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Saturday, November 28, 2009

हमें चाहिए खिलखिलाहटों की दो चार जड़ें


वर्षों से हमारी देह में उग रहा है मौन
जंगली खुभिंयो सा।
हमारे पास-
कुछ रूई सी मुलायम स्मृतियां हैं
और चिनार सी लम्बी यादें
कुछ प्रार्थनाएं है हमारे पास
और कुछ गीत भी।

हमें चाहिए-
प्यार करने के लिए
सताई हुई दो निर्दोष आँखें,
खिलखिलाहटों की दो चार जड़ें
जो उग सके हमारे मौन में।
और-
माँ की जैसी स्नेहिल उंगलियां
जो उभार सकें
हमारे बचपन के हरे-हरे गीत।

हमें नहीं चाहिए-
बरगद जितने बड़े सुख,
समुद्र की ओर खुलने वाली खिड़की,
और-
सड़कों से भी लम्बी उम्र।

हमें बस-
जरूरत है दो परों की
जिन्हें पहना सकें हम
सहेज कर रखे हुए सपनों को
और-
कुछ तीखी कविताओं की,
जिन्हें सुलगा सके हम
धीमी-सी आँच में।

कवि- मनीष मिश्र

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

गिरिजेश राव, Girijesh Rao का कहना है कि -

@ हमें चाहिए-
प्यार करने के लिए
सताई हुई दो निर्दोष आँखें,

क्यों भाई, प्यार करने के लिए केवल निर्दोष होना पर्याप्त नहीं है ? उनका सताया होना आवश्यक है ?

गिरिजेश राव, Girijesh Rao का कहना है कि -
This comment has been removed by the author.
निर्मला कपिला का कहना है कि -

हमें चाहिए-
प्यार करने के लिए
सताई हुई दो निर्दोष आँखें,
खिलखिलाहटों की दो चार जड़ें
जो उग सके हमारे मौन में।
और-
माँ की जैसी स्नेहिल उंगलियां
जो उभार सकें
हमारे बचपन के हरे-हरे गीत।
सुन्दर लगी ये पंक्तियाँ शुभकामनायें

Unknown का कहना है कि -

सीमित मनोभावों को दर्शाती और संदेशों को समेटे सुंदर पंक्तियाँ. कवि को शुभकामनाएं.
गिरिजेश राव जी ने जो कहा वह बात मुझे भी खली सताई हुई दो निर्दोष आँखें" ही क्यों.

Unknown का कहना है कि -

हमें बस-
जरूरत है दो परों की
जिन्हें पहना सकें हम
सहेज कर रखे हुए सपनों को
sundar-ati sundar

Sajeev का कहना है कि -

very nice poem...girijesh ji...yahi sachhayi hai....zara dil se poochke dekhen...kavita men kavi ne koi bhi shabd faltu nahi rakha hai...

Anonymous का कहना है कि -

बहुत ही प्यारी रचना के लिए बधाई मिश्र जी !

देवेन्द्र पाण्डेय का कहना है कि -

जंगली खुशियाँ हैं रूई सी मुलायम स्मृतियाँ हैं
आपके पास चाहतों के समुंदर की सीपीयाँ हैं
--अब और क्या चाहिए इसके सिवा कहना
हमारे पास आपके लिए सिर्फ बधाइयाँ हैं

डा श्याम गुप्त का कहना है कि -

अच्छी कविता, भावों की नवीनत तो है परन्तु वही त्रुटि है जो आज कल अधिकान्श कवि कर रहे हैं,शायद अर्थवत्तात्मकता को अधिक द्यान में न रखने के कारण--वही जो गिरिजेश राव जी ने कहा--सताई हुई आन्खोंकी ही क्या आवश्यकता है।

Kishore Kumar Jain का कहना है कि -

सब कुछ मौन है जंहा
वंहा अगर खिलखिलाहट हो
वो कबिता ही तो कबिता है
अच्छी लगी आपकी कबिता हालांकि अनुशीलन की जरुरत है।
फिर भी बधाई हो.
----किशोर कुमार जैन.गुवाहाटी असम

मनोज कुमार का कहना है कि -

हमें नहीं चाहिए-
बरगद जितने बड़े सुख,
समुद्र की ओर खुलने वाली खिड़की,
और-
सड़कों से भी लम्बी उम्र।

अच्छी रचना। बधाई।

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

आज के परिवेश में इनका भी मिलना बड़ा मुश्किल हो गया है..बढ़िया कविता ..हमेशा की तरह भाव प्रधान सुंदर कविता..बधाई

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