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लकीरें


नवंबर माह की तेरहवें स्थान की कविता अनिल जीगर ’फ़राग़’ की है। हिंद-युग्म पर यह उनकी लंबे वक्त के बाद की वापसी है। इससे पहले इनकी पिछली कविता अक्टूबर 2009 पे प्रकाशित हुई थी।

कविता: लकीरें

यूँ ही काट-काट के रात भर
पीस-पीस के लगाया
हथेली पर
बुझती हुई रात का,
जलता हुआ चाँद।
एक टुकड़ा उल्काओं का
 गिरा आँगन में तभी
कोई सन्देशा
वहीं लॉन पर छपा पाया
चाँद हथेली से माँगा,
काइनात ने मुझसे

बड़ी मुश्किल से कुरेदा
 और लौटा दिया
इसी कोशिश में
चमड़ी भी उतर गई कहीं

कभी पीछे से देखना,
अगर जाओ तुम
मेरी हाथो की लकीरों के कोड़े
चाँद की पीठ पर पड़े हैं।


ओ कैटरपिलर! जैसे नींव में पत्थर!


मनोज कुमार जिन्हें कल ही हमने यूनिपाठक घोषित किया था, वे एक प्रखर कवि भी हैं। उनकी कविता दूसरे स्थान पर क़ाबिज़ है।

पुरस्कृत कविता- ओ कैटरपिलर!

ओ कैटरपिलर!
तितलियों पर लिखते हैं सब,
मैं लिखूंगा तुझ पर,
ओ कैटरपिलर!

गीत, छंद, नई कविता,
लिखना तितलियों पर,
करना शब्द रचना
नहीं है कोई बड़ी बात।
पर कठिन है,
लेखनी उठाना तुझ जैसों पर,
नहीं जिसकी
अपनी कोई औकात।

तेरे शरीर का खुरदरापन
बारह खंडों में विभाजित तन,
और
सौंदर्य रहित तेरी काया पर,
यदि दो-चार शब्द-चित्र गढूं,
तो शायद
मैं ही पढूं।
फिर भी लिखूंगा तुझ पर,
हे आदिम बुनकर!
ओ कैटरपिलर!

तेरी ठहरी हुई सी
गति में जो माधुर्य है,
तिल-तिल सरकने में
जो संघर्ष है, चातुर्य है,
वह तितलियों की उड़ान में कहां?
यह लाघव जहान में कहां?

नन्हें पांवों
लूप बनाकर
अपनी काया ढोना।
कभी सरल हो-होकर खिंचना,
कभी वक्र हो-होकर झुकना,
गुल-गुलेल होना।
लगता है कैसा?
बौने का हिमालय लांघने के संकल्प जैसा।

तेरी परिभाषा को न सही अभिजात्य शब्द
फिर भी,
अपनी लोच से,
मृदुलता से,
जीतना समर।
ओ कैटरपिलर!


मेंडिबुलर मुखभागों से,
हरी पत्तियां कुतर-कुतर।
किसी तरह भर पाना,
दस भागों का रेल उदर।

इसी लिए,
लोग कहते हैं कि तुम,
पौधों के लिए दुश्‍मन जैसे।
और फिर उड़ेलते तुम पर,
विषैले रसायन कैसे-कैसे।

तुम्हारे कायान्तरण से,
निकली तितलियां
जिनके नयनों को भाती,
उन्हें तुम्हारी ज़िन्दगी रास नहीं आती।

पर, सभ्यता निखरती है,
तुम्हारे देय संवर कर।
ओ कैटरपिलर!
कैटरपिलर!
तुम प्रतीक हो,
बेबस बेचारों के,
मोहताज़ मज़दूरों,
लाचारों के।
हे श्रमजीवी!
करके तैयार,
रंग-विरंगे वस्त्रों का,
रेशमी संसार।
तुम मिटते हो,
पटते हो,
जैसे नींव में पत्थर।
ओ कैटरपिलर!


