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खिलखिलाये


शोक में, उल्लास में
दो बूंद आँसू झिलमिलाये
देखकर प्यासे सुमन पगला गये और खिलखिलाये
*
साज़िश थी इक ,
सूर्य को बन्दी बनाने के लिये
जंजीर में की कैद किरणे
तमस लाने के लिये
नादान मेढक हुये आगे, राह इंगित कर रहे
कौशिशों में जूगनुओं ने चमक़ दी और पर हिलाये
देखकर नन्हे शिशु पगला गये और खिलखिलाये
*
बादलों के पार
बेचैनी भरी मदहोंश चितवन
देख सुन्दर सृष्टि को ना
रोक पाई दिल की धड़कन
भाव व्याकुल हो तड़ित सा काँप जाता तन बदन
मधुर आमन्त्रण दिये, निशब्द होठों को हिलाये
देखकर रूठे सनम पगला गये और खिलखिलाये
*
नृत्य काली रात में था
शरारत के मोड़ पर
सुर बिखरता , फैल जाता
ताल लय को तोड़ कर
छू गया अंतस
प्रणय का गीत मुखरित हो उठा
थम गई साँसे उलझ कर जाम लब से यों पिलाये
देखकर प्यासे चषक पगला गये और खिलखिलाए

-हरिहर झा

आकाश में


छागये लो बादल आकाश में
प्यास धरती को ; नल आकाश में

खींचली साड़ी ; तारों से भरी
द्रौपदी रोई; छल आकाश में

चिढ़ते पानी से ; हैरान सब
कौन ये सूं सूं ; जल आकाश में

छेड़ती आ कर आवारा हवा
लो बचा लो आँचल आकाश में

ना उगी धरती से कोई फ़सल
वो चलाता है हल आकाश में

पेड़ झूमा ; मस्ती का था नशा
फैंकता मीठा फल आकाश में

-हरिहर झा

मौन !


ना समझ पाया स्वयं को
पोथियों में बाँचता
मौन वाणी हो चली है
शब्द भीतर नाचता

कश्तियां कागद-कलम से
खींचती थी मौन आँखें
कर्म की भाषा न समझी फड़फड़ाती भव्य पाँखें
उड़ न पाई एक डग उस गगन के विस्तार में
चित्र राहों का कभी
मंजील नही पहुँचता
मौन तूलिका हो चली है
रंग भीतर नाचता

बखेड़ा यदि राह में
खुद राह को मालुम कब
भोग ने भोगा अभी जो
भोग को मालुम कब
सुन न पाई जिन्दगी
विश्लेषणों में दिल की धड़कन

सोंच पाता हूँ मैं क्या
दिन भर यही मैं सोंचता
मौन वाणी हो चली है
शब्द भीतर नाचता

-हरिहर झा

कुलटा !


आग-बबूला होकर भी
चुपचाप
बैठी हूँ अपने पुरूष-मित्र के विरह में
भीग रहे मेरे कपोल आँसुओं से
पायल बज रही उस छिनाल की
बेशरम चले जा रहे दोनो
सुख-चैन की पगडंडियों पर
सिहर-सिहर जाती हूँ
उसे लाज नहीं आती
क्यों छिन लिया उसने मेरा मित्र ?
उसकी यह हिम्मत !
कि मुझे उलझा गई कांटों में
सोंचती हूँ तो
खून में
कौंध जाती बिजली
कर देती क्षण भर के लिये
मेरा जीवन-प्रवाह अवरूद्ध
वह दीवाल बन कर आड़े आती कलमुई !
मैं छप्पर बन कर
दोस्त को बचाना चाहती उससे
पर अब बादलों की गड़गड़ाहट में
लय टूट गया
क्या हुआ कि
पलक झपकते
उजड़ गई मेरी दुनियाँ
झगड़ी उससे मैं;
रिश्तों के ड्रेसिंग-टेबल से
कान उमेठ कर
उसे दूर करना चाहा तो
बिखर गया लोशन मेरा
और वह सजाती रही भाल कुमकुम से
कुलटा !
क्यों नहीं समझती कि वह तो पराई है
क्या हक बनता है उसका ?
वह है
सिर्फ़ उसकी पत्नी !

