नवंबर माह की तेरहवें स्थान की कविता अनिल जीगर ’फ़राग़’ की है। हिंद-युग्म पर यह उनकी लंबे वक्त के बाद की वापसी है। इससे पहले इनकी पिछली कविता अक्टूबर 2009 पे प्रकाशित हुई थी।
कविता: लकीरें
यूँ ही काट-काट के रात भर
पीस-पीस के लगाया
हथेली पर
बुझती हुई रात का,
जलता हुआ चाँद।
एक टुकड़ा उल्काओं का
गिरा आँगन में तभी
कोई सन्देशा
वहीं लॉन पर छपा पाया
चाँद हथेली से माँगा,
काइनात ने मुझसे
बड़ी मुश्किल से कुरेदा
और लौटा दिया
इसी कोशिश में
चमड़ी भी उतर गई कहीं
कभी पीछे से देखना,
अगर जाओ तुम
मेरी हाथो की लकीरों के कोड़े
चाँद की पीठ पर पड़े हैं।






