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चिड़चिड़ी


केवल उंगलियां देख कर
घबराती ग्वालिन
देख रही अपनी ’मौसी’ का चेहरा -
आग-बबूला
पहाड़ से लुढ़कते पत्त्थर सा क्रोध
उफनती नदी खो चुकी अपनी शालिनता
काँपते हुये हिरन के बच्चे
कुलांचे भरते
देखते कगार पर अपनी मृत्यु
कत्लगाह से छुट पाने की विफलता पर
बैठे अनमने हो कर
पलकें एकटक
जिनके बोल खो जाते कहीं धुएँ में ।


देखा था मौसी ने -
ऋषि-मुनियों के यज्ञ की आहुति का धुआँ -
टकराते चकमक पत्थर से निकलती
अग्नि से प्रज्ज्वलित हवन
जिसके साथ जुड़ी प्रार्थना और श्रद्धा ने ही
बददिमाग कर दिया मौसी को
अब तो कण्डे के उपले भी
जल कर उसे देने लगे हैं
तंग करती हुई गुदगुदी
क्यों नहीं सह पाती
अपने लाड़ले बेटों की शरारत ?
कहती है -
“सिगरेट सा यह धुआँ !
क्यों छोड़ते हो अधोवायु
तुम्हारी बिना बैल की गाड़ी से ?
और तु्म्हारे कारखानो के
इन मशीन-पुर्जों में
हाय राम !
खुद ही पीसी जा रही हूँ
कब तक जलाऊंगी अपनी चमड़ी
और अस्थियां !
बड़ी तकलिफ देते हो मुझे !
कहे देती हूँ
मरोगे बिना मौत
मैं आगा-पीछा नहीं देखती
गुस्से में
शुरू कर दूंगी
मेरा काली-नृत्य शुरू
तो फिर कोई शिव की छाती
रोक नही पायेगी
मेरे पैर !”

सठिया गई है मौसी
देखी नहीं जाती उससे
हमारी प्रगति
हमारी समृद्धि और विकास
कोढ़ के मरीज सी
बदसूरत हो चली
चिड़चिड़ी मौसी ।

-हरिहर झा

समावरोह... ( बदल रही है मेरी दिल्ली)


दिल्ली बीचो-बीच में भवन भव्य विज्ञान
कर्मठता का पुलिस को, मिलना था सम्मान
मिलना था सम्मान, सो पहुँचे सभी वक्त पर
मोटी - मोटी तोंदों वाले आला अफसर
लम्बे - पतले, मोटे - छोटे, नाटे - गट्टे
अब तक शक्ल दिखी ना जिनकी हुए इकट्ठे
चेहरे रगड़ मलाई, सेंट लागाकर आये
उचक उचक कर तकें कि कब कोई हमें बुलाये
अवार्ड बेस्ट मुस्तैदी का जब पा गया कुत्ता
हुई सिपाही अफसर में फिर गुत्थम-गुत्था
अवार्ड दिलाने के लिये इसने पैसे खाये
तील साल में मुझसे छ: छोछक दिलवाये
उछल उछल कर कुत्ता मंच पर उड़ाये खिल्ली
देशभक्त या द्वेषभक्त, बदल रही है मेरी दिल्ली

भाग्य नहीं बदलता


सच कहा है
नियति पर किसी का वश नहीं चलता
इंसान अपना भाग्य नहीं बदलता

पत्ता पत्ता
इश्वर की आज्ञा से हिलता है
वह चाहे तो
बेमौसम फूल खिलता है

विधि का विधान
क्या बदलेंगे देवदूत
हाथ की लकिरें हैं
सिमेंट सी मजबूत

भले ही विज्ञान ने
दुनियां की शक्ल बदल डाली
दवाओं ने इंसान की उम्र बदल डाली
पर बदलने वाले हैं वे
जो अभी नासमझ हैं
अक्ल के कच्चे हैं
जो दर्शन और संस्कृति के ज्ञान में
अभी बच्चे हैं

वे जूझते हैं टकराते हैं
धरती की धूल उड़ा कर
ग्रहों मे पत्थर ढूंढते हैं
चांद के बाद मंगल में
क्या राशियों का मिलान ढुंढते है?

नादान! समझ ले
किस्मत का लिखा हुआ
किस्मत तेरे हाथ मे धरेगा
भाग्य मे लिखी इसी मंगल को मौत
तो तू मंगल को मरेगा

यह बात अलग
कि किसी टीके के प्रभाव से
बीस साल बाद तू बुध को मरा
तो भाग्य की बदलाहट को
जानेगा कैसे ?
बिना पढ़े भाग्य का परिवर्तन
पहचानेगा कैसे ?
कहेगा, किस्मत मे था सो हुआ
क्योंकि किस्मत से डरना था
समझेगा बुद्धू यही
कि तुझे बुध को मरना था।

- हरिहर झा