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बारूद के ढेर पर बैठने वालो


सुनो… सुनो…
जरा ध्यान से सुनो !
ओ बारूद के ढेर पर बैठने वालो
काल के क्रूर हाथों को झुका नहीं सकोगे
अपनी गरजती हुयी बन्दूकों से
ये जो धुँआ फैलाया है तुमने आतंक से
नियति की द्रष्टि से छिप नहीं पाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन…

सुनो… सुनो
जरा ध्यान से
ओ सपोले पालने वालो
पिलाते हुये दूध डसे जायेंगें तुम्हारे हाथ
काल के यम पाश में कोई स्वार्थ होता
पीड़ा की कोई जाति नहीं होती
हिंसा के बीज का कोई धर्म नहीं होता
उसी पीड़ा से छटपटाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन

सुनो… सुनो
जरा कान खोलकर सुनो
ओ निर्दोषों को चिता पर चढ़ाने वालो
अंगारे होंगे तुम्हारी चिता में भी
और ऑंसू भी नहीं मिल सकेगा एक
ठण्डा करने तुम्हें …
नश्वर शरीर के सुख की चाह में
शरीरो को नश्वर करने का खिलवाड़
करते रहोगे कब तक
हो चुका है बहुत बन्द भी करो अब
अन्यथा …..
हिंसा की लहरों पर ये मदान्ध नृत्य
लेगा निगल तुम्हें भी एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन.

घिन आने लगी है 'घोड़ामण्डी' से



लगते थे ....
बहुत अच्छे तुम
बातें तुम्हारी .....
सीधे दिल के अंदर
नसों में खून .....
उबलने लगता था
कुछ भी करने को आतुर

चिलचिलाती धूप में
पसीने से लथपथ ..
आते थे जब भी ..
भटकते हुए मांग कर
किसी से 'लिफ्ट'
अथवा पैदल ...

तुम्हारा भूखा प्यासा
पदयात्रा से थका चेहरा
कर देता था व्याकुल
हर गावं में मां को ..
दौड़ पड़ती थी बहना
ले पानी का गिलास
भाभी टांक देती थी बहुधा
तुम्हारे ‘फटे हुए कुरते’ के बटन
बाबा सोचते थे हरबार
देने को एक नया कुरता
मुझसे पहले ….. तुम्हें

सीखा मैंने जिज्ञासु
तुम्हारे थैले में भरी किताबों से
नैतिकता, राष्ट्रप्रेम, त्याग, समाजसेवा
इतिहास और आदर्श का हर पाठ
उत्प्रेरित हो तुमसे ही ....
……………..
किंतु ......
जबसे देखता हूँ तुम्हें…
पहने हुए तरह तरह के मुखौटे
बदलते हुए टोपियाँ …. हरपल
निकलते हुए कार से
गावं के उस मिटटी के चबूतरे का
उडाते हुए उपहास .....

धूलधूसरित मां .....
घंटों देखती रहती है
नीले, पीले, लाल, हरे,
केसरिया झण्डों को..
विस्फारित नेत्रों से ....
आज सुनती है जब
'घोड़ामण्डी' के भाव
थूक देती है पिच्च से ..
और उसके चेहरे पर
पढ़ते हुए भाव …..
मुझे घिन आने लगी है
तुम्हारी नौटंकी से…
तुम्हारे चेहरे से ....
तुमसे ....

महंगाई के डण्डे


सोऊँगा देर तक
क्योंकि आज 'सण्डे' है
सोचा था बस
इतने में ही पत्नी ने
उबलते गरम पानी का
नमकीन प्याला पकड़ाया
उठो जी यह है चाय
सुनते ही मन झुँझलाया
बस पूछो मत
कृतित्व उभर आया

बाहर देखा
थे कुछ और ही नज़ारे
रिमझिम पड़ रही थी फुहारे
कन्धे पर भारी बोझ
संभालने का करता प्रयास
लड़ख़ड़ाता .. भीगता ..
सब्जी बेचने वाला बूढ़ा
तुनकते सुबकते बच्चे को
भीगने से बचाती
रोजी की तलाश में
भटकती माँ …..
सब्जियों से लदे ठेले
कीचड़ में सना कौन
इस से बेपरवाह
मोटरों के मेले

आश्चर्य ….. !
किन्तु सत्य
देखा है कभी ध्यान से
छाता लगाये उस बूढ़े
भिखारी की ऑंखों में..
महसूस की है कभी
ड्रग्स की मस्ती में
सडकों पर धूम मचाते
बेरोज़गार युवकों की
शोलों जैसी ऑंच ?

