े हुए हैं। और गज़लों के अराधक-याचक-पुजारी हैं। किताब खरीदने और जमा करने का शौक है। गज़लों और कविताओं का काफी अच्छा संकलन इक्कठा किया है। और दुसरी तरफ कौमिक्स के दीवाने हैं। अपनी वर्दी और फ़ौज के अनुशासन की तरह ग़ज़ल के अनुशासन पर खड़ा उतरने की कोशिश कर रहे हैं अपने गुरु पंकज सुबीर की शागिर्दगी में. आज ये यूनिकवि बने हैं, इसका श्रेय ये अपने गुरु को ही देते हैं।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

हवा जब किसी की कहानी कहे है
नये मौसमों की जुबानी कहे है

फ़साना लहर का जुड़ा है जमीं से
समुन्दर मगर आसमानी कहे है

कटी रात सारी तेरी करवटों में
कि ये सिलवटों की निशानी कहे है

यहाँ ना गुजारा सियासत बिना अब
मेरे मुल्क की राजधानी कहे है

"मुहल्ले की सारी गली मुझको घूरे"
हुई जबसे बेटी सयानी कहे है

"रिवाजों से हट कर नहीं चल सकोगे"
जड़ें ये मेरी खानदानी कहे है

नयी बात हो अब नये गीत छेड़ो
गुजरती घड़ी हर पुरानी कहे है

(बहर-मुतकारिब मुसमन सालिम, १२२-१२२-१२२-१२२)



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ८॰२५, ४, ६, ९, ७, ८॰२
औसत अंक- ७॰०७५
स्थान- पहला


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ७, ७॰६, ७ॅ०७५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ७॰२२५
स्थान- पहला


एक जज की टिप्पणी- ग़ज़ल की एक लाइन 'मुहल्ले की सारी गली मुझको घूरे' की ज़गह 'न जाने सभी क्यों मुझे घूरते हैं' किया जा सकता है। इससे शे'र और सुंदर बन पड़ेगा।


पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु १०० तक की पुस्तकें।

चूँकि यूनिकवि ने अक्टूबर माह के अन्य तीन सोमवारों को भी अपनी कविता प्रकाशित करने का वचन दिया है, अतः शर्तानुसार रु १०० प्रत्येक कविता के हिसाब से रु ३०० का नग़द इनाम दिया जायेगा।

यूनिकवि गौतम राजऋषि को तत्वमीमांसक डॉ॰ गरिमा तिवारी की ओर से 'येलो पिरामिड' भेंट की जायेगी तथा यूनिकवि को डॉ॰ गरिमा तिवारी से मेडिटेशन पर एक पैकेज का ऑनलाइन प्रशिक्षण पाने का अधिकार होगा (लक पैकेज़ छोड़कर)।

इस बार हम शीर्ष १३ कविताओं का प्रकाशन करेंगे ताकि पाठकों की निर्णायक दृष्टि भी सभी स्तरीय कविताओं पर पड़ सके। शीर्ष १३ के अन्य १२ कवि हैं- (यद्यपि हम शीर्ष १० कविताओं का ही प्रकाशन करना चाहते थे, लेकिन अंतिम ३ कविताओं के प्राप्तांक लगभग बराबर थे, इसलिए हम शीर्ष १३ का प्रकाशन कर रहे हैं)

पुष्कर चौबे
रचना श्रीवास्तव
लक्ष्मी ढौंडियाल
सुधी सिद्धार्थ
अरूण मित्तल
माला शर्मा
हरबिंदर सिंह कलसी
संजीव वर्मा
बज़्मी नक़वी
निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"
केशव कर्ण
दीपक मिश्रा

उपर्युक्त लिखित नामों में से शीर्ष ९ कवियों को शशिकांत सदैव अपना काव्य संग्रह 'स्त्री की कुछ अनकही' भेंट करेंगे।

