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यूँ ही नहीं था... तप्त तवे पर पसर जाना


प्रस्तुत कविता सितम्बर माह की प्रतियोगिता से प्रकाशन के लिए चुनी गई 15 कविताओं में से अंतिम है। इसके रचनकार राजाभाई कौशिक का जन्म 6 नवम्बर, 1973 को सालासर की पुण्यभुमि पर हुआ। बचपन से युवावस्था देशनोक में प्रारम्भिक पढ़ाई-लिखाई के बाद स्नातक के लिये अजमेर डीएवी कोलेज में प्रवेश लिया। रोगी सेवा की भावना से आयुर्वेद अपनाये और सुयस प्राप्त किया। विचारों की उथल-पुथल स्रवण सामर्थ ने इनके मानस पटल के किसी कोने में एक कवि को जन्म दिया पर समयाभाव में पूरा पोषण नहीं हो पाया। फिर भी साहित्य सेवा में अनेकों कविताएं, लेख, व्यंग लिख कर वाहवाही बटोरी, सौभाग्य से चित्रकारी भी मनभावन है। छोटे-छोटे अनेकों पुरुस्कार प्राप्त किये। हाल में राजस्थान प्रांत के चूरु में निवास कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविता- तब जाकर कहीं...........एक

हवा का बल खाकर चलना, इतराना, उठना
रेत छान लहरें बनाना, खर पतवार को छुपाना।
यूँ ही नहीं था... उसका बादल लेकर आना
चमकना, गरजना, हरषाना और डराना॥
तपती रेत पर बूँद का, धार का, परनाल का
तल छूने की चाह में गिरना, बह जाना
यूँ ही नहीं था... उसका उंगलियों के नाप में समा जाना
भीनी भीनी सौंधी सौंधी सुगन्ध और महकना
स्वेद मोतियों के बाने में उजड़े घर का वासी तपता
मुट्ठी से एक एक दाना छोड़ धरती की माँग भरता
यूँ ही नहीं था... आसमान में टाँगूं ऐसी आशा
थार के एक छोर से चलना, मुड़ना और चलते जाना

फूट कर निकला जो हरित पट पहन
देते हुए आभास लक्ष्य के समीप का
यूँ ही नहीं था... अंत उस बीज के परिणाम का
उसका बढ़ना, कटना, छिलना और पिसना

कंगनों की खनक बीच, अंजली भर सींच
दोनों हथेलियों की थपथपाहट पाना
यूँ ही नहीं था... तप्त तवे पर पसर जाना
तब जाकर कहीं एक ... रोटी बनी; और लो ना

भ्रष्टाचार एक कल्पतरु है


कविता रावत पहली बार यूनिकवि प्रतियोगिता के माध्यम से प्रकाशित हो रही हैं। 8 जून, 1968 को भोपाल में जन्मी और यहीं निवास करने वाली कविता ने एम.कॉम. एवं कम्प्यूटर ट्रेनिंग जैसी प्रोफेशनल डिग्रियाँ अर्जित की हैं। भारत के मध्य प्रदेश राज्य की राजधानी झीलों की नगरी भोपाल में राज्य शिक्षा केन्द्र में शिक्षक प्रशिक्षण प्रकोष्ठ में कार्यरत। ये अपनी कविताओं में आस-पास की सामाजिक परिवेश की घटनाओं, परिदृश्यों और मानव मन में उठने वाली सहज भावनाओं व विचारों को सरलतम शब्दों में अभिव्यक्त करती हैं। इनका उद्देश्य साधारण जन मानस तक लेखन के माध्यम से सहज रूप से पहुँच कर समाज में व्याप्त बुराइयों से उनकों दूर कर उन्हें कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करना है। इनकी कविता ने चौदहवाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता- आज का शिष्टाचार

