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Tuesday, February 12, 2008

आया बसन्त


सखी री !
देखो आया बसन्त
बौराई पुरवा को लेकर
मदमाती अँगड़ाई लेकर
तन-मन टूटे मदमस्त अंग
सखी री !
देखो आया बसन्त

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया बसन्त

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया बसन्त

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

mehek का कहना है कि -

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
बहुत बढ़िया पंक्तियाँ है,बधाई हो

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

बहुत सुंदर |
कितना मन भवन होता है बसंत और उतना ही महकता आपकी रचना का भाव|

बड़ा romantic है|

अवनीश तिवारी

Alpana Verma का कहना है कि -

मन आनंदित करती बसंती कविता!

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

मनभावन काव्य कांत जी,

फाग के राग में
लिप्त अति अनुराग में

-बधाई..

seema gupta का कहना है कि -

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया बसन्त
" सुंदर कवीता बसंत के आगमन पर मन को उल्लासित करती "

Regards

kavi kulwant का कहना है कि -

बहुत अच्छी लगी आया बसंत...

Anonymous का कहना है कि -

क्या कहूं की बातें लिखते कुछ और
आते जरा आज गर दूषित वादियों के ठौर
खिल उठता हृदय , कहते जब दुखित हो
आया बसंत, पर ना दिख सका आमों का बौर।

anil pandey का कहना है कि -

क्या कहूं की बातें लिखते कुछ और
आते जरा आज गर दूषित वादियों के ठौर
खिल उठता हृदय , कहते जब दुखित हो
आया बसंत, पर ना दिख सका आमों का बौर।

रंजू का कहना है कि -

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया बसन्त

वसंत आगमन की सुंदर रचना है यह ..इसको पढ़ना अच्छा लगा !!

Gita pandit का कहना है कि -

वाह....

हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया बसन्त

देखो सचमुच ही आया बसन्त....

श्रीकान्त जी...
बधाई..

शोभा का कहना है कि -

श्री कान्त जी
बसंत का आगमन सच मच ही आनंद दाई है कविता सुंदर है-

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया बसन्त


आशा करती हूँ कि जीवन मैं भी बसंत आएगा। सस्नेह

"राज" का कहना है कि -

श्रिकान्त जी!!
बहुत ही बढिया लिखा है...बसन्त का बहुत ही अच्छे से आपने स्वागत किया है....बधाई हो!!!
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यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया बसन्त

RAVI KANT का कहना है कि -

वसंत का स्वागत होना ही चाहिए।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

इस कविता पर मैथिली शरण गुप्त का प्रभाव दिखता है। ११-१२वीं कक्षा में हिन्दी की पुस्तक में कुछ कविताएँ थी- जैसे-
-->रख सखी! ये खंजन आये।
-->मुझे फूल मत मारो।

वैसे शायद गुप्त का कोई कविता-संग्रह ही मौसमों के वर्णन पर है (जिसमें उर्मिला को विरह को सजाया गया है) । अवसर मिले तो आप पढ़ें।

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