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मैं नारी.........


आज पूरी दुनिया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है। दुनिया कि महिलाओं के महत्व दिखाने और इसका एहसास महिलाओं को भी कराने के लिए दुनिया भर में तरह-तरह के कार्यक्रम होते हैं। पिछले वर्ष इस विषय पर हिन्द-युग्म ने ढेरों कविताएँ प्रकाशित की थी (सभी कविताएँ पढ़ें)। आज हम बाल-उद्यान की सबसे सक्रिय लेखिका सीमा सचदेव द्वारा लिखित कुछ नारे और कविता प्रकाशित कर रहे हैं। सीमा हर महत्वपूर्ण दिवसों पर नारे तैयार करके भेजती रही हैं, जो संबंधित गैर-सरकारी-संगठनों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुई हैं।

नारी दिवस का नारा

१.
जब नारी में शक्ति सारी
फिर क्यों नारी हो बेचारी
२.
नारी का जो करे अपमान
जान उसे नर पशु समान
३.
हर आंगन की शोभा नारी
उससे ही बसे दुनिया प्यारी
४.
राजाओं की भी जो माता
क्यों हीन उसे समझा जाता
५.
अबला नहीं नारी है सबला
करती रहती जो सबका भला
६.
नारी को जो शक्ति मानो
सुख मिले बात सच्ची जानो
७.
क्यों नारी पर ही सब बंधन
वह मानवी, नहीं व्यक्तिगत धन
८.
सुता-बहू कभी माँ बनकर
सबके ही सुख-दुख को सहकर
अपने सब फर्ज़ निभाती है
तभी तो नारी कहलाती है
९.
आंचल में ममता लिए हुए
नैनों से आंसु पिए हुए
सौंप दे जो पूरा जीवन
फिर क्यों आहत हो उसका मन
१०.
नारी ही शक्ति है नर की
नारी ही है शोभा घर की
जो उसे उचित सम्मान मिले
घर में खुशियों के फूल खिलें
११.
नारी सीता नारी काली
नारी ही प्रेम करने वाली
नारी कोमल नारी कठोर
नारी बिन नर का कहाँ छोर
१२.
नर सम अधिकारिणी है नारी
वो भी जीने की अधिकारी
कुछ उसके भी अपने सपने
क्यों रौंदें उन्हें उसके अपने
१३.
क्यों त्याग करे नारी केवल
क्यों नर दिखलाए झूठा बल
नारी जो जिद्द पर आ जाए
अबला से चण्डी बन जाए
उस पर न करो कोई अत्याचार
तो सुखी रहेगा घर-परिवार
१४.
जिसने बस त्याग ही त्याग किए
जो बस दूसरों के लिए जिए
फिर क्यों उसको धिक्कार दो
उसे जीने का अधिकार दो
१५.
नारी दिवस बस एक दिवस
क्यों नारी के नाम मनाना है
हर दिन हर पल नारी उत्तम
मानो , यह नया ज़माना है |
*****************************


मैं नारी.........