सुना होगा आपने कभी एक कल्पतरु हुआ करता था
जिसके तले बैठ मानव इच्छित फल को पाता था
इच्छा उसकी पूर्ण होती, वह सुख-चैन से रहता
जो भी इसके तले बैठता, वही ख़ुशी से झूमता
क्या आज भी कहीं ऐसा वृक्ष मिल पायेगा?
जो मनोवांछित फल हमको दे सकेगा!
आप कहोगे कल्पतरु अब नहीं, जो सपने करे साकार
लेकिन वह वृक्ष व्याप्त है, नाम है उसका भ्रष्टाचार
यह ऐसा वृक्ष है जिसकी शीतल है छाया
जो भी तले बैठे इसके, उसी ने पायी माया
इसकी जड़ें होती गहरी, यह उखड़ नहीं पाता
जो भी यत्न करता वही समझो है पछताता
जो भी जड़ें जकड़ता इसकी, इच्छित फल वह पाता
जो विमुख रहता इससे, वह खाली ढोल है बजता
आज का कामधेनु है यह जिसका दूध है काला
जो सर्वप्रिय है आज, उसका नाम है घोटाला
आत्मा तन से निकलती, यह धर्मशास्त्र कहता
भ्रष्टाचार व्याप्त रहेगा यही आधुनिक शास्त्र कहता
विराट कल्पतरु का रूप ले चुका यह भ्रष्टाचार
इसलिये लोग कहते है इसे आज का शिष्टाचार।

ओ मरियम तुम्हीं बताओ....


कवि पृथ्वीपाल रावत जो अकेला मुसाफिर के नाम से भी कविताएँ लिखते हैं, की एक कविता ने सितम्बर 2009 की यूनिकवि प्रतियोगिता में 13वाँ स्थान बनाया है। इससे पहले इनकी एक कविता ने जुलाई 2009 की प्रतियोगिता में शीर्ष 10 में स्थान बनाया था।

पुरस्कृत कविता- मरियम तुम्ही बताओ

ओ मरियम!
मेरे परमेश्वर की माँ!
तुम्हीं बताओ
मैं क्या करूँ?
तुम्हीं बताओ
मैं कैसे उठाऊं
अपने परमेश्वर के कृत्यों का अनचाहा बोझ
जो अनजाने ही हो रहा है पोषित मेरे गर्भ मैं?
ओ मरियम तुम्हीं बताओ....!
ओ मरियम!
क्या तुमने भी भोगा था यह अभिशाप
जो मुझे मिला है
एक 'कुवारी माँ' बनकर,
शायद नहीं!
क्योंकि तब वासना की भूख
इतनी भड़की नहीं रही होगी
ना ही मानव इतना कुटिल रहा होगा
जितना कि आज है
तुम्हारे पुत्र को
जो निशानी था तुम्हारे परमेश्वर की
उसे उन भोले मासूम लोगों ने
मान लिया दाता
अपना भाग्य विधाता
मगर.......
मेरे परमेश्वर की निशानी
इन्सां नहीं
जानवर की औलाद होगी....!
ओ मरियम!
तुम जान सकती हो मेरे जैसी लाखों मरियामों का दर्द
जो आज भी
छोड़ देती हैं,
अपने परमेश्वर की निशानी
किसी अनाथालय, वाचनालय,
मंदिर या गिरजाघर के
किसी सुनसान कोने में.
या फिर समय से पहले
कालकलवित हो जाती है
नन्ही रूह
ओ मरियम,
तुम जान सकती हो मेरा दर्द
तुम्हीं बताओ
क्या करूँ मैं................!

नानी की कहानियाँ झूठी नहीं थीं


प्रतियोगिता की 8वीं कविता के रचनाकार हिन्द-युग्म के लिए नये हैं। पूरी तरह से नये नहीं हैं क्योंकि इनकी कविताएँ काव्य-पल्लवन में प्रकाशित होती रही हैं, लेकिन प्रतियोगिता के माध्यम से प्रकाशित होने का इनका यह पहला अवसर है।
नाम: मयंक सिंह सचान
पिता का नाम: श्री धर्मेन्द्र सिंह
माता का नाम: श्रीमती किशोरी सचान
जन्म-स्थान: जिला कानपुर (देहात) में ग्राम धरमंगदपुर
शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान के शहर कोटा से। मोतीलाल नेहरू क्षेत्रीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय (अब MNIT), इलाहाबाद से सन् 1983 में B.E.(Electrical) में स्नातक डिग्री। फ़िर IIT-Delhi से M.Tech. (Power Generation Tech) में स्नातकोत्तर उपाधि।
कार्य अनुभव: 6 वर्ष J.K.Synthetics Ltd., Kota में
तदोपरान्त 16 वर्ष से लगातार देश की अग्रणी विद्युत कं. NTPC Ltd. में सेवारत। वर्तमान में नोएडा स्थित Corporate Office में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्य कर रहा हूँ।
लेखन अनुभव: कोई उल्लेखनीय प्रकाशन नहीं। कॉलेज व कम्पनी स्तर की छोटी-मोटी पत्रिकाओं में ही जगह बना पाया। हालाँकि लिखने का शौक बचपन से ही रहा। कक्षा 12 में स्कूल से विदाई समारोह में एक पैरोडी कव्वाली बनाई थी। जिसको सराहना मिली तो लिखने का उत्साह बढ़ता गया। इलाहाबाद में पहली कविता लिखी।