आओ… आओ…
कार से उतर कर
समाजवाद… धर्मनिरपेक्षेता…
सर्वहारा क्रान्ति...और क्या.. क्या
का ढिंढोरा पीटने वालो
सोते रहोगे क्या तुम यों ही..
अगले चुनाव तक ?
या फिर करते रहोगे
आपस में जूतम पैज़ार
मत देखो… मत सुनो…
और मत बोलो...
शायद तुम्हे मालुम नहीं
‘एक कप चाय और...’ सुनते ही
मेरी पत्नी, विद्रोहिणी सी हुँकारती
फुंकारती नज़र आती है
चाय.. चीनी.. दूध.. रसोई गैस
कुछ भी नहीं है आज से…
आज तो बरसात में भीगती वह लौकी
मेरी जेब से बहुत… बहुत बड़ी
नजर आती है.
दाल का सूप भी मिलेगा नहीं आज
क्योंकि श्रीमान जी !
बस बच्चों की गुल्लक ही बाकी है
और वेतन मिलने मे
पूरा सप्ताह बाकी है
पत्नी के इस उत्तर से
चकराये सिर बैठ जाता हूँ
हाय रे ! दूरदर्शन पर ...
नेताओं का सत्ता खेल ...
बस यही सोच पाता हूँ
क्या यह सण्डे है?
या फिर...
आम आदमी के सिर पर
महंगाई के डण्डे हैं

तुम्हारी पदचाप



समय की दीवार पर
पल की खिड़की से
झांकता तुम्हारा चेहरा
पुरवा के झोंको संग
होठों की कोर पर
‘स्मित का बादल’ ले आता है
घाटी में फैले
समतल खेतो की
धानी हरियाली ....
'स्नेहिल चादर'
पहाडों पर सीढ़ीदार
खेतों की हलचल,
हरियल की फुर्र के साथ
बहुधा उड़ जाती है

दशकों बाद 'कालेज कंपाउण्ड' में
'वय की चादर' ओढे....
चश्में के पीछे से झांकती
तुम्हारी आँखें देखती होंगी
बदले हुए कैम्पस में
अदृश्य पटल पर ...
‘स्मृतियों के चलचित्र’
मचलता होगा मन
चीड़ और देवदार के तनों पर ...
उंगलियों की पोरों पर ...
पाने को पुनः 'वही स्पर्श'

और मैं जानता हूँ
पहाड़ की चोटी पर
ऊपर चढ़ती पगडण्डी पर
अनगिन पगचिन्हों में
मौजूद हैं तुम्हारे पदचिन्ह

हाँ युग के साथ बदला है
... बहुत कुछ
किंतु वो बर्फीली चोटियाँ,
वो शाखें ...
और अलमस्त छांव
खुशी से झूम रही हैं
बरसते हुए बादलों के संग
क्योंकि ....
पहचानती हैं वो आज भी
चोटी के मन्दिर में
प्रतीक्षित नयनों में बसा संताप
और अपने आंगन में ...
आज तुम्हारी पदचाप

हॄदय पर हस्ताक्षर



पर्वत की ऊंची चोटी पर
गिरता पड़ता चढ़ता
श्रमसाध्य बिन्दुओं के साथ
स्वेदसिक्त माथे को नवाता हुं
परन्तु ...
पाता हूँ अपने चारो ओर
मानव निर्मित कलाकृतियां
झण्डे ढोल मृदंग मजीरे और
जय हो का अनवरत तुमुल
बस ..
तुम्हें नहीं पाता हूं
कहां हो तुम ...
आकुल ...
धू धू जलती उर ज्वाला से
बहुधा निर्वाण...
यतीमन हो जाता है
भटकता हूं समय की धारा पर
खेते हुये जीवन नैया
देखता हूं .....
साल दर साल
बाढ़ पर बाढ़
अनसुलझे सवालों की
खणडहर होती...
सभ्यताओं के किले
नदी की कगारों के साथ
ढहती मृदाभित्तियां ...
उभरते हैं ....
अनवरत सलिलधारा में
प्रतिपल कटती ऊंची कगारों से
जीवाश्मों की भांति झलकती ....
झांकती ताकती स्मॄतियों के चित्र
और मैं पह्चानने लगता हूं
यह है क्षणभंगुर जीवन में भोगा हुआ
मेरा और तुम्हारा क्षणिक ...
किन्तु अविभक्त साथ
हॄदय पर अंकित तुम्हारा हस्ताक्षर
अविभाज्य अमिट अविस्मृत
अमर और कालातीत

