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दु:ख के सब रास्ते एक से ही होते होंगे


हिन्द-युग्म ने विगत वर्ष से अपना प्रकाशन आरम्भ किया है। अब तक 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन पुस्तकों में से भी कुछ चुनिंदा रचनाओं को अपने पाठकों के समक्ष रखने का हमने निश्चय किया है। आज हम इस शृंखला की शुरूआत मनीष मिश्र के कविता संग्रह 'शोर के पड़ोस में चुप-सी नदी' से कर रहे हैं। हिन्द-युग्म पर प्रकाशित मनीष मिश्र की सभी कविताएँ भी इस संग्रह में संग्रहित हैं।

प्रेम में समय

प्रेम में बीत जाता है समय
समय के साथ धीरे-धीरे बीतता है प्रेम।

बीतता हुआ प्रेम
चुनना चाहता है
तेजी से सरकते कालखंड में ठिठके स्पर्श
स्मृतियों के धुँधले पड़ रहे पोर्ट्रेट
अंतर्मन में कौंधते फ्लैश बैक।

प्रेम के क्षणों में तेजी से फिसलता है समय
समय के साथ हाथों से फिसल जाता है प्रेम।


आज हम

आज हम ओढ़ लेंगे
बातों की चादर को
सिंवइयों जैसी
छोटी-छोटी साँसों के साथ।

आज हम जायेंगे
नदी के किनारे नहीं
तो साँसों के झुरमुट में
एकांत पहाड़ों में नहीं
तो देह के अकेलेपन में।

आज हम बुनेंगे
स्वेटर के साथ सर्दियाँ
स्नेह को छोटे-छोटे फन्दों में उलझाये।

आज हम सोचेंगे
बचपन के अधपके दिन
अनाम प्रेम कथाएँ
छोटे-छोटे गरीब सपने
और बहुत मुलायम सुख।

आज हम कुछ नहीं कहेंगे
फेंक देंगे नदी में शब्दों का ढेर
उतार फेंकेंगे भाषा की केंचुल
और बैठ जायेंगे चुप के नीचे।


दु:ख के रास्ते

दु:ख के सब रास्ते एक से ही होते होंगे
उन पर नहीं पड़ती होगी वृक्षों की दोस्त-छाया
नहीं पड़ता होगा सडक़ों के पड़ोस में किसी पुराने मित्र का नया मकान
नहीं होती होगी कोने में दुबकी उधार देने वाली कृपालु गुमटी
नहीं आता होगा उस रास्ते बृहस्पति को उपवास रखवाने वाले देवता का मंदिर

वहा आ कर सुस्ताती होगी-
रोजमर्रा से झींक कर आई जिंदगी
वहाँ गप्पे लगते होंगे-
दुनिया भर से धकियाये हुए जवान सपने
वहा टहलते होंगे-
अपनी ही दुनिया से ख़ारिज हो चुके स्मृतिजीवी बुजुर्ग

दु:ख के रास्तों का भूगोल सीधा मगर कठिन होता होगा इतिहास
दु:ख के रास्तों पर फलते-फूलते होंगे भटकटैया
दु:ख के रास्ते पड़ते होंगे निर्जर वनप्रांतर, पुराने जीर्ण शैव मंदिर
और रास्ता भटक आये प्रेमी युगल

दु:ख के रास्ते जहाँ से गुजरते होंगे
उनके रास्ते आते होंगे मंदिर, मस्जिद और गुरद्वारे
लेकिन उनके रास्ते में कभी नहीं आते होंगे
विद्यालय, पुस्तकालय और विचार के धधकते प्रायद्वीप।


शोर के पड़ोस में चुप सी नदी
कविता-संग्रह । कवि- मनीष मिश्र


ISBN- 978-81-909767-1-8
प्रकाशन वर्ष- 2010
प्रकार- हार्डबाइंड (सजिल्द)
विधा- कविता
लेखक- मनीष मिश्र
पृष्ठ- 76
मूल्य- रु 100

संग्रह से हिन्द-युग्म पर प्रकाशित कविताएँ-
1. उम्र का चालीसवाँ वसंत
2. उम्र का पचासवाँ वर्ष
3. किताबें
4. कविताएँ
5. सब कुछ नहीं होता समाप्त
6. बेटी-1
7. बेटी-2
8. तुम
9. प्रेम में समय
10. आज हम
11. ऐसे गुजारता हूँ दिन
12. कठिन समय में
13. दुःख के रास्ते
14. हमें चाहिए खिलखिलाहटों की दो चार जड़ें

