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Friday, February 20, 2009

खिड़की बन्द


भनक पड़े झरती बूंदों की खिड़की बन्द किया करता
कलरव पंछी का सुन कर भी कितना बोर हुआ जाता हूँ

रिसने लगे पलक से आँसू फूल पत्तियां देख देख
शिकायत भँवरों की गुंजन से लयभंग की मीनमेख
छ्टा निराली छोड़ के नकली चित्रों से मन बहलाया
झूला छोड़ महकती डाली डालर गिनना मुझको भाया

डूब गया नोटों में खड़ी कर दी आट्टालिकायें
जिस्म कैद हथकड़ी बजाता चिल्ला कर गाता हूँ

धूल इकठ्ठी की जीवन में कंकर बस हमने बीने
देख न पाया चांदनी के मृदुल अधर रस भीने
हुआ अनमना, एकाकी, बोझिल दिमाग अपना ढोता
कल्पवृक्ष की छाया में भी मृगतृष्णा ही रहा संजोता

नृत्य हो रहा महफिल में मैं दिवास्वप्न में खोया
झनझन डूब गई, सिक्कों की खनखन मैं पाता हूँ

हो गई है सुनसान डगर थक चला हूँ सब कुछ हारे
है धुंधलाया आकाश धरा बोझिल है गम के मारे
सूख गया अनुराग ह्दय से बिन बसन्त का मेरा मन
सूरज से गीरता लावा करता महलों का ध्वंस दनादन

हुये तमाशाई तारे दिखलाते दिन में नाटक
भीतर झांक के देखूं जितना गहन तमस पाता हूँ

-हरिहर झा

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

हिमांशु का कहना है कि -

सुन्दर सा गीत. धन्यवाद.

neelam का कहना है कि -

हुये तमाशाई तारे दिखलाते दिन में नाटक
भीतर झांक के देखूं जितना गहन तमस पाता हूँ

hirday vidaarak rachna ,khubsoorat
bhaavovyakti .

itna hi malaal hai ,to bandhiye boriyabistar aur aa jaaiye waapas
apne desh me bhi roti to milegi hi ,aur hindyugm ke cheeten aur bauchaar to aapke saath hamesha hain ,chaahe aap waha unchi attalikaaon me rahen ya yahaan jhopdi me .hahahahahhhaahahahahahah

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

सुंदर |
अवनीश

vinay k joshi का कहना है कि -

हुआ अनमना, एकाकी, बोझिल दिमाग अपना ढोता
कल्पवृक्ष की छाया में भी मृगतृष्णा ही रहा संजोता
झा साहब,
सवेदना के स्तर को छूती पंक्तियाँ है | समग्र कविता ही सुंदर है , बधाई |
सादर,
विनय के जोशी

M.A.Sharma "सेहर" का कहना है कि -

धूल इकठ्ठी की जीवन में कंकर बस हमने बीने
देख न पाया चांदनी के मृदुल अधर रस भीने
हुआ अनमना, एकाकी, बोझिल दिमाग अपना ढोता
कल्पवृक्ष की छाया में भी मृगतृष्णा ही रहा संजोता

खूबसूरत शब्दावली,भाव अद्भुत,
अर्थ गुनगुनाती सुंदर अभिव्यक्ति

manu का कहना है कि -

हरिहर जी,
सुंदर कविता के लिए बधाई स्वीकारें....

Harihar का कहना है कि -

सभी टीप्पणीकारों को धन्यवाद ।
नीलम जी ! गीत के रूप में कविता एक भाव-दशा होती है।
इस कविता के कारण अगर मैं भारत आगया -बोरीबिस्तर बाँध कर - तो सृजनगाथा में इन दो रचनाओं को क्या जवाब दूंगा ?

http://www.srijangatha.com/2008-09/Sept/austrelia%20ki%20chitthi-harihar%20jha.htm

http://www.srijangatha.com/2008-09/august/kavita-%20harihar%20jha.htm

neelam का कहना है कि -

aap ne to seriously le liya ,
haqiqat yah hai ki jitna watan se door rahte hain ,utni hi uske liye
muhbbat aur ijjat badhti jaati hai .paas rahne par to amooman har bhaartiy ki tarah ap bhi gaali hi enge ,apne desh ko,is system ko ,etc etc

Gaurav का कहना है कि -

Well, I was searching for some inspiration, some solace or some special meaning. But I felt, it was a Bhatkan - wandering aimlessly. There are days like that in everyone's life and may be one can appreciate and cherish these feelings then.
But, somehoe, please keep up, may be one day you 'll do a different mode of Poem which I would like to read again and again.

shanno का कहना है कि -

हरिहर जी,
वाह! आपकी रचना की यह पंक्तियाँ 'धुंधलाया आकाश धरा बोझिल है गम के मारे'' मन को बहुत छू गयीं हैं. बहुत अच्छी रचना.धन्यबाद.

sangeeta का कहना है कि -

हरिहर जी,
आप तो विदेश में रह कर ऐसा सोच रहे हैं पर जो इस देश में हैं वो भी सिक्कों की खनक में डूबे हुए हैं....

छ्टा निराली छोड़ के नकली चित्रों से मन बहलाया
झूला छोड़ महकती डाली डालर गिनना मुझको भाया

सुंदर भावाभिव्यक्ति .
बधाई

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