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Sunday, March 08, 2009

मैं नारी.........


आज पूरी दुनिया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है। दुनिया कि महिलाओं के महत्व दिखाने और इसका एहसास महिलाओं को भी कराने के लिए दुनिया भर में तरह-तरह के कार्यक्रम होते हैं। पिछले वर्ष इस विषय पर हिन्द-युग्म ने ढेरों कविताएँ प्रकाशित की थी (सभी कविताएँ पढ़ें)। आज हम बाल-उद्यान की सबसे सक्रिय लेखिका सीमा सचदेव द्वारा लिखित कुछ नारे और कविता प्रकाशित कर रहे हैं। सीमा हर महत्वपूर्ण दिवसों पर नारे तैयार करके भेजती रही हैं, जो संबंधित गैर-सरकारी-संगठनों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुई हैं।

नारी दिवस का नारा

१.
जब नारी में शक्ति सारी
फिर क्यों नारी हो बेचारी
२.
नारी का जो करे अपमान
जान उसे नर पशु समान
३.
हर आंगन की शोभा नारी
उससे ही बसे दुनिया प्यारी
४.
राजाओं की भी जो माता
क्यों हीन उसे समझा जाता
५.
अबला नहीं नारी है सबला
करती रहती जो सबका भला
६.
नारी को जो शक्ति मानो
सुख मिले बात सच्ची जानो
७.
क्यों नारी पर ही सब बंधन
वह मानवी, नहीं व्यक्तिगत धन
८.
सुता-बहू कभी माँ बनकर
सबके ही सुख-दुख को सहकर
अपने सब फर्ज़ निभाती है
तभी तो नारी कहलाती है
९.
आंचल में ममता लिए हुए
नैनों से आंसु पिए हुए
सौंप दे जो पूरा जीवन
फिर क्यों आहत हो उसका मन
१०.
नारी ही शक्ति है नर की
नारी ही है शोभा घर की
जो उसे उचित सम्मान मिले
घर में खुशियों के फूल खिलें
११.
नारी सीता नारी काली
नारी ही प्रेम करने वाली
नारी कोमल नारी कठोर
नारी बिन नर का कहाँ छोर
१२.
नर सम अधिकारिणी है नारी
वो भी जीने की अधिकारी
कुछ उसके भी अपने सपने
क्यों रौंदें उन्हें उसके अपने
१३.
क्यों त्याग करे नारी केवल
क्यों नर दिखलाए झूठा बल
नारी जो जिद्द पर आ जाए
अबला से चण्डी बन जाए
उस पर न करो कोई अत्याचार
तो सुखी रहेगा घर-परिवार
१४.
जिसने बस त्याग ही त्याग किए
जो बस दूसरों के लिए जिए
फिर क्यों उसको धिक्कार दो
उसे जीने का अधिकार दो
१५.
नारी दिवस बस एक दिवस
क्यों नारी के नाम मनाना है
हर दिन हर पल नारी उत्तम
मानो , यह नया ज़माना है |
*****************************


मैं नारी.........


मैं नारी सदियों से
स्व अस्तित्व की खोज में
फिरती हूँ मारी-मारी
कोई न मुझको माने जन
सब ने समझा व्यक्तिगत धन
जनक के घर में कन्या धन
दान दे मुझको किया अर्पण
जब जन्मी मुझको समझा कर्ज़
दानी बन अपना निभाया फर्ज़
साथ में कुछ उपहार दिए
अपने सब कर्ज़ उतार दिए
सौंप दिया किसी को जीवन
कन्या से बन गई पत्नी धन
समझा जहां पैरों की दासी
अवांछित ज्यों कोई खाना बासी
जब चाहा मुझको अपनाया
मन न माना तो ठुकराया
मेरी चाहत को भुला दिया
कांटों की सेज़ पे सुला दिया
मार दी मेरी हर चाहत
हर क्षण ही होती रही आहत
माँ बनकर जब मैनें जाना
थोडा तो खुद को पहिचाना
फिर भी बन गई मैं मातृ धन
नहीं रहा कोई खुद का जीवन
चलती रही पर पथ अनजाना
बस गुमनामी में खो जाना
कभी आई थी सीता बनकर
पछताई मृगेच्छा कर कर
लांघी क्या इक सीमा मैंने
हर युग में मिले मुझको ताने
राधा बनकर मैं ही रोई
भटकी वन वन खोई खोई
कभी पांचाली बनकर रोई
पतियों ने मर्यादा खोई
दांव पे मुझको लगा दिया
अपना छोटापन दिखा दिया
मैं रोती रही चिल्लाती रही
पतिव्रता स्वयं को बताती रही
भरी सभा में बैठे पांच पति
की गई मेरी ऐसी दुर्गति
नहीं किसी का पुरुषत्व जागा
बस मुझ पर ही कलंक लागा
फिर बन आई झांसी रानी
नारी से बन गई मर्दानी
अब गीत मेरे सब गाते हैं
किस्से लिख-लिख के सुनाते हैं
मैने तो उठा लिया बीड़ा
पर नहीं दिखी मेरी पीड़ा
न देखा मैनें स्व यौवन
विधवापन में खोया बचपन
न माँ बनी मैं माँ बनकर
सोई कांटों की सेज़ जाकर
हर युग ने मुझको तरसाया
भावना ने मुझे मेरी बहकाया
कभी कटु कभी मैं बेचारी
हर युग में मैं भटकी नारी |