गवाक्ष में इस बार अनामिका, धूमिल और राजेश तिवारी


मित्रो ,
नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएँ। मैं आशा करता हूँ कि इस वर्ष आप हिंद युग्म पर ढेरों अच्छी कविताएँ पढ़ पाएंगे। इस बार गवाक्ष में तीन कवियों की कविताएँ हैं। अनामिका स्त्री विमर्श में एक जाना माना नाम हैं। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं- गलत पते की चिट्ठी (कविता), बीजाक्षर (कविता), अनुष्टुप (कविता), अब भी वसंत को तुम्हारी जरूरत है (कविता)(2004), दूब-धान (कविता)(2007)। दूसरे हैं धूमिल जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है संसद से सड़क तक और सुदामा पाण्डेय का प्रजातंत्र इनकी चर्चित पुस्तके हैं। राकेश तिवारी एकदम नए कवि हैं, नए कलेवर के साथ। 'माँ' इनकी एक ऐसी कविता है जो पुराने बिम्ब तोड़ती है और एक नया शिल्प रचती है।

नए साल में आपसे मुलाकात होगी कविता की नयी जमीन पर। आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए साहस का कार्य करेगी।

--मनीष मिश्र



मौसिया

वे बारिश में धूप की तरह आती हैं–
थोड़े समय के लिए और अचानक
हाथ के बुने स्वेटर, इंद्रधनुष, तिल के लड्डू
और सधोर की साड़ी लेकर
वे आती हैं झूला झुलाने
पहली मितली की ख़बर पाकर
और गर्भ सहलाकर
लेती हैं अन्तरिम रपट
गृहचक्र, बिस्तर और खुदरा उदासियों की।

झाड़ती हैं जाले, संभालती हैं बक्से
मेहनत से सुलझाती हैं भीतर तक उलझे बाल
कर देती हैं चोटी-पाटी
और डाँटती भी जाती हैं कि री पगली तू
किस धुन में रहती है
कि बालों की गाँठें भी तुझसे
ठीक से निकलती नहीं।

बालों के बहाने
वे गाँठें सुलझाती हैं जीवन की
करती हैं परिहास, सुनाती हैं किस्से
और फिर हँसती-हँसाती
दबी-सधी आवाज़ में बताती जाती हैं–
चटनी-अचार-मूंगबड़ियाँ और बेस्वाद संबंध
चटपटा बनाने के गुप्त मसाले और नुस्खे–
सारी उन तकलीफ़ों के जिन पर
ध्यान भी नहीं जाता औरों का।

आँखों के नीचे धीरे-धीरे
जिसके पसर जाते हैं साये
और गर्भ से रिसते हैं महीनों चुपचाप–
ख़ून के आँसू-से
चालीस के आसपास के अकेलेपन के उन
काले-कत्थई चकत्तों का
मौसियों के वैद्यक में
एक ही इलाज है–
हँसी और कालीपूजा
और पूरे मोहल्ले की अम्मागिरी।

बीसवीं शती की कूड़ागाड़ी
लेती गई खेत से कोड़कर अपने
जीवन की कुछ ज़रूरी चीजें–
जैसे मौसीपन, बुआपन, चाचीपंथी,
अम्मागिरी मग्न सारे भुवन की।

------अनामिका



धूमिल की चमचमाती कविताएँ

जब सडको में होता हूँ
बहसों में होता हूँ
रह रह चहकता हूँ

लेकिन हर बार वापस घर लौट कर
कमरे के अपने एकांत में
जूते से निकाले गए पावँ सा
महकता हूँ!
-----------------------------------------
क्या आजादी सिर्फ
तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिसे एक पहिया ढोता है
या इसका कोई ख़ास मतलब होता है!
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हम अपने सम्बन्धो में
इस तरह पिट चुके है
जैसे एक गलत मात्रा ने
शब्द को पीट दिया!
------------------------------------
घनी आबादी वाली
बस्तियों में
मकान की तलाश है
प्रेम।