-हरिहर झा

चाय गरमागरम


खून से सने नोटों में हो गया केक का भरम
चक्कर आये, एक कप पी ली चाय गरमागरम

मुमकिन नहीं थी प्यार की मीठी मीठी नींद
बेचैन दिल ने पा लिये हैं बिस्तर नरम नरम

कलियाँ मिली तो चटख डाली उनके ही बाग में
रिवाज़ नही अब रखने का नवाबों सी हरम

ताकत नहीं सूरज की, दे पाये कुछ रोशनी
मांगता सूरदास कब से जुगनुओं की करम

मीठे बोलों में छुपी हुई थी जहर की ज्वाला
दोस्ती में भी दुश्मनी का आनन्द मिला परम

पंडित जी पढ़ गये कथा, नहीं आई कुछ समझ
पल्ले पड़ा तो इस जुबान को परशाद का मरम

-हरिहर झा

रोना चाहता है


गम भुलाकर दिमाग खुश होना चाहता है
ये दुखी दिल जी भर के अब रोना चाहता है

ढो लिये चाँद-तारे आकाश उकता गया अब
बावला रे ! तु चैन से सोना चाहता है

कैद हैं सब टेन्शन टकराते मेरे भीतर
तेज जलता चिराग अब बुझना चाहता है

लुट गई तो न बच सकेगी धरती पे कहीँ
आबरू को डूबाके वो मरना चाहता है

हँस न पाया हँसी कभी मासूम सी जो
भटक कर फूल वो कहाँ बोना चाहता है

चाँद पर रात भर यों काला डामर टपकता
पाप धरती से जो हुये ; धोना चाहता है
-हरिहर झा

निमन्त्रण


कितना अजीब है !
मिलना निमन्त्रण
भूतपूर्व पत्नी की
शादी पर !!
जैसे कि
याद दिला दिया उसने
कैसे कैसे स्वप्न थे मेरे !
कि पत्नी भी बन पाये प्रेमिका
पर छोड़ो यार !
कहाँ की लजाती मुस्कान और
शौख अदाये!
नहीं बन पाई थी वह
रूक्मणी से राधा !

देना पड़ा था तलाक
क्योंकि मैं उसे
कैसे संभालता
जब वह छटपटा रही थी
बीमारी से
देख कर दिमाग धुँआता था कुहरे में
कि किसी गाय की रंभाहट लगता था
उसका चिल्ल्लाना !
उलझने क्या सुलझती
जब कोई एहसास नहीं हुआ
कि हो पाये सुलह हम दोनो में
पर खबरदार ! जो मुझे मक्कार, धूर्त समझा तो
पत्नी बीमार थी तो क्या
मैं उसका साथ देता !
हाँ , उस पर किये अहसानों के बदले
मैंने अपने पास रख ली है
हमारे शिशु की मासुम हँसी
चहकना, क्रन्दन और गुंजन
किस्मत से ले लिया मैंने
प्रतिशोध ऐसा
कि उसे माँ से मिलने नहीं दिया
वह तो केवल
अपनी ऊँगलियां
फिराती रही
समय की रेती पर ।

हथकड़ी बन गये थे
हमारी शादी के बन्धन
क्योंकि वह परले दर्जे की
स्वार्थी है
यह निमन्त्रण
कोई मुझे जलाने की तरकीब नहीं
उसकी चालाकी है
कि इस बहाने
हमारे… पर अब सिर्फ़ मेरे शिशु को
साथ लाऊँगा
और वह देख लेगी उसे
जी भर कर अपनी आँखों से
लगा पायेगी कलेजे से
पकड़ा दिया है मुझे यह
निमन्त्रण !