देश मेरा जल रहा


है ज़मीं ये जल रही
आसमाँ ये जल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आज अरि के हाथ में कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात करके मातृभू संग ये अधम धन तोलते हैं
आज उन सब के लिये न्याय का प्रतिकार दो
विंहसता है कुटिल अरि अब युद्ध में ललकार दो

नीर आँखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आग ये किसने लगाई क्यों लगाई किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में राष्ट्र के पाँडव पड़े हैं
प्रतीक्षा में कृष्ण की हम मूक जैसे क्यूँ खड़े हैं

क्यों कारगिल की राह में
सैनिक हमारा छल रहा
घर पड़ोसी का नहीं यह
देश मेरा जल रहा

अरि हमें ललकारता है मातृभू ललकारती है
महाकौशल के लिये फिर जन्म भू पुकारती है
उठो जागो सत्य सिन्धु सजीव मानस
कर गहो गाँडीव फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का हर शिरा में उबल रहा
शीष लेकर हाथ में ‘कान्त’ इस पथ चल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

निर्बंध हुआ है हर यौवन


सजनी रजनी तम चुनर ओढ़
अभिकम्पित शुभ्र ज्योत्सना से
होली आहट सुन जाग रही
चुपके चुपके से भाग रही

स्मित अधरों संग खुले नयन
सर पर नीरज द्रुम दल खिलते
अरुणिम अम्बर रंग भरा थाल
उषा बिखेरती है गुलाल

भावी सपने बिहगों के दल
नीले अम्बर में खोल पंख
बंदी पिंजर से हरिल खोल
उन्मुक्त भावना का बहाव

धानी परिधानों से सज्जित
अवनी आँचल से कनक लुटा
सजती क्षैतिज का ले दरपन
बौराई अमवा की डालें
झूमें खाकर मदमस्त भंग
यष्टि में फैलाती सुगंध

बादल निचोड़ ले मुठ्ठी से
कर डाल जलद घन से वर्षा
अम्बर तम मुख मल दे गुलाल
अंतस में स्नेह फुहार लिये
पापों की गठरी ले समेट
मन आंधी मैला कुत्सित मन
कर डाल आज होलिका दहन
चहुँओर निमंत्रण भावों का
निर्बंध हुआ है हर यौवन

समय


समय …
एक …
'पढ़ी हुई पुस्तक'
बन जाता है
होते हैं ..
जब हम निराश
ज़िन्दगी …
उड़ने लगती है
बिखरे ..
अधखुले पन्नों की तरह
समय के झोंके से
और एक कहानी,
छोड़ देती है
भावों के ऊहापोह में
आशा का सूरज…
सामाजिक रूढ़ियों में जकड़े
कैदी की तमस कोठरी में
नहीं उगता है
और तब …
‘ज़िन्दगी की किताब’
पूरी न कर
हम बन जाते हैं
एक 'दुखान्त उपन्यास’
समय
एक 'पढ़ी हुई पुस्तक'
बन जाता है
होते है जब हम निराश

स्वयं बोध


चलो नीड़ की ओर
बन्धु अब चलो नीड़ की ओर
जाने कितनी बार छला तू
छलना है चहुँ ओर
चलो नीड़ की ओर ...

नील गगन पर
विहगों के दल
विचरण करते अनगिन
भूख प्यास से
गिरि प्रवास से
व्याकुल होकर
खोजें दाना निशिदिन
मिले कहीं यदि आखेटक जो
फंस जाते चहुँ ओर
प्राण प्रिय ....
उडो नीड़ की ओर
छलना है चहुँ ओर ....

माया के तम
घिर घिर आये
अंधियारे ने पंख पसारे
उल्लू चमगादड की बानी ..
जग बोला चहुँ ओर
बन्धु तुम ..
तजो मोह की डोर
छलना है चहुँ ओर ....