पुरस्कृत कविता- बूढ़ी नानी की कहानी

मेरी बूढ़ी नानी
बचपन में सुनाती थी एक कहानी
कहानी- जिसमें था एक महल
महल के आंगन में बरगद की छाँव सुहानी
बरगद पर बैठी कोयल की सुरीली तान
महल के पास बहते झरने का मीठा पानी
और इन सबके बीच रहती थी
एक परियों की रानी
बढ़ती उम्र के साथ मैंने
महल तो देखे
बरगद की छाँव का आनन्द भी लिया
कोयल की सुरीली तान सुनी
तो झरने का मीठा पानी भी पिया
लेकिन बहुत खोजने पर भी ना मिली
वो परियों की रानी
तो क्या परियों की रानी थी
सिर्फ़ एक कहानी?
मैं अक्सर सोचता हूँ कि
क्या मेरी नानी ने झूठ बोला?
या फिर मेरी ही बुद्धि ने ज्ञान का वो द्वार
अभी तक नहीं खोला?
अब ये जो इस साईबर-युग के बच्चे हैं
ये 'एसी' की हवा में पलते हैं
होम थियेटर और म्यूजिक स्टेशन पर जीते हैं
और बोतल-बंद मिनरल वाटर पीते हैं।
ये बच्चे-
बरगद की सुहानी छाँव,
कोयल की सुरीली तान और
झरने के मीठे पानी को
क्या जान पाएँगे?
ये बेचारे भी
मुझ अज्ञानी की तरह
उस परियों की रानी की तरह
बरगद, कोयल और झरने को भी
बूढ़ी नानी की कहानी ही बताएँगे।
मेरी नानी कभी झूठ नहीं बोलती थी
परियों की वो रानी वास्तव में होती थी
पर कुछ तो वो विज्ञान के तर्कों-कुतर्कों में
विलीन हो गई
और कुछ मानव विकास की अंधी दौड़ में
अस्तित्व-विहीन हो गई।
प्रकृति से मानव के सम्बन्ध,
जो यूँ ही बिगड़ते जाएँगे
तो वो दिन दूर नहीं जब
बूढ़ी नानी की कहानी तरह
उस परियों की रानी की तरह
बरगद, कोयल और झरने भी
अस्तित्व-विहीन हो जाएँगे
सब विलीन हो जाएँगे॥


पुरस्कार- डॉ॰ श्याम सखा की ओर सेरु 200 मूल्य की पुस्तकें।

चाँद के होठों पे इक बात थी सीली निकली


युवा कवि अनिल जींगर ने सितम्बर माह की प्रतियोगिता में अनिल फ़राग के नाम अपनी कविता भेजी है। अनिल जींगर की पहली कविता फरवरी 2008 में प्रकाशित हुई थी। इस बार इनकी कविता ने बारहवाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता- आवाज़ से गिरा नाम

जब कोई दूर रहे और बहुत पास रहे..
नींद सुखी सी रहे और बहुत प्यास रहे..
तुम वही ख्वाब जगाने चले आ जाया करो..
मेरी रातों को चरागों से सज़ा जाया करो..

अश्क गीले से मोती अभी कच्चे हैं
ये ख्वाबों को समझ लेते हैं सच्चे हैं..
तुम वही रस्म निभाने चले आ जाया करो..
मेरी पलकों पे लब अपने सज़ा जाया करो...

दिन को धोया जो बहुत रात भी गीली निकली..
चाँद के होठों पे इक बात थी सीली निकली..
अपनी फूँकों से वो बात सुखा जाया करो..
तन्हा से कुछ ख्वाब पलकों मे दबा जाया करो..

