फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सुभद्रा कुमारी चौहान जी की एक अविस्मरणीय रचना


मैंने हँसाना सीखा है,

मैं नहीं जानती रोना.

बरसा करता पल-पल पर ,

मेरे जीवन में सोना.

मैं अब तक जान न पाई,

कैसी होती है पीड़ा?

हँस-हँस जीवन में मेरे

कैसे करती है क्रीडा?

जग है असार, सुनती हूँ

मुझको सुख-सार दिखाता.

मेरी आँखों के आगे

सुख का सागर लहराता.

उत्साह-उमंग निरंतर

रहते मेरे जीवन में

उल्लास विजय का हँसता

मेरे मतवाले मन में.

आशा आलोकित करती

मेरे जीवन को प्रतिक्षण

हैं स्वर्ण-सूत्र से वलयित

मेरी असफलता के घन.

सुख भरे सुनहले बादल

रहते हैं मुझको घेरे

विश्वास प्रेम साहस हैं

जीवन के साथी मेरे।

प्रेषक: संजीव वर्मा 'सलिल'



नारी का छल


यह कारागार जहाँ तुम झेल रही हो,
नित नई यातनाएं,
किसी और ने नहीं स्वयं तुमने रचा है अपने हाथों से

और यह सोने का पिंजरा भी तुमने ही गढ़ा है,
जहाँ छटपटाती हो तुम अब,

और बिखर चुकी हैं तुम्हारी आकांक्षाएं
टकराकर जिसकी सलाखों से

और हाँ ये अग्नि भी मुझे तुम्हारी ही ज्योती का,
विकृत स्वरुप नज़र आती है
झुलसा रही है जो तुम्हारा अस्तित्व अपनी ज्वालों से

हे नारी ये तो कहो जो सबके लिए बनी धरती,
जिसने सजाये अनगिनत आकाश,
उसने आखिर क्यों छल किया
स्वयं अपने ही ख्वाबों से

---ममता पंडित
कवयित्री द्वारा प्रेषित शीर्षक- छल



मैं नारी.........


आज पूरी दुनिया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है। दुनिया कि महिलाओं के महत्व दिखाने और इसका एहसास महिलाओं को भी कराने के लिए दुनिया भर में तरह-तरह के कार्यक्रम होते हैं। पिछले वर्ष इस विषय पर हिन्द-युग्म ने ढेरों कविताएँ प्रकाशित की थी (सभी कविताएँ पढ़ें)। आज हम बाल-उद्यान की सबसे सक्रिय लेखिका सीमा सचदेव द्वारा लिखित कुछ नारे और कविता प्रकाशित कर रहे हैं। सीमा हर महत्वपूर्ण दिवसों पर नारे तैयार करके भेजती रही हैं, जो संबंधित गैर-सरकारी-संगठनों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुई हैं।

नारी दिवस का नारा

१.
जब नारी में शक्ति सारी
फिर क्यों नारी हो बेचारी
२.
नारी का जो करे अपमान
जान उसे नर पशु समान
३.
हर आंगन की शोभा नारी
उससे ही बसे दुनिया प्यारी
४.
राजाओं की भी जो माता
क्यों हीन उसे समझा जाता
५.
अबला नहीं नारी है सबला
करती रहती जो सबका भला
६.
नारी को जो शक्ति मानो
सुख मिले बात सच्ची जानो
७.
क्यों नारी पर ही सब बंधन
वह मानवी, नहीं व्यक्तिगत धन
८.
सुता-बहू कभी माँ बनकर
सबके ही सुख-दुख को सहकर
अपने सब फर्ज़ निभाती है
तभी तो नारी कहलाती है
९.
आंचल में ममता लिए हुए
नैनों से आंसु पिए हुए
सौंप दे जो पूरा जीवन
फिर क्यों आहत हो उसका मन
१०.
नारी ही शक्ति है नर की
नारी ही है शोभा घर की
जो उसे उचित सम्मान मिले
घर में खुशियों के फूल खिलें
११.
नारी सीता नारी काली
नारी ही प्रेम करने वाली
नारी कोमल नारी कठोर
नारी बिन नर का कहाँ छोर
१२.
नर सम अधिकारिणी है नारी
वो भी जीने की अधिकारी
कुछ उसके भी अपने सपने
क्यों रौंदें उन्हें उसके अपने
१३.
क्यों त्याग करे नारी केवल
क्यों नर दिखलाए झूठा बल
नारी जो जिद्द पर आ जाए
अबला से चण्डी बन जाए
उस पर न करो कोई अत्याचार
तो सुखी रहेगा घर-परिवार
१४.
जिसने बस त्याग ही त्याग किए
जो बस दूसरों के लिए जिए
फिर क्यों उसको धिक्कार दो
उसे जीने का अधिकार दो
१५.
नारी दिवस बस एक दिवस
क्यों नारी के नाम मनाना है
हर दिन हर पल नारी उत्तम
मानो , यह नया ज़माना है |
*****************************


मैं नारी.........