मैं नारी सदियों से
स्व अस्तित्व की खोज में
फिरती हूँ मारी-मारी
कोई न मुझको माने जन
सब ने समझा व्यक्तिगत धन
जनक के घर में कन्या धन
दान दे मुझको किया अर्पण
जब जन्मी मुझको समझा कर्ज़
दानी बन अपना निभाया फर्ज़
साथ में कुछ उपहार दिए
अपने सब कर्ज़ उतार दिए
सौंप दिया किसी को जीवन
कन्या से बन गई पत्नी धन
समझा जहां पैरों की दासी
अवांछित ज्यों कोई खाना बासी
जब चाहा मुझको अपनाया
मन न माना तो ठुकराया
मेरी चाहत को भुला दिया
कांटों की सेज़ पे सुला दिया
मार दी मेरी हर चाहत
हर क्षण ही होती रही आहत
माँ बनकर जब मैनें जाना
थोडा तो खुद को पहिचाना
फिर भी बन गई मैं मातृ धन
नहीं रहा कोई खुद का जीवन
चलती रही पर पथ अनजाना
बस गुमनामी में खो जाना
कभी आई थी सीता बनकर
पछताई मृगेच्छा कर कर
लांघी क्या इक सीमा मैंने
हर युग में मिले मुझको ताने
राधा बनकर मैं ही रोई
भटकी वन वन खोई खोई
कभी पांचाली बनकर रोई
पतियों ने मर्यादा खोई
दांव पे मुझको लगा दिया
अपना छोटापन दिखा दिया
मैं रोती रही चिल्लाती रही
पतिव्रता स्वयं को बताती रही
भरी सभा में बैठे पांच पति
की गई मेरी ऐसी दुर्गति
नहीं किसी का पुरुषत्व जागा
बस मुझ पर ही कलंक लागा
फिर बन आई झांसी रानी
नारी से बन गई मर्दानी
अब गीत मेरे सब गाते हैं
किस्से लिख-लिख के सुनाते हैं
मैने तो उठा लिया बीड़ा
पर नहीं दिखी मेरी पीड़ा
न देखा मैनें स्व यौवन
विधवापन में खोया बचपन
न माँ बनी मैं माँ बनकर
सोई कांटों की सेज़ जाकर
हर युग ने मुझको तरसाया
भावना ने मुझे मेरी बहकाया
कभी कटु कभी मैं बेचारी
हर युग में मैं भटकी नारी |

--सीमा सचदेव

बालिका दिवस का नारा (हिन्दी)


आज का दिन राष्ट्रीय कन्या दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। पिछले हिन्दी-दिवस पर सीमा सचदेव द्वारा लिखे नारों को पाठकों ने बहुत पसंद किया। इसी से ऊर्जा पाकर सीमा सचदेव ने ही राष्ट्रीय बालिका दिवस पर भी ढेरों नारे लिखे भेजे हैं। बहुत से पाठकों को सामाजिक जागरूकता की खातिर अभियान चलाने के लिए भी उपयुक्त नारों की आवश्यकता होती है। पढ़िए और बताइए कि कैसे हैं

१.
उस स्रष्टा की भी जननी जो
क्यों उपेक्षित कन्या वो

इससे जुड़ी प्रविष्टियाँ-

1. अज्ञात कन्या का मर्म
2. एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए
3. मेरी बगिया की नन्ही कली
4. अपराधबोध!!!
5. कठपुतलियां तो नारी हैं
6. कन्या भ्रूण हत्या
7. दोषी कौन?
8. क्या नारी शक्ति आवाज़ उठा पायेगी?
२.
बेटी कुदरत का उपहार
नहीं करो उसका तिरस्कार

३.
जो बेटी को दे पहचान
माता-पिता वही महान

४.
बेटी का जीवन बचाओ
मानव दुनिया में कहलाओ

५.
पुत्रों से पुत्री बढ़कर
माता-पिता की करे फिक्र
करती सच्चे दिल से प्यार
फिर उसका हो क्यों तिरस्कार

६.
जीने का उसको भी अधिकार
चाहिए उसे थोडा सा प्यार
जन्म से पहले न उसे मारो
कभी तो अपने मन में विचारो
शायद वही बन जाए सहारा
डूबते को मिल जाए किनारा

७.
हर क्षेत्र में लडंकी आगे
फिर क्यों हम लड़की से भागें

८.
दुनिया मे उसे आने तो दो
चैन से उसको जीने तो दो
करेगी वो भी ऊँचा नाम
आएगी दुनिया के काम

