...लेकिन ठहाकों से...
अरे बाबा ये दिलो दिमाग पर बम और हथगोलों की तस्वीर ही क्यूँ आ जाती ऐसा टाइटल देखकर..
और भी बड़े बडे धामाकें हैं दुनियाँ में जिनगी गूँज
अनावरत अनंत काल तक गूँजती रहेगी....
एक हास्य का धमाका, दुनियाँ कहती थी जिनको 'काका'
गूँज थी दिल्ली की भू पर, दिन था बुद्धवार, तारीख 8 अक्तूबर...
मुम्बई से पधारे हामरे हास्य कवि श्री आशकरण अटल
नवाजा गया हास्य रत्न उपाधि से
देकर एक लाख का चैक, मानपत्र, शॉल और श्रीफल
काका हाथरसी पुरस्कार ट्रस्ट के सचिव
श्री अशोक गर्ग जी ने मानपत्र बाँचा
बाराबर में खडे थे श्री चक्रधर चाचा
'जयजयवंती सम्मान' के हकदार
बने वरिष्ठ साहित्यकार, श्री अजित कुमार
सौजन्य 'डायमण्ड पब्लिकेशनस' श्री नरेन्द्र कुमार
हिन्दी साफ्टेवेयर से सजा धजा एक लैपटोप
ताकि हो न सके तकनीकी युग में हिन्दी का लोप
गोष्ठी में बडे बडे महानुभाव, बड़े बड़े लोग पधारे
जैसे मोहन कांत जी, महेन्द्र अजनबी, और शर्मा जी हमारे
गंगा प्रसाद जी, रवि-नलिनी जी, उदय प्रताप जी व ओम विकास जी
अरुण जैमिनी जी, पवन दीक्षित जी, पद्माकर जी और वेद प्रकाश जी
मुख्य अतिथि के रूप में विदेश राज्य मंत्री श्री आनन्द शर्मा जी भी आये
भवन में हास्य कविताओं का रसस्वादन कर बहुत मुस्कराये
हिन्दी की किसी भी विधा में लिखते वक्त आये ना कोई दुविधा
इसलिये हिन्दी सॉफ्टवेयर ने दिया श्री चंचल चौहन जी को 'सुविधा'
ये तो रही बात मान और सम्मान की
अब बात करें हास्य के आला कमान की
आका कहूँ, काका कहूँ, और का का कहूँ
हँसी का गोदाम कहूँ या सर्वोच्च ठाहाका कहूँ
कहने में सक्षम होता तो कह पता भी कुछ
स्लाइड शो में अथाह दिखा तो कैसा होगा सचमुच
शब्दों का ही शिल्पी नहीं.. कूँची का भी था जादूगर
कैनवास पर भी कविता की, अपने कौशल से रंग भरकर
चक्रधर चाचा ने बना रखा था रोचक व भोंचक माहोल
और रह रह कर करतल ध्वनि से भर जाता था सारा हॉल
आशकरण अटल जी ने भी चचा और शर्मा जी पर एक हास्य सुनाया
और गुददुदाती दर्शक दीर्घा और और भी गुदगुदाया
बीच बीच में शर्मा जी ने भी अपनी जगह से ही कुछ छर्रे छोड़े
तो बांये बैठे लोगों ने दांये और दांये बैठे लोगो नें बांये मुहुँ मोड़े
रथी माहारथियों को पुष्प गुच्छ दिया गया
खुशी की बात ये है कि इन्हीं गुच्छों में सभी को शामिल किया गया
यह जयजयवंती की चौदहवीं कड़ी थी
बड़े बड़े नामों के साथ सचमुच बहुत बड़ी थी
सुन्दर सुहानी सोम्य शान्दार घड़ी थी
क्यूकि सभीं के कपोलों पर समारोह समापन तक मुस्कान खड़ी थी
भगवान करें ये घडियाँ, कडियाँ, मुस्कान की लड़ियाँ यूँ ही चलती रहें
हिन्दी के भविष्य और भविष्य की हिन्दी की भावानयें जन जन में मचलती रहें.
*जय हिन्द जय हिन्दी..
