हम हर माह के तीन सोमवारों को उस माह के यूनिकवि की रचनाएँ प्रकाशित करते रहे हैं। उसी परम्परा मे प्रस्तुत है हमारे मई माह के यूनिकवि मृत्युंजय ’साधक’ का यह मधुर गीत, जो प्रेम-गीतों की वासंती-बगिया के एक मनोहर पुष्प सी मोहकता लिये है।
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे;
सुबह हो शाम हो दिन हो, सदा रहती मुझे घेरे॥
तुम्हारी याद में खोया रहा मैं, क्यों यहाँ अक्सर
मिले जो खत मुझे तुमसे, निकलता हूँ उन्हें पढ़कर
तुम्हारी राह तकता हूँ, मुझे भी तक रही है वह
बनाऊँ किस तरह उन पर, तुम्हारे ख्वाब के डेरे
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे...॥
बहुत बेचैन होता हूँ, अगर तुमको ना देखूँ तो
ये फूलों का मुकद्दर है, तुम्हारे पास फेंकूँ तो
उमंगों की कली, खिलकर मचलती है यहां अक्सर
तुम्हारे बिन सबेरे भी सताते हैं नजर फेरे
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे ..॥
तुम्हें अब हो गई फुरसत, ह्रदय में छा रहे हो तुम
हिमालय से बही गंगा, बहाये जा रहे हो तुम
चलो अब सीपियाँ ढूढ़ें, चलो मोती कहीं चुन लें
तुम्हारे साथ चलकर हम, उतर जायें कहीं गहरे
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे...॥




उम्र के बत्तीसवें पायदान पर खड़े गेतम राजऋषि जीवन के छोटे-मोटे अनुभवों को बस शब्दों में बाँध लेने की कोशिश करते हैं। सेना में हैं। जन्म और प्रारम्भिक शिक्षा बिहार के कोशी प्रभावित सहरसा में. इंटरमीडियेट करने के पश्चात राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, पुणे में दाखिला ले लिया जहाँ तीन साल के सैन्य-प्रशिक्षण के बाद भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में फिर एक साल का विशिष्ट प्रशिक्षण और तब से भारतीय सेना की पैदल-वाहिनी (इन्फैन्ट्री) में हैं। "मेजर" के पद पर हैं फिलहाल। विगत दस सालों की सैन्य-सेवा आधे से ज्यादा कश्मीर घाटी में अनाम लड़ाइयाँ लड़ते हुये बीती है। एक साल के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ की शांति-सेना के साथ अफ्रीका के कांगो गणराज्य में सेवारत थे और अभी पिछले डेढ़ सालों से उत्तराखंड की इस मनोरम वादी देहरादून में हैं- उसी भारतीय सैन्य अकादमी में प्रशिक्षक के तौर पर जहाँ कभी खुद ये एक कैडेट हुआ करते थे। साहित्य से जुडा़व बचपन से रहा। कविता और ग़ज़ल पढ़ते-सुनते एक रोज अहसास हुआ कि खुद भी लिख सकते हैं। बशीर बद्र, निदा फाजली, वसीम बरेलवी, राहत इंदौरी, मुक्तीबोध, दुष्यंत कुमार, अहमद फ़राज़, गुलज़ार, फ़िराक...ये कुछ नाम हैं जिन्हें पढ़ते-गुनते बड़े हुए हैं। और गज़लों के अराधक-याचक-पुजारी हैं। किताब खरीदने और जमा करने का शौक है। गज़लों और कविताओं का काफी अच्छा संकलन इक्कठा किया है। और दुसरी तरफ कौमिक्स के दीवाने हैं। अपनी वर्दी और फ़ौज के अनुशासन की तरह ग़ज़ल के अनुशासन पर खड़ा उतरने की कोशिश कर रहे हैं अपने गुरु पंकज सुबीर की शागिर्दगी में. आज ये यूनिकवि बने हैं, इसका श्रेय ये अपने गुरु को ही देते हैं।
लखनऊ (उ॰प्र॰) में जन्मी रचना को लिखने की प्रेरणा बाबा स्वर्गीय रामचरित्र पाण्डेय और माता श्रीमती विद्यावती पाण्डेय और पिता श्री रमाकांत पाण्डेय से मिली। भारत और डैलस (अमेरिका) की बहुत सी कवि गोष्ठियों में भाग लिया, और डैलास में मंच संचालन भी किया। अभिनय में अनेक पुरस्कार और स्वर्ण पदक मिला, वाद-विवाद प्रतियोगिता में पुरुस्कार, लोक संगीत और न्रृत्य में पुरुस्कार, रेडियो फन एशिया, रेडियो सलाम नमस्ते (डैलस), रेडियो मनोरंजन (फ्लोरिडा), रेडियो संगीत (हियूस्टन) में कविता पाठ। कृत्या, साहित्य कुञ्ज, अभिव्यक्ति, सृजन गाथा, लेखिनी, रचनाकर, हिंद-युग्म, हिन्दी नेस्ट, गवाक्ष, हिन्दी पुष्प, स्वर्ग विभा, हिन्दी-मीडिया इत्यादि में लेख, कहानियाँ, कवितायें, बच्चों की कहानियाँ और कवितायें प्रकाशित।
पेशे से आर्किटेक्ट पराग अग्रवाल इन दिनों दिल्ली में धन उगाह रहे हैं, मूलरूप से धार (म॰ प्र॰) के रहने वाले हैं। ग़ज़ल लिखना-पढ़ना पसंद करते हैं।
इस माह के यूनिपाठक पुरस्कार के लिए हमने चुना है पाठिका दीपाली मिश्रा को। दीपाली मिश्रा, जौनपुर (उत्तर प्रदेश) की रहने वाली हैं और वर्तमान समय में अपना परास्नातक भूगोल विषय में कर रही हैं। इन्हें साहित्य पढ़ना और संगीत सुनना बेहद पसंद है जोकि हिन्द-युग्म के द्वारा अब और बढ़ गया है। इन्होंने अपनी पहली कविता नौवीं कक्षा में लिखी थी-"हमको आगे बढ़ाना होगा" जोकि इनके छोटे भाई की कविताओं से प्रेरित थी. आगे चलकर ये प्रशाशनिक सेवा में जाना चाहती हैं।