-हरिहर झा

मण्डी बनाया विश्व को


लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा

क्रेन पर
ऊँचा चढ़ा कर,
चैन उसकी तोड़ दी
लोभ का दर्शन बना,
मझधार नैया छोड़ दी
ऋण-यन्त्र से
मन्दी बढ़ी,
पोखर में
डॉलर बह लिया
अर्थ की सरिता में
भोंडे नाच से मोहित किया

बहकता
उन्माद सिर पर
क्यों हमें बहका न देगा
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा

सैज
सिक्कों की बनी,
सब बेवफ़ायें सो रही
मण्डी बनाया विश्व को,
निलाम ’गुडविल’ हो रही
गर्मजोशी बिकी,
सौदाई का जादू चल गया
शेयरों में
आग धधकी ,
लहू कितना जल गया

तड़पता सूरज
दहक कर
कहो क्यों झुलसा न देगा ।
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा

’उपभोग’ की
जय जय हुई,
बाजार घर में आ घुसे
व्यक्ति बना
’सामान’ तो,
रिश्तों में चकले जा घुसे
मोहक कला
विज्ञापनों की,
हर कोई इसमें फँस लिया
अभिसार में मीठा ज़हर,
विषकन्या बन कर डँस लिया

फैकी गुठली
रस-निचुड़ी,
कोई क्यों ठुकरा न देगा
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा ।
-हरिहर झा

जनता की किस्मत फूटी


झगड़ा हुआ नेताजी और पत्रकार में
मंहगाई की मार से बावले हुये पत्रकार ने
मला सिर पर बाम
लगाया नेताजी पर इलजाम
किसी कोमलांगी के बदन को छूकर
उसके घूंघट की ओंट से निकला एक विडियो टेप
दूसरे दिन व्यभिचार¸ दुराचार की
सुर्खियां छाई
बड़े बड़े अक्षरों में
हाय तौबा हुई
टांग खिंचाई की जनता ने
नाराज हो कर पत्रकारिता की गंदी चाल पर
नेता चिल्लाया और झल्लाया
गेर जिम्मेदार मिडिया पर
भनभनाया "उस दो कौड़ी के पत्रकार" पर
झगड़े मे फंसी युवती से
नाटक किया राखी का
शब्दों की बैसाखी का
उल्टा फंसाया कलमघीसू को
हथकड़ी पहनाकर
बाजार मे घुमाया
हुआ हंगामा सदन में
जब जनता रोती रही रोजी रोटी को
बिजली, पानी और सूखी खेती को
तो जिम्मेदार मिडिया और सूचना के नियन्त्रण पर
भाषण हुये एक्ट बनाने
असंतुष्टो को मनाने
सेमिनारों पर
रकम हुई स्वाहा
मुहं से निकला अहाहा !
मलाई गई नेताजी को
हिस्सा मिला पत्रकार को
मिलीभगत हुई, लड़ाई टूटी
पर दोनो की इस मारामारी में
जनता की किस्मत फूटी।

-हरिहर झा

ओछी हरकत


( घरेलु हिंसा के विरुद्ध संघर्ष – एक शीर्षक )

मारपीट अब बहुत हो गई
ओछी हरकत अब न सहूँगी

खौफ़ दिया क्रूर कर्मों से
भँडास निकाली जी भर कर
रोई मैं चुपचाप अकेले
करवट बदली रात-रात भर

पर न बहाऊंगी सावन अब
बिजली बन कर कड़कूँगी मैं
वार किया तो चूप न रहूँगी

मारपीट अब बहुत हो गई
ओछी हरकत अब न सहूँगी

प्रतिकार में तेवर बदलु
माथा मेरा ठनक गया तो
एक चीख न्यायालय पहुँचे
बात बात में तुनक गया तो

जहर बहेगा आँचल से
आँखों से खून के फव्वारे
प्रतिशोध से क्यों न कहूँगी

मारपीट अब बहुत हो गई
ओछी हरकत अब न सहूँगी
-हरिहर झा



मत फेंको जूता


मत फेंको जूता
यह है शिष्टाचार के खिलाफ़
और कानून के विरुद्ध ।


तुम क्षमा कर दो उन्हे
जो हत्या में लिप्त थे
जरा देखो तो सही !
उनके हाथ अब कितने पाक-साफ है !
वे गले में टांगे घूम हैं
निर्दोष होने का प्रमाण-पत्र !


