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कदम मिलाकर चलना होगा...




दौड़ता हिन्द, दौड़ता हिन्दयुग्म (रूपम चौपड़ा)- तस्वीर सौजन्य टाइम्स ऑफ इंडिया-08-12-2008
कदम मिलाकर चलना होगा
******************

भाग्य राष्ट्र का अपने दम पर
हमको आज बदलना होगा..
कदम मिलाकर चलना होगा..
कदम मिलाकर चलना होगा..

और नहीं बन्दूक चलेगी
गैरों के कन्धे पर रखकर
परिवर्तन के हेतु स्वमं ही
उठकर हमको चलना होगा...
भाग्य राष्ट्र का अपने दम पर
हमको आज बदलना होगा..
कदम मिलाकर चलना होगा..

कंटक हो राहों में कितने
लेकिन संग संग कदम बढ़ाकर
फौलादी कर आज इरादे
पैरों तले कुचलना होगा..
भाग्य राष्ट्र का अपने दम पर
हमको आज बदलना होगा..
कदम मिलाकर चलना होगा..

हमें गिराने की साजिश में
शातिर कितने लगे हुए हैं
कदम कदम पर चाल समझकर
लेकर ढ़ाल सम्भलना होगा
भाग्य राष्ट्र का अपने दम पर
हमको आज बदलना होगा..
कदम मिलाकर चलना होगा..

08-12-08

शंखनाद...


उठो देश के वीर जवानो उठो... उठो....
सही वक्त है अब पहिचानो उठो... उठो....
घर में आ हमको ललकारा
बूढ़े बच्चे सबको मारा
कब तक ये सब सहन करेंगे
कब तक बैठे बैठ मरेंगे
आखिर कुछ तो करना होगा
ले बन्दूक उतरना होगा
उठो... उठो....
उठो देश के वीर जवानो उठो... उठो....
सही वक्त है अब पहिचानो उठो... उठो....

मुम्बई बन गयी जलियाँवाला
लोथ लोथ से घर भर डाला
नाम पाक नापाक इरादे
अब तक तोड़े कितने वादे
अनुनय से अब काम ना होगा
बिना उठे आराम ना होगा
उठो... उठो....
उठो देश के वीर जवानो उठो... उठो....
सही वक्त है अब पहिचानो उठो... उठो....

घुस ना पाये कोई शातिर
स्वाभिमान स्व-राष्ट्र के खातिर
व्यवसाय या रण का खेत हो
सठे साठ्यम समाचरेत हो
चैन अमन फिर लाना होगा
हर आतंक मिटाना होगा
उठो... उठो....
उठो देश के वीर जवानो उठो... उठो....
सही वक्त है अब पहिचानो उठो... उठो....

पानी नही रगों मे अपनी
बैठ के माला अब नहीं जपनी
मात भारती की औलादो
अपना खून आज खौलादो
आखों में अब आग उतारो
पकड़ पकड़ कर इनकों मारो
उठो... उठो....
उठो देश के वीर जवानो उठो... उठो....
सही वक्त है अब पहिचानो उठो... उठो....

अगर रहें जो यूँ ही शांत हम
खो देंगें एक एक प्रांत हम
आज हमारी ही जमीन में
सांप घुसे हैं आस्तीन में
और ना आगे इंतजार हो
फन पर इनके तीक्ष्ण वार हो
उठो... उठो....
उठो देश के वीर जवानो उठो... उठो....
सही वक्त है अब पहिचानो उठो... उठो....

पक्का कर लो आज इरादा
वक्त नहीं अब देना ज्यादा
सपथ उठाओं आओ मिलकर
अपनी रक्षा अपने बल पर
कहीं चोट अब नहीं खायेंगे
ईंट से पत्थर टकारायेंगे
उठो... उठो....
उठो देश के वीर जवानो उठो... उठो....
सही वक्त है अब पहिचानो उठो... उठो....
उठो देश के वीर जवानो उठो... उठो....
सही वक्त है अब पहिचानो उठो... उठो....


04-12-2008

फिर गूँज उठी दिल्ली....


...लेकिन ठहाकों से...



अरे बाबा ये दिलो दिमाग पर बम और हथगोलों की तस्वीर ही क्यूँ आ जाती ऐसा टाइटल देखकर..
और भी बड़े बडे धामाकें हैं दुनियाँ में जिनगी गूँज

अनावरत अनंत काल तक गूँजती रहेगी....

