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आसाम से लौटकर हरिया सोरेन


हिन्दी में बहुत कम आदिवासी कविताएँ रची जाती हैं। आदिवासी कविताओं का मतलब जिसमें आदिवासी जनजीवन हो, उनके दुख-दर्द हों, वे खुद हों। हिन्द-युग्म पर पिछले कई महीने से सक्रिय कवि सुशील कुमार आदिवासी कविता लिखने वाले कवि के तौर पर भी चर्चित हैं। इंटरनेट पर कम से कम ऐसी कविताओं का अभाव है। आज हम आपको एक ऐसी ही कविता से मिलवा रहे हैं।

आसाम से लौटकर हरिया सोरेन
[आसाम में उपद्रवियों द्वारा सताये गये झारखंडी भाई-बहनों की व्यथा-कथा सुनकर...]

अबकी अगहन में ही
लौट आया हरिया
आसाम से अपने गाँव

अपने दो जन गँवाकर
बंधना परब से दो मास पहले

हरिया सोरेन अच्छा बजनियाँ है
मांदर बजाता है
बाँसूरी बजाता है
और परब के गीत खुद बनाता है
खुद गाता भी है
वह अच्छा चित्रकार भी है
दीवाल पर गेरू रामरस चूना सुरखी टेसू-जामुन से
हाथी ऊँट मोर फूल-पत्तियों के भाँति-भाँति के
सुन्दर-सुन्दर भित्ति-चित्र उकेरता है, गाँव-घर में
उसकी बहुत कदर है पचास का है वह
काका कहकर सभी हँकाते हैं उसे

इस बार मगर हरिया चुप-चुप रहता है
न कहीं आता-जाता है
न गीत ही लिखता है परब के
नीमिया के नीचे दिनभर दालान में
महुआ के मद्य में ओघराया
कभी ज़मीन टकटोरता तो
कभी अकास निहुरता है
एक जगह भोर का बैठा-बैठा
चिलम पर चिलम पीता
साँझ कर देता है
बीच-बीच में उसके होंठ हिल पड़ते हैं -
‘काहे ढिठाई की थी चुड़का तुने
हमरे संग चलने की
अपने घरवाली के कहने में आकर..’
तो कभी हुँकार मारकर रो पड़ता है -
‘बेटा बुधन नहीं बचा पाया तेरा यह
कायर बाप तुझे उपद्रवियों के कहर से।’

उसकी ललछौंही आँखों से ढरक आते हैं आँसू
उसके स्याह ओठ तक और पठार सी
उसकी काया थरथराने लगती है
उसकी संतानें सुखमुनी, बिटीया और पत्नी सुगिया भी
उसके साथ सिसकने लगते हैं।

-2-
धनकटनी पूरी हो गयी पहाड़ पर
माघ का महीना है, धान पीटे जा रहे हैं खमार में
पहाड़ी बस्तियों में रौनकें लौटने लगी हैं
गाँव के मुखिया-माँझी टोलों में
परब के दिन तै कर रहे हैं -
ऊपर टोला चौदह तारीख सोमवार
मरांग टोला सोलह तारीख बुधवार
कदम टोला बीस को
यानी अलग-अलग टोलों में बंधना-माघी के
अलग-अलग दिन धराये गये

सारा पहाड़ नवगति-नवलय-नवताल में है
पर हरिया के हृदय में पड़ा मौन टूट नहीं पाया
हराधन बेटाधन छोटका सभी आये समझाने-बुझाने
हरिया को पर हरिया उदास है

-3-
आज हरिया के गाँव में परब है
लड़के दल बनाकर ढोल-मांदर
बाँसूरी-तुरही झांझ बजा रहे हैं
लड़कियाँ हरे-नये परिधान में
फूल-पत्तियों और मिट्टी-कागज के
तरह-तरह के गहनों में सजी-सँवरी
एक-दूसरे की बाँहों में बाँहे डाले
लड़कों के दल को अर्धचन्द्राकार
पंक्तियों में घेरे थिरक रही हैं

सभी गा रहे हैं फसल के गीत और
बढ़ रहे हैं कदम दर कदम
हरिया की झोपड़पट्टी की ओर
सबकी आँखें ढूंढ रही हैं हरिया सोरेन को
पर दीख नहीं रहा कहीं हरिया सोरेन