पुरस्कार- रामदास अकेला की ओर से इनके ही कविता-संग्रह 'आईने बोलते हैं' की एक प्रति।

जमीन की कोख में तेल खोजता कवि और आयुध बनाता पाठक (परिणाम)


साहित्य समय का साक्षी होता है, फिर चाहे इसकी विधा कोई भी हो। हम यूनिकवि प्रतियोगिता के माध्यम से जिन कविताओं की शिनाख़्त करते हैं उसमें भी नदी की तरह बह रहे समय का दस्तावेज़ हैं। यूनप्रतियोगिता के 34वें आयोजन में 54 कवियों ने भाग लिया।

पिछले महीने से हमने निर्णय प्रक्रिया जो बदलवा किया था, उसे ज़ारी रखते हुए पहले चरण में 3 निर्णायक और दूसरे चरण में 3 निर्णायक निश्चित किये गये। पहले चरण के तीनों जजों से कहा गया कि वे अपनी पसंद की 12 कविताएँ हमें दें। इस प्रकार कुल 22 कविताओं को दूसरे चरण में स्थान मिला। दूसरे चरण में 3 निर्णायकों ने अपन-अपनी पसंद की 10 कविताएँ भेजी, जिसमें अपूर्व शुक्ल की कविता 'समय की अदालत में' को सर्वश्रेष्ठ कविता चुना गया। यह कविता सभी 6 निर्णायकों की पसंद रही। एक निर्णायक ने तो यहाँ तक कह डाला कि यह सुखद आश्चर्य है कि हिन्द-युग्म पर इस तरह की कविताएँ आ रही हैं। हिन्द-युग्म का भविष्य उज्ज्वल है।

यूनिकवि- अपूर्व शुक्ल

पैदाइश कानपुर में हुई। उ॰ प्र॰ के एक छोटे से शहर शाहजहाँपुर के और भी छोटे से गाँव के एक सामान्य से पुरोहित परिवार से तअल्लुक रखते हैं। बेहद बचपन में चित्रकथाओं के रंग-बिरंगे चरित्रों से संवाद करने के लिये झटपट पढ़ना सीखे। तब से हर्फ़ों से बना यह रिश्ता सफ़हे-दर-सफ़हे, साल-दर-साल जारी है।
पढ़ाई का सिलसिला भी लम्बा और बिना पतवार की किश्ती के सफ़र की तरह रहा। लखनऊ यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में एम. एस. सी. करने के बाद आई. आई. टी. रुड़की से इंस्ट्‍रूमेन्टेशन में एम. फिल. किया। तत्पश्चात आई. आई. टी. खड़गपुर से सिस्मोलॉजी में एम. टेक पूरा किया। अभी फिलहाल एक बहुराष्ट्रीय ऑयल कम्पनी के लिये जमीन की कोख में तेल के अनुसंधान में रत हैं। बागों के शहर बेंगलुरू की शाखों पर फुदक रहे हैं। कल का पता नहीं, विचलित मन किस धार में इन्हें बहा ले जाये।
पढ़ने का यह शौक नशे की तरह हरदम रहा। बचपन में रास्ते मे पड़े अखबारों के टुकडों से लेकर नेट पे ब्लॉगजगत तक क्या-क्या पढ़ गये, खुद भी खबर नहीं। पिछले 2-3 सालों में जरूर फ़िल्मों के शौक ने किताबों से वक्त को चुरा लिया। हाँ मगर कलम-घिसाई का शौक बस दो माह पुराना है। वह भी नेट पर अपना चिट्ठा बनाने के बाद। इसलिये कहीं और छपने का सवाल नहीं उठता। साहित्यिक प्रतियोगिता का भी यह प्रथम अनुभव है। तब से अंतरतम के अंधेरे मे भटके अव्यक्त भावों को कलम की रोशनी मे शब्दों की पनाह मे लाने के लिये प्रयासरत हैं। हाँ मगर मूलतः एक पाठक हैं।

यूनिकविता- समय की अदालत में

क्षमा कर देना हमको
ओ समय !
हमारी कायरता, विवशता, निर्लज्जता के लिये
हमारे अपराध के लिये
कि बस जी लेना चाहते थे हम
अपने हिस्से की गलीज जिंदगी
अपने हिस्से की चंद जहरीली साँसें
भर लेना चाहते थे अपने फेफड़ों मे
कुछ पलों के लिये ही सही
कि हमने मुक्ति की कामना नही की
बचना चाहा हमेशा
न्याय, नीति, धर्म की परिभाषाओं से
भागना चाहा नग्न सत्य से.