जरा समझो कि
साँस छोड़ती चन्द जिन्दगियां
धन्य हुई
जिनसे चील कौओं ने तुष्टि पाई;
फड़फड़ाती अकुलाती चिड़ियों की वेदना
धन्य हुई
जिनसे गलत में ही सही
प्रतिशोध की हवस पूरी की
बाज ने और गिद्धों ने
जिनके क्रूर नृत्य से डरता है आकाश
तो तुम सह लो और भूल जाओ
क्योंकि तुम्हारे अपनों की याद
मुँह चिढ़ाती है
आइने में नपुंसकता बन कर
इनके ठाठ-बाठ में शरीक हो जाओ
कि ये तुम्हे क्षमा करके पौरुषवान हो गये
फिर से कहता हूँ
मत फेंको जूता

अब तुमने फेंक ही दिया
तो तुम्हारे फटे मौजे के छेद से
नासूर दिखने लगे
जिसकी पीड़ा
कलम बेच खाने वालों को भी हुई
कहने लगे - तुम्हे
कलम की ताकत पर
भरोसा नहीं रहा
उसकी शक्ति हार गई जूते के आगे
तुम्हारे दर्द ने
व्यवस्था पर
जो आक्रमण किया
वही तो किया था
चील कौओं की राजनीति ने
बाज और गिद्धों के स्वार्थ ने
फ़र्क ही क्या रहा?


तो इस सभ्य समाज की
सारी खुशफ़हमियाँ
बनी रहने दो;
चुनाव के रोज
इठलाती उंगली पर लगी
इतराती हुई काली-
स्याही की कसम
मत फेंको जूता !


-हरिहर झा





फ्रायड ने देखा एक ख़्वाब


फ्रायड ने देखा एक ख़्वाब
मनुष्य जाति
जो मनोरोगों से ग्रस्त
मानसिक विकारों से त्रस्त
कैसे पूरी हो बीमारी को
दूर भगाने की आस
हो हर ताले की
कुंजी उसके पास

फिर सपने में देखा
झोली या डंडा
मुर्गी या अंडा
अंडे का फंडा
प्रत्येक का जरूर कोई अर्थ
लाठी, नाग, तलवार या चाकू
कूआ, खाई¸ पहाड़ या राई
सब कुछ यौन पिपासा
सर्व सेक्समयं जगत
सदा से भीतर कुण्ठायें रोई
जब चेतन मन बिल्ली की नींद सोया
दमित वासना़ का चूहा
चुपचाप
अपना भेष बदल कर निकला
मानो फ्रायड ने
चतुर बिल्ली की तरह
नींद का ढ़ोग रच कर
जान लिया चूहों का राज।

दंग रह गया फ्रायड
मन की गहराइयां बतलाते
ये सपने कितने सच्चे!
कि जैसे निरदोष बच्चे
बाकी झूठा इंसान
झूठी यह दुनियां।


खिड़की बन्द


भनक पड़े झरती बूंदों की खिड़की बन्द किया करता
कलरव पंछी का सुन कर भी कितना बोर हुआ जाता हूँ

रिसने लगे पलक से आँसू फूल पत्तियां देख देख
शिकायत भँवरों की गुंजन से लयभंग की मीनमेख
छ्टा निराली छोड़ के नकली चित्रों से मन बहलाया
झूला छोड़ महकती डाली डालर गिनना मुझको भाया

डूब गया नोटों में खड़ी कर दी आट्टालिकायें
जिस्म कैद हथकड़ी बजाता चिल्ला कर गाता हूँ

धूल इकठ्ठी की जीवन में कंकर बस हमने बीने
देख न पाया चांदनी के मृदुल अधर रस भीने
हुआ अनमना, एकाकी, बोझिल दिमाग अपना ढोता
कल्पवृक्ष की छाया में भी मृगतृष्णा ही रहा संजोता

नृत्य हो रहा महफिल में मैं दिवास्वप्न में खोया
झनझन डूब गई, सिक्कों की खनखन मैं पाता हूँ

हो गई है सुनसान डगर थक चला हूँ सब कुछ हारे
है धुंधलाया आकाश धरा बोझिल है गम के मारे
सूख गया अनुराग ह्दय से बिन बसन्त का मेरा मन
सूरज से गीरता लावा करता महलों का ध्वंस दनादन