एक हास्य का धमाका, दुनियाँ कहती थी जिनको 'काका'
गूँज थी दिल्ली की भू पर, दिन था बुद्धवार, तारीख 8 अक्तूबर...
मुम्बई से पधारे हामरे हास्य कवि श्री आशकरण अटल
नवाजा गया हास्य रत्न उपाधि से
देकर एक लाख का चैक, मानपत्र, शॉल और श्रीफल
काका हाथरसी पुरस्कार ट्रस्ट के सचिव
श्री अशोक गर्ग जी ने मानपत्र बाँचा
बाराबर में खडे थे श्री चक्रधर चाचा
'जयजयवंती सम्मान' के हकदार
बने वरिष्ठ साहित्यकार, श्री अजित कुमार
सौजन्य 'डायमण्ड पब्लिकेशनस' श्री नरेन्द्र कुमार
हिन्दी साफ्टेवेयर से सजा धजा एक लैपटोप
ताकि हो न सके तकनीकी युग में हिन्दी का लोप
गोष्ठी में बडे बडे महानुभाव, बड़े बड़े लोग पधारे
जैसे मोहन कांत जी, महेन्द्र अजनबी, और शर्मा जी हमारे
गंगा प्रसाद जी, रवि-नलिनी जी, उदय प्रताप जी व ओम विकास जी
अरुण जैमिनी जी, पवन दीक्षित जी, पद्माकर जी और वेद प्रकाश जी
मुख्य अतिथि के रूप में विदेश राज्य मंत्री श्री आनन्द शर्मा जी भी आये
भवन में हास्य कविताओं का रसस्वादन कर बहुत मुस्कराये
हिन्दी की किसी भी विधा में लिखते वक्त आये ना कोई दुविधा
इसलिये हिन्दी सॉफ्टवेयर ने दिया श्री चंचल चौहन जी को 'सुविधा'
ये तो रही बात मान और सम्मान की
अब बात करें हास्य के आला कमान की
आका कहूँ, काका कहूँ, और का का कहूँ
हँसी का गोदाम कहूँ या सर्वोच्च ठाहाका कहूँ
कहने में सक्षम होता तो कह पता भी कुछ
स्लाइड शो में अथाह दिखा तो कैसा होगा सचमुच
शब्दों का ही शिल्पी नहीं.. कूँची का भी था जादूगर
कैनवास पर भी कविता की, अपने कौशल से रंग भरकर
चक्रधर चाचा ने बना रखा था रोचक व भोंचक माहोल
और रह रह कर करतल ध्वनि से भर जाता था सारा हॉल
आशकरण अटल जी ने भी चचा और शर्मा जी पर एक हास्य सुनाया
और गुददुदाती दर्शक दीर्घा और और भी गुदगुदाया
बीच बीच में शर्मा जी ने भी अपनी जगह से ही कुछ छर्रे छोड़े
तो बांये बैठे लोगों ने दांये और दांये बैठे लोगो नें बांये मुहुँ मोड़े
रथी माहारथियों को पुष्प गुच्छ दिया गया
खुशी की बात ये है कि इन्हीं गुच्छों में सभी को शामिल किया गया
यह जयजयवंती की चौदहवीं कड़ी थी
बड़े बड़े नामों के साथ सचमुच बहुत बड़ी थी
सुन्दर सुहानी सोम्य शान्दार घड़ी थी
क्यूकि सभीं के कपोलों पर समारोह समापन तक मुस्कान खड़ी थी
भगवान करें ये घडियाँ, कडियाँ, मुस्कान की लड़ियाँ यूँ ही चलती रहें
हिन्दी के भविष्य और भविष्य की हिन्दी की भावानयें जन जन में मचलती रहें.

*जय हिन्द जय हिन्दी..






समावरोह... ( बदल रही है मेरी दिल्ली)


दिल्ली बीचो-बीच में भवन भव्य विज्ञान
कर्मठता का पुलिस को, मिलना था सम्मान
मिलना था सम्मान, सो पहुँचे सभी वक्त पर
मोटी - मोटी तोंदों वाले आला अफसर
लम्बे - पतले, मोटे - छोटे, नाटे - गट्टे
अब तक शक्ल दिखी ना जिनकी हुए इकट्ठे
चेहरे रगड़ मलाई, सेंट लागाकर आये
उचक उचक कर तकें कि कब कोई हमें बुलाये
अवार्ड बेस्ट मुस्तैदी का जब पा गया कुत्ता
हुई सिपाही अफसर में फिर गुत्थम-गुत्था
अवार्ड दिलाने के लिये इसने पैसे खाये
तील साल में मुझसे छ: छोछक दिलवाये
उछल उछल कर कुत्ता मंच पर उड़ाये खिल्ली
देशभक्त या द्वेषभक्त, बदल रही है मेरी दिल्ली

तिरछी नज़र....


