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Friday, October 30, 2009

संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ


संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ
तू भी मुझको लूट, लूटकर चलता बन

दुनिया देखी चेहरा बदला
खुद से खुद का पहरा बदला
अंतस का मीठा स्वर बदला
शांतिमयी सुरभित घर बदला
समझ न पाया यह परिवर्तन, मैं कब, कौन हुआ?
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

बाजारों में बिकने आया
जो न था वो दिखने आया
खुद की हर पहचान को खोया
हाँ, ये अंतर्मन तब रोया
कोमल उँगलियों से मैंने, जब अंगार छुआ
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

जीना है यूँ कठपुतली बन
तन में केवल शेष हैं धड़कन
मैंने नाता खुद से तोडा
खुद को ही दुविधा में छोडा
लगता है कुछ अपनों की ही, मुझको लगी दुआ
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

Harihar का कहना है कि -

हाँ, ये अंतर्मन तब रोया
कोमल उँगलियों से मैंने, जब अंगार छुआ
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

वाह अरुण जी !

वाणी गीत का कहना है कि -

संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ
तू भी मुझको लूट, लूटकर चलता बन
तेल डिपो की आग अपने आप बुझने की आस लिए वहां खड़े तमाशबीन यही सोच रहे होंगे ...!

shyam1950 का कहना है कि -

दुनिया देखी चेहरा बदला
खुद से खुद का पहरा बदला
अंतस का मीठा स्वर बदला
शांतिमयी सुरभित घर बदला
समझ न पाया यह परिवर्तन,
मैं कब, कौन हुआ?
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ
bahut hi sarthak rachna, hamare samay ke antartam bhavon ko shabd deti hui .. dil ko chhoone wali ,lekin aapke yahan ka sampadan!!

Satyaprasanna का कहना है कि -

बहुत ही अच्छी रचना है. बहुत- बहुत बधाई.
"सत्यप्रसन्न"

Apoorv का कहना है कि -

मैं कब, कौन हुआ?
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

एक सार्थक और शाश्वत प्रश्न..मगर उत्तर बहुत मुश्किल लगता है इसका..संवादों की परिधि से परे खड़ा मौन ही शायद बांच सके इसे..अद्भुत रचना!!!

MANOJ KUMAR का कहना है कि -

इतना अच्छा लगा कि क्या कहूं, मेरे पास शब्द नहीं हैं, बस ... ...
शब्द तो शोर है तमाशा है,
भाव के सिंधु में बताशा है।
मर्म की बात होठ से न कहो,
मौन ही भावना की भाषा है।
आप बधाई के पात्र हैं।

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

बाजारों में बिकने आया
जो न था वो दिखने आया
खुद की हर पहचान को खोया
हाँ, ये अंतर्मन तब रोया
कोमल उँगलियों से मैंने, जब अंगार छुआ
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

सुंदर अभिव्यक्ति...बढ़िया भाव..बेहतरीन कविता..बधाई!!!

shalu का कहना है कि -

har line mai ek alag baat hai per ha ye kah sakte hai ki aap ne jo likha kai wo sabse juda hai

Shamikh Faraz का कहना है कि -

पूरी कविता में शब्द बहुत अच्छे है और सोच भी उम्दा है.

बाजारों में बिकने आया
जो न था वो दिखने आया
खुद की हर पहचान को खोया
हाँ, ये अंतर्मन तब रोया
कोमल उँगलियों से मैंने, जब अंगार छुआ
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

manu का कहना है कि -

कविता पढ़ कर दंग रह गया..

एक एक शब्द लगा जैसे मेरे लिए लिख डाला है..

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

sundar abhivykti arun badhaaee
mn ki bat likhi is bar aapne.
shyam skha shyam

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