तुम तक ही आते थे मेरी मन्ज़िल के निशान
ये रस्ते न इतने मुश्किल है न इतने आसान..
अपने पैरों के निशान वही दबा जाया करो..
अपनी आवाज़ से नाम मेरा गिरा जाया करो..

तुम वही ख्वाब जगाने चले आ जाया करो..
मेरी रातों को चरागों से सज़ा जाया करो.

कुछ शून्य नहीं होता


वर्ष 2008 के वार्षिक पाठक सम्मान से सम्मानित और अगस्त 2008 माह की यूनिपाठिका दीपाली मिश्रा की एक कविता ग्यारहवें पायदान पर है। दीपाली इन दिनों दिल्ली में हैं और भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रही हैं।

पुरस्कृत कविता- सहारा

लहरों को किनारे की
जीवन को सहारे की
जरूरत होती है
एकांत भी विश्रांत नहीं होता
मौन की गूंज में भी
कुछ होता है श्रव्य
क्षितिज पर भी दिखाई पड़ते हैं
कई दृश्य
और
यात्रा अनंत, एकल व नीरस
होने पर भी साथ होते है,
अनेक सहचर
आकाश..
वो भी शून्य नहीं होता
उस वृहद् खोखले में है
अनेक नक्षत्र
घूम रहे है साथ साथ, यद्यपि अलग
मन.....
सहारे है सदैव से ही
पूर्व की स्मृतियों एवं
भविष्यत् कल्पनाओं के
"मैं"
ये तो सदैव सहारे रहा है
विचारों के, रिश्तों के, भावनाओं के
संगी के, संवेदनाओं के,
तथाकथित आशाओं के
ये तो सदैव सहारे रहा है,
फिर भी......
कुछ है निशांत अकेला
अन्दर जीता, वृद्धि करता,
रेशम के कीड़े सा
कमजोर और बेसहारा
शायद नहीं......
वो भी थी सदैव सहारे रहा है...
अध्यात्म के!!!

रो रहा बचपन मैं कैसे मुस्कराऊँ


नामः डॉ. राजीव ‘राज’
पिता का नामः श्री प्रेम बाबू यादव
माता का नामः श्रीमती शकुन्तला यादव
शैक्षिक योग्यताः बी.एस-सी., एम.एस-सी.,पी-एच.डी. (रसायन) एम.ए. (हिन्दी साहित्य एवं संस्कृत), साहित्य रत्न प्रयाग विश्वविद्यालय, बी.एड.
सम्प्रतिः शिक्षक, शिव नारायण इण्टर कॉलेज, इटावा
पत्र व्यवहार का पताः 239, प्रेम बिहार,
विजय नगर, इटावा पिन- 206001
ई-मेलः dr_rajeevraj@yahoo.com
ब्लागः vednakephool.blogspot.com
सितम्बर माह की प्रतियोगिता में इनकी कविता ने दसवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता

अर्घ गंगाजल का चाहे देवता,
आँख के आंसू न कोई देखता,
अर्थपूरित हो गयी हैं अर्चनाएं
अथ प्रदूषित हो गयीं हैं सर्जनाएं,
घंटियों में भी नहीं संगीत है
मंदिरों ने भी बदल दी नीत है,
पीर अंतर में लिए जाऊं कहाँ?
किसको सुनाऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

दर्द अब केवल नहीं कश्मीर है,
भारती के अंग अंग में पीर है
मुम्बई, गुजरात देखो रक्तरंजित,
जम्मू,काशी घाट भी लगता प्रकम्पित
बम से थर्राई है जब-जब राजधानी,
अंजुरी भर ढूढता जल स्वाभिमानी
आह माँ की भूल कैसे
मैं खुशी के गीत गाऊँ?
राष्ट्र ऋण का बोध मैं कैसे भुलाऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

भोर पर छाई निशा की कालिमा,
भूख ने बचपन की छीनी लालिमा
काश जो करते कलम की नोंक पैनी,
उन कारों में है हथौड़ा और छैनी
शीश पर अपने गरीबी ढो रहे हैं,
भोजनालय में पतीली धो रहे हैं
जो खिलौना चाँद का मांगे
कहाँ वो कृष्ण पाऊँ?
रो रहा बचपन मैं कैसे मुस्कराऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