उपर्युक्त कवियों से निवेदन है कि सितम्बर माह की अपनी कविता-प्रविष्टि को न तो अन्यत्र कहीं प्रकाशित करें ना प्रकाशनार्थ भेजें क्योंकि हम इस माह के अंत तक एक-एक करके प्रकाशित करेंगे।

पाठकों की बात करें तो पिछले १ साल से हिन्द-युग्म से जुड़ी रचना श्रीवास्तव हिन्द-युग्म को लगातार पढ़ती रहीं, पहले केवल पढ़ती रहीं, फिर कमेंट करना शुरू किया, शुरूआत में रोमन में लिखा, फिर हमारे अनुरोध पर देवनागरी में करने लगीं। इस बार ही हम इन्हें यूनिपाठिका बना रहे हैं।

रचना श्रीवास्तव

लखनऊ (उ॰प्र॰) में जन्मी रचना को लिखने की प्रेरणा बाबा स्वर्गीय रामचरित्र पाण्डेय और माता श्रीमती विद्यावती पाण्डेय और पिता श्री रमाकांत पाण्डेय से मिली। भारत और डैलस (अमेरिका) की बहुत सी कवि गोष्ठियों में भाग लिया, और डैलास में मंच संचालन भी किया। अभिनय में अनेक पुरस्कार और स्वर्ण पदक मिला, वाद-विवाद प्रतियोगिता में पुरुस्कार, लोक संगीत और न्रृत्य में पुरुस्कार, रेडियो फन एशिया, रेडियो सलाम नमस्ते (डैलस), रेडियो मनोरंजन (फ्लोरिडा), रेडियो संगीत (हियूस्टन) में कविता पाठ। कृत्या, साहित्य कुञ्ज, अभिव्यक्ति, सृजन गाथा, लेखिनी, रचनाकर, हिंद-युग्म, हिन्दी नेस्ट, गवाक्ष, हिन्दी पुष्प, स्वर्ग विभा, हिन्दी-मीडिया इत्यादि में लेख, कहानियाँ, कवितायें, बच्चों की कहानियाँ और कवितायें प्रकाशित।

पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु २०० तक की पुस्तकें।

यूनिपाठिका रचना श्रीवास्तव को तत्वमीमांसक डॉ॰ गरिमा तिवारी की ओर से 'येलो पिरामिड' भेंट की जायेगी तथा यूनिपाठिक को डॉ॰ गरिमा तिवारी से मेडिटेशन पर एक पैकेज का ऑनलाइन प्रशिक्षण पाने का अधिकार होगा (लक पैकेज़ छोड़कर)।

इस बार हम जिन्हें दूसरे से चौथे स्थान का पाठक चुन रहे हैं, उन्होंने बहुत अधिक तो नहीं पढ़ा, लेकिन जितना भी पढ़ा, उससे यह उम्मीद जगती है कि आने वाले समय में हिन्दी साहित्य को पाठकों की कमी खलने वाली नहीं है। दूसरे से चौथे स्थान के पाठक के रूप में हमने क्रमशः फ़िरदौस खान, मानविंदर भिंबर और सुरेन्द्र 'अभिन्न' को चुना है, जिन्हें मसि कागद की ओर से कुछ पुस्तकें भेंट की जायेंगी।

हम निम्नलिखित कवियों का भी धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया और यह निवेदन करते हैं कि अक्टूबर २००८ की यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में भी अवश्य भाग लें।

पुनीत मिश्रा
केतन कनौजिया "काफिर"
सुमन कुमारी 'मेनका'
सुमन कुमार सिंह
विवेक रंजन श्रीवास्तव
जीष्णु
दीपाली मिश्रा
दिनेश गहलोत
अनु शर्मा
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
जसप्रीत कौर
सनत जैन
सुरेन्द्र कुमार अभिन्न
उत्पल कांत मिश्रा
शाशिकांत शर्मा
नीलम मिश्रा
अनिल जींगर
सीमा 'स्‍मृति'
अभिषेक चित्रांश
प्रमोद कुमार
अनूप सिंह यादव
नीरा राजपाल
आशीष कुमार श्रीवास्तव
सुनील कुमार ’सोनू’
अविनाश वाचस्पति
महेश कुमार वर्मा
कमल प्रीत सिंह
सुरिंदर रत्ती
तपन शर्मा
कबीर मल्होत्रा
जय नारायण त्रिपाठी "अद्वितीय"