-4-
पहाड़ की तराई में अकेला खड़ा हरिया गा रहा है -
(या कि दाढे़ मारकर रो रहा है)
उसके गीत में पहाड़ का दु:ख है
दहाड़ है चेतावनी है
अपने लोगों के लिये सीख है
वह गा रहा है और कह रहा है -
उठो, जागो मेरे भाई
वनदेवता तुम्हें जगा रहे हैं नींद से
अब और सोने का समय नहीं
तराई की ज़मीन पर जाओ
उबड़-खाबड़ टीले-टप्पर काटो-छाँटो
उसे चौरस बनाओ
कुँआ खोदो वहाँ हल-बैल लाओ
जोतो-बोओ, हम वीर सीदो-कान्हु की संतान हैं
भूलकर भी अब परदेस कमाना मत भाई
अपनी ज़मीन पर ही मेहनत-मजूरी करना
बाहर लोग हिकारत भरी नज़र से देखते हैं हमें
आसाम में अब तक हमारे सैकड़ों भाइयों को
मौत के घाट उतार दिया गया, मुम्बई से भी हमें
खदेरा गया। हमारी बेटियां हर दिन दिल्ली के बाज़ार में
बेची जाती है। हमारे बीच के लोग इसमें दलाल बनते हैं,
इन दलालों का मुँह काला करो, गाँव निकाला करो
हमें अपने जंगल बचाने हैं पहाड़ बचाने हैं
यहीं... पहाड़ की तराई में हम अपनी
छोटी सी दुनिया बसायेंगे
अब हम बाहर नहीं जायेंगे
उठो, जागो मेरे भाई
पहाड़ के देवता तुम्हें जगा रहे हैं।

--सुशील कुमार

बाज़ार मनुष्यता का सेन्सेक्स गिराना चाहता है, लेकिन॰॰


कहते हैं कि जिसके पास क़लम है, और जो ज़रूरत पड़ने पर उसे उठाता है, उसके अंदर का इंसान ज़िंदा है। आज जबकि बाज़ार मनुष्यता को भी एक उत्पाद बनाता जा रहा है, वैसे में एक क़लम ही है जो इसके सामने दीवार बनकर खड़ी है। हालाँकि बहुत से बुद्धिजीवियों का आरोप है कि बहुत से कलमकार भी जाने-अनजाने इस बाज़ार की चपेट में आ चुके हैं, वैसे में यह खोज पाना बहुत मुश्किल है कि कौन अदीब इस बाज़ार को तटस्थ होकर देख पा रहा है, कौन नहीं। हमारे अनुसार सुशील कुमार एक समर्थ कवि हैं, जिनकी कलम यूरो-डॉलर के मायाजाल के खिलाफ संघर्ष करती है।

बाज़ार और कविता

बाज़ार आदमी की
रोजमर्रा की जरूरतों से पैदा हुआ
और कविता उसके मन की
गहरी गुफाओं के एकांत में उठती
लहरों की उथल-पुथल से

पर इससे पेश्तर कि
आदमी बाज़ार की पैमाईश कर पाता,
बाज़ार आदमी का मोल-तोल कर
उसकी गठरी मार
उसके दायरे से लगातार छूटता हुआ
दहकते लावा की तरह
उसके चारो तरफ़ फैलता गया
और कविता के लिये
जगह-जगह ताबूतें रख
आदमी का आदमीनामा भी अपने
बाज़ार-भाव के हिसाब से
तय करता चला गया

हालाँकि
कविता और आदमी दोनो को
इस बात की अच्छी मालूमात है कि
बाज़ार पहले से और भी
अधिक शातिर और चौकन्ना हो चला है !

पर बाज़ार को भी इसका इल्म है कि
ऐसे समय में कविता और आदमी को
अपनी गिरफ़्त में लेने के लिये
कितनी तरकीब की जरूरत होगी !!

तभी तो वह घुसता है अब
आदमी की चेतना में हौले-हौले
संचार के नूतन
तरीकों-तकनीकों को अपनाकर
भाषा की नई ताबिश में

और उसका घुड़सवार बन
ऐसी चाबुक जड़ता है उसकी पीठ पर कि
आदमी घोड़े की तरह हिनहिनाता हुआ
उसके ईशारे पर दौड़ पड़ता है

दरअसल बाज़ार की
अंदरूनी ख्वाहिश यह रही है कि
आदमी अपनी भावना,
अपनी अभिव्यक्ति को
उसकी दुकान की महरी बना दे
और अपना सेन्सेक्स इतना गिरा दें
कि लानतों से बनी सुविधाओं की
मंदी की मार जीवन-भर वह
हँस-ठठाकर झेलता रहे

वह उसके सोचने के तरीके उसके
हृदय की पुकार
उसकी निजी अंतरंगता को भी
बदल डालना चाहता है युरो में डॉलरों में

यह दीगर है कि
बाज़ार हल्ला बोलकर
कभी उसके पास आता नहीं
उसने कितने ही विदुषक मुहावरे
और कितनी ही लफ़्फ़ाजियाँ रच रखी हैं
आदमी को भुनाने के
जिसकी हरेक कहन में
हजारों नियामतें पाने का
झूठा फलसफा गुप्त होता हैं !

