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आकाश में


छागये लो बादल आकाश में
प्यास धरती को ; नल आकाश में

खींचली साड़ी ; तारों से भरी
द्रौपदी रोई; छल आकाश में

चिढ़ते पानी से ; हैरान सब
कौन ये सूं सूं ; जल आकाश में

छेड़ती आ कर आवारा हवा
लो बचा लो आँचल आकाश में

ना उगी धरती से कोई फ़सल
वो चलाता है हल आकाश में

पेड़ झूमा ; मस्ती का था नशा
फैंकता मीठा फल आकाश में

-हरिहर झा

जिस्म कमाने निकल गया है


कवि नाज़िम नक़वी इनदिनों हिन्द-युग्म का आतिथ्य स्वीकारे हुए हैं। आवाज़ पर ईद के बहाने और कविता पृष्ठ पर ग़ज़लों के बहाने आप सभी इनसे रूबर हो ही चुके हैं। आज पढ़ते हैं इनकी एक और ग़ज़ल॰॰

सूरज हाथ से फिसल गया है
आज का दिन भी निकल गया है

तेरी सूरत अब भी वही है
मेरा चश्मा बदल गया है

ज़ेहन अभी मसरूफ़ है घर में
जिस्म कमाने निकल गया है

क्या सोचें कैसा था निशाना
तीर कमां से निकल गया है

जाने कैसी भूख थी उसकी
सारी बस्ती निगल गया है

मुहब्बत की वापिस निशानी करें


मुहब्बत की वापिस निशानी करें।
शुरू फिर जो चाहें कहानी करें।।

है घाटे का सौदा मुहब्बत सदा।
हिसाब अब लिखें या जुबानी करें।।

चलो नागफनियाँ उखाड़ें सभी।
वहाँ फिर खड़ी रात-रानी करें।।

है रुत पर भला बस किसी का चला।
चलो बातें ही हम सुहानी करें।।

खरीदे बुढापे को कोई नहीं।
सभी तो पसन्द अब जवानी करें।।

बहुत जी लिये और मर भी लिये।
बता क्या तेरा जिन्दगानी करें।।

रवायत नहीं ‘श्याम’ जब ये भली।
तो फिर बातें क्यों हम पुरानी करें।।

ये भी क्या जिन्दगी हुई साहिब


घर जला, रोशनी हुई साहिब
ये भी क्या जिन्दगी हुई साहिब

है न मुझको हुनर इबादत का
सर झुका, बन्दगी हुई साहिब

भूलकर खुदको जब चले हम, तब
दोस्ती आपसे हुई साहिब

तू नही और ही सही कहना
क्या भला आशिकी हुई साहिब

खुद से चलकर तो ये नहीं आई
दिल दुखा, शायरी हुई साहिब

जीतकर वो मजा नहीं आया
हारकर जो खुशी हुई साहिब

तुम पे मरकर दिखा दिया हमने
मौत की बानगी हुई साहिब

'श्याम' से दोस्ती हुई ऐसी
सब से ही दुश्मनी हुई साहिब

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन

--डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'

समझेगा कुरान की वो खामोशियाँ कैसे


Surendra Kumar Abhinnaयूनिकवि प्रतियोगिता के तीसरे स्थान पर हम सुरेन्द्र कुमार अभिन्न की कविता लेकर आये हैं। यमुना नगर (हरियाणा) में जन्मे अभिन्न अंग्रेजी भाषा और साहित्य में स्नातकोत्तर (एम.ए. व एम फिल्. ), यात्रा एवं पर्यटन प्रबंधन में स्नातकोत्तर (एम.टी.ए.) जैसी शिक्षाएँ ली हैं और आबकारी एवं कराधान अधिकारी के रूप में सेवारत हैं। सुरेन्द्र को अच्छा साहित्य (विधा चाहे कोई भी हो) पढना और उस पर चिंतन-मनन करना पसंद है।

पुरस्कृत कविता- अपने खिलाफ़

उजालों में पड़ी सच्चाई से मुंह मोड़ने वाले,
खोजेगा ख़ुद को अंधेरों के दरमियाँ कैसे

सुनाई न दी चीख जिसे मजलूम की,
समझेगा कुरान की वो खामोशियाँ कैसे

तोड़ेगा जब शाख से परिंदों के घोसले ,
बचायेगा मुसीबतों से अपना आशियाँ कैसे,

मैं ही गवाह हूँ अपने गुनाहों का चश्मदीद,
खोलूं खिलाफ अपने अपनी जुबान कैसे

पूछा न करो ख़त में के हम यहाँ कैसे,
समझ लो अपने शहर के हालत वहाँ कैसे



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५, ५, ६, ६॰८, ७
औसत अंक- ५॰९६
स्थान- चौथा


