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Friday, August 14, 2009

आया फिर से सावन आया.....


आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई
झरने कल-कल बहते निर्झर, नदियाँ झूमें बौराई

टप-टप बूँदें गिरती, घिरती सुर्ख घटायें काली सी
रिमझिम रिमझिम बरखा छाये, शाम हुई मतवाली सी
बहती शीतल हवा सुहानी, सबके ही मन को भाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

घुमड़ घुमड़ यूँ मेघ गरजते, मानो पास बुलाते हों
टर्र-टर्र टर्राते मेंढक, जैसे राग सुनाते हों
सुन-सुन कर सुमधुर आवाजें, जागी दुनिया अलसाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

मदमाता हर फूल महकता, फैले गंध निराली यूँ
मधुबन खुद में नहीं समाता, झूमे डाली-डाली यूँ
भागी दूर तपिश कण-कण की, धरती फिर से मुस्काई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

खेतों में लहराती फसलें, छाई अनुपम हरियाली
पगलाया सा जनजीवन है, चहुँदिशी बिखरी खुशहाली
घर आँगन फुलवारी सारी, यूँ कुदरत ने महकाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

मन मयूर सम नाच रहा है, पग-पग उठे तराना सा
रोम-रोम में भरे शरारत, कोई राग पुराना सा
इठलाती हैं निज यौवन में, मस्त लताएँ बलखाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

नभ में इन्द्रधनुष छाया, सब पंछी चिहुंक-चिहुंक गायें
स्वागत करते नई भौर का, इक दूजे को बहलायें
मिलकर नव उल्लास मनाएं, मनमोहक यह ऋतू आई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

हर पल मन को लगे सुहाना, मौसम दूर न जाए ये
मिट जाए हर द्वेष धरा से, प्रेम सुमन बरसाए ये
बनी मधुरतम अद्भुत बेला, नवयुग के पथ पर छाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

anonymous no. 2 का कहना है कि -

how very sweet and rhyming.
great poem in old traditions.

Disha का कहना है कि -

सावन का मौसम सभी का मन बावरा कर देता है
बहुत ही सुन्दर रचना

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

यह यूटोपिया की कविता है- कम से कम अब का मौसम तो ऐसा नहीं ही होता।

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

शैलेश जी,आपके समीप ऐसा मौसम हो न हो हम तो गीत में वर्णित मौसम की सारी मस्तियों का आनंद उठा रहें हैं
मों ब्लों-योरप के सबसे ऊँचे शिखर यानि सफ़ेद पहाड़ पर बसंत व् वर्षा दोनों की छठा अदभुत है ,अद्भुत के गीत सी अभिनव ,
श्याम सखा

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

वर्षा ऋतु का सुंदर और मनभावन वर्णन..
सुंदर गीत..

Manju Gupta का कहना है कि -

सुहाने गीत की सुंदर तुकबन्दी के साथ मन झूम गया .अंतिम चार पंक्तियों ने संदेश के साथ कविता अद्भुत बन गयी .

Arun Mittal "Adbhut" का कहना है कि -

अरे वाह श्याम जी, हमें भी ले चलते अपने साथ .... जहाँ आप हैं ....... यहाँ तो बस चिपचिप गर्मी के सिवा कुछ नहीं है.... हाँ ये गीत लिखा था शायद कुछ इसी से ठंडक मिल जाए पर लगता है शैलेश जी तो मौसम से कुछ ज्यादा ही बौखलाए हैं .. वैसे आपके स्नेह के लिए धन्यवाद ....

manu का कहना है कि -

शैलेश जी भी सही कह रहे हैं...
जब सवेरे ये कविता छपी होगी उस वक़्त मौसम गर्म ही था...
पर अब तो सही जन्माष्टमी वाली बारिश का मजा ले रहा हूँ.....
कविता पढ़ के बचपन की बारिशें याद आ गयीं....बिलकुल ऐसी ही होतीं थीं.....

रोम-रोम में भरे शरारत, कोई राग पुराना सा
इठलाती हैं निज यौवन में, मस्त लताएँ बलखाई

बरसात का पूरापूरा मजा देती कविता

नभ में इन्द्रधनुष छाया, सब पंछी चिहुंक-चिहुंक गायें
स्वागत करते नई भौर का, इक दूजे को बहलायें
इन्द्र धनुष देखे भी मुद्दत हुई...
पर ये पढ़ कर वो दिन एक दम आँखों के आगे आ गए...कैसे गर्दन नीची नहीं होती थी .....
जब तक सारे रंग आकाश में ना विलीन हो जाएँ...


आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई
झरने कल-कल बहते निर्झर, नदियाँ झूमें बौराई

टप-टप बूँदें गिरती, घिरती सुर्ख घटायें काली सी
रिमझिम रिमझिम बरखा छाये, शाम हुई मतवाली सी
बहती शीतल हवा सुहानी, सबके ही मन को भाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

बहुत लुत्फ़ लिया अरुण भाई आपकी कविता का...

अमिता का कहना है कि -

आपने तो बचपन मैं पहुंचा दिया . बिलकुल ऐसा ही थी बरसातें. और शायद अब भी बैसी ही होंगीं मैं उनसे दूर आ गई. पर आपकी कविता ने उसी ठंडक मैं पंहुचा दिया. धन्यवाद
सादर
अमिता

sada का कहना है कि -

हर पल मन को लगे सुहाना, मौसम दूर न जाए ये
मिट जाए हर द्वेष धरा से, प्रेम सुमन बरसाए ये

बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Anonymous का कहना है कि -

इस बिजनेस में शैलेश ही नहीं कई लोग शामिल हैं और जो शामिल है उनके बा्रे में लिखी सही टिप्पणी जो उनकी पोल खोलती है हटा भी दी जाती है जैसे किसी कि यह टिपप्णी,
एक छुट भैये आयोजक राजेश चेतन ने एक एक छुटभैये कवि अरुण को सम्मानित किया और सच लिखा था कि चेतन का यह बाजारवाद है वो अपना नाम स्र्कुलेट करने के लिये अपने नाम से पुरस्करित कर्ता है कि छुट भैये कवि नेट व अपनी किताबों मे अपने परिचय रजेश चेतन पुरुस्कार का जिक्र करेंगे,महा पुरुसो व विभूतियों या बाप-दादा के नाम से तो पुरुस्कार रखे जाते हैं \और उस सम्मेलन में वाकई ६०-७० लोग थे ४०- तो मन्त्री के साथ आये गये,माधव कौशिक को छोड़ कोई स्तरीय कवि भी नथा.राजेश ने आज तक जुगाड़बाजी के अलावा किया ही क्या है एक भी कविता नहीं लिखी,स्तर की

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