तूने निज को
दांव लगाकर
जीवन में क्या पाया
तृण खोया अपने वन का सब
मूरख ही कहलाया
आग लगादे .....
उपवन में अब
हों लपटें घनघोर
अरे ! तू गहे राम की डोर
रे भैया छलना है चहुँ ओर

जिन की प्रीत के पाहन पूजे
दीपक जोत जलायी
अंधियारे में जिनके संग चल
ठोकर भी है खायी
उनके चन्दा..
आज अमावस
कहाँ किरण की भोर
बन्धु अब ...
उड़ो नीड़ की ओर
चलो नीड़ की ओर
विहग सब उड़ो नीड़ की ओर

सारे साथी जीवन बाती
जग में हैं सब झूठे
उनकी अन्तर कोर हिले ना
तू कितना ही रूठे
ऐसे में तू कब तक पंछी
उड़ता है अब और ..
छोड़ दे दूजों की डग डोर
पकड़ ले ..
निज उपवन की ठौर
छोड़ दे छलनामय रंग रौर
उड़ चले उस जीवन की ओर
जहाँ है राम राम सब ओर

चलो नीड़ की ओर
बन्धु अब चलो नीड़ की ओर
जाने कितनी बार छला तू
छलना है चहुँ ओर ....
27 Jul 1985

तुम्हारा रिश्ता



तुम्हारा रिश्ता
जैसे सूखा कुँआ ….
और उजाड़ पनघट
चिलचिलाती दोपहर में
रिसता है पल पल
शिवलिंग पर रखा घट
बस खाली होता हुआ
पार्वती की प्रतीक्षा में

पतझड़ के मौसम में
अमरबेल सा कोमल
और उलझाये कोई वृक्ष
नागफणी का फूल
और कंटक की फाँस
टिमटिमाते …
दीपक की रोशनी
और धूम धूसरित
कोई अँधेरा कक्ष

लू के थपेडों
से खिलते हैं
बांस के फूल
मन में …
छाने लगती हैं
अनजानी …
आशंकाओं की धूल

और तभी घुमड़ते हैं
अंतस में मेघ
उफनता है …
आवेग का ज्वार
झरने लगती है …
काली घटा फ़िर कोई
नयनों की कोरों से
ला देती है सैलाब

स्मृति की बिजलियाँ
कौंधती हैं बार बार
निकल पड़ता हूँ मैं …
अनजानी डगर पर
भीगता ... सीझता ...
नीले पड़ते होंठ लेकर
अपलक ...
अनंत में घुलता हुआ
बीते पलों का
छाता ढूँढता हुआ

आया बसन्त


सखी री !
देखो आया बसन्त
बौराई पुरवा को लेकर
मदमाती अँगड़ाई लेकर
तन-मन टूटे मदमस्त अंग
सखी री !
देखो आया बसन्त

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया बसन्त

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया बसन्त

क्रमशः



इच्छायें
कुण्डली ग्रस्त, सर्पो जैसी
जब फन फैलाकर
खड़ी हो जाती हैं
शान्ति का निस्सीम आकाश
आँधीग्रस्त हो उठता है
फड़फड़ा उठते हैं
सभी विचार
भयत्रस्त परिन्दों की तरह
स्मृतियों के छप्पर
उड़ने लगते हैं
उजड़े हुये नगर जैसा
अंतस्
वीरान हो उठता है
इच्छायें
कुण्डलीग्रस्त सर्पो जैसी
जब फन फैलाकर
खड़ी हो जाती हैं
शांति का निस्सीम आकाश
आँधीग्रस्त हो उठता है

पुरू



घना है कुहासा
भोर है कि साँझ
डूब गया है
सब कुछ इस तरह
तमस के जाले से
छूटने को मारे हैं
जितने हाथ पाँव
और फंस गया हूँ
बुरी तरह…
वक्त का मकड़ा
घूरता है हर पल
अपना दंश मुझमें
धंसाने से पहले

याद है मुझे
‘'पुरू' हूँ
किन्तु 'पौरूष' खो गया है
भटक रहा हूँ युगों से
तलाश में …
उस शमी वृक्ष की
टांगा था मैनें
जिस पर कभी गाँडीव

अज्ञातवास की वेदना
अंधकार में अदृश्य घाव
डूबी नही है चाह अब तक
एक नये सूरज की

उबारो …
उबारो तो मुझे
ओ ! मेरी ‘सोयी हुयी चेतना’
इस अन्धकार से
चीखता रहूँगा मैं
निस्तेज होने तक
शायद इसी आशा में
कि आओगे एक दिन ‘तुम’
जो बिछड़ ग़ये थे मुझसे
अतीत के अनजाने मोड़ पर

