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लकीरें


नवंबर माह की तेरहवें स्थान की कविता अनिल जीगर ’फ़राग़’ की है। हिंद-युग्म पर यह उनकी लंबे वक्त के बाद की वापसी है। इससे पहले इनकी पिछली कविता अक्टूबर 2009 पे प्रकाशित हुई थी।

कविता: लकीरें

यूँ ही काट-काट के रात भर
पीस-पीस के लगाया
हथेली पर
बुझती हुई रात का,
जलता हुआ चाँद।
एक टुकड़ा उल्काओं का
 गिरा आँगन में तभी
कोई सन्देशा
वहीं लॉन पर छपा पाया
चाँद हथेली से माँगा,
काइनात ने मुझसे

बड़ी मुश्किल से कुरेदा
 और लौटा दिया
इसी कोशिश में
चमड़ी भी उतर गई कहीं

कभी पीछे से देखना,
अगर जाओ तुम
मेरी हाथो की लकीरों के कोड़े
चाँद की पीठ पर पड़े हैं।


चाँद के होठों पे इक बात थी सीली निकली


युवा कवि अनिल जींगर ने सितम्बर माह की प्रतियोगिता में अनिल फ़राग के नाम अपनी कविता भेजी है। अनिल जींगर की पहली कविता फरवरी 2008 में प्रकाशित हुई थी। इस बार इनकी कविता ने बारहवाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता- आवाज़ से गिरा नाम

जब कोई दूर रहे और बहुत पास रहे..
नींद सुखी सी रहे और बहुत प्यास रहे..
तुम वही ख्वाब जगाने चले आ जाया करो..
मेरी रातों को चरागों से सज़ा जाया करो..

अश्क गीले से मोती अभी कच्चे हैं
ये ख्वाबों को समझ लेते हैं सच्चे हैं..
तुम वही रस्म निभाने चले आ जाया करो..
मेरी पलकों पे लब अपने सज़ा जाया करो...

दिन को धोया जो बहुत रात भी गीली निकली..
चाँद के होठों पे इक बात थी सीली निकली..
अपनी फूँकों से वो बात सुखा जाया करो..
तन्हा से कुछ ख्वाब पलकों मे दबा जाया करो..

तुम तक ही आते थे मेरी मन्ज़िल के निशान
ये रस्ते न इतने मुश्किल है न इतने आसान..
अपने पैरों के निशान वही दबा जाया करो..
अपनी आवाज़ से नाम मेरा गिरा जाया करो..

तुम वही ख्वाब जगाने चले आ जाया करो..
मेरी रातों को चरागों से सज़ा जाया करो.

अदीब का जन्म


आज हम जिस युवा कवि की कविता लेकर उपस्थित हैं, उसने पहली बार फरवरी २००८ में हिन्द-युग्म पर दस्तक दी थी। तक हमने इनकी 'ख़त साँस लेते हैं' कविता प्रकाशित की थी। अनिल जींगर की दूसरी कविता 'कुरकुरी धूप' मई २००८ में प्रकाशित हुई। और आज हम इनकी तीसरी कविता दिसम्बर २००८ की प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता के रूप में लेकर हाज़िर हैं।

पुरस्कृत रचना- जन्म

सोच से अलगाव अच्छा हुनर है अदीबों का
अपने दिमाग़ का फितूर जाने
कैसे
दूसरों के जहाँ पे ढोला करते हैं

बात मुमकिन न हो
फिर भी
सितारे बाँध के फेंके हो
आसमान में ऐसा लगता है

वक़्त के पर्चों में
कुछ लिखा नहीं है
हम ही तो बहते हैं सतहों पर
जो गुजारा है
वो गुजरा नहीं है
बस हम गुजरते है

ख़याल ही में रह जाते हैं
ख़याल बन कर ही गुजर जाते हैं

ये सोच के दायरों के परे
हमेशा कुछ चुनते रहते हैं
बुनते रहते हैं
जब कभी सोच
से अलगाव होता है
उस वक़्त इक अदीब का जन्म होता है

प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४॰५, ६॰२५, ७॰२
औसत अंक- ५॰९८३३३
स्थान- दूसरा


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ५, ५॰९८३३३ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ४॰९९४४
स्थान- पाँचवाँ


पुरस्कार- कवि गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' द्वारा संपादित हाडौती के जनवादी कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह 'जन जन नाद' की एक प्रति।