कि हम अपने बूढे अतीत को
विस्मृति के अंधे कुँए मे धकेल आये थे
अपने नवजात भविष्य को गिरवी रख दिया था
वर्तमान के चंद पलों की कच्ची शराब पी लेने के लिये,
बॉटम्स अप !
कि हम बस जी लेना चाहते थे
अपने हिस्से की हवा
अपने हिस्से की जमीन
अपने हिस्से की खुशी
नहीं बाँटना चाहते थे
अपने बच्चों से भी

कि हम बड़े निरंकुश युग मे पैदा हुए थे
ओ समय
उस मेरुहीन युग में
जहाँ हमें आँखें दी गयी थीं
इश्तहारों पर चिपकाये जाने के लिये
हमें जुबान दी गयी थी
सत्ता के जूते चमकाने के लिये
और दी गयी थी एक पूँछ
हिलाने के लिये
टांगों के बीच दबाये रखने के लिये

कि जिंदगी की निर्लज्ज हवस मे हमने
चार पैरों पर जीना सीख लिया था
सीख लिया था जमीन पर रेंगना
बिना मेरु-रज्जु के
सलाखों के बीच रहना,
कि हमें अंधेरों मे जीना भाता था
क्योंकि सीख लिया था हमने
निरर्थक स्वप्न देख्नना
जो सिर्फ़ बंद आँखों से देखे जा सकते थे
हमें रोशनी से डर लगने लगा था
ओ समय !

जब हमारी असहाय खुशियाँ
पैरों मे पत्थर बाँध कर
खामोशी की झील मे
डुबोयी जाती थीं,
तब हम उसमे
अपने कागजी ख्वाबों की नावें तैरा रहे होते थे

ओ समय
ऐसा नही था
कि हमें दर्द नही होता था
कि दुःख नही था हमें
बस हमने उन दुःखों मे जीने का ढंग सीख लिया था
कि हम रच लेते थे अपने चारो ओर
सतरंगे स्वप्नो का मायाजाल
और कला कह देते थे उसे
कि हम विधवाओं के सामूहिक रुदन मे
बीथोवन की नाइन्थ सिम्फनी ढूँढ लेते थे
अंगछिन्न शरीरों के दृश्यों मे
ढूँढ लेते थे
पिकासो की गुएर्निक आर्ट
दुःख की निर्जल विडम्बनाओं मे
चार्ली चैप्लिन की कॉमिक टाइमिंग
और यातना के गहन क्षणों मे
ध्यान की समयशून्य तुरीयावस्था,
जैसे श्वान ढूँढ़ लेते हैं
कूड़े के ढेर मे रोटी के टुकड़े;

कि अपनी आत्मा को, लोरी की थपकियाँ दे कर
सुला दिया था हमने
हमारे आत्माभिमान ने खुद
अपना गला घोंट कर आत्महत्या कर ली थी

हम भयभीत लोग थे
ओ समय !
इसलिये नही
कि हमें यातना का भय था,
हम डरते थे
अपनी नींद टूटने से
अपने स्वप्नभंग होने से हम डरते थे
अपनी कल्पनाओं का हवामहल
ध्वस्त होने से हम डरते थे,
उस निर्दयी युग मे
जब कि छूरे की धार पर
परखी जाती थी
प्रतिरोध की जुबान
हमें क्रांति से डर लगता था
क्योंकि, ओ समय
हमें जिंदगी से प्यार हो गया था
और आज
जब उसकी छाया भी नही है हमारे पास
हमें अब भी जिंदगी से उतना ही प्यार है!