इसलिये आजकल ज्यादातर चुप रहकर
वह
एक ऐसी लिपि... ऐसी भाषा
के ईज़ाद में दिन-रात जुटा है
जो आदमी को फाँसकर उसे केवल
एक ग्राहक-आदमी बना दे, तभी तो

उसने उन कविताओं की
मियाद भी मुक़र्रर कर दी है
जो बाज़ार के बीजगणित से बाहर है
और आदमी को ऐसी कविताई से
दूर रहने की ताकीद भी की है

पर खुद उसके चौबारों घरों...
यहाँ तक कि बिस्तरों पर भी
टी. वी. स्क्रीनों के मार्फ़त
विज्ञापन की नई-नई चुहुलबाजियों के जरिये
काबिज हो चुका है


और हाँ, कविता के लिये
उसने चालाकी से
कवि-भेसधारी हिजड़ों की
ऐसी फ़ौज भी तैयार कर ली है
जो बाज़ार की बोली बोलती है
नये-नये विज्ञापन के रोज़ नये छंद रचती है
और मंचों पर गोष्ठियों में
अपनी वाहवाही लूटती है, लोगों की
तालियाँ बटोरती है

बाज़ार को क्या मालूम कि
कविता अनगिनत उन
आदिमजातों की नसों में
लहु बन कर
दौड़ रही हैं इस समय
जो बाज़ार के खौफ़नाक़ इरादों से बेज़ार होकर
अधजले शब्दों की ढेर से
अनाहत शब्द चुन रहे हैं
और उनसे भाषा की रात के खिलाफ़
अपने हृदय के पन्नों पर
अभी नई कवितायें बुन रहे हैं

बस, पौ फटने की देर है
कि आदमी बाज़ार की साजिशों के विरुद्ध
कबीर की तरह लकुटी लिये
इसी बाज़ार में आपको खड़े मिलेंगे जगह-जगह
जिनके पीछे कवियों का कारवाँ होगा।

हिन्दी में लिखिए और पढ़िए - जीतिए हज़ारों के इनाम


जुलाई 2009 माह की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित की जाती है। उल्लेखनीय है कि हिन्द-युग्म पिछले 31 माह से इस प्रतियोगिता का आयोजन यूनिकोड (हिन्दी) के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए करता आ रहा है। हिन्दी आयोजनों में यह एक मात्र पुरस्कार है जो पाठकों को भी प्रोत्साहित करता है।

इस प्रतियोगिता के आयोजन की उद्‍घोषणा प्रत्येक माह की पहली तिथि को की जाती है और परिणाम अगले माह के प्रथम सोमवार को प्रकाशित किये जाते हैं। इस प्रतियोगिता का आयोजन हिन्द-युग्म के सहयोगियों, प्रसंशकों और हिन्दी-कर्मियों की मदद से होता है।

कृपया इसमें भाग लेकर इंटरनेट पर हिन्दी लिखने-पढ़ने की परम्परा को समृद्ध करें।

जुलाई 2009 का यूनिकवि बनने के लिए-

१) अपनी कोई मौलिक तथा अप्रकाशित कविता 17 जुलाई 2009 की मध्यरात्रि तक hindyugm@gmail.com पर भेजें।

(महत्वपूर्ण- मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के अतिरिक्त गूगल, याहू समूहों में प्रकाशित रचनाएँ, ऑरकुट की विभिन्न कम्न्यूटियों में प्रकाशित रचनाएँ, निजी या सामूहिक ब्लॉगों पर प्रकाशित रचनाएँ भी प्रकाशित रचनाओं की श्रेणी में आती हैं।)

२) कोशिश कीजिए कि आपकी रचना यूनिकोड में टंकित हो।
यदि आप यूनिकोड-टाइपिंग में नये हैं तो आप हमारे निःशुल्क यूनिप्रशिक्षण का लाभ ले सकते हैं।

३) परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, इतना होने पर भी आप यूनिकोड-टंकण नहीं समझ पा रहे हैं तो अपनी रचना को रोमन-हिन्दी ( अंग्रेजी या इंग्लिश की लिपि या स्क्रिप्ट 'रोमन' है, और जब हिन्दी के अक्षर रोमन में लिखे जाते हैं तो उन्हें रोमन-हिन्दी की संज्ञा दी जाती है) में लिखकर या अपनी डायरी के रचना-पृष्ठों को स्कैन करके हमें भेज दें। यूनिकवि बनने पर हिन्दी-टंकण सिखाने की जिम्मेदारी हमारे टीम की।

४) एक माह में एक कवि केवल एक ही प्रविष्टि भेजे।

यूनिपाठक बनने के लिए

चूँकि हमारा सारा प्रयास इंटरनेट पर हिन्दी लिखने-पढ़ने को बढ़ावा देना है, इसलिए पाठकों से हम यूनिकोड ( हिन्दी टायपिंग) में टंकित टिप्पणियों की अपेक्षा रखते हैं। टायपिंग संबंधी सभी मदद यहाँ हैं।

१) 1 जुलाई 2009 से 31 जुलाई 2009 के बीच की हिन्द-युग्म पर प्रकाशित अधिकाधिक प्रविष्टियों पर हिन्दी में टिप्पणी (कमेंट) करें।