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ७, ७, ५॰९६ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰६५३
स्थान- तीसरा


पुरस्कार- मसि-कागद की ओर से कुछ पुस्तकें। संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी अपना काव्य-संग्रह 'समर्पण' भेंट करेंगे।

रास्तों से गपगपाते चल दिये


ग़ज़ल- प्रेमचंद सहजवाला

रास्तों से गपगपाते चल दिये
बारहा ठोकर भी खाते चल दिये

हमसफ़र कोई मिला तो खुश हुए
राग उल्फत का सुनाते चल दिये

वक़्त जब बोला कि मंज़िल दूर है
बेवजह हम खिलखिलाते चल दिये

गर्मियों में छांव में बैठे कहीं
सर्द रुत में थरथराते चल दिये

हर हकीक़त से गले मिलते रहे
ख़्वाब से भी तो निभाते चल दिये

हाथ में परचम तमन्ना के लिए
ये कदम आगे बढ़ते चल दिये

---प्रेमचंद सहजवाला

जमीर एक आग






बात लच्छों में लपेट कर कहनी मुझे आई नहीं
और इस दुनिया को मेरी साफ़गोई भाई नही
मैं यूहीं चलता रहा जमाने से कुछ अलग हट कर
मुझे खुशी है बजूद से अपने, मैं कोई परछांई नही

महलों में घूमने से कब किसे यहां खुशी है मिली
बहार आने पर तो जंगल में भी हर कली है खिली
जो आराम थक कर खुली जमीन पर पसर जाने से है
वो लज्जत किसी ने मखमली बिस्तर मे भी पाई नहीं


मन के हालात तय करते हैं खुशी व गम का पैमाना
बांटने से और बढता है मुस्कराहटों का यह खजाना
एक बार गिरने से कोई मायूस होता उम्र भर के लिये
क्या बहुतेरों ने यहां बिना बैसाखी लाचारी निभाई नहीं


अंधेरों को देखना हो तो देखना उजालों का सपना ले कर
मिल जाये रोशनी तो चलना अंधेरों की यादें साथ ले कर
मुफ़लिसी हजार दर्जे बेहतर है किसी बहकी हुई अमीरी से
जमीर को हमेशा आग समझना महज एक दियासलाई नही

तेरे आने से




कितना जोश, पाकीजगी है आज आशियाने में
कहां से सीखा ऐसे रिश्तों को पिरोना तुमने

मेरी आंखों की चमक पर क्यों तुम हैरान हो
कर दिया पूरा मेरा हर ख्वाब सलौना तुमने

मुद्दतों बाद आज मुझको फ़िर सूकूं की नींद आई
अपने फ़ूल से हाथों से बिछाया था बिछौना तुमने

अब तो बस खेल खेल में यूंही उमर गुजर जायेगी
मुझको दे दिया एक हंसी नायाब खिलौना तुमने

अब तलक मेरा सिर्फ़ अंधेरों से ताल्लुक रहा
कर दिया रोशन मेरे घर का कोना-कोना तुमने

उजाले तक


सनक गई सकून मिला अन्धेरे से उजाले तक
दावा नहीं दया पहुंची जीगर के छाले तक

लेपटोप पंहुच गये गांव में बस्ती में
मोबाइल हथेली में सब्जी दूध वाले तक

हेरी पोटर देख-देख सर्पीली तेज हवा चली
फैल गया दंश लहू में गोरे तक, काले तक

झेलते रहे भिड़न्त इस दुनियां के खेल में
तो गेंद देखो आ पहुंची दुश्मन के पाले तक

खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक

फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक

दरवाजे पे गमगीन हुये गोता हमने यूं खाया
कि चाबी पंहुच ही गई लटकते ताले तक

-हरिहर झा

गजल


दावत बुला के धोखे से है काट सर दिया
हैवां का जी भरा न तो फिर ढ़ा कहर दिया

दुनिया कि कोई हस्ती शिकन इक न दे सकी
अपनों ने उसको घोंप छुरा टुकड़े कर दिया

कण-कण बिखर गया जो किया वार पीठ पर
खुद को रहा समेट कहाँ तोड़ धर दिया

अंडों को खाता सांप ये हैं उसकी आदतें
बच्चे को नर ने खा सच को मात कर दिया

इंसां गिरा है इतना रहा झूठ सच बना
पैसा बना इमान वही घर में भर दिया

होली जला के रिश्तों की नंगा है नाचता
बन कंस खेल बदतर वह खेल फिर दिया

कवि कुलवंत सिंह

चांद की छुअन





तुम मिले तो धूप भी, छत-मकान हो गई
झुक गई थी जो नजर, तन कमान हो गई

राह की दुशवारियों से, अब कोई शिकवा नहीं
साथ जो तेरा मिला, मेरी राहें आसान हो गई

सिमटी सी चाहतों को जैसे, पँख हों मिल गये
हसरतें फ़िर से आज एक, खुली उडान हो गई

दिल से निकल बरसों, होठों पर जो रुकी रही
वो अनकही बातें सभी, खुलकर बयान हो गई

इक तमन्ना उदास लहरों पर डूबती उतराती रही
छू लिया झुककर चांद ने जब, आसमान हो गई

रात के अंधेरों में रंग,सूर्ख-चाँदनी का भर गया
छोटी सी दुनिया मेरी, तारों का जहान हो गई