तस्लीमा नसरीन, सलमान रश्दी हूँ मैं


विवेक रंजन श्रीवास्तव पिछले 2 वर्षों से हिन्द-युग्म पर हाज़िरी लगा रहे हैं। प्रतियोगिता, काव्य-पल्लवन, पॉडकास्ट कवि सम्मेलन आदि में भाग लेकर हमारा प्रोत्साहन करते रहते हैं। सितम्बर 2009 की प्रतियोगिता में भी इन्होंने भाग लिया जहाँ इनकी कविता ने नौवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता- एक कवि हूँ, सच हूँ मैं

रात सोते वक़्त
टीवी के आखिरी बुलेटिन में
जब मेरे मारे जाने की खबर नहीं होती,
तो सो लेता हूँ।
सुबह जब
अखबार की सुर्खियों में
पाता नहीं स्वयं को मृत
तो फिर लिखता हूँ
एक नई रचना,
एक नया सच।
और इस तरह
स्वयं के जिंदा होने का
अहसास करना मुझे अच्छा लगता है
क्योंकि तस्लीमा नसरीन हूँ मैं,
सलमान रश्दी हूँ मैं
एक लेखक हूँ
एक कवि हूँ,
सच हूँ मैं..


पुरस्कार- डॉ॰ श्याम सखा की ओर सेरु 200 मूल्य की पुस्तकें।

ऐसा अक्सर होता है


युवा कवि प्रदीप वर्मा की 4 कविताएँ हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हो चुकी हैं। आज हम इनकी पाँचवीं कविता प्रकाशित कर रहे हैं, जो सितम्बर माह की प्रतियोगिता में सातवाँ स्थान बना चुकी है।

पुरस्कृत कविता- ऐसा अक्सर होता है

ऐसा अक्सर होता है न
जब बहुत कुछ कहना होता है
तब कुछ कहा नहीं जाता
घुमड़-घुमड़ कर बातें
आती हैं मन में कहने को
उड़ जाती है वही बातें
जाती हुई हवाओं के संग
रह जाती है मन में
कसक न कह पाने की
और दिन भार सताती है
ऐसा अक्सर होता है न
जब बहुत कुछ कहना होता है

और ऐसा भी होता है न
किसी दिन
न कुछ कहने की चाह हो
न कुछ सुनने का इरादा
न चिड़चिढ़ाहट कि
अभी तक
कोई बात
न सुनी
न कही
न कोई उत्साह कि
ये कह लो
वह सुन लो

जब कुछ कहने सुनने की
चाह नहीं हो
तब ऐसा भी होता है न
कोई बात
कानों में ऐसे उतर आती है
मुँह में रखी मिश्री की डली
घुल रही हो हल्के हल्के से


पुरस्कार- डॉ॰ श्याम सखा की ओर सेरु 200 मूल्य की पुस्तकें।

नानी ने भेजे होंगे


प्रतियोगिता की छठवीं कविता के रचनाकार रवि मिश्रा एक पत्रकार हैं। इससे पहले इनकी एक कविता मई महीने की प्रतियोगिता में प्रकाशनार्थ चुनी गई थी।

पुरस्कृत कविता- सोने दो

सुबह की पलकें खोले कौन
हिंडोले में ना डोले कौन
पुतली को सोने दो
सपना है, सपना ही सही
होने दो, आज मुझे सोने दो।

बड़े दिनों के बाद
ये लहरें चौखट तक आयी हैं
कोई बदरी मेरे छत की
इस दूर देस में छाई है
खाली हैं, खाली ही सही
होने दो,
आज मुझे सोने दो।

इक धान की बाली फूट गई
और मेरे तकिये पर बिखर गई
लाल-लाल एक धूप सुबह की
अलसाई पलकों में उतरी
उतरी और निखर गई
और इंद्रधनुष का एक घेरा भी है
झूठा है, होने दो
आज मुझे सोने दो।

पैरों में लगी फिर गीली मिट्टी
बीते कल से आई है चिठ्ठी
लिखा बहुत कुछ अक्षर-अक्षर
भरे लिफ़ाफे परियों के पर
नानी ने भेजे होंगे
वरना कौन करेगा
बड़े हुए हम बच्चों की फ़िकर
बातें हैं, होने दो
आज मुझे सोने दो।