कौन हूं मैं …



कौन हूँ मैं …
ले उर में अथाह जलराशि
नील नभ में तैरता ...
हवा के झोंकों पर सवार
ऊपर और ऊपर …
अपने प्रस्तार से
सूरज को ढंक लेने का दंभ लिये
हर पल कोई नया रूप लिये
कोई भटकता बाद्ल ...
किन्तु वादियों में बहुधा उलझ जाता हूँ
नवयौवना की वेणी जैसा गुंथ जाता हूँ
वर्फीली पर्वत चोटियों से नीचा हो जाता हूँ
और मेरा दंभ चूर हो जाता है ...
फिर कौन हूँ मैं …

कौन हूँ मैं …
अछूती कन्या के शील सी
दूर तक पसरी हुयी रेत पर
हवा की ख़ारिशों से लिखा नाम ...
चमकता हूँ दूर तक, सबसे अलग
बेचैनी से ……
और प्रस्तार की प्रतीक्षा में
किन्तु फिर दूब उग आती है
या फिर अंधड़ तूफ़ान के आते ही
ढंक जाता है …
समाप्त हो जाता है मेरा अस्तित्व
फिर कौन हूँ मैं …

कौन हूँ मैं …
काल की अनवरत धारा पर
बनी हुयी एक आकृति …
बहती जा रही है
अपनी क्षणभंगुरता से बेख़बर …
यौवन की देहरी पर खड़ी
आसपास की सभी आकृतियों को
आकृष्ट करने में निरन्तर ….
एक निश्चित दूरी पर,
बहती हुयी धारा में जो भँवर है
वहां पहुंचते ही आकृति विलीन हो जाती है
कहीं कोई नाम नहीं …. कोई निशान नहीं
गीली रेत पर पगचिन्ह…
दोपहर होते ही मिट जाते हैं
फिर कौन हूँ मैं ….

मैं हूँ ... .... ...
शायद एक शाश्वत विचार ...
जो दिया है मैने, युग को ...
या फिर वो अमिट पल
जो जिया है मैने, मिटने से पहले

लहरों के आने तक












एक नयी खोज ने
सिद्ध कर दिया है
‘बालू’ के कणों' से निर्मित
'पिण्ड' में भी
'स्व-निर्माण प्रक्रिया' जारी है

‘समुद्र तट' पर बने 'घरौंदों' में
हो रहा है 'घरौंदों' का निर्माण
‘ज्वार भाटे' की लहरों से बेखबर,
बस घरौंदे को ही …
‘दुनियाँ’ समझने में मगन
‘बालू के पिण्ड'
करते जा रहे हैं
'असंख्य पिण्डों' की सृष्टि
बालू कहां से आयी है
बालू कहाँ से आयेगी ... ?
जारी है तमाशा
बस ….
'तूफानी लहरों' के आने तक

खोज अभी तक जारी है
उस 'द्रव्य' की
जो कर देता है प्रारम्भ…
'स्वनिर्माण प्रकिया' को
खोज अभी तक जारी है
उस 'द्रव्य' की
जो कर देता है बन्द
इसी प्रकिया को

स्वागत हे नव वर्ष !












सभी के लिए वर्ष में शान्ति
आर्थिक क्रांति बने संदेश
इस तरह हो अभिनव नववर्ष
न हो अंतस में कोई क्लेश

पादपों में तरुणाई हो
पक्षियों में फिर से कलरव
रिक्त आतंकों से युग हो
आज फिर से फैले नीरव

मुक्त हो हर भोला बचपन
सुने माँ आँचल में संगीत
गाँव में कम्प्यूटर आये
युग्म का गूँजे हर नव गीत

सभ्यता नयी नये संदेश
रहेंगे हर पल हम जागे
भिन्न बोली भाषा या वेश
बढ़ेंगे हम हर पल आगे

ईर्ष्या वैर भाव अब छोड़
एक कौटुम्ब बने हर देश
‘कान्त’ है स्वागत हे नव वर्ष!
विश्वगुरु का फैले संदेश

जीवन बाँसुरी


अरी ! बाँसुरी
ओ ! जीवन की
कितनी प्यारी लगती
अधरों से लिपटी
तू हर पल…
जीवन गुँजित करती

जलदों
से…
जीवन रस लेकर
विहगों से ले कलरव
चहक-चहक कर
वन-वन उपवन
कुसुमित कर दे हर मन

विध्वंसों
के विस्फोटों से
नीऽरव में हाय हलाहल
मानवता अब है आतंकित
त्राऽसद युग में कोलाहल