हिन्दी कविता का नया पराग (परिणाम)


आज क्रांतिकारी ग़ज़लगो, हिन्दी ग़ज़ल के अग्रदूत दुष्यंत कुमार जिन्होंने ग़ज़ल को नई व्यंजना दी, तेवरों को मान दिया, व्याकरणों का अतिक्रमण करके भी जनग्राह्यता बनाये रखी, का जन्मदिवस है और कितना सुखद संयोग है कि हमने जिन्हें अगस्त माह का यूनिकवि चुना है, उन्होंने भी ग़ज़ल जैसी रचना लिख भेजी थी, जिसे हमारे निर्णायक मंडली ने प्रथम चुना है।

यूनिकवि प्रतियोगिता का आयोजन विगत् २० महीनों से हिन्दी कविता-लेखन, उसका पठन और इंटरनेट पर हिन्दी की अपनी लिपि में लिखने को प्रोत्साहित करने हेतु हो रहा है। २०वें आयोजन में ४६ कवियों ने भाग लिया। दो चरणों में निर्णय कराया गया, प्रथम चरण के ५ जजों द्वारा दिये गये अंकों के औसत के आधार पर २५ कविताओं को अंतिम दौर के जजमेंट के लिए भेजा गया, जहाँ शेष २ जजों के दिये गये अंकों और पिछले चरण के औसत के औसत के आधार पर पराग अग्रवाल की ग़ज़ल को यूनिकविता चुना गया।

पराग अग्रवाल
Parag Agrawalपेशे से आर्किटेक्ट पराग अग्रवाल इन दिनों दिल्ली में धन उगाह रहे हैं, मूलरूप से धार (म॰ प्र॰) के रहने वाले हैं। ग़ज़ल लिखना-पढ़ना पसंद करते हैं।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

मेरी रातों के परिंदे बेशजर हो गए ................
नींदें बंज़र हो गयीं ख्वाब समंदर हो गए ......................

मैंने इनसे कहा था के जागते रहना ............
ख्वाब सो के उठे तो चद्दर हो गए ...............

वक़्त ने अपने चेहरे से मुखातिब कराया उन्हें .....
अपनी नज़र से उतरे तो हमनज़र हो गए ..............

यूं अंजाम हुआ उनकी हसरत-ए-परवाज़ का ..........
आईने घर से निकले तो दर-बदर हो गए .............

आरजू-ए-हरम पूरी तो हो गयी लेकिन ................
मेरी हवाओं के दायरे मुख्तसर हो गए ............



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ३, ४॰५, ७॰५, ६॰४५, ७
औसत अंक- ५॰६९
स्थान- आठवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ७॰५, ९, ६॰६९ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ७॰३९६६
स्थान- प्रथम


पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु १०० तक की पुस्तकें।

चूँकि यूनिकवि ने सितम्बर माह के अन्य तीन सोमवारों को भी अपनी कविता प्रकाशित करने का वचन दिया है, अतः शर्तानुसार रु १०० प्रत्येक कविता के हिसाब से रु ३०० का नग़द इनाम दिया जायेगा।

यूनिकवि पराग अग्रवाल को तत्वमीमांसक डॉ॰ गरिमा तिवारी की ओर से 'येलो पिरामिड' भेंट की जायेगी तथा यूनिकवि को डॉ॰ गरिमा तिवारी से मेडिटेशन पर एक पैकेज का ऑनलाइन प्रशिक्षण पाने का अधिकार होगा (लक पैकेज़ छोड़कर)।

इस बार हम शीर्ष १५ कविताओं का प्रकाशन करेंगे ताकि पाठकों की निर्णायक दृष्टि भी सभी स्तरीय कविताओं पर पड़ सके। शीर्ष १५ के अन्य १४ कवि हैं-