--सीमा सचदेव

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15 कविताप्रेमियों का कहना है :

शोभा का कहना है कि -

नारी का बहुत सुन्दर परिचय दिया है आपने। आभार।

Mrs. Asha Joglekar का कहना है कि -

बहुत सटीक कविता ।

shanno का कहना है कि -

सीमा जी,
अपनी कवितायों में बहुत सुंदर ढंग से दी है आपने नारी की परिभाषा. उसकी गरिमा का अहसास दिलाने का अति धन्यबाद. खूब अच्छा लिखतीं हैं आप.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

आत्मीय सीमा जी!

वन्दे मातरम

महिला दिवस पर नारी की व्यथा-कथा का झूठ ढोल पीटती रचनाओं को पढ़ कर दुखी हूँ. इन रचनाओं के स्त्री-पुरुष रचनाकार अभावों, उत्पीडन, उपेक्षा, अत्याचार का अतिरेकी वर्णन हमेशा करते हैं. क्या जीवन का सच सिर्फ इतना है? क्या लिखनेवालों ने कभी वह भोगा है जो वे लिख रहे हैं? क्या वाकई नारी को कभी सम्मान, स्नेह, आदर, प्रतिष्ठा नहीं मिली? क्या इस पर एक भी पंक्ति न लिखना न्यायोचित है. पूज्य बुआ जी स्व. महादेवी वर्मा जी तथा उनकी अभिन्न सहेली सुभद्रा जी ने जीवन में विपरीत परिस्थितियों का कई बार सामना किया पर शुभ की साधना से मुंह नहीं मोडा. हर त्यौहार पर दोनों ने हर्ष, उल्लास, आशा की कवितायें लिखीं और जूझ रहे लोगों के उत्साह बढाया. सुभद्रा जी ने लिखा ' मैंने हंसना सीखा है, / मैं नहीं जानती रोना./ बरसा करता पल-पल पर / मेरे जीवन में सोना'. यह लिखते समय वे और उनका परिवार देश की आजादी के संघर्ष में जूझ रहा था. उन्हें रोजी-रोटी की नहीं देश की फ़िक्र थी. वे जो नहीं था उसका रोना नहीं रो रहीं थीं अपितु जो था उसके लिए ईश्वर के प्रति आभारी थीं. वे इस कविता के अंत में लिखती हैं-'सुख भरे सुनहले बादल,/ रहते हैं मुझको घेरे./ विश्वास प्रेम साहस हैं / जीवन के साथी मेरे.'
मैं आपकी रचनात्मक ऊर्जा का प्रशंसक हूँ. आज आपकी कलम से कुछ आशाप्रद सन्देश पाने की अपेक्षा थी, स्त्री-पुरुष संबंधों पर रचनात्मक सहयोग का आव्हान करती कोई ऐसी रचना मिलती जिसे पढ़कर स्त्री को कमजोर समझकर उपेक्षा करनेवाला अपनी सोच बदलने पर मजबूर हो जाता तो मैं आपका वंदन कर खुद को धन्य मान पाता पर...