२) टिप्पणियों से पठनीयता परिलक्षित हो।

३) हमेशा कमेंट (टिप्पणी) करते वक़्त समान नाम या यूज़रनेम का प्रयोग करें।

४) हिन्द-युग्म पर टिप्पणी कैसे की जाय, इस पर सम्पूर्ण ट्यूटोरियल यहाँ उपलब्ध है।

कवियों और पाठकों को निम्न प्रकार से पुरस्कृत और सम्मानित किया जायेगा-


१) यूनिकवि को शिवना प्रकाशन की ओर से रु 1000 की मूल्य तक की पुस्तकें तथा प्रशस्ति-पत्र।

२) यूनिपाठक को सुशील कुमार के पहले कविता-संग्रह कितनी रात उन घावों को सहा है की एक प्रति तथा प्रशस्ति-पत्र।

३) दूसरे से दसवें स्थान के कवियों को तथा दूसरे से चौथे स्थान के पाठकों को सुशील कुमार के पहले कविता-संग्रह कितनी रात उन घावों को सहा है की एक-एक प्रति।

कवि-लेखक प्रतिभागियों से भी निवेदन है कि वो समय निकालकर यदा-कदा या सदैव हिन्द-युग्म पर आयें और सक्रिय लेखकों की प्रविष्टियों को पढ़कर उन्हें सलाह दें, रास्ता दिखायें और प्रोत्साहित करें।

प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले सभी 'नियमों और शर्तों' को पढ़ लें।

सिदो-कान्हु का हुल और इनके वंशजों की नियति


सिदो-कान्हु की मूर्ति
भारत में ब्रिटिश हुकूमत के अधीन महाजनी प्रथा और सरकार की बंदोबस्ती नीति के ख़िलाफ़ 30 जून 1855 को पहला विद्रोह हुआ था, जिसे 'संथाल हुल'1 के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन 20 हज़ार संथाली लोग, अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए भोगनाडीह2 में जमा हुए थे। इस क्रांति के अग्रदूत थे चार भाई सिदो, कान्हु, चाँद और भैरव मुर्मू। यह हुल ब्रिटिश इतिहासकार हंटर के अनुसार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उग्र क्रांतियों में से एक था, जिसमें 20 हज़ार संथाली शहीद3 हुए थे।

शोषण इस हद तक था कि इन आदिवासियों को 50 प्रतिशत से 500 प्रतिशत तक खेती-कर देना पड़ता था। जब सिदो मुर्मू और कान्हु मुर्मू ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई तो हज़ारो-हज़ार लोगों के समूह ने इनका स्वागत किया, जिन्होंने भोगनाडीह गाँव में जमा होकर खुद को स्वतंत्र घोषित किया और स्थानीय जमींदार, पूँजीपतियों, सूदखोरों के खिलाफ जंग छेड़ने की शपथ ली। कहा जाता है कि सिदो मुर्मू को अंग्रेज़ पुलिस ने पकड़ लिया और कान्हु एक एनकाउंटर में मारा गया। आज का दिन इसी क्रांति की याद में 'हुल दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

परंतु विडंबना यह है कि सिदो-कान्हु की पाँची पीढ़ी के वंशज सरकारी उपेक्षा के शिकार हैं। न इनके पास खाने को है, न पहनने-ओढ़ने को। झारखंड राज्य के बनने के बाद वर्तमान पीढ़ी की मुखिया बितिया मुर्मू को कुछ आस ज़रूर जगी थी कि शायद यह सरकार कुछ करे। लेकिन झारखंड बनने के आठ वर्षों के बाद भी इस परिवार, इस गाँव और इस क्षेत्र को कोई सुविधा मुहैया नहीं करा सकी सरकार। आलम यह कि इसी पाँचवीं पीढ़ी का वंशज बेटाधन मुर्मू भूखमरी की बलि चढ़ गया। उसे टीवी हुई, इलाज़ के लिए पैसे नहीं थे, खून की उल्टियाँ करता मरा।

कवि संवेदनशीलता का पर्याय होता है। सुशील कुमार इसी नवनिर्मित राज्य झारखण्ड की धरती के पुत्र हैं और आदिवासियों के दुःख, उनकी उपेक्षा, उनके प्रति अन्याय इनकी कविताओं में दृष्टिगोचर होते हैं। 14 जुलाई 2007 को बेटाधन मुर्मू के असामयिक निधन पर सुशील कुमार की कलम ने जो संवेदना प्रकट की, वो हम आपके समक्ष रख रहे हैं।

श्रद्धांजलि : दिवंगत बेटाधन मुर्मू को

कई बार गिरे और उठे बेटाधन मुर्मू तुम
उनकी चोट अपनी अदम्य छाती पर सहकर,
पर इस बार उठ गये हो सर्वदा के लिये।