शबनम-ए-हयात





उन्हें चाहत तो है मुझसे, ऐतबार नहीं है
होगी हासिल ये मंजिल, उस्तुवार नहीं है

वो जब चाहें पलट जायें अपनी जुबान से
हमको मगर इतना भी, इख्तियार नही है

सब्र तलबी कब तक जमाने तू ही बता दे
सब कुछ तो है बस सिर्फ़, करार नहीं है

वाकिफ़ हूं खूब मैं उन कलियों के दर्द से
आई हिस्से में जिनके कोई, बहार नहीं है

शबनम-ए-हयात खो जायेगी धुआं बन के
ये इल्तजा-ए-दिल है कोई, गुब्बार नहीं है
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चाहत = प्यार, ऐतबार = भरोसा, उस्तुवार = पक्का भरोसा
जुबान =बातों, इख्तियार = कब्जा या कंट्रोल,
सब्र-तलबी = मन मारना
करार = चैन, वाकिफ़ = जानकारी,
शबनम-ए-हयात = ओस सी जिन्दगी,
इल्तजा-ए-दिल = दिल की याचना
गुब्बार = हवा में उडती हुई धूल

मेरे किस्सों को किताब होने दो


बिखरे सवालों को जबाब होने दो
मेरे किस्सों को किताब होने दो

दर्द की शिद्दत को पहचानेंगे वो
जर्रा-ए-दिल को आफ़ताब होने दो

माहताब कब तक छिपेगा पर्दों में
आज सच को बेनकाब होने दो

आंसू भारी पडेंगे हरसू दौलत पर
ठहरो आखिर को हिसाब होने दो

ढूंढा फ़िरेगा मुझको जमाने भर में
उदास मुहब्बत को अजाब होने दो

"मोह" की अब तक कटी ख्यालों में
बाकी बची को भी पुर-ख्वाब होने दो
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शिद्दत = तेजी, तीव्रता, मात्रा
जर्रा-ए-दिल = दिल का टुकडा
आफ़ताब= सूरज, चमकता सितारा
माहताब = चांद की रोशनी, चांदनी
चिलमन = झीना पर्दा
हरसू = चारों तरफ़
अजाब = विशिष्ट, कम पाया जाने वाला
चमत्कारी
पुर-ख्वाब=स्वप्न भरी, स्वप्नमय

जज्वा-ऐ-दिल



पता मुझसे कहीं, अपने घर का खो गया
जागते हुए शहर को जाने ये क्या हो गया

ताल्लुकों में, वो पहले सी, गर्मजोशी नहीं
सारे रिश्तों का अहसास पत्थर सा हो गया

जो पूछा करता था मुझसे मंजिलों का पता
आज राहों में, वो शक्स, मेरा रहवर हो गया

मैंने मांगे कहां, किसी से, वफ़ाओं के सिले
क्यों खैरातों का मुझ पर, यह सिला हो गया

आज हस्ती बन गई मेरी, उस सूखे पेड सी
जो इक ऊपर चढी बेल से फ़िर हरा हो गया

फ़ूल से भी हल्का समझ मैने संभाला जिन्हें
वक्त पर उन सब के लिये एक बोझा हो गया

आज मांगू भी तो क्या मांगू, झुक सजदे में मैं
जीने का वो जज्वा, इस दिल से जुदा हो गया

क्यूं नहीं लेते






छुडा के हाथ अगर चल दिया है कोई अपना
किसी गैर को तुम अपना बना क्यूं नहीं लेते

दिल में न पालो तुम सैलाब घुटती तमन्ना का
भरी हैं आंखें तो कुछ आंसू बहा क्यूं नहीं लेते

हंसी सपने किसी खास की जागीर नहीं होते
नया ख्वाब इक आंखों में सजा क्यूं नही लेते

बन कर चांद सा गर तुम्हें रहना नहीं आता
दहकता सूरज खुद को तुम बना क्यूं नहीं लेते

कुछ कश्तियों को तूंफ़ा ले जाते हैं किनारे तक
किनारा भूल लहरो को गले लगा क्यूं नहीं लेते

