सनक गई सकून मिला अन्धेरे से उजाले तक
दावा नहीं दया पहुंची जीगर के छाले तक
लेपटोप पंहुच गये गांव में बस्ती में
मोबाइल हथेली में सब्जी दूध वाले तक
हेरी पोटर देख-देख सर्पीली तेज हवा चली
फैल गया दंश लहू में गोरे तक, काले तक
झेलते रहे भिड़न्त इस दुनियां के खेल में
तो गेंद देखो आ पहुंची दुश्मन के पाले तक
खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक
फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक
दरवाजे पे गमगीन हुये गोता हमने यूं खाया
कि चाबी पंहुच ही गई लटकते ताले तक
-हरिहर झा
-
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13 कविताप्रेमियों का कहना है :
सनक गई सकून मिला अन्धेरे से उजाले तक
दावा नहीं दया पहुंची जीगर के छाले तक
वाह हरिहर जी कमाल की ग़ज़ल लिखी है इस बार, एक एक शेर एक अलग दास्तान कहता है....
खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक
फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक
खूब ...
अंधेरे से उजाले तक का सफर तय करती आपकी ग़ज़ल अच्छी लगी .......सीमा सचदेव
एक नयी तरह की बेहतरीन गजल...
बहुत बढिया साब!
बधाई
फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक
बहुत अच्छी रचना.....नए ढंग की!
सुंदर बनाया है |
अवनीश तिवारी
वैसे तो पूरी रचना ही अच्छी है पर आपकी इस बात पर बरबस ही मुँह से वाह निकल पड़ी!
'खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक"
फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक
वाह!!हरिहर जी बहुत ही बेहतरीन बात कही आपने बहुत अच्छी लगी यह रचना आपकी
खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक
बहुत खूब.
Ek nayee koshish...
बहुत अच्छा लिखा है हरीहर जी ने .........अच्छी कोशीश है .........मगर एक जुटता की कमी लगी मुझे कविता में ........या कुछ गहरा अर्थ हो जो में जान ना पाई ........प्रेम a
बहुत ही सुंदर रचना
किस किस शेर की तारीफ की जाय
हर एक शेर लाजवाब है
खास कर ये
"लेपटोप पंहुच गये गांव में बस्ती में
मोबाइल हथेली में सब्जी दूध वाले तक"
"खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक"
अर्चना जी
जैसा कि गजल-गुरूजी ने बताया था,कि गजल में एक थीम होना आवश्यक तत्व नहीं है पर फिर भी
मैंने आशावाद को मूल-स्वर दिया है पर
हर शेर में ऐसा होना आवश्यक नहीं है
हरिहर जी ,
आज के दौर में तेजी से रंग बदलती जिंदगी की झलक आपकी इस ग़ज़ल में साफ साफ दिखाई देती है , सभी शेर प्रभावित करते हैं, बहुत खूब .
शुभकामनाएँ
^^पूजा अनिल
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