धूमिल


माँ

घोसले में आई चिड़िया से
पूछा चूजो ने
माँ आकाश कितना बड़ा है ?
चूजो को अपने पंखो से ढकती
बोली चिड़िया
सो जाओ -इन पंखो से बड़ा नहीं है।

राजेश तिवारी

नई कविता में जाने का नया 'गवाक्ष'


पहली कड़ी

मित्रो,

आज से हम कविता का एक मासिक स्तम्भ शुरू कर रहे हैं 'गवाक्ष'। मनीष मिश्र की कविताओं से हमारे पाठक खूब अच्छी तरह परिचित हैं। मनीष मिश्र जी का मंतव्य है कि इंटरनेट के पाठकों को यह बताना बहुत ज़रूरी है कि समकालीन कविता की छोटी-छोटी पगडंडियाँ कहाँ-कहाँ से निकलती हैं और किधर-किधर को जाती हैं। इसलिए उन पगडंडियों को देखने, उसपर चल कर आ रहीं अपने समय की महान कविताओं की प्रतीक्षा करने के लिए अपने घर में एक खिड़की चाहिए। उसी खिड़की को मनीष ने तैयार किया है। इसके तहत मनीष अपने पसंद की उन नई कविताओं के बारे में बात करेंगे, जिनकी चर्चा वे ज़रूरी समझते हैं। उन्हीं के शब्दों में-

हम पाठकों को नयी कविता का सलोना चेहरा दिखाएँ। ऐसी कवितायें जो संवेदना के लथपथ विन्यास में उगती हैं। अपने शिल्प और कथ्य में कसी ऐसी कवितायें जो पढ़े जाने के बाद आपके सामने एक शून्य परोस देती हैं। केदारनाथ सिंह ने लिखा भी है-
"कविता यही करती है
यही सीधा मगर जोखिम भरा काम
कि सारे शब्दों के बाद भी आदमी के पास
हमेशा बचा रहे एक सादा पन्ना"


हिंद-युग्म कविता के इस सलोने चेहरे को ले कर हर माह आपके पास आएगा- गवाक्ष के नाम से। इसमें पुराने और नए कवियों की प्रकाशित कुछ बेहद ओजपूर्ण कवितायें प्रकाशित की जाएँगी। इन कविताओं पर आप पाठकों की
प्रतिक्रियायें अपेक्षित रहेंगी। तो चलिए शुरू करते हैं गवाक्ष की पहली कड़ी।

1. मैं सोचता रहा
और दूर चला आया
मैं दूर चला आया और सोचता रहा
तुम सोचती रही और दूर चली गयी
तुम दूर चली गयी और सोचती रही

इस तरह हमने दूरिया तय की।

--मंगलेश डबराल

2. ये सिर्फ किवाड़ नहीं हैं
जब ये हिलते हैं
माँ हिल जाती है
और चौकस आँखों से देखती है क्या हुआ।

मोटी साँकल की चार कड़ियों में
एक पूरी उम्र और स्मृतियाँ बँधी हुई हैं
जब साँकल बजती है
बहुत कुछ बज जाता है घर में।

इन किवाड़ों पर
चंदा सूरज और नाग देवता बने हुए हैं
एक विश्वास और सुरक्षा खुदी हुई है इन पर
इन्हें देख कर हमें पिता की याद आती है।

भैय्या जब इन्हें बदलवाने को कहते हैं
माँ दहल जाती है
और कई रातों तक
पिता उसके सपनो में आते हैं।

ये पुराने हैं
लेकिन कमजोर नहीं
इनके दोलन में एक वजनदारी है

ये जब खुलते हैं
एक पूरी दुनिया हमारी तरफ खुलती है
जब ये नहीं होंगे
घर-घर नहीं होगा।

--कुमार अम्बुज

3. किसी काम का नहीं इनका हरापन
मवेशी भी नहीं खाते इन्हें
पावँ रोपने की जगह नहीं जड़ों में
फलियों में जुगाड़ नहीं एक जून का
ये बीहड़ हैं
और बीहड़ों के बाड़ नहीं होते।

कुदाल होने से लोहा डरता है
बेट होने से लकड़ी
आग नहीं चढ़ती उनकी चमड़ी पर
उखाड़ फेको तो कफ़न पर फैलते हैं कमबख्त।

