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Friday, February 06, 2009

आतंक



सामने खड़ी अनुज की मौत !
वह भी कुछ कायर लोगों के हाथों
जो मांस नोचना जानते हैं
मानवता उन्हे कैसे समझाई जाय !
मेरा भाई ! नाज़ है उस पर !
स्वप्न और दूरद्रष्टि
उसके प्रोजेक्ट की लाल पीली रेखा बन कर
घूमते हैं उसके सिर में
बहुत प्यारा है वह
उसका सिर भी न !
किसी लेपटोप की भाँति
जिसमें ऐसी ऐसी नाड़ियां हैं
जिनकी छाया मात्र है
उस होटल ताज की सुन्दरता
जहाँ भाई, मेरा भाई ठहरा है
मिलने की गुदगुदी है इस मन की झोपड़ी में ।

फोन करता है वह मुझे
तो यह क्या? धम !धम ! गोलियों की आवाजें?
हाय ! बचाओ कोई उसे ! बचाओ !!
होटल मेनेजर की चेतावनी
उसके इंटरकोम से
पड़ रही मेरे भी कानों में
“कुछ प्रेतात्मायें घुस आई हैं होटल में
बिना भाड़ा दिये
मचल रही हैं तुम्हे मरघट ले जाने
बिना कसूर !
सुरक्षा की व्यवस्था गुड़गोबर !
अगला आदेश मिलने तक कछुये की तरह
अपनी इंद्रियों को ढंक लो कवर में
कमरे में लॉक कर लो अपने आपको
बाहर गीदड़ हो गये हैं आदमखोर
रक्तपान के लिये
झूम रहे चहुँओर” ।

बरामदे में शायद
राक्षस निगल रहे हड्डियों के टुकड़े
क्रुर पंजों से फैंक रहे हैं धधकती आग
क्षितिज पर फैली श्यामलता
न जाने यह कैसा बवंडर होगा
छटपटाती होगी उसकी नन्ही सी जान
निकल भागने के लिये
चंगुल से
लो खून से सन गई उसकी लाल रेखायें
और भयग्रस्त हुई पीली रेखायें
क्या सम्भाले? लेपटाप? दो कोड़ी का
पाकिट या महत्वपूर्ण कागज़ ?
जब कि दाग रहे वे परलोक के पासपोर्ट
और लाशें जमीन पर !
मेरा भाई ! कहाँ दफन करूँ इन आँसुओं को
चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यू
कैसे छुड़ाऊँ ?
चिंघाड़ रहा हूँ दर्द से
कहने को हिम्मत दे रहा उसे
पर खुद ही डरा हुआ
ढांढस क्या दूं ?
खुद ही मरा हुआ
छुप कर आजा ! इन्टरनेट के तारों में
रातभर फोन करता हूँ
बार बार
दिल में धकधक..
वहाँ पर वह मौजूद है
या…..

(26/11/०8 को हुई एक घटना पर आधारित )

-हरिहर झा


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4 कविताप्रेमियों का कहना है :

शोभा का कहना है कि -

वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

neeti sagar का कहना है कि -

आपकी रचना अच्छी है,किंतु जो आपने लेपटोप की उपमा दी वहां २ पंक्तियाँ मुझे समझने में देर लगी,या आपने उन्हें जल्दी में लिखा होगा,खैर...रचना अच्छी बधाई!

तपन शर्मा का कहना है कि -

अच्छा लिखा है पर कविता लम्बी है।

rachana का कहना है कि -

लो खून से सन गई उसकी लाल रेखायें
और भयग्रस्त हुई पीली रेखायें
क्या सम्भाले? लेपटाप? दो कोड़ी का
पाकिट या महत्वपूर्ण कागज़ ?
जब कि दाग रहे वे परलोक के पासपोर्ट
और लाशें जमीन पर !
मेरा भाई ! कहाँ दफन करूँ इन आँसुओं को
चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यू
कैसे छुड़ाऊँ ?

बेबसी का सुंदर चित्रण है
खूब
सादर
रचना

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