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Friday, December 04, 2009

नई कविता में जाने का नया 'गवाक्ष'


पहली कड़ी

मित्रो,

आज से हम कविता का एक मासिक स्तम्भ शुरू कर रहे हैं 'गवाक्ष'। मनीष मिश्र की कविताओं से हमारे पाठक खूब अच्छी तरह परिचित हैं। मनीष मिश्र जी का मंतव्य है कि इंटरनेट के पाठकों को यह बताना बहुत ज़रूरी है कि समकालीन कविता की छोटी-छोटी पगडंडियाँ कहाँ-कहाँ से निकलती हैं और किधर-किधर को जाती हैं। इसलिए उन पगडंडियों को देखने, उसपर चल कर आ रहीं अपने समय की महान कविताओं की प्रतीक्षा करने के लिए अपने घर में एक खिड़की चाहिए। उसी खिड़की को मनीष ने तैयार किया है। इसके तहत मनीष अपने पसंद की उन नई कविताओं के बारे में बात करेंगे, जिनकी चर्चा वे ज़रूरी समझते हैं। उन्हीं के शब्दों में-

हम पाठकों को नयी कविता का सलोना चेहरा दिखाएँ। ऐसी कवितायें जो संवेदना के लथपथ विन्यास में उगती हैं। अपने शिल्प और कथ्य में कसी ऐसी कवितायें जो पढ़े जाने के बाद आपके सामने एक शून्य परोस देती हैं। केदारनाथ सिंह ने लिखा भी है-
"कविता यही करती है
यही सीधा मगर जोखिम भरा काम
कि सारे शब्दों के बाद भी आदमी के पास
हमेशा बचा रहे एक सादा पन्ना"


हिंद-युग्म कविता के इस सलोने चेहरे को ले कर हर माह आपके पास आएगा- गवाक्ष के नाम से। इसमें पुराने और नए कवियों की प्रकाशित कुछ बेहद ओजपूर्ण कवितायें प्रकाशित की जाएँगी। इन कविताओं पर आप पाठकों की
प्रतिक्रियायें अपेक्षित रहेंगी। तो चलिए शुरू करते हैं गवाक्ष की पहली कड़ी।

1. मैं सोचता रहा
और दूर चला आया
मैं दूर चला आया और सोचता रहा
तुम सोचती रही और दूर चली गयी
तुम दूर चली गयी और सोचती रही

इस तरह हमने दूरिया तय की।

--मंगलेश डबराल

2. ये सिर्फ किवाड़ नहीं हैं
जब ये हिलते हैं
माँ हिल जाती है
और चौकस आँखों से देखती है क्या हुआ।

मोटी साँकल की चार कड़ियों में
एक पूरी उम्र और स्मृतियाँ बँधी हुई हैं
जब साँकल बजती है
बहुत कुछ बज जाता है घर में।

इन किवाड़ों पर
चंदा सूरज और नाग देवता बने हुए हैं
एक विश्वास और सुरक्षा खुदी हुई है इन पर
इन्हें देख कर हमें पिता की याद आती है।

भैय्या जब इन्हें बदलवाने को कहते हैं
माँ दहल जाती है
और कई रातों तक
पिता उसके सपनो में आते हैं।

ये पुराने हैं
लेकिन कमजोर नहीं
इनके दोलन में एक वजनदारी है

ये जब खुलते हैं
एक पूरी दुनिया हमारी तरफ खुलती है
जब ये नहीं होंगे
घर-घर नहीं होगा।

--कुमार अम्बुज

3. किसी काम का नहीं इनका हरापन
मवेशी भी नहीं खाते इन्हें
पावँ रोपने की जगह नहीं जड़ों में
फलियों में जुगाड़ नहीं एक जून का
ये बीहड़ हैं
और बीहड़ों के बाड़ नहीं होते।

कुदाल होने से लोहा डरता है
बेट होने से लकड़ी
आग नहीं चढ़ती उनकी चमड़ी पर
उखाड़ फेको तो कफ़न पर फैलते हैं कमबख्त।

दो फसलों के बीच का परती समय है यह
खेत की चमड़ी चबाते कंधों तक चढ़ आये हैं बेहया
आँधियों की सरहद पर खड़े हैं पेड़
आसमान की और सर उठाये खड़ी हैं नीलगायों की पात
और उनकी खुरों की मिट्टी में
किसी नवजात को
जन्म देने के लिए ऐंठ रही है पृथ्वी की कोख।

--निलय उपाध्याय

4. उसने कहा
उसके पास छोटा सा हृदय है
जैसे धूप कहे उसके पास थोड़ी सी रौशनी
आग कहे उसके पास थोड़ी सी गर्माहट

धूप नहीं कहती उसके पास अन्तरिक्ष है
आग नहीं कहती उसके पास लपटें
वह नहीं कहती उसके पास देह।

--अशोक बाजपाई

5. उसके हाथ की गुनगुनी धुप
उसके हाथ का झिझकता अँधेरा
उसके हाथ फूलों की तरह
ओस भीगे और शांत
उसके हाथ पक्षियों की तरह
भाग जाने को विकल
उसके हाथ अकेले
उसके हाथ डूबे हुए स्वप्न में
उसके हाथ करते हैं प्रतीक्षा
हाथों की।

--अशोक बाजपाई

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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