रात से ही सुकी, दुली, जोबना, मंगल सभी
तुम्हारे शव पर पछाड़ें खा रहे हैं
हाँक रहे हैं, तुम्हें जगा रहे हैं


सिदो-कान्हु पर ज़ारी डाक टिकट
सुराज के सपने और
विकास का सब्जबाग़ दिखाकर
तुम्हारी तालियाँ बटोरने वाले
तुम्हारे ही भाई-बंधु
तुम जैसी चमड़ी के रंग वाले
तुम्हारी ही बिरादरी की भाषा बोलते
तुम्हारे भीतर पैठकर
शासन करते हैं तुम्हारे ऊपर
और तुम्हारी दुर्बल स्नायुओं में
बाहरी-भीतरी के भेद का ज़हर घोलकर
तुम्हें तोड़ लेते हैं हर बार
अपने पक्ष में अक्षर-अक्षर।

झारखंड बने आठ साल हो गये
पर कितनी बदल पायी, बेटाधन
झाड़-झाँखड़ झारखंडी भाई-बहनों की तस्वीर?
पहले तो बिहार पर तोहमत लगाते थे
और अलग प्रदेश की लड़ाई में तुम्हारा साथ लेते थे।

पर कितने सुखी हो पाये
झारखंड अलगने के बाद?
तुम्हारे पूर्वजों की आँखें तो
घुटन-शोषण से मुक्ति का सपना देखते-देखते
पथरा गयीं थीं, पीठ उनकी उकड़ूँ हो गयी थी
कंधे झुक गये थे...
और उनके जाने के बाद...
तुम भी बराबर लड़ते रहे
अपने बाप-दादों की वह लड़ाई
(जो विरासत में मिली तुम्हें।)

दु:ख है, तुम्हारी ज़मीन पर अंधेरा
अब भी कायम है !
समय बदला शासन बदला
मुद्दे बदले लड़ने के ढंग बदले
पर कितनी बदल पाये तुम अपनी तक़दीर
और कितना बदल सका जंगल का कानून?

भोगनाडीह के भूखे-नंगे लोग
चिथड़ों में लिपटे तुम्हारे शव को घेरे खड़े हैं
कातर नज़रों से निहार रहे हैं कि
इलाज़ की आस में
कैसे कराहते हुये ख़ून की उल्टियाँ करते
आखिरकार तुम्हारे साँस की डोर टूट गयी !

सुकी के पास इतने भी पैसे नहीं कि
अपने पति के अंत्येष्टि के वास्ते
दो गज कफ़न का इंतजा़म कर सके !

कुछ ही दिन हुए,
हुल-दिवस (तीस जून) पर
झक्क सफ़ेद कुर्ते वालों का
जमावड़ा था तुम्हारे गाँव में
वादों और घोषणाओं की झड़ी लगा दी थी
उसने आकर भोगनाडीह में
और पक्का भरोसा दिया था कि
तुम्हें मरने नहीं दिया जायेगा
बेहतर इलाज के लिए बाहर भेजा जायेगा
पर हुआ वही जो
हर हुल-दिवस पर होते आया है, यानी
वक्ष तक वीर शहीद सिदो-कान्हु की प्रतिमा को
पुष्प-मालाओं से लाद, मत्था टेक
बखानते रहे घंटों
उनके वीरता की गाथाएँ, फिर
जेड श्रेणी की सुरक्षा-कवचों के बीच
चमचमाती गाड़ियों में बैठ
भोगनाडीह की कच्ची सड़कों पर
धूल उड़ाते हुये राँची कूच कर गये।

बेटाधन, तुम उसी वंशज के
पाँचवी पीढ़ी के संतान हो
जिसने तीरों से बिंध दिये थे
जुल्मी महाजनों को
अठारह सौ पचपन के हुल में, याद करो।
तुम्हारे हिस्से की लड़ाई
अभी खत्म नहीं हुई है बेटाधन

तुम्हारी ठंडी मौत ने
प्रदेश के जन-मन को मथ दिया है।


संथाल- भारत की प्रमुख जनजाति
हुल- क्रांति, आंदोलन, इंकलाब
1.संथाल-हुल- 30 जून 1855 को झारखंड के भोगनाडीह में हुआ जन विद्रोह
2.भोगनाडीह- वीर सिदो-कान्हु की जन्म स्थली
3.संदर्भ- वेबसंथाल्स

तुम्हारी कलम आज भी उनके पास रेहन है


समय-समय पर आप आसानी से निगल जाने वाली कविताओं का आनंद लेते रहते हैं, जिसमें कई बार हमें आइसक्रीम खाने जैसा सुख मिलता है, लेकिन यह सुख बहुत क्षणिक होता है, वास्तिकता का गरम धरातल अपनी ऊष्मा का वलय जल्द ही हमारे चारों तरफ बना देता है। लेकिन कुछ कविताएँ आसानी से समझ में नहीं आतीं। मस्तिष्क पर ज़ोर डालना पड़ता है। समय के सभी आयामों पर दिमाग की रोशनी डालनी पड़ती है। ये कविताएँ ऐसे ही असल ज़मीन की असल खोज़बीन की झलक होती हैं। कुछ ऐसी ही कविताएँ रचते हैं सुशील कुमार। सुशील कुमार जिन्हें हमने अभी कुछ दिन पहले ही कवि के तौर पर पकड़ा है, इस बार कविता-लेखन की परम्परा की बुनियाद पर ही सवाल उठा रहे हैं।