सीमा सचदेव का कहना है कि -

आचार्य जी नमस्कार
अच्छा लगा जानकर कि आप हर दिन पर हँसी खुशी की बात ही करना/सुनना चाहते है |आपने शायद स्लोगन नही पढे |
या शायद पढकर नारी दिवस पर एक नारी द्वारा लिखे गए नारों पर आप पहले की तरह दोषारोपण नही कर पाए
कि नारे लिखने वाले ही विपरीत आचरण करते हैं |अगर आप यह समझते हैं कि यहां लिखने वाली नारियां कभी
किसी तरह प्रताडित नही हुई तो आप नारी की वेदना को समझ ही नही सकते | नारी हर युग , हर काल मे पुरुष की प्रताडना
का शिकार हुई है और पुरुष अपने अहम के चलते यह मानने को ही तैयार ही नही | आखिर जब भी नारी पर हुए जुल्म की बात
उठती है तो पुरुष समाज बिफर क्यों उठता है |और किस खुशी की बात करते है आप , क्या इस बात पर खुश हुआ जाए कि
सदियों से नारी की उपेक्षा की जाती रही है |आप तो शायद कन्या दिवस पर भी यही कहते कि हँसी-खुशी की बात करो और आज
नारी दिवस पर नारी के इतिहास को भी याद न करो | यह दिन मनाने का अभिप्राय ही यही होता है कि हम इतिहास को याद करें
और उस पर विचार करे कि जो गलतियां हमसे हुई उनको न दोहराया जाए , क्या पुरुष समाज इस बात की गारण्टी लेता है कि फिर से नारी
को किसी के झूठे अहम का शिकार नही होना पडेगा , तो हम बोलना छोड देन्गे | वैसे भी साहित्य समाज का दर्पण होता है और इस
सामाजिक कटु सत्य को कम से कम उस दिन त अनदेखा नही किया जा सकता जो दिन नारी के नाम किया गया है |

rachana का कहना है कि -

क्या बात है एक एक नारा बहुत कुछ कहता है .और कविता पढ़ के जोश भी आया और थोडा सोचने भी लगी
सुंदर है आप का हर कथन
नारी के पैरों में अब नहीं है थकन
रचना

M.A.Sharma "सेहर" का कहना है कि -

जब नारी में शक्ति सारी
फिर क्यों नारी हो बेचारी

सीमा जी बहुत ही ओजपूर्ण नारे हैं...
जोश दिलाते हुवे ..
सच्चाई लिए हुवे...

our time starts now


बहुत खूब !!!

SURINDER RATTI का कहना है कि -

सीमा जी बधाई, कुछ पंक्तियाँ बहुत ही सुंदर है

जब नारी में शक्ति सारी
फिर क्यों नारी हो बेचारी
२.
नारी का जो करे अपमान
जान उसे नर पशु समान
३.
हर आंगन की शोभा नारी
उससे ही बसे दुनिया प्यारी
७.
क्यों नारी पर ही सब बंधन
वह मानवी, नहीं व्यक्तिगत धन
सुरिन्दर रत्ती

Anonymous का कहना है कि -

अपनी कवितायों में बहुत सुंदर ढंग से आपने नारी की परिभाषा दी है. ati khub aap ne nari ko smman dilane ke liye achhi achhi
bate kahi use koi bhi saral tarike se samjh jai ga ham aap ke sath sadev nari ko smman dene ko tatpar hai!
kisi ko kisi nari par atya char kar te wakt soch lena chahiya ki us ka bhi koi bahan hai.....

karishma का कहना है कि -

naari hi nar ka gahana h
maa hai aur bahana hai ....

Malay Singh का कहना है कि -

nari ninda mat kro nari sukh ki khan,
nari se paida hue ram krishan hnuman.

pooja Mehta का कहना है कि -

it is so nice......superb poem on women....

Anonymous का कहना है कि -

koi bhi mulk shikhar par tab tak nahi poch sakta jab tak uski auurte kandhe se kandha mila kar nahi chalti

Anonymous का कहना है कि -

koi bhi mulk yash ke shikhar par tab tak nahi poch sakta jab tak uski nariyan kandhe se kandha mila kar nahi chalti.................

Anonymous का कहना है कि -

Dam good Poem

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