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बालिका दिवस का नारा (हिन्दी)


आज का दिन राष्ट्रीय कन्या दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। पिछले हिन्दी-दिवस पर सीमा सचदेव द्वारा लिखे नारों को पाठकों ने बहुत पसंद किया। इसी से ऊर्जा पाकर सीमा सचदेव ने ही राष्ट्रीय बालिका दिवस पर भी ढेरों नारे लिखे भेजे हैं। बहुत से पाठकों को सामाजिक जागरूकता की खातिर अभियान चलाने के लिए भी उपयुक्त नारों की आवश्यकता होती है। पढ़िए और बताइए कि कैसे हैं

१.
उस स्रष्टा की भी जननी जो
क्यों उपेक्षित कन्या वो

इससे जुड़ी प्रविष्टियाँ-

1. अज्ञात कन्या का मर्म
2. एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए
3. मेरी बगिया की नन्ही कली
4. अपराधबोध!!!
5. कठपुतलियां तो नारी हैं
6. कन्या भ्रूण हत्या
7. दोषी कौन?
8. क्या नारी शक्ति आवाज़ उठा पायेगी?
२.
बेटी कुदरत का उपहार
नहीं करो उसका तिरस्कार

३.
जो बेटी को दे पहचान
माता-पिता वही महान

४.
बेटी का जीवन बचाओ
मानव दुनिया में कहलाओ

५.
पुत्रों से पुत्री बढ़कर
माता-पिता की करे फिक्र
करती सच्चे दिल से प्यार
फिर उसका हो क्यों तिरस्कार

६.
जीने का उसको भी अधिकार
चाहिए उसे थोडा सा प्यार
जन्म से पहले न उसे मारो
कभी तो अपने मन में विचारो
शायद वही बन जाए सहारा
डूबते को मिल जाए किनारा

७.
हर क्षेत्र में लडंकी आगे
फिर क्यों हम लड़की से भागें

८.
दुनिया मे उसे आने तो दो
चैन से उसको जीने तो दो
करेगी वो भी ऊँचा नाम
आएगी दुनिया के काम

९.
अति उत्तम बेटी का धन
कर देती मन को पावन

१०.
जिस घर मे बेटी आई
समझो स्वयं लक्ष्मी आईं

११.
बेटी तो घर में ज़रूरी है
वो नहीं कोई मजबूरी है

१२.
बेटी-बेटे का त्यागो भ्रम
लेने दो बेटी को जन्म

१३.
बेटों से भी बेटी भली
क्यों जन्म से पूर्व उसकी बलि

१४.
बेटी को सम्मान दो
जीवन उसको दान दो

अज्ञात कन्या का मर्म (राष्ट्रीय कन्या दिवस विशेष)


कन्या भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा और कुपोषण को हतोत्साहित करने के लिए भारत सरकार २४ जनवरी २००९ को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मना रही है। यह उद्घोषणा महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने १९ जनवरी २००९ को की थी। कन्या दिवस पूरी दुनिया में मनाया जाता है। कन्या भ्रूण हत्या की वह वजह है जो भारत के लिंगानुपात को ९२५ से भी नीचे रखे हुए है। यूनिसेफ इस दिवस को २४ सितम्बर को मनाता है। १५ अक्टूबर को यह दिवस हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी मनाया जाता है, जहाँ महिलाओं की हालत भारत से भी अधिक खराब है। दुनिया में जितने भी दिवस रखे गये हैं वो इसलिए ताकि हम उससे जुड़ी चीजों का महत्व समझ सकें। कन्या दिवस भी उसी कन्या का महत्व का समझाने के लिए है, जिसकी हालत पर मनु बेतखल्लुस ने कार्टून बनाया है और सीमा सचदेव ने कविता लिखी है।

अज्ञात कन्या का मर्म

भिनभिनाती मखियाँ
कुलबुलाते कीडे
सूँघते कुत्ते
कचरादान के गर्भ मे
कीचड़ से लथपथ
फिर से पनपी
एक नासमझ जिन्दा लाश
छोटे-छोटे हाथों से
मृत्यु देवी को धकेलती
न जाने कहाँ से आया
दुबले-पतले हाथों में इतना बल
कि हो गए इतने सबल
जो रखते है साहस
मौत से भी जूझने का
शायद यह बल
वह अहसास है
माँ के पहले स्पर्श का
वह अहसास है
माँ की उस धड़कन का
जो कोख मे सुनी थी
चीख-चीख कर कहती है
नन्ही सी कोमल काया....
मैं जानती हूँ माँ
मैं पहचानती हूँ
तुम्हारी ममता की गहराई को
तुम्हारे स्नेह को
तुम्हारे उस अनकहे प्यार को
महसूस कर सकती हूँ मैं
भले यह दुनिया कुछ भी कहे
मैं इस काबिल नहीं कि
सब को समझा सकूँ
तुम्हारी वो दर्द भरी आह बता सकूँ
जो निकली थी तेरे सीने की
अपार गहराई से
मुझे कूडादान में सबसे छुप-छुपा कर
अर्पण करते समय
यह तो सदियों से चलता आ रहा सिलसिला है
कभी कुन्ती भी रोई थी
बिल्कुल तुम्हारे ही तरह
मैं जानती हूँ माँ
तुम भी ममतामयी माँ हो
न होती
तो कैसे मिलता मुझे तुम्हारा स्पर्श
तुम तो मुझे कोख मे ही मार देती
नहीं माँ ! तुम मुझे मार न सकी
और आभारी हूँ माँ
जो एक बार तो
नसीब हुआ मुझे तुम्हारा स्पर्श
उसी स्पर्श को ढाल बना कर
मैं जी लूँगी
माथे पर लगे लाँछन का
जहर भी पी लूँगी
इससे जुड़ी प्रविष्टियाँ-

1. बालिका दिवस का नारा
2. एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए
3. मेरी बगिया की नन्ही कली
4. अपराधबोध!!!
5. कठपुतलियां तो नारी हैं
6. कन्या भ्रूण हत्या
7. दोषी कौन?
8. क्या नारी शक्ति आवाज़ उठा पायेगी?
तुम्हारे आँचल की
शीतल छाया न सही
तुम्हारे सीने से निकली
ठण्डी आह का तो अहसास है मुझे
धन्य हूँ मै माँ
जो तुमने मुझे इतना सबल बना दिया
आँख खुलने से पहले
दुनियादारी सिखा दिया
इतना क्या कम है माँ
कि तूने मुझे जन्मा
हे जननी!
अवश्य ही तुम्हारी लाचारी रही होगी
नहीं तो कौन चाहेगी
अपनी कोख में नौ माह तक पालना
कुत्तो के लिए भोजन
इसीलिए तो दर्द नहीं सहा तुमने
कि दानवीर बन कर
कुलबुलाते कीड़ों के भोजन का
प्रबन्ध कर सको
नहीं! माँ ऐसी नहीं होती
मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं
मैं ही अभागी
तुम्हारी कोख में न आती
आई थी तो
तुम्हें देखने की चाहत न करती
बस इसी स्वार्थ से
कि माँ का स्नेह मिलेगा
जीती रही, आँसू पीती रही
एक आस लिए मन में...
स्वार्थ न होता
तो गर्भ में ही मर जाती
तुम्हें लाँछन मुक्त कर जाती
किसी का भोजन भी बन जाती
पर यह तो मेरे ही स्वार्थ का परिणाम है
कि बोझ बन गई मैं दुनिया पर
कलंक बन गई तेरे माथे पर
कुत्तों, कीड़ों या चीलों का
भोजन न बन सकी
और बन गई एक अज्ञात कन्या
अज्ञात कन्या