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Tuesday, March 25, 2008

देश मेरा जल रहा


है ज़मीं ये जल रही
आसमाँ ये जल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आज अरि के हाथ में कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात करके मातृभू संग ये अधम धन तोलते हैं
आज उन सब के लिये न्याय का प्रतिकार दो
विंहसता है कुटिल अरि अब युद्ध में ललकार दो

नीर आँखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आग ये किसने लगाई क्यों लगाई किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में राष्ट्र के पाँडव पड़े हैं
प्रतीक्षा में कृष्ण की हम मूक जैसे क्यूँ खड़े हैं

क्यों कारगिल की राह में
सैनिक हमारा छल रहा
घर पड़ोसी का नहीं यह
देश मेरा जल रहा

अरि हमें ललकारता है मातृभू ललकारती है
महाकौशल के लिये फिर जन्म भू पुकारती है
उठो जागो सत्य सिन्धु सजीव मानस
कर गहो गाँडीव फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का हर शिरा में उबल रहा
शीष लेकर हाथ में ‘कान्त’ इस पथ चल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

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20 कविताप्रेमियों का कहना है :

अरुण का कहना है कि -

शानदार कविता जी काफ़ी समय बाद वीर रस से भरी इतनी अच्छी कविता पढी..

Bharati का कहना है कि -

.,वाह! श्रीकांत मिश्री , जवाब नही आप का बहुत सुंदर लिखा है आपने .बहुत दिनों बाद देश - भक्ति पर ऐसी सुंदर रचना पढी मैंने मजा आ गया

Bharati का कहना है कि -

राजीव रंजन जी, आप की रचना मुझे बहुत पसंद आई
बहुत ही अच्छा विषय चुना है आपने और उससे भी अच्छा आपने देश - भक्त , "भगतसिंह'' पर अपने विचार लिख कर रचना मे
चार चाँद लगा दिए हैं

धन्यवाद

मीत का कहना है कि -

कमाल है भाई ! बहुत ही अच्छी कविता. मन प्रसन्न हो गया. बधाई ....

मीनाक्षी का कहना है कि -

उठो जागो सत्य सिन्धु सजीव मानस
कर गहो गाँडीव फिर से बनो तापस
--- देशभक्ति का सन्देश देती रचना. शुभकामनाएँ

Vikas का कहना है कि -

अच्छी रचना है. कम शब्दों मे अपने काफ़ी कुछ लिख दिया.

Harihar का कहना है कि -

आज अरि के हाथ में कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात करके मातृभू संग ये अधम धन तोलते हैं
आज उन सब के लिये न्याय का प्रतिकार दो
विंहसता है कुटिल अरि अब युद्ध में ललकार दो

बहुत सुन्दर! श्रीकांतजी
देश की हालत का सही चित्र!

seema gupta का कहना है कि -

नीर आँखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा
" बहुत सुंदर देश भक्ती पर एक भावपूर्ण रचना"

सजीव सारथी का कहना है कि -

एक रक्षा अधिकारी की कलम से निकले सच्चे जज्बात...

kavi kulwant का कहना है कि -

वीर रस की सुंदर कविता

anju का कहना है कि -

घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा
क्या खूब कहा श्री कान्त जी आपने
वास्तव में देश को जागने की जरोरत है इस वक्त
उन्हें यह सब बताने की... भूल गए है लोग
आपकी यह कविता लोगों तक पहुंचे ताकि लोग देश को जलने से बचा सके
जय हिंद
अंजू गर्ग

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

श्रीकांत जी,

कर शब्द चुन-चुन कर प्रयुक्त हुआ तथा ओजस्वी है। इस रस की रचना में जो प्रवाह बन पडा है वह विलक्षण है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

बड़ा योज और तेज लिए है रचना |

अवनीश तिवारी

रंजू का कहना है कि -

अरि हमें ललकारता है मातृभू ललकारती है
महाकौशल के लिये फिर जन्म भू पुकारती है
उठो जागो सत्य सिन्धु सजीव मानस
कर गहो गाँडीव फिर से बनो तापस

बहुत जोश से भरी और अच्छी रचना लगी श्रीकांत जी !!

Rama का कहना है कि -

डा. रमा द्विवेदीsaid...

सुन्दर भाव, कुशल शब्द संयोजन और ओज से परिपूर्ण आपकी कविता बहुत अच्छी लगी....साधुवाद स्वीकारें....

RAVI KANT का कहना है कि -

कान्त जी, अच्छी रचना। आपकी राष्ट्र-चेतना वंदनीय है। शब्दों का सटीक प्रयोग। हाँ एक प्रश्न है मन में-
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

इससे आपका क्या मंतव्य है? क्योंकि पड़ोसी का घर जलना भी उतना ही दुःखदायी है।

tanha kavi का कहना है कि -

प्रशंसनीय रचना है, जोश-खरोश एवं होश से भरपूर। बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

seema sachdeva का कहना है कि -

sachch kaha aapne apanaa hi desh jal rahaa hai ,aur ham hi tamaashaa dekh rahe hai...seema

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

बन्धु रविकांत पाण्डेय जी !

आपकी बात से मैं पुरी तरह सहमत हूँ कि घर किसी का भी जले परन्तु अंततः विनाश सभी का होता ही है इसलिए इस विचार से पड़ोसी का घर सदैव हमारे लिए उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए जितना कि हमारा स्वयम का. किंतु इस रचना में मैंने पड़ोसी शब्द का प्रतीकार्थ जिस सन्दर्भ में लिया है वह सर्वविदित है और स्वयम कि सुरक्षा बिना किसी का अहित चिंतन किये प्रत्येक का कर्तव्य और उत्तरदायित्व भी है.

दूसरी बात पड़ोसी यदि पड़ोसी के धर्म का मर्म जनता और मानता है तो ..... और उसके विपरीत आचरण करने वाले पड़ोसी के लिए ही 'पड़ोसी का घर' एक मुहावरे के रूप में भी प्रयुक्त होता है.

वस्तुतः आप सब को यह रचना अच्छी लगी इसके लिये सभी मित्रों का धन्यवाद

बरबाद देहलवी का कहना है कि -

वाह! श्रीकांत जी सुन्दर भाव, कुशल शब्द संयोजन, ओजपूर्ण रचना के लिये मुबारकबाद

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