पुरस्कार- डॉ॰ श्याम सखा की ओर सेरु 200 मूल्य की पुस्तकें।

हर घड़ी भागते नज़र आते हो


आलोक उपाध्याय 'नज़र' विगत् 6 महीनों से यूनिकवि प्रतियोगिता का हिस्सा बन रहे हैं और अपनी कविताओं के लिए सराहे भी जा रहे हैं। सितम्बर माह में भी इन्होंने प्रतियोगिता में भाग लिया। जहाँ इनकी कविता ने पाँचवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता

रातों को जागते नज़र आते हो
आसमां ताकते नज़र आते हो

क्या बात है आखिर इन दिनों?
हर घड़ी भागते नज़र आते हो

माँ नाराज़ चल रही है क्या?
खुद जूते बाँधते नज़र आते हो

कहाँ गए बापू के फौलादी कंधे?
हर बोझ लादते नज़र आते हो

उड़ गए न सारे छींक के जलवे?
घंटों अकेले खांसते नज़र आते हो

लगता है अब नसें दुखने लगी है
दर्द-ए-हयात दाबते नज़र आते हो

"खिलौनों की सारी दुकानें बंद थीं"
रोज़ बच्चे को टालते नज़र आते हो

कल तो पर्दानशीं थे फिर क्यूँ भला
हर गली हर रास्ते नज़र आते हो

अब क्यों नहीं है "नज़र" में अदब
रंजिशें दिल में पालते नज़र आते हो


पुरस्कार- डॉ॰ श्याम सखा की ओर सेरु 200 मूल्य की पुस्तकें।

हिंदी को जा के ढूँढ़ो, हिंदी कहीं नहीं है


उत्तराखंड के अपराध अनुसंधान विभाग (क्राइम ब्रांच) के हल्द्वानी खंड में पुलिस उपाधीक्षक तरव अमित एक संवेदनशील व्यक्ति हैं। स्थितियों-परिस्थितियों की साफ-समझ रखते हैं। हिन्द-युग्म हिन्दी-भाषा के लिए काम करने वाले उत्साही जनों का एक समूह है। सितम्बर 2009 की यूनिकवि प्रतियोगिता की चौथी कविता एक तरह से हिन्द-युग्म के कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करती है और हिन्दी भाषा के समक्ष जो परेशानियाँ मुँह बाये खड़ी हैं, उनका सही विश्लेषण भी करती है। हिन्द-युग्म के पहले यूनिकवि आलोक शंकर की कविता 'हिन्द-युग्म' के साथ-साथ हम इस गीत को भी अपनी साहित्य-निधि का हिस्सा बनाना चाहते हैं।

पुरस्कृत कविता

हिंदी वही नहीं है
हिंदी वहीं नहीं है
हिंदी को जा के ढूंढ़ो
हिंदी कहीं नहीं है!

कुछ फूल रही है हिंदी
कुछ भूल रही है हिंदी
शब्दों की उलझनो में
यूँ झूल रही है हिंदी!

पगली हुई है हिंदी
पिछली हुई है हिंदी
गैरत पसंदों की भी
मितली हुई है हिंदी!

थी रक्तोनस में हिंदी
भावों-बहस में हिंदी
हिंदी हुई बहस में
हिंदी दिवस में हिंदी!

हिंदी तो बेरहम है
बुढ़िया है बेकरम है
पोते को बोलने में
आती बड़ी शरम है!

बासी हुई है हिंदी
त्रासी हुई है हिंदी
अनगढ़ गुफा शिला है
तराशी नहीं है हिंदी!

छूटेगी इस विविर में
उठते हुए शिविर में
फिर दर्द बन बहेगी
मुख, दिलमें सिर में हिंदी!

मुँह में पड़ी है हिंदी
दुबकी खड़ी है हिंदी
कल आप हम कहेंगे
बस चू पड़ी है हिंदी!

हिंदी पे बात करना
हिंदी में बात करना
है प्रश्न ये नहीं की
हिंदी की बात करना!

कुछ और भी हो हिंदी
सिरमौर भी हो हिंदी
इससे हो वस्त्र छाया
इक कौर भी हो हिंदी!

हिंदी हो दफ्तरों में
हिंदी मिले घरों में
बहती हुई मिले ये
हिंदी चराचरों में!

संगीत वाद्य हिंदी
सबकी आराध्य हिंदी
बस पूर्ण हो कि इतनी
साधन और साध्य हिंदी!

विस्तृत फलक में हिंदी
कल की झलक में हिंदी
हमें गर्व हो हम बोलें
मद में तड़क में हिंदी!