मैं नारी सदियों से
स्व अस्तित्व की खोज में
फिरती हूँ मारी-मारी
कोई न मुझको माने जन
सब ने समझा व्यक्तिगत धन
जनक के घर में कन्या धन
दान दे मुझको किया अर्पण
जब जन्मी मुझको समझा कर्ज़
दानी बन अपना निभाया फर्ज़
साथ में कुछ उपहार दिए
अपने सब कर्ज़ उतार दिए
सौंप दिया किसी को जीवन
कन्या से बन गई पत्नी धन
समझा जहां पैरों की दासी
अवांछित ज्यों कोई खाना बासी
जब चाहा मुझको अपनाया
मन न माना तो ठुकराया
मेरी चाहत को भुला दिया
कांटों की सेज़ पे सुला दिया
मार दी मेरी हर चाहत
हर क्षण ही होती रही आहत
माँ बनकर जब मैनें जाना
थोडा तो खुद को पहिचाना
फिर भी बन गई मैं मातृ धन
नहीं रहा कोई खुद का जीवन
चलती रही पर पथ अनजाना
बस गुमनामी में खो जाना
कभी आई थी सीता बनकर
पछताई मृगेच्छा कर कर
लांघी क्या इक सीमा मैंने
हर युग में मिले मुझको ताने
राधा बनकर मैं ही रोई
भटकी वन वन खोई खोई
कभी पांचाली बनकर रोई
पतियों ने मर्यादा खोई
दांव पे मुझको लगा दिया
अपना छोटापन दिखा दिया
मैं रोती रही चिल्लाती रही
पतिव्रता स्वयं को बताती रही
भरी सभा में बैठे पांच पति
की गई मेरी ऐसी दुर्गति
नहीं किसी का पुरुषत्व जागा
बस मुझ पर ही कलंक लागा
फिर बन आई झांसी रानी
नारी से बन गई मर्दानी
अब गीत मेरे सब गाते हैं
किस्से लिख-लिख के सुनाते हैं
मैने तो उठा लिया बीड़ा
पर नहीं दिखी मेरी पीड़ा
न देखा मैनें स्व यौवन
विधवापन में खोया बचपन
न माँ बनी मैं माँ बनकर
सोई कांटों की सेज़ जाकर
हर युग ने मुझको तरसाया
भावना ने मुझे मेरी बहकाया
कभी कटु कभी मैं बेचारी
हर युग में मैं भटकी नारी |

--सीमा सचदेव

एक ग़ज़ल- औरत के बहुआयामी जीवन एवम्‌ व्यक्तित्व पर केन्द्रित


8 मार्च को दुनिया भर में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। हम भी इस अवसर को अपने तरह से मनाने की कोशिश करेंगे। जिसकी शुरूआत कर रहे हैं साहित्यकार डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम' की ३८ शे'रों की ग़ज़ल 'लड़कियों की ज़िंदगी'॰॰॰

1
काँच का बस एक घर है लड़कियों की जिन्दगी
और काँटों की डगर है लड़कियों की जिन्दगी
2
मायके से जब चले है सजके ये दुल्हिन बनी
दोस्त अनजाना सफर है लड़कियों की जिन्दगी
3
एक घर ससुराल है तो दूसरा है मायका
फिर भी रहती दर-ब-दर है लड़कियों की जिन्दगी
4
खूब देखा, खूब परखा, सास को आती न आँच,
स्टोव का फटना मगर है लड़कियों की जिन्दगी
5
पढलें लिखलें और करलें नौकरी भी ये भले
सेज पर सजना मगर है लड़कियों की जिन्दगी
6
इस नई तकनीक ने तो है बना दी कोख भी
आह कब्रिस्तान भर है लड़कियों की जिन्दगी
7
कारखानों अस्पतालों या घरों में भी तो यह
रोज लड़ती इक समर है लड़कियों की जिन्दगी
8
लूटते इज्जत हैं इसकी मर्द ही जब, तब कहो
क्यों भला बनती खबर है लड़कियों की जिन्दगी

