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Friday, June 05, 2009

मण्डी बनाया विश्व को


लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा

क्रेन पर
ऊँचा चढ़ा कर,
चैन उसकी तोड़ दी
लोभ का दर्शन बना,
मझधार नैया छोड़ दी
ऋण-यन्त्र से
मन्दी बढ़ी,
पोखर में
डॉलर बह लिया
अर्थ की सरिता में
भोंडे नाच से मोहित किया

बहकता
उन्माद सिर पर
क्यों हमें बहका न देगा
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा

सैज
सिक्कों की बनी,
सब बेवफ़ायें सो रही
मण्डी बनाया विश्व को,
निलाम ’गुडविल’ हो रही
गर्मजोशी बिकी,
सौदाई का जादू चल गया
शेयरों में
आग धधकी ,
लहू कितना जल गया

तड़पता सूरज
दहक कर
कहो क्यों झुलसा न देगा ।
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा

’उपभोग’ की
जय जय हुई,
बाजार घर में आ घुसे
व्यक्ति बना
’सामान’ तो,
रिश्तों में चकले जा घुसे
मोहक कला
विज्ञापनों की,
हर कोई इसमें फँस लिया
अभिसार में मीठा ज़हर,
विषकन्या बन कर डँस लिया

फैकी गुठली
रस-निचुड़ी,
कोई क्यों ठुकरा न देगा
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा ।
-हरिहर झा

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9 कविताप्रेमियों का कहना है :

Shamikh Faraz का कहना है कि -

लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा

शुरुआत के साथ साथ पूरी कविता ही सुन्दर है.

महामंत्री - तस्लीम का कहना है कि -

सामयिक रचना। आभार।


-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

मुकेश कुमार तिवारी का कहना है कि -

हरिहर जी,

बहुत सुन्दर कविता। आज के यथार्थ से दो-दो हाथ करती हुई :-

’उपभोग’ की
जय जय हुई,
बाजार घर में आ घुसे
व्यक्ति बना
’सामान’ तो,
रिश्तों में चकले जा घुसे
मोहक कला
विज्ञापनों की,
हर कोई इसमें फँस लिया
अभिसार में मीठा ज़हर,
विषकन्या बन कर डँस लिया


सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Manju Gupta का कहना है कि -

ARTH VYAVASTHA KI MANDI KE DAUR MEIN ARTH MANDA HO GAYA. AUR IS KAVITA MEIN SHABD MANDE NAHI PADE. ADHUNIK ARTH VYAVASTHA PAR GEHRA PRAHAR HAI. सामयिक रचना HAI. sundar rachna ke liye badhayi.

Manju Gupta.

rachana का कहना है कि -

हरिहर जी
’उपभोग’ की
जय जय हुई,
बाजार घर में आ घुसे
व्यक्ति बना
’सामान’ तो,
रिश्तों में चकले जा घुसे
मोहक कला
विज्ञापनों की,
हर कोई इसमें फँस लिया
अभिसार में मीठा ज़हर,
विषकन्या बन कर डँस लिया
एक दम अलग सा बिषय .और बहुत सुंदर शब्द आप के बहुत सही लिखा है
सादर
रचना

Ambarish Srivastava का कहना है कि -

बहुत अच्छी कविता |

फैकी गुठली
रस-निचुड़ी,
कोई क्यों ठुकरा न देगा
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

आपको बहुत बहुत बधाई |

Soul mate का कहना है कि -

Aap ko jitana janta tha kuch nahi jaanta tha.
Aaj meme aapke pata nahi kitane links dekh daale.

English/Hindi sabhi padhe.

English ke saath Hindi me bhi itana accha likha hai ki maja aagaya.
Aap ko bahut badhai.
I will follow your post. Keep me update on new creations.

aaa kitty20101122 का कहना है कि -

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