इक्कीस सितम्बर, बादलों से घिरा अम्बर,
असीम सुहाना मौसम........ और
भारत पर्यावास केन्द्र में हम...
करीब डेढ़ बजे..
हिन्दी के सिपाई दृढ संकल्प की वर्दी में सजे...
इकट्ठे हो गये...
और फिर हिन्दी हित में खो गये..
भगवन की असीम कृपा से पड़ रहीं थी हल्की हल्कीं बूदे
ताकी सिपाही हर बात पर रहें चौकन्ने और आँखें ना मूँदें
कोई दिल्ली से तो कोई फरीदाबाद से
कुछ गुड्गाँव से तो कुछ गाजियाबाद से
नज़र ना लगे हिन्दी के इस लगाव से
सभी का शुक्रिया करना चाहता हूँ हृदयागत भाव से
रविवार का दिन था तो कोई पत्नी को नाराज करके अया
कोई मित्रों को॥ कोइ फिल्म तज कर आया तो कोई चित्रो कों
किसी ने शॉपिंग के पैसे बचाये तो तो हम जैसे कुछ
पत्नी से पिंड छुडाकर आये ... बहरहाल हर कोई आया
और यहीं दिल को बहुत भाया... तो भाया आया कौन कौन...
कैमरे की तिरछी नज़र का का कमाल ॥ आप भी देखिये
नटखट कैमरे की आखों देखा हाल ...
हिन्द युग्म वीर-वीरांगनायें
हर सांस हिन्द की दीवानी, कुछ करने की दिल में ठानी ।
हम मुट्ठीभर पर मुट्ठी हैं, हम हिन्द युग्म के सैनानी ॥

जगदीश रावतानी जी, पराग जी (बांये से)

अपनी कविता का मधु 'पराग', बिखरेगा चहुँ दिस यही राग ।

गजल भूप आशीश मिला, प्रफुल्लित मन हम धन्य भाग ॥


जगदीश रावतानी जी, रूपम चौपड़ा जी (बांये से)

'रूपम' का एक और मिला रूप, हिन्दी का एक ओर भद्र स्वरूप ।

हो बात चेतना की जन की, जन जन को करना जागरूक ॥

प्रेमचन्द सहजवाला जी, नीलम जी (बांये से)

हम हिन्द-युग्म एक रत्नाकर, नीलम सम 'नीलम' को पाकर ।

आओ प्रयास हर रोज करें, माणियों कि नित नित खोज करें ॥


गौरव सोलंकी जी, सुमित जी (बांये से )

दिल से कृतज्ञ, युग्म रब का , जो साथ मिला है गौरव का ।

सु-मीत 'सुमित' का साथ संग, ये युग्म प्यारा हम सब का ॥

प्रेम चन्द सहजवाला जी
अनुभवी चक्षु अनुभवी हाथ, और प्रेमचन्द का सजह साथ ॥
अब कठिन राह हो जाये मगर, क्या घवराने की कोई बात ॥

धन्यवाद
- अपका कैमरा

आखिर कब तक.....






खूनी मंजर
*******

वो सात दशक बूढी आखें
सूखे आँसू रोये रोये...
एक सात बरस का ये बचपन
माँ बाप बहन भाई खोये...
पथाराई आँखें बापू की
बेटा अब तक घर नहीं लौटा
राखी भी रह-रह बिलख रही
खो गया भाई भी इकलोता
लाशें लाशों को देख हँसी
ना रहा कोई रोने वाला
वरना मरता हर रोज कोई
इतना कुनबा खोने वाला ।


ललकार
*****

छुप छुप के धमांके करने से
दुधमुँहों की लोथ बिखरने से
साबित होती एक बात मगर
तू कोई जानवर से बद्तर
तू मरे से परे निष्प्रान कोई
ना धर्म जाति ईमान कोई
ना तेरा अल्लाह ईश कोई
ना ही तेरा भगवान कोई....