9
बाप-मां के बाद अधिकार है भरतार का
फर्ज का संसार भर है लड़कियों की जिन्दगी
10
हो रहीं तबदीलियां दुनिया ये अब तो हर जगह
वक्त की तलवार पर है लड़कियों की जिन्दगी
11
क्यों हैं करती दुश्मनी खुद औरतों से औरतें
बस दुखी यह जानकर है लड़कियों की जिन्दगी
12
माँ बहन हैं बेटियाँ भी ये हमारी दोस्तो
बिस्तरा होना मगर है लड़कियों की जिन्दगी
13
किस धरम, किस जात में इन्साफ इसको है मिला
जीतती सब हार कर है लड़कियों की जिन्दगी
14
हो अहल्या या हो मीरा या हो बेशक जानकी
मात्र चलना आग पर है लड़कियों की जिन्दगी
15
द्रोपदी हो, पद्मिनी हो, हो भले ही डायना
रोज लगती दाँव पर है लड़कियों की जिन्दगी
16
एक रजिया एक लक्ष्मी और इक इन्दिरा भला
क्या नहीं अपवाद-भर है लड़कियों की जिन्दगी
17
क्या जवानी क्या बुढ़ापा या भले हो बचपना
सहती हर दम बद नजर है लड़कियों की जिन्दगी
18
हों घरों में, आफिसों में, हों सियासत में भले
क्या कहीं भी मोतबर है लड़कियों की जिन्दगी
19
औरतों के हक में हों कानून कितने ही बने
दर हकीकत बेअसर है लड़कियों की जिन्दगी
20
तू अगर इसको कभी अपने बराबर मान ले
फिर तो तेरी हमसपफर है लड़कियों की जिन्दगी
21
घर भी तो इनके बिना बनता नहीं घर दोस्तो
क्यों भला फ़िर घाट पर है लड़कियों की जिन्दगी
22
आह धन की लालसा का आज ये अंजाम है
इश्तिहारों पर मुखर है लड़कियों की जिन्दगी
23
कर नुमाइश जिस्म की क्या खुद नहीं अब आ खड़ी
नग्नता के द्वार पर है लड़कियों की जिन्दगी
24
प्यार करने की खता जो कहीं करलें ये कभी
तब लटकती डाल पर है लड़कियों की जिन्दगी
25
जानती सब, बूझती सब, फिर भला क्यों बन रही
हुस्न की किरदार भर है लड़कियों की जिन्दगी
26
ठीक है आजाद होना, हो मगर उद्दण्ड तो
कब भला पायी सँवर है लड़कियों की जिन्दगी
27
माँ बहन बेटी कभी पत्नी कभी, कभी है प्रेयसी
जानती क्या-क्या हुनर है लड़कियों की जिन्दगी
28
मुम्बई हो, कोलकाता, राजधानी देहली
चल रही दिल थामकर है लड़कियों की जिन्दगी
29
ले रही वेतन बराबर, हक बराबर, पर नहीं
इतनी सी तकरार भर है लड़कियों की जिन्दगी
30
आदमी कब मानता इन्सान इसको है भला
काम की सौगात भर है लड़कियों की जिन्दगी
31
शोर करते हैं सभी तादाद इनकी घट रही
बन गई अनुपात भर है लड़कियों की जिन्दगी
32
ठान लें जो कर गुजरने की कहीं ये आज भी
फिर तो मेधा पाटकर है लड़कियों की जिन्दगी
33
क्यों नहीं तैतीसवां हिस्सा भी इसको दे रहे,
आधे की हकदार गर है लड़कियों की जिन्दगी
34
देवता बसते वहाँ है पूजते नारी जहाँ
क्यों धरा पर भार भर है लड़कियों की जिन्दगी
35
हाँ, कहीं इनको मिले गर प्यारा थोड़ा दोस्तो
तब सुधा की इक लहर है लड़कियों की जिन्दगी
36
मैंने तुमने और सबने कह दिया सुन भी लिया
क्यों न फिर जाती सुधर है लड़कियों की जिन्दगी
37
माफ मुझको अब तू कर दे ऐ खुदा मालिक मेरे
हाँ यही किस्मत अगर है लड़कियों की जिन्दगी
38
‘कल्पना’ को ‘श्याम’ जब अवसर दिया इतिहास ने
उड़ चली आकाश पर है लड़कियों की जिन्दगी

फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलुन

ग़ज़लगो- श्याम सखा 'श्याम'