हरी होंगी फ़िर से ये सूखी बेलें बहारों के आने पर
वक्ती तौर पर कांटो को दिल मे सजा क्यूं नहीं लेते

कोई नहीं है




जिन्होंने संजोये और पाले लाखों सपने
आज उन भीगे आबशारों का कोई नही है

जिसमें बसा करता था कभी एक घर
आज उन टूटी दीवारों का कोई नहीं है

जिनका साथ पा कर चढी ऊंची मिनारें
आज उन कमजोर सहारों का कोई नहीं है

जहां पर खेलती रौनकें थी जमाने भर की
आज उन उजडे किनारों का कोई नहीं है

कभी वक्त था जिनकी ठोकरों में रुलता
आज उन वक्त के मारों का कोई नहीं है

जिनकी उंगली थाम बचपन जवानी में बदला
आज उन्हीं बुलन्द बुजुर्गवारों का कोई नहीं है

कोयला आज भी हूं



हमसे कब आ के हाले दिल पूछा तुमने
और हमने भी किसी को बताया ही नहीं

दर्द के इस दिल पर लगे थे पहरे इतने
बाद तेरे इस जानिब कोई आया ही नहीं

दुशमनी हमसे प्यार में ऐसी निभाई तुमने
फ़िर किसी को कभी दोस्त बनाया ही नहीं

दिले-नादान को भा गई खिजायें इस कदर
फ़िर बहारों में भी कोई गुल खिलाया ही नहीं

"मोह"सुलगा और सब ने धुंआ भर देखा
कोयला आज भी हूं राख बन पाया ही नहीं

मुस्कराओ तो सही




धूप फैली है हरसू खिड़कियों से पर्दे हटाओ तो सही
बुझ गया पहला अगर दूसरा चिराग जलाओ तो सही

कब तलक गम का रोना लिये बैठे रहोगे तुम यूं ही
खुशी है रूबरू खड़ी तेरे अब जरा मुस्कराओ तो सही

न राहों की, न मंजिलों की कमी है इस दुनिया में
हौसला तुम भी करो, जरा चल के दिखाओ तो सही

हसरतों की शाख पर आज है फिर से बहारों का साया
प्यार के जज़्बे से आज नया गुँचा खिलाओ तो सही

किसी इक रात के चातक से पड़ा था पहले पाला तेरा
आखिरी सांस तक रहेगा साथ, हाथ मिलाओ तो सही

कोई मेरे साथ तो है


गम कुछ कम नहीं हुए तुझसे मिलने के बाद मगर
दिल में इक हौंसला सा है कि कोई मेरे साथ तो है

कांटे मेरी राहों के हरसूरत मेरे हिस्से में ही आयेंगे
गर इक गुल है मेरे साथ तो जरूर कोई बात तो है

मुझे आज तक जो भी मिला,मशक्कत से मिला
तुझ से मिलने में मेरी तकदीर का कुछ हाथ तो है

अंधेरे कहां समझते हैं भला मशाल के जलने का दर्द
वजह कोई भी हो हर सूरत में दोनों की मात तो है

डूबने वाले के लिये फ़र्क नहीं मंझधार और किनारे में
बेबसी का सबब जिन्दगी के उलझे हुये हालात ही तो हैं

मै क्या क्या न भूल चुका


हमदर्द समझ जिसको मैंने, जख्म दिखाये थे अपने
छिडका नमक उसी ने इतना , मैं दर्द पुराना भूल चुका

मेरे घर की नींव हिला दी, मेरे रोपे पेड की चूलों ने
अब तो तौबा करली भैया, मैं पौध लगाना भूल चुका

कितने लोग मिलते है अब भी, बन कर मेरे अपने से
हाथ मिलाता हूं सबसे पर, दिल का मिलाना भूल चुका

रुकता हूं हर मोड पर लेकिन मुडकर पीछे देखा नहीं
याद तेरी है दिल में लेकिन, वो तेरा ठिकाना भूल चुका

मुहब्बत, अदावत, बेरूखी, वफ़ा अब तो सारे देख लिये
गुजरे हादसे याद हैं मुझको, जिनको जमाना भूल चुका

आईना हूं मैं लेकिन जाने क्यों, अक्श दिखाना भूल चुका
रंग बदलते चेहरे देख-देख कर, रंग में आना भूल चुका

झूठी मुस्कानों के पीछे, जब उठती देखीं लपटें नफ़रत की
प्रेम भरा है रग-रग में लेकिन, मैं प्रेम का गाना भूल चुका

रोने वालों की कदर कहां इस हंसती गाती दुनिया में
समझा इस राज को जबसे, मैं अश्क बहाना भूल चुका