हुये तमाशाई तारे दिखलाते दिन में नाटक
भीतर झांक के देखूं जितना गहन तमस पाता हूँ

-हरिहर झा

आतंक



सामने खड़ी अनुज की मौत !
वह भी कुछ कायर लोगों के हाथों
जो मांस नोचना जानते हैं
मानवता उन्हे कैसे समझाई जाय !
मेरा भाई ! नाज़ है उस पर !
स्वप्न और दूरद्रष्टि
उसके प्रोजेक्ट की लाल पीली रेखा बन कर
घूमते हैं उसके सिर में
बहुत प्यारा है वह
उसका सिर भी न !
किसी लेपटोप की भाँति
जिसमें ऐसी ऐसी नाड़ियां हैं
जिनकी छाया मात्र है
उस होटल ताज की सुन्दरता
जहाँ भाई, मेरा भाई ठहरा है
मिलने की गुदगुदी है इस मन की झोपड़ी में ।

फोन करता है वह मुझे
तो यह क्या? धम !धम ! गोलियों की आवाजें?
हाय ! बचाओ कोई उसे ! बचाओ !!
होटल मेनेजर की चेतावनी
उसके इंटरकोम से
पड़ रही मेरे भी कानों में
“कुछ प्रेतात्मायें घुस आई हैं होटल में
बिना भाड़ा दिये
मचल रही हैं तुम्हे मरघट ले जाने
बिना कसूर !
सुरक्षा की व्यवस्था गुड़गोबर !
अगला आदेश मिलने तक कछुये की तरह
अपनी इंद्रियों को ढंक लो कवर में
कमरे में लॉक कर लो अपने आपको
बाहर गीदड़ हो गये हैं आदमखोर
रक्तपान के लिये
झूम रहे चहुँओर” ।

बरामदे में शायद
राक्षस निगल रहे हड्डियों के टुकड़े
क्रुर पंजों से फैंक रहे हैं धधकती आग
क्षितिज पर फैली श्यामलता
न जाने यह कैसा बवंडर होगा
छटपटाती होगी उसकी नन्ही सी जान
निकल भागने के लिये
चंगुल से
लो खून से सन गई उसकी लाल रेखायें
और भयग्रस्त हुई पीली रेखायें
क्या सम्भाले? लेपटाप? दो कोड़ी का
पाकिट या महत्वपूर्ण कागज़ ?
जब कि दाग रहे वे परलोक के पासपोर्ट
और लाशें जमीन पर !
मेरा भाई ! कहाँ दफन करूँ इन आँसुओं को
चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यू
कैसे छुड़ाऊँ ?
चिंघाड़ रहा हूँ दर्द से
कहने को हिम्मत दे रहा उसे
पर खुद ही डरा हुआ
ढांढस क्या दूं ?
खुद ही मरा हुआ
छुप कर आजा ! इन्टरनेट के तारों में
रातभर फोन करता हूँ
बार बार
दिल में धकधक..
वहाँ पर वह मौजूद है
या…..

(26/11/०8 को हुई एक घटना पर आधारित )

-हरिहर झा


अभागी मैं


मुझे अपना जैसा बनाने के नाम पर
मेरा स्वत्व छिन कर ले गये
बेड़ियां उतारने के बहाने
कुछ नई बेड़ियां जोड़ गये
भोली मैं
अपनी खुशी की दुनियां में
फुदकती रही चहकती रही
अपने केशों को मर्दों की तरह
छोटा कर
जीती रही एक छलावा
पुरूषाये वस्त्र पहन कर
देती रही अपने को
एक भुलावा
भूल गई
घर के साथ दोहरा शोषण
हो रहा आफिस के काम पर
तडा़क सा किया तलाकित
अधिकार देने के नाम पर
ताकि तुम मुझे
सिंगल मदर या
अविवाहित माँ के रूप में
छोड़ कर
मुझसे अपनी नजर मुड़ा सको
नन्हा गुल मुझे सौप कर
गुलछर्रे उड़ा सको।