पुरस्कार- डॉ॰ श्याम सखा की ओर सेरु 200 मूल्य की पुस्तकें।

ये एक भीड़ का दर्द है या जन्नत की हक़ीक़त


युवा कवि उमेश पंत हिन्द-युग्म पर फरवरी 2009 से प्रकाशित हो रहे हैं। सितम्बर माह की प्रतियोगिता में इनकी एक कविता तीसरे स्थान पर रही।

पुरस्कृत कविता

ऊँची सियासत ने की
बड़ी गलतियाँ
और कश्मीर
कश्मीर हो गया।

दिखाये गये
धरती पर स्वर्ग के सपने
पर स्वर्ग बन पाने की सभी शर्तें
दमन की कब्र में दफना दी गयीं।

पीने लगे कश्मीरी
आजादी के घूँट
फूँक-फूँक कर।
देखने लगे आजादी के
तीन थके हुए रंग।
ढोते हुए आजादी को
किसी बोझ की तरह।

फीका लगने लगा गुलमर्ग
संगीनों के साये में।
लगने लगा सुर्ख
डलझील का पानी।

बर्फ की सफेदी के बीच
पसरता रहा स्याह डर।
दबती रही चीखें पर्वतों के बीच
सिकुड़ती रहीं औरतें
अपने घरों में।

दो पाटों के बीच
पिस जाने की परम्परा
बनने लगी
"कश्मीरियत"।

तय करता रहा लोकतंत्र
कश्मीर की इच्छाएँ
अपने नजरिये से।
जीता रहा कश्मीर
गुलामी के लोकतंत्र में।

ये एक भीड़ का दर्द है
या जन्नत की हक़ीक़त
हिन्दुस्तान की धरती पर
दिल को कचोटती
गूंज रही हैं कुछ आवाजें
जीवे जीवे पाकिस्तान।


पुरस्कार- डॉ॰ श्याम सखा की ओर सेरु 200 मूल्य की पुस्तकें।

आओ सब मिल सेंकते हैं हिंदी की रोटी


अखिलेश श्रीवास्तव हिन्द-युग्म के जुलाई 2009 के यूनिकवि हैं और कविताओं की बेहतर परख रखने वाले एक प्रबुद्ध पाठक भी हैं। सितम्बर माह की प्रतियोगिता में इनकी कविता ने दूसरा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता

उठा लाये बच्चन की सिरहाने रखी कुछ
जीवनियाँ
महादेवी की बदलियों से ले ले
थोड़ा नीर
बिस्मिल की ग़ज़लों से
मिल जायेगी चिंगारी
और धूमिल से
माँग लेंगे
उनकी कनस्तर की पेंदी का आटा।

पूर्वज कर गए हैं व्यवस्था
कर्णधारो आओ
सब मिल सेंकते हैं हिंदी की रोटी।

नंगे हो कर माननीय बनो
और करो
भाषा से व्यधिचार।
गर टकरा गए आम जन से
तो घुड़क देना उसे
दिखा देना अपने शरीर पर
साटे डिग्रीयों के कागज।
शलाका पुरुषों
रेल को कहो लौहपथगामिनी
ग्लोबल वार्मिंग को कहो भुवन भभूका
अवनी अगन या तप्त उर्मिका
इक सबद भी न अपनाना
अंग्रेजी का
जलते रहो सौतिया डाह से।
आस पास की हवाओं में
मत लेने देना हिंदी को साँस
उसे जिलाए रखो वेंटिलेटर पर
ताकि लूट सको
उसके जिन्दा होने का श्रेय।
नित निकलना निविदायें
हिंदी को क्लिष्ट करने का
आम आदमी गर आम हिंदी बोले
तो सुना देना
जीभ से शब्दकोश पलटने की सजा।
भाषा पंडितो
मनाओ हिंदी पखवारा
श्राद्ध के दिन में
कभी न आने देना हिंदी का नवरात्र।
सुना है
खासते हुए मरे थे जयशंकर
जिद बहुत छोटी सी थी
नहीं खायेंगे वो दवाइयाँ
जिनके नाम पर्चे पर
लिखे गए हो अंग्रेजी में।


पुरस्कार- डॉ॰ श्याम सखा की ओर सेरु 200 मूल्य की पुस्तकें।