वीनस केसरी
सुरेन्द्र कुमार अभिन्न
कनुप्रिया
दिव्य प्रकाश दुबे
मयंक सक्सेना
रूपम चोपड़ा (RC)
केतन कनौजिया
पंकज उपाध्याय
सुधीर सक्सेना 'सुधि'
सुजीत कुमार सुमन
देवेन्द्र कुमार मिश्रा
पुष्कर चौबे
रचना श्रीवास्तव
लक्ष्मी ढौंडियाल

उपर्युक्त लिखित नामों में से शीर्ष ९ कवियों को मसि-कागद की ओर से कुछ चुनिंदा पुस्तकें दी जायेंगी। साथ ही साथ संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी अपना काव्य संग्रह 'समर्पण' भेंट करेंगे।

उपर्युक्त कवियों से निवेदन है कि अगस्त माह की अपनी कविता-प्रविष्टि को न तो अन्यत्र कहीं प्रकाशित करें ना प्रकाशनार्थ भेजें क्योंकि हम इस माह के अंत तक एक-एक करके प्रकाशित करेंगे।

इसबार पाठकों में उस तरह की ऊर्जा नहीं दिखी जो जुलाई महीने में देखने को मिलती है। वैसे कुछ लोग कहते भी हैं कि अगस्त महीना विचारों के बदलने का समय होता है। शायद तभी कुछ नये पाठक टिप्पणी करने का विचार बना रहे होंगे वहीं कुछ पाठक न करने का। लेकिन हम तो यही निवेदन करेंगे कि नये पढ़ने और टिपियाने का मन बनायें और पुराने भी कमेंट करते रहे।

अगस्त माह के पाठकों में से वीनस केसरी और दीपाली मिश्रा ने लगभग बराबर ही पढ़ा। दीपाली के टिप्पणियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रही। वीनस अगस्त के दूसरे सप्ताह से टिप्पणियाँ करते दिखे, हालाँकि वो हिन्द-युग्म को पिछले ७ महीनों से पढ़ रहे हैं। शुभ संकेत है कि वो अब पाठक और कवि दोनों रूपों में कूद पड़े हैं।

दीपाली मिश्रा

इस माह के यूनिपाठक पुरस्कार के लिए हमने चुना है पाठिका दीपाली मिश्रा को। दीपाली मिश्रा, जौनपुर (उत्तर प्रदेश) की रहने वाली हैं और वर्तमान समय में अपना परास्नातक भूगोल विषय में कर रही हैं। इन्हें साहित्य पढ़ना और संगीत सुनना बेहद पसंद है जोकि हिन्द-युग्म के द्वारा अब और बढ़ गया है। इन्होंने अपनी पहली कविता नौवीं कक्षा में लिखी थी-"हमको आगे बढ़ाना होगा" जोकि इनके छोटे भाई की कविताओं से प्रेरित थी. आगे चलकर ये प्रशाशनिक सेवा में जाना चाहती हैं।

पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु २०० तक की पुस्तकें।

यूनिपाठिका दीपाली मिश्रा को तत्वमीमांसक डॉ॰ गरिमा तिवारी की ओर से 'येलो पिरामिड' भेंट की जायेगी तथा यूनिपाठिक को डॉ॰ गरिमा तिवारी से मेडिटेशन पर एक पैकेज का ऑनलाइन प्रशिक्षण पाने का अधिकार होगा (लक पैकेज़ छोड़कर)।

निस्संदेह दूसरे स्थान के पाठक के रूप में हम चुनेंगे वीनस केसरी को, जिनकी टिप्पणियों से यह साफ झलकता है कि इन्हें साहित्य की गहरी समझ है, और जिस ऊर्जा से ये हमें पढ़ रहे हैं, हमें आशा है कि आगे भी पढ़ते रहेंगे। इन्हें हम मसि-कागद की ओर से कुछ पुस्तकें भेंट करेंगे।

