सुनो… सुनो…जरा ध्यान से सुनो !
ओ बारूद के ढेर पर बैठने वालो
काल के क्रूर हाथों को झुका नहीं सकोगे
अपनी गरजती हुयी बन्दूकों से
ये जो धुँआ फैलाया है तुमने आतंक से
नियति की द्रष्टि से छिप नहीं पाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन…
सुनो… सुनो
जरा ध्यान से
ओ सपोले पालने वालो
पिलाते हुये दूध डसे जायेंगें तुम्हारे हाथ
काल के यम पाश में कोई स्वार्थ होता
पीड़ा की कोई जाति नहीं होती
हिंसा के बीज का कोई धर्म नहीं होता
उसी पीड़ा से छटपटाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन
सुनो… सुनो
जरा कान खोलकर सुनो
ओ निर्दोषों को चिता पर चढ़ाने वालो
अंगारे होंगे तुम्हारी चिता में भी
और ऑंसू भी नहीं मिल सकेगा एक
ठण्डा करने तुम्हें …
नश्वर शरीर के सुख की चाह में
शरीरो को नश्वर करने का खिलवाड़
करते रहोगे कब तक
हो चुका है बहुत बन्द भी करो अब
अन्यथा …..
हिंसा की लहरों पर ये मदान्ध नृत्य
लेगा निगल तुम्हें भी एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन.

















