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निदा फ़ाज़ली देंगे आपके सवालों के जवाब


हिन्द-युग्म अपने पाठकों को विशेष अवसर दे रहा है। हिन्द-युग्म के प्रतिनिधि १-२ दिनों में मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली से मुलाक़ात करने वाले हैं। हम चाहते हैं कि आप भी निदा से कुछ पूछें। हम निदा फ़ाज़ली से आपके सवाल आपके नाम से रखेंगे और उन्हीं आवाज़ में उनका जवाब लेकर आवाज़ पर आयेंगे। तो बस नीचे के फॉर्म में आप लिख भेजें अपने सवाल।



नोटः- हमारे संपादक मंडल को जो सवाल पसंद आयेंगे, हम वही सवाल निदा फ़ाज़ली के सामने रखेंगे।

पाँच साल का मेरा चांद (निदा फ़ाज़ली)


दुनिया पर मंडरा रहे आतंक के बादलों को देख हर संवेदनशील व्यक्ति आतंकित है। भारत के जाने-माने साहित्यकार निदा फ़ाज़ली भी इससे अछूते नहीं है। मुम्बई में हुई २६ नवम्बर की घटना पर निदा ने भी एक कविता लिखी, जिसका प्रकाशन हम उन्हीं की अनुमति से हिन्द-युग्म पर कर रहे हैं। नये पाठकों को बता दें कि ७० वर्षीय निदा फाज़ली का जन्म दिल्ली में हुआ और प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर में हुई। विभाजन के वक़्त इनके पिता जो खुद एक जाने-माने शायर थे, पाकिस्तान चले गये, परंतु निदा भारत रुक गये। निदा एक बार एक मंदिर के पास से गुजर रहे थे तो उन्होंने सूरदास का वह भजन सुना जिसमें सूरदास ने राधा का कृष्ण से वियोग होने के दुःख का वर्णन किया था। इस भजन ने निदा को बहुत प्रभावित किया और इससे ही प्रभावित होकर निदा ने कविता में अपना पहला गंभीर प्रयास किया। निदा फाजली मानते थे कि उर्दू कविता का दायरा सीमित है, निदा ने उर्दू कविता के आकाश को महाकवि टी॰ एस॰ इलियट, गोगोल, एंटन पावलोविच चेखोव (Anton Pavlovich Chekhov) तथा ताकासाकी इत्यादि को पढ़कर फैलाया। ये मीर और ग़ालिब के अंदाज़-ए-बयाँ के भी समर्थक रहे, साथ ही साथ कबीर तथा मीरा के गेयात्मकता के भी अनुगामी। निदा को इनके कविता-संग्रह 'खोया हुआ सा कुछ' के लिए १९९८ का साहित्य-अकादमी पुरस्कार भी मिला। इन्होंने फिल्मों में भी गीत लिखें, जिसमें रज़िया-सुल्तान, आप ऐसे तो ना थे, यात्रा, सुर तथा सरफ़रोश के नाम उल्लेखनीय है। निदा के ऊपर लिखने के लिए कीबोर्ड पर बिना रुके चलने वाली उँगलियाँ चाहिए, फिलहाल इतना सामर्थ्य मुझमें नहीं है। साहित्यकार का साहित्य ही उसकी पहचान होता है। फिलहाल हम उनकी कविता पढ़ते हैं।

मनु बे-तक्खल्लुस
जो भी हुआ था किसने किया था..
पता नहीं है...
बस इतना मालूम है हमको
जिंदा इंसानों के बिखरे टुकड़ों में
मेरा बच्चा भी शामिल था...
कोई किसी की अंगूठी को अपना रिश्ता मान रहा था...
कोई किसी के नाम को उसकी एनक से पहचान रहा था...
मेरे मातम का कोई भी नाम नहीं था...
किसे बताती वो कैसा था …?
छोटे-छोटे हाथ पांव थे…
बच्चा था.... बच्चों जैसा था...
पता नहीं जिस क़ब्र पे उसके नाम का पत्थर लगा हुआ है
उसमें वो कितना है लेकिन...
घर के ताक़ में उसकी जो तस्वीर लगी है
उसमें वो पूरा है अबतक…
पांच साल का चांद ये मेरा यूं ही रहेगा पूरा
मैं ज़िंदा हूं जब तक...