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घर और घर का अंतर


पिछले कुछ दिनों में हरेप्रकाश उपाध्याय, अंजना बख्शी, रामजी यादव और मुहम्मद अहसन की कविताओं को प्रकाशित करने के बाद जो प्रतिक्रियाएँ मिली उससे यह अंदाज़ा लगा कि हमारे पाठक बासी और टटका कविता को पहचानना जानते हैं और यह भी जानते हैं कि कौन सी कविता हमेशा खाई जा सकती है। आज इसी कड़ी में युवा कवि सुशील कुमार की बिलकुल टटका कविता हम आपको पढ़वा रहे हैं। इनका विस्तृत परिचय फिर कभी, फिलहाल इनका वक्तव्य प्रकाशित कर इस भार से मुक्त हो रहे हैं- इस आशा के साथ कि इनकी कलम हमारी बातों, हमारे इर्द-गिर्द और उसमें पसरी विडम्बनाओं तथा हमारे सपनों पर जमी धूल को थोड़ा सा उड़ाएँगी ज़रूर। शायद इसे टटका भात की तरह नहीं, बल्कि मकई की रोटी की तरह धीरे-धीरे खाना पड़े।

घर और घर

सुशील कुमार
Susheel Kumar
वक्तव्य- "जब मेरे मन की समप्रवाहित नदी में कोई पत्थर फेंकता है या वातावरण का भूगोल कोई उछाल लाता है तब स्वमेव वहाँ भावों के प्रपातों की सृष्टि होने लगती है। तब भीतर शब्द बजने लगते हैं नगाड़े की तरह और विवश हो उठता हूँ मैं अभिव्यक्ति के लिये। तब ही कहीं शब्द मुझे रच पाते हैं...। जितनी बार मैं कविता लिखता हूँ, शब्द मुझे झिंझोरते हैं, जगाते हैं तो कभी मदहोश करते हैं और अपनी गोद में सुलाते हैं । उनकी आहट पाकर मैं बेचैन हो जाता हूँ उसे आकार देने के लिये। सृजन की यह बेला मेरे लिये बड़ी ताजा, निराली... पर कसक भरी होती है जहाँ समय मेरे लिये स्थिर हो जाता है और घड़ी की सुईयाँ मानो रुक सी जाती हैं। ऐसे कितने ही क्षण मैंने उन भावतरंगों की सम्मोहनावस्था (हिप्नोटिक स्टेट) में जिये हैं कविता के पालने में झूलते हुए। मैं उसे कभी खोना नहीं चाहता क्योंकि वही अपनी उर्जा है जिसे जीवन-यात्रा की बीहड़ घाटियों के बीच गुजरते हुए मैंने उन क्षणों की चिर-नवीन तह से ही निचोड़कर पाये हैं। यह मेरे जीवन के तपते जंगल में तरुवर-सी छाया और श्रांति देती है जहाँ जन (मॉस) के उस विराट रूप का साक्षात्कार कर पाता हूँ जिसने अपने श्रम-सौंदर्य से इस उबड़-खाबड़ धरती को रहने और जीने के लायक बनाने में कोई कोर-कसर तो नहीं छोड़ रखा है पर जो आज भी चंद मुठ्ठी-भर लोगों की जकड़न में कराह रहा है।"
वह मेरे भीतर-कहीं से निकलकर
मेरे सामने खड़ा हो गया
और बुदबुदाने लगा -
घर वह नहीं
जहाँ आदमी रहता है
घरों में आदमी अब कहाँ रहता है
जिसे तुम घर कहते हो
वह तो एक तबेला है
लानतों के सामान यहाँ
लीदों की तरह पसरे रहते हैं


हाँ, काँखते घोड़ों को अपनी देह से उतार
जिन खूँटों से आदमी
देर रात गये रोज़ बांधता है
सहुलियत के लिये उस जगह को
तुम घर कह सकते हो


क्योंकि तब उसके रोशनदानों से दरवाजों तक
अँधेरा परदे की तरह गिरता है
और ऊब और तनाव से लिपटे
सन्नाटे के साये में
कुछ देर के लिये वह जगह
एकान्त-निकेतन में तब्दील हो जाती है
जहाँ औरतें काम से निबरती हैं
बच्चे सपने बुनते हैं और
बुड्ढे अपने दाँत किटकिटाते हैं