तुम्हारी कलम उनके पास रेहन है

तुम्हारे शब्दों के जंगल से छूटते ही
वे आँखें मुझमें वापस लौट आयी हैं
जिसने व्यवस्था के अंधेरे में बजबजाती
उस तवारीख को पढ़ ली हैं
जिसे चरित्रहीनता और लालच की स्याही से
तुम्हारी सियासी कलम ने
हमें पालतु बनाए रखने की नीयत से गढ़ी है

यह जानते हुए भी कि
हमारे पुरखों को आदिम पशुता ने नोंच खायी थी,
तुमने लिखा - ‘आदमखोर चिताओं ने।’


राजप्रासाद से बुर्ज़ों तक समूची रियासत की शान
हमारे पूर्वजों की घट्ठायी उंगलियों पर टिकी थी
फिर भी कसाईयों ने उन्हें कोड़ों से पीटा
हाथ तक काट डाले, पिरामीडों में राजाओं के
शवों के साथ ज़िन्दा दफ़न कर दिया


पर तुम्हारी कलम ने कभी खिलाफ़त नहीं की उनकी,
उल्टे उनके नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कर दिये


चुप्पियों की मानिंद तुम्हारी यह हत्यारी हरकत
अब संसद से राजपथों को होती हुई,
पगडंडियों से गाँवों तक चली आती है
और उन झुर्रीदार चेहरों के हूक में समा जाती है
जो सन ‘47 के पन्द्रह अगस्त की मध्यरात्रि से
सपनों को अपनी पीठ पर लादे
नंगे पाँव उकडूँ होकर चल रहे हैं
जनतंत्र के पथ पर


मुझे मालुम है यह सब तुम्हें सुनना भाता नहीं
क्योंकि जनता के सुख-स्वप्न सब
पान की गिलौरियाँ बनाकर
जिन लोगों ने चबा ली हैं, उन्हीं ने तुम्हारी
बुद्धि भी खा ली है, क्या तुम...


बता सकते हो, बासठ साल के आज़ाद
मुल्क के इस बूढ़े आदमी के भीतर इतनी आग क्यों है,
उसकी आँखों में इतना धुआँ, इतनी राख, इतना मलाल क्यों है ?

नहीं...तुम चुपचाप अपनी रुसवाई सुनते रहोगे
और सुनकर भी अनसुनी करोगे
और, ‘यह देश विविधता में समरसता का देश है’
- लिखते रहोगे क्योंकि
तुम्हारी कलम आज भी उनके पास रेहन है

घर और घर का अंतर


पिछले कुछ दिनों में हरेप्रकाश उपाध्याय, अंजना बख्शी, रामजी यादव और मुहम्मद अहसन की कविताओं को प्रकाशित करने के बाद जो प्रतिक्रियाएँ मिली उससे यह अंदाज़ा लगा कि हमारे पाठक बासी और टटका कविता को पहचानना जानते हैं और यह भी जानते हैं कि कौन सी कविता हमेशा खाई जा सकती है। आज इसी कड़ी में युवा कवि सुशील कुमार की बिलकुल टटका कविता हम आपको पढ़वा रहे हैं। इनका विस्तृत परिचय फिर कभी, फिलहाल इनका वक्तव्य प्रकाशित कर इस भार से मुक्त हो रहे हैं- इस आशा के साथ कि इनकी कलम हमारी बातों, हमारे इर्द-गिर्द और उसमें पसरी विडम्बनाओं तथा हमारे सपनों पर जमी धूल को थोड़ा सा उड़ाएँगी ज़रूर। शायद इसे टटका भात की तरह नहीं, बल्कि मकई की रोटी की तरह धीरे-धीरे खाना पड़े।

