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Sunday, October 18, 2009

रो रहा बचपन मैं कैसे मुस्कराऊँ


नामः डॉ. राजीव ‘राज’
पिता का नामः श्री प्रेम बाबू यादव
माता का नामः श्रीमती शकुन्तला यादव
शैक्षिक योग्यताः बी.एस-सी., एम.एस-सी.,पी-एच.डी. (रसायन) एम.ए. (हिन्दी साहित्य एवं संस्कृत), साहित्य रत्न प्रयाग विश्वविद्यालय, बी.एड.
सम्प्रतिः शिक्षक, शिव नारायण इण्टर कॉलेज, इटावा
पत्र व्यवहार का पताः 239, प्रेम बिहार,
विजय नगर, इटावा पिन- 206001
ई-मेलः dr_rajeevraj@yahoo.com
ब्लागः vednakephool.blogspot.com
सितम्बर माह की प्रतियोगिता में इनकी कविता ने दसवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता

अर्घ गंगाजल का चाहे देवता,
आँख के आंसू न कोई देखता,
अर्थपूरित हो गयी हैं अर्चनाएं
अथ प्रदूषित हो गयीं हैं सर्जनाएं,
घंटियों में भी नहीं संगीत है
मंदिरों ने भी बदल दी नीत है,
पीर अंतर में लिए जाऊं कहाँ?
किसको सुनाऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

दर्द अब केवल नहीं कश्मीर है,
भारती के अंग अंग में पीर है
मुम्बई, गुजरात देखो रक्तरंजित,
जम्मू,काशी घाट भी लगता प्रकम्पित
बम से थर्राई है जब-जब राजधानी,
अंजुरी भर ढूढता जल स्वाभिमानी
आह माँ की भूल कैसे
मैं खुशी के गीत गाऊँ?
राष्ट्र ऋण का बोध मैं कैसे भुलाऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

भोर पर छाई निशा की कालिमा,
भूख ने बचपन की छीनी लालिमा
काश जो करते कलम की नोंक पैनी,
उन कारों में है हथौड़ा और छैनी
शीश पर अपने गरीबी ढो रहे हैं,
भोजनालय में पतीली धो रहे हैं
जो खिलौना चाँद का मांगे
कहाँ वो कृष्ण पाऊँ?
रो रहा बचपन मैं कैसे मुस्कराऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

Shamikh Faraz का कहना है कि -

पूरी कविता ही सुन्दर है लेकिन यह भाग बहुत अच्छा लगा.

भोर पर छाई निशा की कालिमा,
भूख ने बचपन की छीनी लालिमा
काश जो करते कलम की नोंक पैनी,
उन कारों में है हथौड़ा और छैनी
शीश पर अपने गरीबी ढो रहे हैं,
भोजनालय में पतीली धो रहे हैं
जो खिलौना चाँद का मांगे
कहाँ वो कृष्ण पाऊँ?
रो रहा बचपन मैं कैसे मुस्कराऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

राकेश कौशिक का कहना है कि -

डॉ राजीव अच्छी कविता के लिए बधाई.
"अंजुरी भर ढूढता जल स्वाभिमानी"
विशेष लगी.
उन कारों में है?

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -

दर्द अब केवल नहीं कश्मीर है,
भारती के अंग अंग में पीर है
मुम्बई, गुजरात देखो रक्तरंजित,
जम्मू,काशी घाट भी लगता प्रकम्पित
बम से थर्राई है जब-जब राजधानी,
अंजुरी भर ढूढता जल स्वाभिमानी
आह माँ की भूल कैसे
मैं खुशी के गीत गाऊँ?
राष्ट्र ऋण का बोध मैं कैसे भुलाऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?...........वेदना के फूल !
..........
ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बड़ी ज़रखेज़ है साथी...
युवा पीढी में आज भी एक आग है

MANOJ KUMAR का कहना है कि -

आधुनिकता को निशाना बनाकर यथार्थ व भारतीयता के धरातल पर लिखित यह रचना बहुत अच्छी लगी।

ismita का कहना है कि -

bahut hi achha laga sir...desh ki samsaamayik sthiti ko samagra roop se ek hi kavita mein utaar diya hai apne...
khoon to bahut khulta hai....apne star se hi prayas karna hoga...aapne hamare vichaaron ko aur sambal pradan kiya...dhanyawad....

Nirmla Kapila का कहना है कि -

राष्ट्र ऋण का बोध मैं कैसे भुलाऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?


रो रहा बचपन मैं कैसे मुस्कराऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?
बहुत ही अच्छी कविता सच मे आज स्वाभिमानी व्यक्ति दुख से बेचैन है देश की हालत देख कर तडप रहा है अपने भावों को कवि ने बहुत सुन्दर शब्दों से निखारा है राजीव जी को बहुत बहुत शुभकामनायें

rachana का कहना है कि -

ati sunder

भोर पर छाई निशा की कालिमा,
भूख ने बचपन की छीनी लालिमा
काश जो करते कलम की नोंक पैनी,
उन कारों में है हथौड़ा और छैनी
शीश पर अपने गरीबी ढो रहे हैं,
भोजनालय में पतीली धो रहे हैं
जो खिलौना चाँद का मांगे
कहाँ वो कृष्ण पाऊँ?
रो रहा बचपन मैं कैसे मुस्कराऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?
in ke liye jitna bhi kahun kam hai
saader
rachana

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