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वाह! मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों, वरना न हों


आतंकवाद
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घटना घटी
नैतिकता के आधार पर
मंत्री जी घटनास्थल पर गये
घटना की निंदा की
मारे गये परिवारों के प्रति
संवेदना प्रकट की
और हर संभव सहायता का वचन दिया।

वाह!
मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों
वरना न हों।

आज फिर घटना घटी
मंत्री जी की नैतिकता फिर जागी
घटना स्थल पर गये
घटना की घोर निंदा की
दोषियों को पकड़कर
तत्काल मुकदमा चलाने का आदेश दिया
दूरदर्शन पर बार-बार दर्शन दिया
और हर संभव सहायता का वचन दिया।

वाह!
मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों
वरना न हों।

बार-बार घटना घटी
हर बार मंत्री जी की नैतिकता जागी
हर बार संवेदना प्रकट की
बार-बार दूरदर्शन पर दर्शन दिया

वाह!
मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों
वरना न हों।

नहीं किया
तो सिर्फ दो काम नहीं किया

एक
आजादी के इकसठ वर्षों के बाद भी
देश में
ऐसी व्यवस्था को जन्म नहीं दिया
कि ऐसी घटनाएँ
बार-बार न घटें।

दो
नैतिकता के आधार पर
अपना इस्तिफा नहीं दिया।

वाह!
मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों
वरना न हों।

--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

करके चैलेन्ज ई-मेल भेजते, हुई सरकारें फेल


प्रतियोगिता से देवेन्द्र कुमार मिश्रा की हम कुछ कुण्डलियाँ लेकर हाज़िर हैं, जिन्होंने १२वाँ स्थान भी बनाया। पिछले महीने भी हमने देवेन्द्र की ही सावन पर कुछ कुण्डलियाँ प्रकाशित किया था।

पुरस्कृत कविता- खुपिया बज्र

आसमान आतंक बदरिया, देश धरा पर छाए।
सभी लोग हैं सहमे-सहमे, दामिनि बन गिर जाए।।
दामिनि बन गिर जाए, स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त।
ई-मेल बना यमदूत, खुशियों को कर दे ध्वस्त ।।
जमी जड़‌े जहाँ आतंकी, उखाडो इन्हें करो बीरान।
मुट्ठी का एहसास दिला दो, बिखरे छठा इन्द-धनुषी आसमान ।।

देश खडा बारूद ढेर पर, खेलें आतंकी खेल ।
करके चैलेन्ज ई-मेल भेजते, हुई सरकारें फेल।।
हुई सरकारें फेल, नेता तू-तू मैं-मैं करते ।
भोले-भाले निरीह लोग, बेवजह निर्दोष मरते ।।
कभी साईकिल-कभी टिफिन में, दहशतगर्दी बेश ।
पल भर में क्या हो, भय में सारा देश ।।

बुलेटप्रूफ जाकिट वाहन से, नेता चलते आज ।
आम नागरिक नहीं सुरक्षित, रहा कराह समाज ।।
रहा कराह समाज, सरकारें ढाढस बधाएं ।
घायल-मरने बालो को, रूपये देकर मरहम लगाएं ।।
सयंम-सयंम बोली रटते, इनके तरह-तरह के रूप ।
ऐसा समय आज है आया, हुई नाकाम बुलेट प्रूफ ।।

सुरक्षा ऐजेन्सी नाकाम, केन्द्र-राज्य हैं दूर ।
राजनीति कर रोटी सेंकें, जनमानस मजबूर ।।
जनमानस मजबूर, लालच में आ जाता ।
दंगा-फसाद, तकलीफें सहता, फिर भी समझ न पाता ।।
नवीन तकनीकि आतंकी, सीख के देते परीक्षा ।
अपना वही पुराना ढर्रा, खतरे में आज सुरक्षा ।।

आज देश की सभी एजेन्सी, आपस में मिल जाओ ।
नाश हो आतंकवाद का, ऐसा बज्र बनाओ ।।
ऐसा बज्र बनाओ, सुदृढ हो खुपिया तंत्र ।
सुख-सुविधाओ से परिपूर्ण हों, इन्हें दो ऐसा मंत्र ।।
बाहर से दुश्मन दिखता है, घर के भेदी इन्हें न लाज ।
आतंकवाद का हो सफाया, ऐसा कानून लाओ आज ।।



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ३॰५, ६॰७५, ४॰७, ७
औसत अंक- ५॰१९
स्थान- चौदहवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५, ३, ५॰१९ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ५॰३९६६
स्थान- बारहवाँ