क्यों अंगार लिये फिरता है
सत्तापेक्षी मानव ….
आखेटक की कुटिल-फाँस ले
सृष्टि में बन दानव …

मधुर रागिनी राग छेड़ दे
जीवन कुंचित पल में
यौवन रस मद घुल जाता है
सरित प्रवाह सलिल में

निरावृत जीवन काया जब
मिट्टी बन जायेगी …
हो विदग्ध विरहाग्नि व्याकुल
मुरली खो जायेगी …

यौवन काया, जरा देह ..
ये मुरली से हैं लगते
मधुर स्वरों से ही गुँजित हों
श्वासों से ही बजते

कृति पीड़ा


उठ… रे...!
ओ मूर्तिकार !
जुट जा. फ़िर तलाश में
पाषाण खण्डों की
तुझे तेरा मीत मिल जायेगा
क्या हुआ … ?
जो तेरा शिल्प
तेरी गढ़ी हुयी मूर्ति
बिक गयी बाजार में
अरे ओ भोले नादान.
ये ..
यही तो है
‘आज की प्रतिष्ठा’

भूल गया तू
उस कुम्हार को
घाट पर बैठे पण्डे को
तेरी मूर्ति भी
तेरी बनायी है
पर तेरी नहीं है
भूल जा ...
उस पीड़ा को
बस जुट जा
अपने निर्माण में
कभी कोई कृति
तेरा मीत बन जायेगी
मत पाल यह भ्रम
तू मत बैठ
धरे हाथ पर हाथ

ले उठा ...
अपने चिर साथी
छेनी और हथौड़ा
चीर दे वक्ष पर्वतों का
उकेर दे कुछ
नूतन रेखायें
काल के भाल पर
लिख डाल फिर
शिलालेख ..
कोई गीत नया,
चित्र बना डाल तू
पाषाण उर पर
थाम कर ...
ले झुका काल
कालजयी रचना शक्ति से

बेड़ियां नैराश्य की
देख ...
कब की हैं टूट चुकी
लौकिक संसार से बस
देह ही तो जाती है
अमर है कवि
अजर रचना संसार है

तम की कोख सवेरा


अरी सांझ !
तू मत डरपा
मैं जानूं
तम की कोख
सवेरा उपजे
उपजेगा मैं मानूँ.

क्लान्त सभी
भयभीत पखेरू
नीड़ खोजते जाते
अस्त हुये
रवि की किरणों से
इन्द्रधनुष उपजाते

सतरंगी स्वप्नो
में आकर
आशा मुझे जगाये
तम का भय
अब शेष नहीं है
पास सवेरा आये

'नया सवेरा'
आयेगा ही
भयातीत हो मानूं
तम की कोख
सवेरा उपजे
उपजेगा मैं मानूँ.

द्वितीय सर्ग


(प्रत्येक वर्ष 4 दिसंबर आती है और मेरे हाथ वर्षों पूर्व लिखी यह कविता डायरी के पन्नों से निकल कर आ जाती है इस कविता का महत्व बस इतना ही है राष्ट्रीय संदर्भ की जिन तत्कालीन परिस्थतियों में यह लिखी गयी थी उसके मात्र 2 दिन बाद 6 दिसंबर वही सब कछ राष्ट्र में हो गया जिसकी आहट उस दिन कविता में प्रतीत हो रही थी)

…… और 'लाक्षागृह कौंसिल' का
'पाण्डवों' ने कर दिया बहिष्कार
बचाया इस तरह यह नवीन बार

कूट युध्द वोट बैंक
अपमान की सतत पीड़ा
छलना स्ववंशजों की
मात्र दुराभिमान हेतु
''एक 'अयोध्याग्राम' तक नहीं''
हो चुका है पारावार

संजय .. संजय ..
किन्तु होंठ बन्द
वाणी अवरूद्ध
देख रहा है 'संजय'
निर्निमेष नेत्रों से
'तुष्टीकरण अस्त्र' की
लपलपाती रूधिर सनी
विनाशकारी ज्वाला

क्या बोलूँ महाराज ..
सोमालिया के बुभुक्ष पिंजर
वोस्नियाँ की रक्तभरी गलियाँ
खण्डहर पड़ी मस्जिदें
वीरान मन्दिर
निरूत्तर अजान
मौन घण्टे और शंख
देख रहा हूँ 'प्रत्यक्ष'
विभाजन के उपरान्त
यह 'द्वितीय सर्ग'