हमें बहुत पढ़ने वालों में स्मार्ट इंडियन भी शामिल हैं, जो अब हिन्द-युग्म का हिस्सा भी हैं। रचना श्रीवास्तव हमें पढ़ तो रही हैं, परंतु टिप्पणियाँ रोमन में ही करती हैं, हम उनसे आग्रह करेंगे कि वो देवनागरी में टिप्पणी देना शुरू करें।

तीसरे और चौथे स्थान के पाठक के रूप में हमने रखा है नीलम मिश्रा और सुमित भारद्वाज को, जिन्हें मसि-कागद की ओर से कुछ पुस्तकें भेंट की जायेंगी।

ऊपर्युक्त सभी पाठकों को मसि-कागद पत्रिका का ताज़ा अंक भी दिया जायेगा।

हम निम्नलिखित कवियों का भी धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया और यह निवेदन करते हैं कि सितम्बर २००८ की यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में भी अवश्य भाग लें।

चंद्रकांत सिंह
संजय सेन सागर
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
गौतम राजरिशी
तपन शर्मा
पीयूष पण्डया
सविता दत्ता
निशा त्रिपाठी
संदेश दीक्षित
कमलप्रीत सिंह
दीपाली मिश्रा
अनुराग शर्मा
प्रदीप मानोरिया
अरुण अद्भुत
सीमा स्‍मृति
विवेक रंजन श्रीवास्तव"विनम्र"
सतीश वाघमरे
ब्रह्मनाथ त्रिपाठी 'अंजान'
विपिन जैन
सुमित भारद्वाज
रश्मि सिंह
भारती यादव
मनीष जैन
नीलम मिश्रा
सुमन कुमार सिंह
डॉ॰ गरिमा तिवारी
पुनीत सिन्हा
संदीप कुमार
सी॰ आर॰ राजश्री
नीलिमा
सनत जैन

सोमवार की कविता- हरकारे से अनुरोध


हरकारे से अनुरोध


सरकार, तुम पर हमारा पूरा भरोसा है
तुम लिए जा रहे हो हमारी पीड़ाएं हुजूर के पास
उम्मीद पर कायम है दुनिया
कौन जाने हमारी पीड़ा उन तक पहुँच ही जाए महाराज!

हम जानते हैं कि चाट-पकौड़ी से अब तुम्हारा काम नहीं चलता
तुम जाहिर कर चुके हो यह हमसे कई बार बातचीत में
लेकिन हम तुम्हारा यह दुःख तो दूर नहीं कर सकते
अन्न बेचकर बस इतना ही कर सके
लेकिन हमारी शिकायत हुज़ूर तक जरूर पहुंचा देना महाराज!

हमारा दुःख तुम्हें यात्रा में सालेगा जरूर
लेकिन विचलित न होना
हमारी बातें हुज़ूर को नागवार गुजरेंगी
लेकिन उन्हें नरम न कर देना
वैसे ही तन कर कहना जैसे कि हमने तुमसे कहा था
जीवन भर के लिए हरकारे हो
लेकिन राम कसम तुम हमारे एकमात्र सहारे हो!

तुम नदी पार करना लेकिन हमारा दुःख बहा मत देना
तुम हवा में उड़ना लेकिन हमें उड़ा मत देना
तुम विश्राम करना लेकिन हमारी बेचैनी भूल न जाना
तुम सैर-सपाटा करना लेकिन हमारे हाथ-पाँव के छाले याद रखना.

उम्मीद तो कमै है कि बनेंगे हमारे बिगड़े काज
लेकिन असलियत तो थोड़ा और खुलैगी महाराज.