ठीक इसी वक्त गगनचुंबी महलातों
की बत्तियाँ बुझा दी जाती है
और रात निर्वस्त्र होकर ‘हिपॉक्रिटिक’ चेहरों
को अपनी आगोश में ले लेती है
जिसके अँधेरे में लावारिस कुत्ते
डरावनी आवाज़ में भौंकते हैं
(तो कभी तेज स्वर में रोते हैं)


पर यह सब महज़ चंद घंटों का खेल है !


सहमति में मैंने सिर हिला दिया,
कहा - हाँ, घर अब फक़त
बूढे़ जवान बच्चे... सबकी
नींद की ख्वाहिशें हैं
जो उनके कल के घर की वसीयतें हैं
जहाँ रात कहीं सुनसान होती है कहीं बदनाम


यह सुनकर वह बिगड़ गया -
उसे घर मत समझो
न नींद को उसके घर की वसीयत...
दरअसल वह कोई सराय जैसा है
या बनजारों के डेरा सा
या फिर रात की खुमारी में डूबे
उन महलों सा जहाँ
दिगम्बराओं की बाँहों में
कितने ही झक्क सफ़ेद कामदेव
झूलते नज़र आते हैं !


‘और नींद ...?’ - मैंने घबराकर पूछा ।


वह तो लोगों के दिमाग में
पलता एक वहम है
अब न घर सोता है
न धड़
क्योंकि घर बेहद डरा-सहमा
एक इंसान है
जो मुर्गे की पहली बांग पर
तिलमिला उठता है और
सुबह होने तक
तिनका सा बिखर जाता है


क्या तुम्हें मालुम नहीं कि
ख्यालों में कई-कई घर होते हैं लोगों के
जिन्हें ढोते फिरते हैं अपने भीतर दिन-भर ?


एक घर माँ की कोख़ थी
पर वह एक था, सुख-शांति की
छाया फैली थी उस घर में
पर अब ...?
अब तो आदमी अपने घरों में नाशाद रहता है !
जितना नाशाद रहता है
उतने ही नये घरों की कामना करता है


हाँ, यह बात अलग है कि
जिनके घर नहीं होते
वे राह-बाट.. कहीं भी अपना घर बना लेते हैं
पर तुम उसे घर कहने से सकुचाते हो
क्योंकि उन घरों में दीवारें नहीं होती
न परदे ही झूलते हैं वहाँ
लाज की दीवारों से बनी इन घरों
को कोई कब उजाड़ दे, पता नहीं
फिर भी घर न होने का दु:ख
उन्हें सालता नहीं
जितना सालता है मौके़-बेमौके़
अपनी आबरू की दीवारें दरकने का दर्द


बिलों में कन्दराओं में
मांदों में घोंसलों में
पेड़ों पर भी इसी दुनिया के जीव
बसेरा डालते हैं
पर तुम उन्हें ‘घर’ की संज्ञा नहीं देते
जहाँ उनकी संततियाँ जनमती है
और पलती है
पर यह आदमी ही है सिर्फ़
जो दीवारें बनाता है
घर बनाने के नाम पर
और अपने सिर पर छतें
ढोता है घर रचने के खेल में
और एक साथ कई-कई घरों के बोझ तले
कहीं नहीं रहता है !
...और रात को दाग़दार करता है !!


उसकी बातें सुन मैं
हक्का-बक्का होने लगता हूँ, तभी
वह फिर मुझे झिंझोरता है-
सदियों से अपने को
स्थापित करने के उपक्रम में
आदमी अपने घर की तलाश में
रोज़ भटकता है
और आजीवन निर्वासन भोगता हुआ
एक दिन सो जाता है चिर-निद्रा में कहीं भी...
इतिहास के पन्ने पर अगर कहीं नाम भी
दर्ज कर जाता है
तो कहाँ होता है उसका पता-ठिकाना ?
कहाँ होता है तब घर उसका ? ?
- कहता हुआ वह फिर
मुझमें प्रवेश कर जाता है।