घर और घर

सुशील कुमार
Susheel Kumar
वक्तव्य- "जब मेरे मन की समप्रवाहित नदी में कोई पत्थर फेंकता है या वातावरण का भूगोल कोई उछाल लाता है तब स्वमेव वहाँ भावों के प्रपातों की सृष्टि होने लगती है। तब भीतर शब्द बजने लगते हैं नगाड़े की तरह और विवश हो उठता हूँ मैं अभिव्यक्ति के लिये। तब ही कहीं शब्द मुझे रच पाते हैं...। जितनी बार मैं कविता लिखता हूँ, शब्द मुझे झिंझोरते हैं, जगाते हैं तो कभी मदहोश करते हैं और अपनी गोद में सुलाते हैं । उनकी आहट पाकर मैं बेचैन हो जाता हूँ उसे आकार देने के लिये। सृजन की यह बेला मेरे लिये बड़ी ताजा, निराली... पर कसक भरी होती है जहाँ समय मेरे लिये स्थिर हो जाता है और घड़ी की सुईयाँ मानो रुक सी जाती हैं। ऐसे कितने ही क्षण मैंने उन भावतरंगों की सम्मोहनावस्था (हिप्नोटिक स्टेट) में जिये हैं कविता के पालने में झूलते हुए। मैं उसे कभी खोना नहीं चाहता क्योंकि वही अपनी उर्जा है जिसे जीवन-यात्रा की बीहड़ घाटियों के बीच गुजरते हुए मैंने उन क्षणों की चिर-नवीन तह से ही निचोड़कर पाये हैं। यह मेरे जीवन के तपते जंगल में तरुवर-सी छाया और श्रांति देती है जहाँ जन (मॉस) के उस विराट रूप का साक्षात्कार कर पाता हूँ जिसने अपने श्रम-सौंदर्य से इस उबड़-खाबड़ धरती को रहने और जीने के लायक बनाने में कोई कोर-कसर तो नहीं छोड़ रखा है पर जो आज भी चंद मुठ्ठी-भर लोगों की जकड़न में कराह रहा है।"
वह मेरे भीतर-कहीं से निकलकर
मेरे सामने खड़ा हो गया
और बुदबुदाने लगा -
घर वह नहीं
जहाँ आदमी रहता है
घरों में आदमी अब कहाँ रहता है
जिसे तुम घर कहते हो
वह तो एक तबेला है
लानतों के सामान यहाँ
लीदों की तरह पसरे रहते हैं


हाँ, काँखते घोड़ों को अपनी देह से उतार
जिन खूँटों से आदमी
देर रात गये रोज़ बांधता है
सहुलियत के लिये उस जगह को
तुम घर कह सकते हो


क्योंकि तब उसके रोशनदानों से दरवाजों तक
अँधेरा परदे की तरह गिरता है
और ऊब और तनाव से लिपटे
सन्नाटे के साये में
कुछ देर के लिये वह जगह
एकान्त-निकेतन में तब्दील हो जाती है
जहाँ औरतें काम से निबरती हैं
बच्चे सपने बुनते हैं और
बुड्ढे अपने दाँत किटकिटाते हैं


ठीक इसी वक्त गगनचुंबी महलातों
की बत्तियाँ बुझा दी जाती है
और रात निर्वस्त्र होकर ‘हिपॉक्रिटिक’ चेहरों
को अपनी आगोश में ले लेती है
जिसके अँधेरे में लावारिस कुत्ते
डरावनी आवाज़ में भौंकते हैं
(तो कभी तेज स्वर में रोते हैं)


पर यह सब महज़ चंद घंटों का खेल है !


सहमति में मैंने सिर हिला दिया,
कहा - हाँ, घर अब फक़त
बूढे़ जवान बच्चे... सबकी
नींद की ख्वाहिशें हैं
जो उनके कल के घर की वसीयतें हैं
जहाँ रात कहीं सुनसान होती है कहीं बदनाम


यह सुनकर वह बिगड़ गया -
उसे घर मत समझो
न नींद को उसके घर की वसीयत...
दरअसल वह कोई सराय जैसा है
या बनजारों के डेरा सा
या फिर रात की खुमारी में डूबे
उन महलों सा जहाँ
दिगम्बराओं की बाँहों में
कितने ही झक्क सफ़ेद कामदेव
झूलते नज़र आते हैं !


‘और नींद ...?’ - मैंने घबराकर पूछा ।


वह तो लोगों के दिमाग में
पलता एक वहम है
अब न घर सोता है
न धड़
क्योंकि घर बेहद डरा-सहमा
एक इंसान है
जो मुर्गे की पहली बांग पर
तिलमिला उठता है और
सुबह होने तक
तिनका सा बिखर जाता है


क्या तुम्हें मालुम नहीं कि
ख्यालों में कई-कई घर होते हैं लोगों के
जिन्हें ढोते फिरते हैं अपने भीतर दिन-भर ?