अरे बाबा ये दिलो दिमाग पर बम और हथगोलों की तस्वीर ही क्यूँ आ जाती ऐसा टाइटल देखकर..
और भी बड़े बडे धामाकें हैं दुनियाँ में जिनगी गूँज
अनावरत अनंत काल तक गूँजती रहेगी....
एक हास्य का धमाका, दुनियाँ कहती थी जिनको 'काका'
गूँज थी दिल्ली की भू पर, दिन था बुद्धवार, तारीख 8 अक्तूबर...
मुम्बई से पधारे हामरे हास्य कवि श्री आशकरण अटल
नवाजा गया हास्य रत्न उपाधि से
देकर एक लाख का चैक, मानपत्र, शॉल और श्रीफल
काका हाथरसी पुरस्कार ट्रस्ट के सचिव
श्री अशोक गर्ग जी ने मानपत्र बाँचा
बाराबर में खडे थे श्री चक्रधर चाचा
'जयजयवंती सम्मान' के हकदार
बने वरिष्ठ साहित्यकार, श्री अजित कुमार
सौजन्य 'डायमण्ड पब्लिकेशनस' श्री नरेन्द्र कुमार
हिन्दी साफ्टेवेयर से सजा धजा एक लैपटोप
ताकि हो न सके तकनीकी युग में हिन्दी का लोप
गोष्ठी में बडे बडे महानुभाव, बड़े बड़े लोग पधारे
जैसे मोहन कांत जी, महेन्द्र अजनबी, और शर्मा जी हमारे
गंगा प्रसाद जी, रवि-नलिनी जी, उदय प्रताप जी व ओम विकास जी
अरुण जैमिनी जी, पवन दीक्षित जी, पद्माकर जी और वेद प्रकाश जी
मुख्य अतिथि के रूप में विदेश राज्य मंत्री श्री आनन्द शर्मा जी भी आये
भवन में हास्य कविताओं का रसस्वादन कर बहुत मुस्कराये
हिन्दी की किसी भी विधा में लिखते वक्त आये ना कोई दुविधा
इसलिये हिन्दी सॉफ्टवेयर ने दिया श्री चंचल चौहन जी को 'सुविधा'
ये तो रही बात मान और सम्मान की
अब बात करें हास्य के आला कमान की
आका कहूँ, काका कहूँ, और का का कहूँ
हँसी का गोदाम कहूँ या सर्वोच्च ठाहाका कहूँ
कहने में सक्षम होता तो कह पता भी कुछ
स्लाइड शो में अथाह दिखा तो कैसा होगा सचमुच
शब्दों का ही शिल्पी नहीं.. कूँची का भी था जादूगर
कैनवास पर भी कविता की, अपने कौशल से रंग भरकर
चक्रधर चाचा ने बना रखा था रोचक व भोंचक माहोल
और रह रह कर करतल ध्वनि से भर जाता था सारा हॉल
आशकरण अटल जी ने भी चचा और शर्मा जी पर एक हास्य सुनाया
और गुददुदाती दर्शक दीर्घा और और भी गुदगुदाया
बीच बीच में शर्मा जी ने भी अपनी जगह से ही कुछ छर्रे छोड़े
तो बांये बैठे लोगों ने दांये और दांये बैठे लोगो नें बांये मुहुँ मोड़े
रथी माहारथियों को पुष्प गुच्छ दिया गया
खुशी की बात ये है कि इन्हीं गुच्छों में सभी को शामिल किया गया
यह जयजयवंती की चौदहवीं कड़ी थी
बड़े बड़े नामों के साथ सचमुच बहुत बड़ी थी
सुन्दर सुहानी सोम्य शान्दार घड़ी थी
क्यूकि सभीं के कपोलों पर समारोह समापन तक मुस्कान खड़ी थी
भगवान करें ये घडियाँ, कडियाँ, मुस्कान की लड़ियाँ यूँ ही चलती रहें
हिन्दी के भविष्य और भविष्य की हिन्दी की भावानयें जन जन में मचलती रहें.
*जय हिन्द जय हिन्दी..






