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Thursday, April 16, 2009

सबसे बड़ा डर


हिन्द-युग्म की यूनिकवि प्रतियोगिता के शीर्ष १० कवियों ने नामों में अधिकतर नाम पुराने कवियों के हैं। पाँचवें स्थान की कविता के रचयिता अरूण मित्तल अद्‍भुत बहुत लम्बे समय से हिन्द-युग्म से जुड़े हैं।

पुरस्कृत कविता- सबसे बड़ा डर

मेरे बचपन से दादू बनने तक
जो कुछ भी हुआ..... मेरी आँखों के सामने ही हुआ
पर पता नहीं कब हो गया
कब आ गया मैं खुले आँगन की गोद से
शहर के मशीननुमा फ्लैट में
यहाँ तो सब कुछ सुव्यवस्थित है
सच कहूं तो मेरी पीपल की छाँव में पली सोच
यहाँ सांस नहीं ले पाती
न जाने कब पहुँच गया मैं देसी हुक्के से "बेड टी" तक
और कब हो गया सफ़र तय
चौपाल के ठहाकों से लेकर अंग्रेजी अखबार तक का
न जाने कौन सा नशा है इस मशीनी जिन्दगी में
की बदल ही जाते हैं रिश्तों के संबोधन
मेरा पोता अपनी माँ को "मॉम" और पिता को "डैड" ही नहीं कहता
बल्कि भाई को "ब्रो" और बहन को "सिस" भी कहता है
न जाने किस चक्की में पीस रही है ये शहरी जिन्दगी सबको
की हर रिश्ता हो गया एक औपचारिकता
क्या बाप और बेटे के बीच में प्रयोग हो सकते हैं
"सॉरी" और "थैंक यू" जैसे शब्द
दफ्तर को शाम से आने पर मेरा बेटा
समय ही नहीं निकाल पाता मेरे साथ बतियाने का
बेटा, बहू, पोता और पोती का ये परिवार
मेरे लिए है
एक चलचित्र के धारावाहिक के पात्रों की भांति
जिन्हें मैं देख और सुन तो लेता हूँ
पर महसूस नहीं कर पाता
मेरी आँखों के सामने ही
मेरी पोती ने पहननी शुरू कर दी है वो पोशाक
जो शरीर को ढँकती कम और दिखाती ज्यादा है
और मेरा पोता जाने कहाँ से सीख गया है
अंग्रेजी गालियाँ
जिस पर उसे माँ बाप से न केवल मिल रही हैं मौन स्वीकृतियां
अपितु माडर्न होने के लिए शाबासियां भी
फिर भी न जाने किस संस्कार से बंधा ये परिवार
मुझे अपने पास रखता तो है
किसी त्यौहार वाले दिन मेरे पांव छूकर
आशीर्वाद तो लेता है
मेरे पोता और पोती कोलेज जाने से पहले
अक्सर "बाये दादू" कहकर तो निकलते हैं
बस यही मेरे लिए सबसे बड़ी ख़ुशी है
पर कभी कभी सोचता हूँ
और भी वक्त पड़ा है अभी जिन्दगी में
कहीं ये सब भी न बदल जाए
बस यही डर है मुझे
सच कहूं तो आदमी की सबसे बड़ी ख़ुशी ही
देती है उसे......................
सबसे बड़ा डर


प्रथम चरण मिला स्थान- बीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- पाँचवाँ


पुरस्कार- हिजड़ों पर केंद्रित रुथ लोर मलॉय द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'Hijaras:: Who We Are' के अनुवाद 'हिजड़े:: कौन हैं हम?' (लेखिका अनीता रवि द्वारा अनूदित) की एक प्रति।



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20 कविताप्रेमियों का कहना है :

Harihar का कहना है कि -

अरुण जी! बहुत अच्छी कविता के लिये बधाई !

Harihar का कहना है कि -

साथ ही यूनि पाठक के लिये भी!

Reality Bytes का कहना है कि -

की बदल ही जाते हैं रिश्तों के संबोधन

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

ना मजा आया और ना ही लगा कि कोई कविता पढ़ रहा हूँ | :(
और अच्छी रचना की प्रतीक्षा में ...

अवनीश तिवारी

Abhishek Tamrakar (Abhi) का कहना है कि -

क्या बात हे अरुण जी बहुत खूब लिखा है आपने , आपकी कविता से बहुत कुछ सीखने को मिला | धन्यवाद

मुकेश कुमार तिवारी का कहना है कि -

अरूण जी,

यूनी कविता में पुरूस्कृत होने पर मेरी हार्दिक बधाईयाँ स्वीकारें।

" सबसे बड़ा ड़र " की सफलता इस बात में है कि वह आज के दौर के रिश्तों को बड़ी ही खूबी से बयां ही नही करती बल्कि बदलते रिश्तों के लिये चिंता जगाती है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

paro का कहना है कि -

तिवारी जी गुणी व सपष्ट कह रहें हैं ।अगर यही हाल रहा तो-केवल कवि युग्म के कवि ही अपनी कविता पढॆंगे-पाठक असली पाठक गाइब हो जाएंगे
तुम्ही युनि-कवि हो
तुम्ही हो पाठक




अवनीश एस तिवारी said...

ना मजा आया और ना ही लगा कि कोई कविता पढ़ रहा हूँ | :(
और अच्छी रचना की प्रतीक्षा में ...