दो फसलों के बीच का परती समय है यह
खेत की चमड़ी चबाते कंधों तक चढ़ आये हैं बेहया
आँधियों की सरहद पर खड़े हैं पेड़
आसमान की और सर उठाये खड़ी हैं नीलगायों की पात
और उनकी खुरों की मिट्टी में
किसी नवजात को
जन्म देने के लिए ऐंठ रही है पृथ्वी की कोख।

--निलय उपाध्याय

4. उसने कहा
उसके पास छोटा सा हृदय है
जैसे धूप कहे उसके पास थोड़ी सी रौशनी
आग कहे उसके पास थोड़ी सी गर्माहट

धूप नहीं कहती उसके पास अन्तरिक्ष है
आग नहीं कहती उसके पास लपटें
वह नहीं कहती उसके पास देह।

--अशोक बाजपाई

5. उसके हाथ की गुनगुनी धुप
उसके हाथ का झिझकता अँधेरा
उसके हाथ फूलों की तरह
ओस भीगे और शांत
उसके हाथ पक्षियों की तरह
भाग जाने को विकल
उसके हाथ अकेले
उसके हाथ डूबे हुए स्वप्न में
उसके हाथ करते हैं प्रतीक्षा
हाथों की।

--अशोक बाजपाई

हमें चाहिए खिलखिलाहटों की दो चार जड़ें


वर्षों से हमारी देह में उग रहा है मौन
जंगली खुभिंयो सा।
हमारे पास-
कुछ रूई सी मुलायम स्मृतियां हैं
और चिनार सी लम्बी यादें
कुछ प्रार्थनाएं है हमारे पास
और कुछ गीत भी।

हमें चाहिए-
प्यार करने के लिए
सताई हुई दो निर्दोष आँखें,
खिलखिलाहटों की दो चार जड़ें
जो उग सके हमारे मौन में।
और-
माँ की जैसी स्नेहिल उंगलियां
जो उभार सकें
हमारे बचपन के हरे-हरे गीत।

हमें नहीं चाहिए-
बरगद जितने बड़े सुख,
समुद्र की ओर खुलने वाली खिड़की,
और-
सड़कों से भी लम्बी उम्र।

हमें बस-
जरूरत है दो परों की
जिन्हें पहना सकें हम
सहेज कर रखे हुए सपनों को
और-
कुछ तीखी कविताओं की,
जिन्हें सुलगा सके हम
धीमी-सी आँच में।

कवि- मनीष मिश्र

छोटे-छोटे कौतुहल समेटे बेटी की आँखें बड़ी हो जाती हैं


मनीष मिश्र की हिन्द-युग्म पर प्रकाशित कविताएँ जल्द ही इनके संकलन 'शहर के पडो़स में चुप सी नदी' का हिस्सा होकर बाज़ार में उपलब्ध होने वाली हैं। तब तक उसी संग्रह से एक-एक करके हम इनकी कविताओं का रसास्वादन कराते रहेंगे।

बेटी-1

बड़ी होती बेटी के साथ
छोटा पड़ता जाता है समय
छोटा होता जाता है घर।

उसके छोटे-छोटे हाथों से फिसलकर
बड़ी होती जाती है जिन्दगी।

बड़ी हो जाती है उसकी आँखें
छोटे-छोटे कौतुहल समेटे।

बेटी-2

मेरी बेटी
जमा करती है आवाजें
और बनाती है
एक तुतलाता, लड़खड़ाता सा शब्द।

शब्द देर तक भटकता है
अर्थ की बेमानी तलाश में
और फिर बिखर जाता है
आवाज में।

मनीष मिश्र

उम्र का पचासवाँ वर्ष


आज से लगभग 1 वर्ष पहले हमने लखनऊ के मनीष मिश्रा को यूनिकवि चुना था और इनकी कविता 'उम्र के चालीसवें बसंत' में प्रकाशित की थी। आज हम इनकी एक कविता 'उम्र के पचासवाँ वर्ष' प्रकाशित कर रहे हैं।

उम्र का पचासवाँ वर्ष

उम्र का पचासवाँ वसंत आता है अचानक
और साथ लाता है-
घुटनों में हल्का सा दर्द
बालों में मुट्ठी भर चाँदी
आँखों में धुँधले से बादल
और कमर की बेल्ट में एक और काज।

उम्र का पचासवाँ पड़ाव
चुपचाप लाता है
जीतने की अदम्य चाहत
हारने का लरजता आक्रोश
अनुभवी की सम्हाल कर रखी कतरनें
और अधेड़ लालसायें।