निर्मला कपिला का कहना है कि -

सभी रचनायें गहरे तक दिल को छूती हैं सभी लेखकों को बधाई और आपका धन्यवाद आपका ये प्रयास सराहनीय है

विपुल का कहना है कि -

वाह मनीष जी ... मज़ा आ गया. बहुत बहुत बधाइयाँ आपको इस सार्थक प्रयास के लिए|

Sumita का कहना है कि -

भैय्या जब इन्हें बदलवाने को कहते हैं
माँ दहल जाती है
आज भी होता तो यूं ही है..मां पुरानी यादों को सहेजे जाती है और हम जरा भी वक्त नहीं लगाते उन्हें बदल मार्ड्न युग को गले लगाते...कितनी प्यारी भावना प्रधान सभी रचनाएं हैं...मनीष जी बहुत-बहुत बधाई ! और एक नयी शुरुवात के लिए शुभकामनाएं १

राकेश कौशिक का कहना है कि -

हिंदी युग्म और मनीष जी के सलोने चेहरे 'गवाक्ष' का हार्दिक स्वागत.
मंगलेश डबराल - इस तरह हमने दूरिया तय की।
कुमार अम्बुज - जब ये नहीं होंगे, घर-घर नहीं होगा।
निलय उपाध्याय - ये बीहड़ हैं और बीहड़ों के बाड़ नहीं होते।
अशोक बाजपाई - (1) वह नहीं कहती उसके पास देह।
(2) उसके हाथ करते हैं प्रतीक्षा हाथों की।
केदारनाथ सिंह जी ने जो लिखा, कवियों ने वही किया है. सभी हस्तियों और उनकी कविताओं को मेरा सलाम. हिंदी युग्म और मनीष जी का आभार और शुभकामनाएं.

Apoorv का कहना है कि -

सच कहूँ तो काफ़ी वक्त से ऐसी ही किसी चीज को मिस कर रहा था हिंद-युग्म पे..अब जब आपने रख दी तो समझ आया कि क्या और कमी खटक रही थी और कितनी शिद्दत से..मनीष जी आप को अंदाजा भी नही होगा कि यह नया स्तंभ देख कर कितनी खुशी मिली मुझे..आपकी तारीफ़ के लिये शब्द कम पड़ जायेंगे मेरी डिक्शनरी मे...
आप जैसे साहित्यविज्ञों की उपस्थिति से हिंदयुग्म का भविष्य उज्जवल लग रहा है मुझे..
आभार

Safarchand का कहना है कि -

Manish ji ke satha Hind Yugm ka upkaar hai ye 'gavaksh'...kya chunav hai..wah..ab se hind yYugm ki sari kavitaaon ko save karne ke bajaye GAVAKSH ki kavitayein hi save karoonga...baki kuch meri apni chuni hui....
dhayawaad....Jai ho Hind-Yugggm aur Dhanya ho Manish

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

मनीष जी की कविताएँ और मनीष जी हिन्दयुग्म के पाठकों के लिए अंजान नही है ..भावनात्मक और बेहतरीन प्रस्तुति बीच बीच में आकर हमे लुभाती रहती है..

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

गवाक्ष की पहली कड़ी ही अच्छी लगी आगे के कड़ियों का इंतज़ार भी यहीं से बढ़ गया ..

मैं सोचता रहा
और दूर चला आया
मैं दूर चला आया और सोचता रहा
तुम सोचती रही और दूर चली गयी
तुम दूर चली गयी और सोचती रही

सभी क्षणिकाएँ लाज़वाब कविता कैसे बन जाती है एक बेहतरीन अंदाज प्रस्तुति का...धन्यवाद आशोक जी

मनोज कुमार का कहना है कि -

बहुत ही सार्थक प्रयास। साधुवाद।

डा. श्याम गुप्त का कहना है कि -

सिर्फ़ कुमार अम्बुज की कविता ही सार्थक कविता है जो सामाज़िक सरोकारों से संयुक्त है, सन्देश देती है। पढने के बाद पाठक को एक सार्थक सोच व कर्तव्य दिशा प्राप्त होती है और उसमे साथ ही प्राप्त होता है यादों के सौन्दर्य का सन्सार ।
मैं मनीश जी या केदार्नाथ जी से सहमत नहीं हूं कि कविता पढने के बाद पाठक के पास एक कोरा कागज़ ही रह जाये या शून्य रह जाये , तो फ़िर वह कविता क्यों पढे ? एसी कविताओ के कारण ही आज पाठक साहित्य से दूर होता जारहा है, और साहित्य -साहित्यकता से ।

वाणी गीत का कहना है कि -

एक सार्थक प्रयास ....दूरियां तय की जाती रही यूँ भी , हाथों के इन्तजार में ...माँ का डर...सब कुछ अछि तरह व्यक्त हुआ है इन कविताओं में ..आभार ...!!

KISHORE KALA का कहना है कि -

आपका चयन भी बहुत अच्छा है। नये कवियों को इससे प्रेरणा मिलेगी। आबहुत ही सुंदर,सार्थक व मनचाही है गवाक्ष की पहली प्रस्तुती। गे भी इसी तरह हमे और भी बहुत कुछ नया मिलेगा। इसी आशा के साथ......किशोर कुमार जैन गुवाहाटी असम

Anonymous का कहना है कि -

सभी रचनाये बहुत अच्छी लगी, अच्छा प्रयास ,
बहुत बहुत धन्यवाद
विमल कुमार हेडा

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