माँ का कुछ दूध पिया है गर
तो मिला आँख सन्मुख आकर
क्यूँ चूहों सा छुपता बुझदिल
भोले बे-गुनाहों के कातिल
ये खूनी खेल बर्बरता का
बस भ्रम है तुझे सफलता का
जाहिर करता खिसियानापन
नापाक तेरी असफलता का

ये मंजर दहशतगर्दी के
है नमूने सब नामर्दी के
यदि फड़क रही तेरी बाजू
तो क्यूँ न सामने आता तू
हिम्मत है सामने लड़ आकर
यूँ पीठ भौंकने से खंजर
अच्छा है डूबकर मर जाना
लेकर के पानी चुल्लूभर

तू खोद रहा है स्वंम कब्र
जो टूट गया जिस रोज सब्र
जिन्दा तुझे दफन करेंगे हम
भारतमाता की हमें कसम
हम शांत हैं तो तू ये न जान
लेता नहीं अपना लहू उफान
सौ बार निछावर वतन हेतु
हमें जान से प्यारा हिन्दोस्तान
हमें जान से प्यारा हिन्दोस्तान
हमें जान से प्यारा हिन्दोस्तान


आखिर किस ठोर चलें ... ???


जाने कहाँ क्या घट जाये...
जाने कब बम फट जाये....
ले साइकल स्कूल ना जाये;
मुन्ना इतना घवराये......
भूखा रहने को राजी अब;
टिफिन उठाते कतराये....
जाने कहाँ क्या घट जाये....
जाने कब बम फट जाये.....

प्रभु के सन्मुख शांति प्रार्थना;
अजान; जान भी ले लेगी,
मन्दिर के घंटों की प्रतिध्वनि;
चीत्कार बन खेलेगी,
हिमगिरि से लेकर जलधिपार;
किस ठोर कहाँ कोई शहर मिले,
जहाँ न खूनी होली हो और
जहाँ न बर्बर कहर मिले,
जहाँ न बम की दहल देहरी दहलाये...
जाने कहाँ क्या घट जाये.....
जाने कब बम फट जाये.....

ज्वर से जलता लाल गोद में;
लेकर बैठी कब से माँ,
बिलख रही पर ! बख्सो बख्सो;
अस्पताल नहीं ले जाना,
बिखर गया जो अस्पताल में
माँटी कहाँ समेटुंगी,
कम से कम अब इतना तो है
आँचल में भर बैठुँगी,
रह रह आंसू टपकाये.........
जाने कहाँ क्या घट जाये...
जाने कब बम फट जाये...

बंगलोर; बमलोर हुआ आह !
शहर गुलाबी लाल हुआ;
बममई हो गयी अब बम्बई;
सूरत, बदसूरत ! कमाल हुआ,
कम्पित कलकत्ता, देहली दहली;
किस ओर नही लो बबाल हुआ,
चैन से जीना ! मसखरी हा हा...
चैन से मरना तक; बेहाल हुआ,
किस लिये योनि मानव पाये....
जाने कहाँ क्या घट जाये .....
जाने कब बम फट जाये .....


06-08-2008

लहर कहर - शमशान शहर...




जीवन दायी देखो कैसा जीवन ग्राही बन गया,
लहर लहर बन गयी कहर; एक तबाही बन गया

बह गये सब खेत मवेशी, खोर लवारे बह गये,
बह गये सब चौका चूल्हे, घेर उसारे बह गये,
जल में डूबा छितिज छोर, जाने कहाँ से उफन गया......
जीवन दायी देखो ...........................

टूट गयीं सब सडकें पुल पथ, टूट गये सब पेड़ रूख,
आंतें टूटी बहुत अबोध हाय! सह न सकीं जो विकट भूख,
कितनों की सिन्दूर चूड़ियाँ, कितनों का यौवन गया,
जीवन दायी देखो ...........................

पंजों के बल खड़ा आस में, कोई पास में आयेगा,
जल ने जकड रखा है लेकिन शायद वो बच जायेगा,
अकड़ गयी लो वृद्ध की काया, एक और जीवन गया,
जीवन दायी देखो ...........................

मेला भाई छो ला है, उथकल; मेले छंग खेलेगा,
अभी जगाउंगा जो इछको, मेली लोती ले लेगा,
नहीं पता, अनजान अबोध, भाई करने चिर-शयन गया
जीवन दायी देखो ...........................

किया तांडव शांत मौन अब, जल मग्न हुई धरती सारी
जो निर्जन में बचे अगर, जन-जन को लेगी बीमारी
शहर बना शमशान अनौखा, कोई न ओढकर गया कफन गया
जीवन दायी देखो ...........................
जीवन दायी देखो कैसा जीवन ग्राही बन गया...............


23-06-2008