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Tuesday, December 02, 2008

हेमंत करकरे नाम का एक आदमी मर गया था


मुम्बई में आम लोगों की सुरक्षा में शहीद हुए हिन्द के नायकों को श्रद्दासुमन अर्पित करते हुए आवाज़ पर विश्व दीपक 'तन्हा' की एक कविता और कुछ लोगों के उद्गार हमने प्रकाशित किये थे। आज दुबारा एक प्रकाशित रचना द्वारा ही वीरों की शहादत को दुबारा याद कर रहे हैं---



आज ही हमें सूचना मिली कि मुम्बई में होटेल ताज़ पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान हिन्द-युग्म के नियमित पाठक, कवि और हिन्दी-सेवी राजीव सारस्वत का देहांत हो गया। पढ़िए पूरी ख़बर॰॰

एक आदमी दिखाता था अपना हाथ बार बार
कैमरे के सामने
जिसमें से चूता था टप टप खून,
एक आदमी ने अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर
लिखा था, ‘हमें बचा लो’
कोलगेट के टूथपेस्ट या जिलेट की शेविंग क्रीम से।
खिड़की पर ज़ूम होता था बार बार कैमरा।
जाने कौनसा मॉडल था,
बहुत बढ़िया था रिज़ोल्यूशन।

दनादन गोलियाँ निकलती थीं
चलती हुई जिप्सी में से,
लोग लेट जाते थे लेटी हुई सड़क पर,
हम सब लिहाफ़ों में लेटकर देखते थे टीवी,
बदलते रहते थे चैनल,
बार बार चाय पीते थे।

समाचार वाली सुन्दर लड़कियाँ बताती थीं
हमें और भी बहुत सारी नई बातें
और जब हम सब कुछ भूल जाना चाहते थे
उनकी छातियों पर नज़रें गड़ाकर
तब सारी उत्तेजनाएँ जैसे किसी खानदानी दवाखाने की
शिलाजीत की गोलियों में छिप जाती थी।
उचककर छत से चिपककर
फूट फूट कर रोने का होता था मन।
नहीं आता था रोना भी।

हेमंत करकरे नाम का एक आदमी
मर गया था
और नहीं जीने देता था हमें।
ऐसे ही कई और साधारण नामों वाले आदमी
मर गए थे
जो नहीं थे सचिन तेंदुलकर, आमिर ख़ान
या अभिनव बिन्द्रा,
नहीं लिखी जा सकती थी उनकी जीवनियाँ
बहुत सारे व्यावसायिक कारणों से।

वह रात को देर से पहुँचने वाला था घर,
फ़्रिज में रखा था शाही पनीर
और गुँधा हुआ आटा,
एक किताब आधी छूटी हुई थी बहुत दिन से,
माँ की आती रही थीं शाम को मिस्ड कॉल,
उसे भी करना था घर पहुँचकर फ़ोन,
ढूंढ़ना था कोल्हापुर में
कॉलेज के दिनों की एक लड़की को,
बस एक बार देखना था उसका अधेड़ चेहरा,
उसके बच्चे,
अपने बच्चों के साथ देखनी थी
पच्चीस दिसम्बर को गजनी।
गजनी माने आमिर ख़ान।

एक दिशा थी
जहाँ से आने वाले सब लोग
भ्रमित हो जाते थे,
एक प्यारा सा चमकीला शहर था
जिसका दुखता था पोर पोर,
जबकि वह एक से अधिक पिताओं का दौर था,
खेलते-सोते-पढ़ते-तुनकते-ठुनकते पचासों बच्चे
रोज हो जाते थे अनाथ,
हमें आता था क्रोध
और हम सो जाते थे।

कमज़ोर याददाश्त और महेन्द्र सिंह धोनी के इस समय में
यह हर सुबह गला फाड़कर उठती हुई हूक,
हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर
और बहुत सारे साधारण लोगों को बचाकर रख लेने की
एक नितांत स्वार्थी कोशिश है,
इसे कविता न कहा जाए।