उम्र के पचासवें वसंत में
दूर खड़ा दिखता है बचपन
धुँधली सी मगर दिखती है अपनी मृत्यू।

बस बचा रह जाता है
बीत गये क्षणों का अफसोस
और अपने होने का अचरज।

कवि- मनीष मिश्रा

ऐसे गुजारता हूँ एक दिन


सबसे पहले पीता हूँ
एक प्याली मीठी सुबह
ताजे अखबार की गंध के पड़ोस में।

फिर गाँठता हूँ दोपहर की सवारी
पहुँचने के लिए दफ्तर।

जब परिंदे लौटते है नीड़ को
मैं ओढ़ता हूँ शाम की जर्द सी शाल
लौटने के लिए घर।

जब थकान करती है अन्तिम प्रहार
तब बिछाता हूँ रात का साँवला-सा बिछौना
और लगाता हूँ नींद का गावद तकिया ।

ऐसे गुजारता हूँ एक दिन ।

--मनीष मिश्रा

सब कुछ नहीं होता समाप्त


सब कुछ थोड़े ही सूख जाता है
बच ही जाती है स्मृति की नन्ही बूंद
मिल ही जाता है प्रिय का लगभग खो गया पता
अलगनी में सूखते हुए कपड़ों पर बच ही जाती है
देह गंध की नम आँच
पायंचे के घुटनों पर रेंग ही आती है मुलायमियत

सब कुछ थोड़े ही ख़त्म हो जाता है
मृत्यु के बाद भी बचे रहते है अस्थि फूल
सूखे जलाशय के तलछट में जीवित रहती है एक अकेली मछली
विशाल मरुस्थल की छाती पर सूरज के खिलाफ
लहराता है खेजरी का पेड़

सब कुछ नहीं होता समाप्त
हमारे बाद भी बचा रहता है जीने का घमासान
भूख के बावजूद बच ही जाते है थाली में अन्न के टुकड़े
निकल ही आता है पुराने संदूक से जीर्ण होता प्रेम पत्र
सबसे हारे क्षणों में मिल ही जाता है दोस्त ठिकाना .

सब कुछ थोड़े ही मिट पाता है
उम्र के बावजूद भी बचे रहते है देह पर प्रेम निशान
जीवन के सबसे मोहक क्षणों में भी चिपका रहता है बीत जाने का भय

सब कुछ नहीं होता समाप्त।

कवयिता- मनीष मिश्र

यूनिकवि की दो छोटी कवितायें


आज सोमवार है और यूनिकवि की कविता का भी दिन है। इसलिये हम यहाँ डॉ॰ मनीष मिश्रा की दो कवितायें प्रकाशित कर रहे हैं।



तुम

मैं देखता हूँ तुम्हारे हाथ
चटख नीली नसों से भरे
और
उंगलियों में भरी हुई उड़ान
मैं सोचता हूँ
तुम्हारी अनवरत देह की सफ़ेद धूप
और उसकी गर्म आंचश
मैं जीत्ताता हूँ तुमको
तुम्हारे व्याकरण और
नारीत्व की शर्तो के साथ
मैं हारता हूँ
एक पूरी उम्र
तुम्हारे एवज में!



कठिन समय में

हमें कठिन क्षणों में भी गुनगुनाना चाहिए अपना मौन
बुननी चाहिए उधड़ते हुए रिश्तो की सीवन
लिखनी चाहिए प्रेम कविताये
निहारना चाहिए चाँद के आलोक में लिप्त आकाश
रखना चाहिए एक स्मृति फूल किताब के भीतर
और लौटना चाहिए पुराने दोस्त दिनों में
हमें कठिन समय में भी
अपने आदि मंत्र की तरह
सहेजकर रखनी चाहिए
बची खुची
जीवन क्र प्रति अपनी
कोमल जिजीविषा!

