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नई कविता में जाने का नया 'गवाक्ष'


पहली कड़ी

मित्रो,

आज से हम कविता का एक मासिक स्तम्भ शुरू कर रहे हैं 'गवाक्ष'। मनीष मिश्र की कविताओं से हमारे पाठक खूब अच्छी तरह परिचित हैं। मनीष मिश्र जी का मंतव्य है कि इंटरनेट के पाठकों को यह बताना बहुत ज़रूरी है कि समकालीन कविता की छोटी-छोटी पगडंडियाँ कहाँ-कहाँ से निकलती हैं और किधर-किधर को जाती हैं। इसलिए उन पगडंडियों को देखने, उसपर चल कर आ रहीं अपने समय की महान कविताओं की प्रतीक्षा करने के लिए अपने घर में एक खिड़की चाहिए। उसी खिड़की को मनीष ने तैयार किया है। इसके तहत मनीष अपने पसंद की उन नई कविताओं के बारे में बात करेंगे, जिनकी चर्चा वे ज़रूरी समझते हैं। उन्हीं के शब्दों में-

हम पाठकों को नयी कविता का सलोना चेहरा दिखाएँ। ऐसी कवितायें जो संवेदना के लथपथ विन्यास में उगती हैं। अपने शिल्प और कथ्य में कसी ऐसी कवितायें जो पढ़े जाने के बाद आपके सामने एक शून्य परोस देती हैं। केदारनाथ सिंह ने लिखा भी है-
"कविता यही करती है
यही सीधा मगर जोखिम भरा काम
कि सारे शब्दों के बाद भी आदमी के पास
हमेशा बचा रहे एक सादा पन्ना"


हिंद-युग्म कविता के इस सलोने चेहरे को ले कर हर माह आपके पास आएगा- गवाक्ष के नाम से। इसमें पुराने और नए कवियों की प्रकाशित कुछ बेहद ओजपूर्ण कवितायें प्रकाशित की जाएँगी। इन कविताओं पर आप पाठकों की
प्रतिक्रियायें अपेक्षित रहेंगी। तो चलिए शुरू करते हैं गवाक्ष की पहली कड़ी।

1. मैं सोचता रहा
और दूर चला आया
मैं दूर चला आया और सोचता रहा
तुम सोचती रही और दूर चली गयी
तुम दूर चली गयी और सोचती रही

इस तरह हमने दूरिया तय की।

--मंगलेश डबराल

2. ये सिर्फ किवाड़ नहीं हैं
जब ये हिलते हैं
माँ हिल जाती है
और चौकस आँखों से देखती है क्या हुआ।

मोटी साँकल की चार कड़ियों में
एक पूरी उम्र और स्मृतियाँ बँधी हुई हैं
जब साँकल बजती है
बहुत कुछ बज जाता है घर में।

इन किवाड़ों पर
चंदा सूरज और नाग देवता बने हुए हैं
एक विश्वास और सुरक्षा खुदी हुई है इन पर
इन्हें देख कर हमें पिता की याद आती है।

भैय्या जब इन्हें बदलवाने को कहते हैं
माँ दहल जाती है
और कई रातों तक
पिता उसके सपनो में आते हैं।

ये पुराने हैं
लेकिन कमजोर नहीं
इनके दोलन में एक वजनदारी है

ये जब खुलते हैं
एक पूरी दुनिया हमारी तरफ खुलती है
जब ये नहीं होंगे
घर-घर नहीं होगा।

--कुमार अम्बुज

3. किसी काम का नहीं इनका हरापन
मवेशी भी नहीं खाते इन्हें
पावँ रोपने की जगह नहीं जड़ों में
फलियों में जुगाड़ नहीं एक जून का
ये बीहड़ हैं
और बीहड़ों के बाड़ नहीं होते।

कुदाल होने से लोहा डरता है
बेट होने से लकड़ी
आग नहीं चढ़ती उनकी चमड़ी पर
उखाड़ फेको तो कफ़न पर फैलते हैं कमबख्त।

दो फसलों के बीच का परती समय है यह
खेत की चमड़ी चबाते कंधों तक चढ़ आये हैं बेहया
आँधियों की सरहद पर खड़े हैं पेड़
आसमान की और सर उठाये खड़ी हैं नीलगायों की पात
और उनकी खुरों की मिट्टी में
किसी नवजात को
जन्म देने के लिए ऐंठ रही है पृथ्वी की कोख।

--निलय उपाध्याय

4. उसने कहा
उसके पास छोटा सा हृदय है
जैसे धूप कहे उसके पास थोड़ी सी रौशनी
आग कहे उसके पास थोड़ी सी गर्माहट

धूप नहीं कहती उसके पास अन्तरिक्ष है
आग नहीं कहती उसके पास लपटें
वह नहीं कहती उसके पास देह।

--अशोक बाजपाई

5. उसके हाथ की गुनगुनी धुप
उसके हाथ का झिझकता अँधेरा
उसके हाथ फूलों की तरह
ओस भीगे और शांत
उसके हाथ पक्षियों की तरह
भाग जाने को विकल
उसके हाथ अकेले
उसके हाथ डूबे हुए स्वप्न में
उसके हाथ करते हैं प्रतीक्षा
हाथों की।

--अशोक बाजपाई