मैं जिन्दा थी
केवल रिश्तों के नाम पर
फूल पत्तियों से लदी
अपनी जड़ से विहिन
पर व्यक्तित्व देने के बहाने
नोचते रहे पत्तियों को मेरी शाखों से
चिपकाते रहे
ब्यूटीसेलुन के लोशन से
नकली फूल मेरी देह पर
प्रतियोगी मापदंड बना कर
निहारते रहे अपनी आंखो से।

वस्त्रों के आवरण पर आवरण
मुझे ओढ़ा दिये थे
स्वामी होने की भावना से
आदिम पुरूष ने
कि कोई मुझे
झपट न ले
बनाये थे काराग्रह मेरे चारो और
मै नाईटक्लब की बाला सी
देखती रह गई
जब तुमने एक एक भारी आवरण को उतार कर
मुझे हल्का किया बादलों सा
पर उतारते उतारते
यह क्या किया तुमने
उतार ली मेरी चमड़ी तक
कभी फैशन के नाम पर
कभी स्वतन्त्रता के नाम पर
और अभागी मै
वस्तु थी
बच्चे की पैदाईश के लिये
वस्तु रह गई
दुनियां की नुमाइश के लिये।.

-हरिहर झा



मौत का एहसास


मौत का एहसास पलपल
देह में अनुनाद कलकल

धमनियां फैली शीरा में
काल की गुर्राहटें भी
देह बुनता लाल चादर
राख में हैं सलवटें भी
फिर दिखी फूलों की माला
डालती सांसों पे ताला

फिसलने लगी जीजिविषा
लो चरमराती हड्डियों पर
मौत का एहसास पलपल
देह में अनुनाद कलकल

फलसफा अपना बनाकर
भीड़ को सौंपे जो नारे
सृष्टि अपनी ही रची
मैंने बनाये चाँद तारे
ढह गई फिर से दीवारें
हिल उठे वे खंडहर भी
धमाके से स्वर्ग आई
जल चुकी जो लाश चलकर
मौत का एहसास पलपल
देह में अनुनाद कलकल

-हरिहर झा

मेरे उसूल


मैं प्रोफेसर
मेरे कुछ उसूल हैं
भले हो विद्यार्थिनी
कुछ पक्षपात नहीं करता
मेरे घर का दरवाजा
पढ़ने के लिये कौन खटखटाता
इसका एहसास नहीं होता मुझे
ढँक लेता कोहरे में
उसकी शारीरिक-संरचना
मैं लहरों की कगार पर खड़ा
नहीं देखता उफनती नदी
बगिया की
पंखुड़ी अपनी अल्हड़ अदा में
भले ही खिल रही हो
बाँहे फैला कर नहीं तलाशता मैं
प्रेम की फुहार
नहीं महसुसता
आंचल से प्रस्फुटित प्रेम
भले हों किसी की बाहों में भटकती
हजारों तमन्नायें
नही सिमटता उसमें
खेल रही हो अठखेलियां
तो नहीं देखता मैं गर्दन उचकाये
नहीं बुझाता अपनी प्यास
यह सिद्धान्त ही मेरा संयम
- हरिहर झा

चुड़ैल


नहीं बनाना मुझे सहेली-वहेली
खुश हूँ अपने आप में
बस अपने काम से काम
मेरा अंतर्मुखी स्वभाव इजाजत नहीं देता
यह क्या हो गया है मुझे पता नहीं
क्यों मैं अपने आप में सिमटती जा रही हूँ?