एक घर माँ की कोख़ थी
पर वह एक था, सुख-शांति की
छाया फैली थी उस घर में
पर अब ...?
अब तो आदमी अपने घरों में नाशाद रहता है !
जितना नाशाद रहता है
उतने ही नये घरों की कामना करता है


हाँ, यह बात अलग है कि
जिनके घर नहीं होते
वे राह-बाट.. कहीं भी अपना घर बना लेते हैं
पर तुम उसे घर कहने से सकुचाते हो
क्योंकि उन घरों में दीवारें नहीं होती
न परदे ही झूलते हैं वहाँ
लाज की दीवारों से बनी इन घरों
को कोई कब उजाड़ दे, पता नहीं
फिर भी घर न होने का दु:ख
उन्हें सालता नहीं
जितना सालता है मौके़-बेमौके़
अपनी आबरू की दीवारें दरकने का दर्द


बिलों में कन्दराओं में
मांदों में घोंसलों में
पेड़ों पर भी इसी दुनिया के जीव
बसेरा डालते हैं
पर तुम उन्हें ‘घर’ की संज्ञा नहीं देते
जहाँ उनकी संततियाँ जनमती है
और पलती है
पर यह आदमी ही है सिर्फ़
जो दीवारें बनाता है
घर बनाने के नाम पर
और अपने सिर पर छतें
ढोता है घर रचने के खेल में
और एक साथ कई-कई घरों के बोझ तले
कहीं नहीं रहता है !
...और रात को दाग़दार करता है !!


उसकी बातें सुन मैं
हक्का-बक्का होने लगता हूँ, तभी
वह फिर मुझे झिंझोरता है-
सदियों से अपने को
स्थापित करने के उपक्रम में
आदमी अपने घर की तलाश में
रोज़ भटकता है
और आजीवन निर्वासन भोगता हुआ
एक दिन सो जाता है चिर-निद्रा में कहीं भी...
इतिहास के पन्ने पर अगर कहीं नाम भी
दर्ज कर जाता है
तो कहाँ होता है उसका पता-ठिकाना ?
कहाँ होता है तब घर उसका ? ?
- कहता हुआ वह फिर
मुझमें प्रवेश कर जाता है।

उसकी हवस हमेशा तुम्हारी भूख पर भारी पड़ती है


पटना में जन्मे और झारखंड में कार्यरत कवि सुशील कुमार के मन में कविता के बीज कब गिरे और कैसे फलित हुए, वे ठीक-ठीक नहीं बता पाते। किन्तु जनपदीय धूल-धक्कड़ से सने श्रमशील श्वासों में धड़कते अपने लोकजीवन और समय के स्पंदन को कहीं महसूसते हैं और ये इन्हें बेहद भाती हैं। पिता के मानसिक असंतुलन की वज़ह से पिछले चौबीस सालों से अपने बहिन-भाइयों यानी कि पूरे परिवार को तबाही और टूटन से बचाने की जिम्मेदारी निभाते रहे। यही इनकी पाठशाला है जिसमें इन्हें संघर्षशील जीवन का तत्वज्ञान प्राप्त हुआ। पहले प्राईवेट ट्यूशन, फ़िर बैंक की नौकरी । 1996 में राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर शिक्षा सेवा में। वर्तमान में जिला स्कूल चाईबासा में प्रिंसिपल के पद परकार्यरत हैं। ये समझते हैं कि कविता सिर्फ़ अंतरतम की पिपासा को ही तृप्त नहीं करती, बल्कि दिन-दिन अमानवीय हो रही व्यवस्था पर अनिवार्य आघात भी कर सकती है, करती है।

आज हम इनकी एक कविता प्रकाशित कर रहे हैं, जो पिछले महीने की प्रतियोगिता में ५वें स्थान पर रही।

पुरस्कृत कविता- भूख तुम्हारी


उसकी नज़र तुम्हारी भूख पर नहीं
भूख से उपजी उस भाषा पर है
जो उसकी बुद्धि के
तिकड़मी दाँतों के बीच फँसती हुई
धीरे-धीरे कुर्सी के विज्ञापनों में तब्दील हो गयी है।
इस समय इतना ही काफ़ी है कि
तुम भूख से मरने वाले अधमरे लोग
सत्ता-संप्रभुओं की मँडराती काली छायाओं के बीच
किसी तरह ज़िन्दा हो !
पर भूख से मर जाने वाले लोगों की अर्थियों पर
भूख की ही भाषा में नित रचे जा रहे ढोंग के आँसू
और कितने दिन सहोगे तुम ?
क्योंकि भूख पर तुम्हारी जुंबिश अब तक
जोगीड़ा की आवाज़ जैसी रही है
शोधपत्रों से घोषणा-पत्रों तक जिसे
अक्षर-अक्षर अपने पक्ष में तोड़ लिया गया है।
और इस थकान भरी यात्रा में
ख़ून-पसीने से लथ-पथ तुम्हारी भूख
जागरण में टिकने के बजाय
तुम्हारी नींद में निढाल हो गयी है
यह बेहद अफ़सोसनाक़ है।
बहुत दुखद है कि
उसकी हवस हमेशा
तुम्हारी भूख पर भारी पड़ती है
जो हरदम कूट-पीसकर तुमको खाती है।



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५॰५, ७॰४५
औसत अंक- ६॰४७५
स्थान- छठवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ७॰७, ६॰४७५ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ६॰०५८३३
स्थान- प्रथम


पुरस्कार- कवि गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' के काव्य-संग्रह 'पत्थरों का शहर’ की एक प्रति