कविताएँ और किताबें


पिछले सप्ताह अक्टूबर माह के यूनिकवि की दूसरी कविता पर अनामी जी की प्रतिक्रिया से हमें पता चला कि विजय कुमार सप्पत्ती की वह कविता ऊनके ब्लॉग पर पहले से ही प्रकाशित है। इसके बाद जब हमने उनके ब्लॉग को खँगाला तो पाया कि प्रथम स्थान की कविता भी उनके ब्लॉग पर प्रकाशित है। उनके ब्लॉग के अतिरिक्त और बहुत सी जगहों पर भी प्रकाशित है। इसलिए शर्तानुसार हम यह विजय कुमार सप्पत्ती को दिया जाने वाले पुरस्कार और सम्मान को हम रद्द करते हैं और द्वितीय स्थान के कवि डॉ॰ मनीष मिश्रा को अक्टूबर माह का यूनिकवि घोषित करते हैं। विजय कुमार सप्पत्ती का आग्रह है कि उनकी कविताएँ हटाई न जायें, तो हम नहीं हटा रहे हैं। हम इन्हें गलती के उदाहरण के तौर पर भी संजोकर रखना चाह रहे हैं। आज चूँकि सोमवार है, और आज वर्तमान यूनिकवि का वार होता है, अतः डॉ॰ मनीष मिश्रा की कविताएँ आपके समक्ष प्रस्तुत हैं।


कवितायें

डायरी के फाड़ दिए गए पन्नों में भी
साँस ले रही होती हैं अधबनी कवितायें
फड़फड़ाते हैं कई शब्द और उपमायें!
विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ
सूख नहीं पाते सारे जलाशय
शब्दों और प्रेम के बावजूद
बन नहीं पाती सारी कवितायें!
डायरी के फटे पन्नों में
प्रतीक्षा करती है कवितायें
संज्ञा की, प्रतीक की, विशेषण की नहीं
दुःख की उस जमीन की
जिस पर वो अक्सर पनपती हैं!


किताबें

हमारे सूखे दरकते जीवनकाश को
गीला भीगा करती हैं किताबें
वे संजोती हैं इतिहास की सूख गई बेल
सुंदर उपमायें और
अंतहीन सपनों के प्रायदीप!
वे चुनती बटोरती हैं
आदि मंत्रो के स्वर विन्यास
और हरीतिमा में भीगी रागिनी!
एक ऐसे समय में
जब सूख चुकी है हस्तलिपियाँ
और संवेदनायें
रंगों गंधों की सूक्ष्म विवेचनायें!
ऐसे हाँफते, काँपते समय में
किताबे हमें
फिर-फिर लौटाती हैं
जोड़ती-गाँठती हैं
बिसरा दिए गए अक्षरों से
लिपि से
भाषा से
एक अदभुत जीवन से!

उम्र के चालीसवें वसंत में


हम अक्टूबर माह की यूनिकवि प्रतियोगिता से जो दूसरी कविता प्रकाशित कर रहे हैं, उसके कवि डॉ॰ मनीष मिश्रा केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ ने जैवप्रोद्यौगिकी प्रयोगशाला में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं। इनकी कविताएँ विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं सहित ज्ञानपीठ (समकालीन भारतीय साहित्य) में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक काव्य-संग्रह 'हमें चाहिए खिलखिलाहटों की दो-चार जड़ें' प्रकाशित हो चुका है और 'शहर के पड़ोस में दुबली सी नदी रहती है' प्रकाशन-पथ पर है।

पुरस्कृत कविता- उम्र के चालीसवे वसंत में

उम्र के चालीसवें वसंत में-
गिरती है समय की धूप और धूल
फ़र-फ़र करती झरती हैं तरुण कामनायें
थोड़े और घने हो जाते है मौन के प्रायः दीप
फिर, फिर खोजता है मन सताए हुए क्षणों में सुख!

उम्र के चालीसवें वसंत में-
छातों और परिभाषाओं के बगैर भी गुजरता है दिन
सपने और नींद के बावजूद बीतती है रात
नैराश्य के अन्तिम अरण्य के पार भी होता है सवेरा
जीवन के घने पड़ोस में भी दुबकी रहती है अनुपस्थिति!

उम्र के चालीसवें वसंत में-
स्थगित हो जाता है समय
खारिज हो जाती है उम्र
बीतना हो जाता है बेमानी!



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ६॰२५, ५, ६॰५, ५॰२
औसत अंक- ५॰७३७५
स्थान- आठवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ६॰५, ६, ५॰७३७५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰०८
स्थान- दूसरा


पुरस्कार- कवयित्री पूर्णिमा वर्मन की काव्य-पुस्तक 'वक़्त के साथ' की एक प्रति।