अवनीश तिवारी

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

कविता है या अकविता...समझने में कठिनाई हो रही है...अपनी नासमझी के लिए खेद है...

manu का कहना है कि -

सच कहूं,,,
तो आदमी की सबसे बड़ी ख़ुशी ही
देती है उसे,,,,

सबसे बड़ा डर ,,,

बहुत ही सुंदर विचार लिए है आपकी "अकविता "
सचमुच आधुनिक शहरी जीवन में रिश्तों की नवज छूते हुए आज का डर सही पेश किया है आपने अपनी "अकविता" में.....
हाँ यदि आपका नाम ना होता तो मैं शुरूआती लाइन से इस को किसी और की ही अकविता मान रहा था ,,,,पर आपने ठीक ठीक निभा दी,,,हालांकि मुझे ज्याद गया नहीं है....
पर आपको बधाई
बहुत बहुत बधाई

Arun Mittal "Adbhut" का कहना है कि -

जिन खोजां तिन पाइयां................. आप दोनों की ही टिप्पणियों का तो इन्तजार था


आचार्य जी,


क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं ... आप भी नासमझ हैं तो फिर हिन्दयुग्म से जुडा हुआ कौन व्यक्ति समझदार होगा ....
सच कह रहा हूँ (वैसे झूठ बोलना मेरी आदत भी नहीं है) मैं आपका बहुत सम्मान करता हूँ क्योंकि आपके लेख मैंने पढ़े हैं ...
प्रस्तुत कविता "अकविता" ही है इसमें कोई दो राय नहीं. ये इसलिए भेजी थी हिन्दयुग्म को, क्योंकि हिन्दयुग्म पर "कविता" नहीं "अकविता" प्रतियोगिता चलती है ... और देखिये प्रथम पांच में भी आ गयी

मनु जी,

आपने मेरे मन की बात कही, आपसे तो ये अपेक्षा थी ही .... फिर भी आपने कविता... माफ़ किजीयेगा "अकविता" को सराहा धन्यवाद....

मुझे और टिप्पणियां पढ़कर थोडा दुःख भी हुआ की इस कविता की आलोचना में बहुत कम लिखा गया लगता है सब लोग मुझ जितने बेबाक नहीं है ............. अब कुछ लोग मेरी इस बात पर एनी माउस बनकर भी कुछ लिख सकते हैं

चलिए आप सबका प्यार मिला............. और मिले तो और अच्छा ..............

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

अद्भुत जी!
बुरा मत मानियेगा लेकिन आपकी बातों से अजीब किस्म का दंभ झलक रहा है।
क्या बात है - आपने अकविता लिखी और हिन्द-युग्म जैसे तुच्छ से मंच पर भेज दी। आपको तो पता हीं था कि अकविता है तो शीर्ष द्स या पाँच में हीं आ हीं जाएगी। और लीजिए आ गई। बधाई स्वीकारिये। लेकिन यह क्या - ऎसी अकविता लिखकर भी आप युनिकवि नहीं हो पाये। आपको तो विजयी होना चाहिए था। तब तो हिन्द-युग्म को अच्छी अकविता की परख नहीं है। शायद अगली बार इससे भी जबर्दस्त अकविता लिखियेगा तो जीत हासिल हो जाएगी। लगे रहिये।

-इसी हिन्द-युग्म का अदना-सा सदस्य।

Arun Mittal "Adbhut" का कहना है कि -

तनहा जी,

हिंद युग्म कोई तुच्छ मंच नहीं है ..... और हाँ मैं जो भी लिखता हूँ टिप्पणियों में वो मेरा दंभ नहीं है शरारत है ..... मैंने ये कविता लिखने के लिए ही लिखी थी, ये कोई महान कविता नहीं है .... मैं ये शरारत इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं छंद का भक्त हूँ ....... मुझे न तो युइकवि बनना है और न ही मुझे किसी पुरस्कार का लालच है .... लोग कविता में छंद को माने क्योंकि छंद बद्ध कविता ही आम पाठक से जुड़ती है .....

चलिए अगर अआप्को मेरी भाषा से ठेस लगी या किसी और को भी बुरा लगा तो मैं क्षमा चाहता हूँ .... (हाथ जोड़कर)

manu का कहना है कि -

हिंद युग्म कोई तुच्छ मंच नहीं है,
एक ने ये बात गंभीरता से स्वीकारी है तो एक ने शरारत के मूड से......
दोनों अपनी अपनी जगह पर अपने अपने ढंग से युग्म की प्रशंशा कर रहे हैं,,,फिलहाल तो ये देख कर अच्छा लगा....
कविता अकविता को खुद ही निबटें.....मैं कैसे बोलूँ....?दोनों की कलम में मजा आता है मुझे तो ...
क्यूंकि मैं तो दोनों का ही फैन हूँ......
:::::)))

neelam का कहना है कि -

aapki kaavya katha hume bhi pasand aayi ,aakhiri line visesh taur par
bahut prabhavi ban padi hai .

nafarat(kavita -akavita ) ki laathi todo
mere desh premiyon aapas me prem
karo .

deepak ji apne apne tareeke hain ,inka falsafa hai ki badnaam gar honge to kya naam n hoga

रश्मि प्रभा का कहना है कि -

bahut bahut hi achhi rachna....

manpreet का कहना है कि -

arun apke kavitaye hindi yugm ke leya misal hai. ap har kavita me jindagi ke sach ko pirokar rakh dete ho. kaha se ye adhut ke soch suru hote hai. andaja lagana muskil hai. ap hindi yugm ke leya hera ke tarah ho. jo jetna lekhaga utna nekhar kar ayega. uske chamak dino din badte jayege. apke kavita ke leya adhut ko dhero badhai.

manpreet का कहना है कि -

arun hame apke kavita bahut achhe lage. vaqae insan jab bachapan se nikalkar budape me kadam rakhta hai. to jo wo dard mahsoos karta hai . use apne apne kavita kejareya. aj ke naye pedhi tak pahuchya hai.ap ke likhne ke sale kamal hai. aur apke kavita bemishal hai.adhut dhero nam kamaye . ye mere bhadhai hai apko

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