--गौरव सोलंकी

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

neeti sagar का कहना है कि -

आपकी कविता को मैंने सिर्फ़ एक कविता की द्रष्टि से नही पड़ा है! आपने सही कहा शहीदों को ये देश बहुत जल्द भुला देता है! अगर कोई खिलाड़ी या अभिनेता चल बसे तो सारे टी.वी चैनल एक साथ मिलकर उसे ख़बर बनाकर कई प्रोग्राम उनके ऊपर बना कर कई दिनों तक दिखाते रहते है! जिससे आम इंसान भी उनसे जुड़ी हर बात को जान पता है! फ़िर शहीदों को इतनी जल्दी..........क्यों भुला देते है?

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

आपके शब्दों के साथ पूरे जोश से मेरी भावनाएं भी खड़ी हैं, मगर उम्मीद है कि हमारे शब्द जाया नहीं जायेंगे.....
बहुत सा हौसला भी,होश भी, जुनून चाहिए....
हिंदी को खून चाहिए...

निखिल आनंद गिरि

Popular India का कहना है कि -

वास्तव में इसे सिर्फ कविता की तरह पढ़ना या सिर्फ कविता ही समझना उचित नहीं.

शहीदों को श्रद्धांजली.

महेश

Harkirat Haqeer का कहना है कि -

गौरव जी, हिन्‍द युग्‍म के परिवार का एक सदस्‍य भी ताज के हादसे में शहीद हो गया जानकर
दुख हुआ... मेरे श्रद्धा सुमन उन्‍हें अर्पित हैं...!

devendra का कहना है कि -

ईश्वर आपको लम्बी उम्र और आपकी कलम को ताउम्र यही धार दे--
-देवेन्द्र पाण्डेय।

तपन शर्मा का कहना है कि -

कुछ कहने को रह नहीं जाता....

Anonymous का कहना है कि -

सोलह आने खरा इतिहास साहित्य की आंखों से देखा हुआ सच होता है जो आपकी कविता में सांसे ले रहा है। एक मंज़रनामा और उस मंज़रनामे के चारों तरफ़ का परिवेश, धड़कता हुआ दिल और सोचता हुआ दिमाग़... गौरव आपकी कविता गहरी छाप छोड़ती है।
नाज़िम नक़वी

rachana का कहना है कि -

क्या कहें कुछ कहा नही जाता आप की कविता दिल के किसी कोने में छुपी हम सभी की बात है
रचना

sumit का कहना है कि -

गौरव जी,
समझ नही आ रहा क्या कहूँ,
जब मुम्बई मे आतंकवादी घटना हुई थी जिन्दगी जैसे रूक सी गयी थी, जो आक्रोश था वो मै पहले ही बयान कर चुका हूँ, अब कुछ शात बैठा हूँ पर कहने को शब्द नही मिल रहे

सुमित भारद्वाज

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

वाकई कविता कविता नहीं कोशिश है..
और् कोशिश कामयाबी की शुरूआत

बहुत बहुत धन्यवाद..

शहीदो को श्रद्धा-सुमन..

सीमा सचदेव का कहना है कि -

गौरव जी सी में यह एक कविता नही है ,यह हम सब की आवाज है | शहीदों को नमन

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

अच्छा लिखे हो।
तुम्हारी रचना के माध्यम से मैं भी सभी शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ।

दिगम्बर नासवा का कहना है कि -

गौरव जी ................आपने कविता नही कही, एक दास्ताँ कही है, समय की, समाज जी, और हम सबके व्यवहार की

M.A.Sharma 'Sehar' का कहना है कि -

हमें आता था क्रोध
और हम सो जाते थे।

इंसान कितना बेबस हो जाता है कभी -कभी
श्रधांजलि रूप मैं लिखी रचना के लिया आभार

शहीदों को सत् -सत् नमन !!

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