पुरस्कार और सम्मान- शिवना प्रकाशन, सिहोर (म॰ प्र॰) की ओर से रु 1000 के मूल्य की पुस्तकें तथा प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रदान किया जायेगा। नवम्बर माह के अन्य तीन सोमवारों की कविता प्रकाशित करवाने का मौका।


इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे तथा उन्हें हम डॉ॰ महेश चंद्र गुप्ता 'ख़लिश' की ओर से इनके ही पहले ग़ज़ल-संग्रहमाज़ी की परतों से की एक-एक प्रति भेंट करेंगे, उनके नाम हैं-

मनोज कुमार
अखिलेश श्रीवास्तव
शोभना मित्तल
एम वर्मा
रवींद्र शर्मा 'रवि'
विनोद कुमार पांडेय
डॉ॰ अनिल चड्डा
लता हया
अंकित सफ़र


हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त भी बहुत सी उल्लेखनीय कविताओं का प्रकाशन करते हैं। इस बार हम निम्नलिखित 8 कवियों की कविताएँ भी एक-एक करके प्रकाशित करेंगे-

अनामिका
सुमीता प्रवीण
चन्द्रकान्त सिंह
डॉ॰ मीना अग्रवाल
दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'
साबिर "घायल"
आशीष 'अक्स'
सुजीत कुमार 'सुमन'


उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 30 नवम्बर 2009 तक अनयत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

पाठकों की बात करें तो बहुत से नये पाठक रोज़ाना हिन्द-युग्म से जुड़ रहे हैं। बहुत से पाठक जिनकी छाप पाठक-संख्या के आगे बढ़ जाने से पता चल जाती है, हमें पढ़ते रहते हैं और ईमेल द्वारा अपनी प्रतिक्रियाएँ भेजते रहते हैं। कुछ पाठक सीधे तौर पर हमें टिप्पणियाँ करते हैं और अच्छा-बुरा बताते हैं। इससे हमें और अधिक शक्ति मिलती है। ऐसे ही एक पाठक हैं मनोज कुमार, जिन्हें हमने इस बार का यूनिपाठक चुना है।

यूनिपाठक- मनोज कुमार

जन्म – बिहार के समस्तीपुर ज़िले मे 25 अगस्त 1962 में
शिक्षा – जन्तु विज्ञान में स्नातकोत्तर (एम.एस.सी इन ज़ूऑलजी)
पेशा – रक्षा मंत्रालय के आयुध निर्माणी बोर्ड, कोलकाता में निदेशक पद पर कार्यरत
अपनी भावनाएं और विचार बांट सकें, इसलिए लिखते हैं। कोई खास विधा से बंधे नहीं हैं। कविती, लेख, कहानी, लधुकथा आदि। देश की कई पत्र-पत्रिकाओं में छपी हैं।

पुरस्कार और सम्मान- डॉ॰ महेश चंद्र गुप्ता 'ख़लिश' की ओर से इनके ही पहले ग़ज़ल-संग्रहमाज़ी की परतों से की एक प्रति तथा प्रशस्ति-पत्र।

इस बार हमने दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान के विजेता पाठकों के लिए हमने क्रमशः विनोद कुमार पांडेय, श्याम और सुमिता प्रवीण को चुना है। इन तीनों विजेताओं को भी <डॉ॰ महेश चंद्र गुप्ता 'ख़लिश' की ओर से इनके ही पहले ग़ज़ल-संग्रहमाज़ी की परतों से की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। इस बार शीर्ष 15 कविताओं के बाद की कविताओं का कोई क्रम नहीं बनाया गया है, इसलिए निम्नलिखित नाम कविताओं के प्राप्त होने से क्रम से सुनियोजित किये गये हैं।

मुहम्मद अहसन
दिलशेर 'दिल'
शामिख फ़राज़
रामनिवास 'इंडिया'
डा.कमल किशोर सिंह
प्रदीप वर्मा
अजय दुरेजा
दीपक 'मशाल'
गिरिजेश राव
संगीता सेठी
कमलप्रीत सिंह
ममता दुबे
अभिषेक कुशवाहा
अखिलेश श्रीवास्तव
नितिन जैन
कविता रावत
राजेशा
पुनीत सिन्हा
अजय सोहनी
नीलेश माथुर
नीति सागर
अरविन्द कुरील
आलोक उपाध्याय
माधव माधवी
राकेश कौशिक
नवनीत नीरव
मृत्युंजय साधक
दीपक कुमार वर्मा
अम्बरीष श्रीवास्तव
शन्नो अग्रवाल
रतन कुमार शर्मा
वर्षा सिंह
डा. सुरेख भट्ट
अमर बरवाल 'पथिक'
सुजीत कुमार "जलज"
सुफियान अश्वनी
रवि मिश्रा