९.
अति उत्तम बेटी का धन
कर देती मन को पावन

१०.
जिस घर मे बेटी आई
समझो स्वयं लक्ष्मी आईं

११.
बेटी तो घर में ज़रूरी है
वो नहीं कोई मजबूरी है

१२.
बेटी-बेटे का त्यागो भ्रम
लेने दो बेटी को जन्म

१३.
बेटों से भी बेटी भली
क्यों जन्म से पूर्व उसकी बलि

१४.
बेटी को सम्मान दो
जीवन उसको दान दो

हिन्द-दिवस का नारा


सभी को हिन्दी-दिवस की पूर्व संध्या पर शुभकामनाएँ। खूब प्रयोग करें अपनी-अपनी मातृभाषा का, न प्रयोग होने वाली भाषाएँ मर जाती हैं। संकल्प लें की अपनी भाषा को जीवित रखेंगे। इस अवसर पर आलोक शंकर की यह कविता भी प्रासंगिक है। पिछले साल हिन्द-युग्म इसी विषय पर सितम्बर का काव्य-पल्लवन भी आयोजित किया था, पढ़िए हिन्दी-दिवस पर १६ कविताएँ। कल हिन्द-युग्म हिन्दी का भविष्य सुरक्षित करने के लिए एक ऑनलाइन परिचर्चा आयोजित कर रहा है। कल सुबह १० से शाम ४ बजे तक का समय हिन्दी के लिए सुरक्षित करें और भाग लें। अधिक जानकारी हेतु देखें




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1.
हिन्दी मेरा इमान है
हिन्दी मेरी पहचान है
हिन्दी हूँ मैं वतन भी मेरा
प्यारा हिन्दुस्तान है
2.
हिन्दी की बिन्दी को
मस्तक पे सजा के रखना है
सर आँखो पे बिठाएँगे
यह भारत माँ का गहना है
3.
बढ़े चलो हिन्दी की डगर
हो अकेले फिर भी मगर
मार्ग की काँटे भी देखना
फूल बन जाएँगे पथ पर
4.
हिन्दी को आगे बढ़ाना है
उन्नति की राह ले जाना है
केवल इक दिन ही नहीं हमने
नित हिन्दी दिवस मनाना है
5.
हिन्दी से हिन्दुस्तान है
तभी तो यह देश महान है
निज भाषा की उन्नति के लिए
अपना सब कुछ कुर्बान है
6.
निज भाषा का नहीं गर्व जिसे
क्या प्रेम देश से होगा उसे
वही वीर देश का प्यारा है
हिन्दी ही जिसका नारा है
7.
राष्ट्र की पहचान है जो
भाषाओं में महान है जो
जो सरल सहज समझी जाए
उस हिन्दी को सम्मान दो
8.
अग्रेजी का प्रसार भले
हम अपनी भाषा भूल चले
तिरस्कार माँ भाषा का
जिसकी ही गोदि में हैं पले
9.
भाषा नहीं होती बुरी कोई
क्यों हमने मर्यादा खोई
क्यों जागृति के नाम पर
हमने स्व-भाषा ही डुबोई
10.
अच्छा बहु भाषा का ज्ञान
इससे ही बनते है महान
सीखो जी भर भाषा अनेक
पर राष्ट्र भाषा न भूलो एक
11.
इक दिन ऐसा भी आएगा
हिन्दी परचम लहराएगा
इस राष्ट्र भाषा का हर ज्ञाता
भारतवासी कहलाएगा
12.
निज भाषा का ज्ञान ही
उन्नति का आधार है
बिन निज भाषा ज्ञान के
नहीं होता सद-व्यवहार है
13.
आओ हम हिन्दी अपनाएँ
गैरों को परिचय करवाएँ
हिन्दी वैज्ञानिक भाषा है
यह बात सभी को समझाएँ
14.
नहीं छोड़ो अपना मूल कभी
होगी अपनी भी उन्नति तभी
सच्च में ज्ञानी कहलाओगे
अपनाओगे निज भाषा जभी
15.
हिन्दी ही हिन्द का नारा है
प्रवाहित हिन्दी धारा है
लाखों बाधाएँ हो फिर भी
नहीं रुकना काम हमारा है
16.
हम हिन्दी ही अपनाएँगे
इसको ऊँचा ले जाएँगे
हिन्दी भारत की भाषा है
हम दुनिया को दिखाएँगे

--सीमा सचदेव