-vijayshankar chaturvedi

प्रेम


पेड की डाली, पंछी का नृत्य,
अति मनभावन, प्रेम पिपासु,
नील गगन के चंद्र सा कोमल,
रहता हरदम नेह पिपासु।

श्याम की बंसी की धुन में गुम,
प्रेमीजन मिलने को आतुर,
राधा जी के कान्हा की मुरली,
अति मनमोहक मुरली का सुर।

पीताम्बर और मोर-मुकुट संग,
कान्हा नाचे झुन झुन झुन झुन,
मेघ की भांति ब्रिज में बरसे,
राधा जी की विरह के आंसु।

हर गोपी का प्रेम है कैसा,
खण्ड से पिघली बर्फ के जैसा,
राधा जी का प्रेम को देखो,
नील-जलधि के जल के जैसा।

प्रेम राम है, प्रेम है सीता,
प्रेम है मिलन की विरह को सहना,
प्रेम कृष्ण है, प्रेम है राधा,
प्रेम है प्रेम का चित में रहना।

प्रेम नंही गाथा-सागर भर,
ढाई अक्षर का सुंदर गहना,
नंही है जिव्हा-मुख का वर्णन,
प्रेम तो है बस चक्षु से कहना।

कश्मीर


कल
धरा का स्वर्ग,श्वेतहिमाभिभूषित;
शिखर उत्तुंग , जिनपर वृक्ष शोभित।
कहीं डल झील के जीवित किनारे ,
प्रणय की भावना ढोते शिकारे।
रसीले बाग, सेवों के , फलों के;
यही , जो स्वर्ग के लगते झरोखे ।
यहाँ त्रिगुणा मनोरम वायु बहती,
कि कण - कण में अलौकिक शांति रहती।
सुविस्मित नेत्र कर देखो प्रकृति का ,
यहाँ पर रोज उत्सव चल रहा है ;
हुआ है दैव आज उदार कितना,
अमित सौन्दर्य का घट खुल रहा है ।
यही कश्मीर , भूषण जो अनोखा,
हमारे देश का हरदम रहा है;
यही वह प्रांत जिसमें मज़हबों का,
अनोखा सर्वदा संगम रहा है ।

अलौकिक संपदा , हम मूल्य जिसका जानते हैं,
कि भारतवर्ष का हम ताज़ इसको मानते हैं ;
भला किस देश में ऐसा प्रदेश विशेष होगा ,
जिसे बस देखकर ही स्वर्ग को भी द्वेष होगा ?


आज
यही कश्मीर है , जिसकी रगों में,
नहीं है रक्त, अब बारूद बहता ;
धवल हिम की पुरानी पत्रिका पर,
कहानी लिख , मनुज का रक्त बहता ।
धमाकों के नगाड़े शांति-सुख के,
किया करते हजारों रोज़ टुकड़े ;
बगल की ही सड़क पर एक बालक,
पिता का है विखंडित हाथ पकड़े ।
भयानक दृश्य है , रे शांत उपवन !
तुझे किसने अचानक डस लिया है ;
कि तूने भूल से अमृत समझकर ,
कहीं कोई हलाहल चख लिया है ?
सदा ही सौख्य-द्युति से दीप्त रहते,
दृगों की ज्योति जैसे खो गयी है ;
हमारी इस अलौकिक सुन्दरी की,
बड़ी दयनीय हालत हो गयी है ।

अब क्या कहें ? आतंक को , आतंक से आतंक है,
निश्चय यहाँ पर ही कहीं , कुछ चल रहा षडयंत्र है ।
अब कौन कितना जानता है , भूल थी किसकी यहाँ ?
किसने कहाँ शुरुआत की , है खो गयी खुशबू कहाँ ?
अब दोष देना है किसी को , तो वही दे लीजिये ,
पर देश की खातिर , अरे नेताजनों ? बस कीजिये !
है आपको भी ज्ञात, कितना फ़र्क राम- रहीम में,
बस कीजिये , इंसान को इंसान रहने दीजिये !!

-आलोक शंकर

शब्दार्थ-

श्वेतहिमाभिभूषित- सफ़ेद बर्फ़ का आभूषण पहने,
उत्तुंग- ऊचे,
त्रिगुणा - तीन गुण वाली, शांत , शीतल ,और सुरभित,
सुविस्मित -सुखद् आश्चर्य,
सौख्य-द्युति - भाईचारे, सद्‌भाव की रोशनी,
दृगों-आँखों