हे कृष्ण
ये परम्परा शुरु हुई थी तुमसे
और इसीलिए शायद आज भी जीवित है
आज भी असफल होते हैं शांति-दूत
आज भी बजता है युद्ध का बिगुल
और आज भी शान्ति स्थापित करने के लिए
भेजे जाते हैं
टैंकों पर सवार
हथियारों से लैस.....
योद्धा
लेकिन क्यों आज
दोनो पक्षों में से
किसी पक्ष से
मध्य में खड़ा होकर कोई योद्धा
अपने हथियार डालते हुए यह नहीं पूछता
कि शायद जो उधर खडा है वो मेरा अपना है
क्यों आज मध्य में खड़े किसी रथ पर
कोई कृष्ण किसी अर्जुन को
गीता का सन्देश नहीं देता
समस्या तुम्हारी उसी युग में समाप्त हो गई थी
लेकिन
हमारे प्रश्नों के उत्तर
नहीं मिल पा रहे हैं आज भी
क्यों आज असम्भव हो रहा है
यह निश्चित कर पाना
कि कौन सा पक्ष धरूँ
और कौन सा अधर्म करूँ?
यूनिकवि- गुलशन सुखलाल