हार गई वह बेचारी
मेरा दुखी मन सहला-सहला कर
कितना मुश्किल है यह सब !
पर न उठी मेरे मन के गलियारे में
खुशियां और किलकारियां
तो सुना डाली उसने मुझे वह
टिमटिमाते तारों में छिपी कहानी
खोल दी अपनी अंतरंग दास्तान
चाहती तो बचा कर रख सकती थी
अपने पति को
जिसके पैरों की आहट थी
सौगात मेरे लिये
पर सहेलीनुमा विश्वास जीतने के लिये
भेजे ई-मेल
दिखा डाले उसने
अपने हनिमून पर लिये फोटो
कुछ विडम्बना ही हुई थी ऐसी
वह भी जानती है
उन फोटो में उसकी जगह पर
मैं हो सकती थी
पर अंगड़ाई ली समय ने
मैं पत्थर-दिल
सह गई सब कुछ
कब उठे और
कब अर्पित हुये भाग्य को
मेरे विद्रोह
एहसास भी न हुआ किसी छोर पर
पर अब मैं अनाप-शनाप
कुछ भी सोंचती हूँ
कि चुड़ैल है वह !
पगला गई हूँ
नहीं जान पाती
कि क्यों चिड़ायेगी वह बच्चों की तरह
या जलायेगी मुझे
कि मेरा प्रेमी है उसके कब्जे में
भला क्यों छिड़केगी
जले पर नमक ?
क्यों रखेगी बार बार
मेरी दुखती रग पर हाथ?
पर मैं हूँ कि कतराती हूँ
आँख चुराती हूँ उससे
अशिष्ट होती जा रही हूँ उसके साथ ।

-हरिहर झा

बाजार-भाव


यौवन के घनेरे बालों की खुशबू
तिस पर ऐसा मोहक अनुरोध
अनमोल है यह पल
इस निराले उन्माद में
यह रूठना मनाना
नाजुक कलाई से उभरता प्यार
कल भले ही मरघट की
सीढ़ियों पर चढ़ कर
गुमनाम हो जाय
उल्का की तरह चमक कर
विलुप्त हो जाय
न जाने कब धूल-धुसरित कर दें
काल के धागों में गुंथे अलगाव;
कला से ढांपे हुये जिस्म
रूह को बाजारी बना दें
गुणवत्ता के मापतोल
दूकानों पर मिलते कमिशन
लचीली शर्तें
मोहक विज्ञापन के जादू
बाजार-भाव के एहसास
लाभ की
मनोवृत्ति से उफनती आँच
न जाने कब
इस क्षण के घरौंदे को
लपेट कर
सब कुछ निगल जाय !

-हरिहर झा

चिड़चिड़ी


केवल उंगलियां देख कर
घबराती ग्वालिन
देख रही अपनी ’मौसी’ का चेहरा -
आग-बबूला
पहाड़ से लुढ़कते पत्त्थर सा क्रोध
उफनती नदी खो चुकी अपनी शालिनता
काँपते हुये हिरन के बच्चे
कुलांचे भरते
देखते कगार पर अपनी मृत्यु
कत्लगाह से छुट पाने की विफलता पर
बैठे अनमने हो कर
पलकें एकटक
जिनके बोल खो जाते कहीं धुएँ में ।


देखा था मौसी ने -
ऋषि-मुनियों के यज्ञ की आहुति का धुआँ -
टकराते चकमक पत्थर से निकलती
अग्नि से प्रज्ज्वलित हवन
जिसके साथ जुड़ी प्रार्थना और श्रद्धा ने ही
बददिमाग कर दिया मौसी को
अब तो कण्डे के उपले भी
जल कर उसे देने लगे हैं
तंग करती हुई गुदगुदी
क्यों नहीं सह पाती
अपने लाड़ले बेटों की शरारत ?
कहती है -
“सिगरेट सा यह धुआँ !
क्यों छोड़ते हो अधोवायु
तुम्हारी बिना बैल की गाड़ी से ?
और तु्म्हारे कारखानो के
इन मशीन-पुर्जों में
हाय राम !
खुद ही पीसी जा रही हूँ
कब तक जलाऊंगी अपनी चमड़ी
और अस्थियां !
बड़ी तकलिफ देते हो मुझे !
कहे देती हूँ
मरोगे बिना मौत
मैं आगा-पीछा नहीं देखती
गुस्से में
शुरू कर दूंगी
मेरा काली-नृत्य शुरू
तो फिर कोई शिव की छाती
रोक नही पायेगी
मेरे पैर !”

सठिया गई है मौसी
देखी नहीं जाती उससे
हमारी प्रगति
हमारी समृद्धि और विकास
कोढ़ के मरीज सी
बदसूरत हो चली
चिड़चिड़ी मौसी ।

-हरिहर झा