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इतना भी काफी है


सब कुछ ठीक नहीं है
इस तथ्य की उपेक्षा कर
यथासंभव जीते ही जाना,
आज के वक़्त में
इतना भी काफी है

सड़क जाम में एम्बुलेंस
जीवन-मृत्यु का संघर्ष
छटपटाता हुआ शासन-तंत्र
हालत मात्र गंभीर
इतना भी काफी है

जूठे बर्तन, ईंट-बालू, धुआँ
इनमें सना देश का भविष्य,
संविधान में प्रावधान है
बाल-श्रम निषेध
इतना भी काफी है

अपने मूर्ति रूप में आराध्य
अनेकों "राधा-कृष्ण" की लाशें,
उन्हीं मुहल्लों में दोबारा
प्रेम पनपा है
इतना भी काफी है

मित्रता-प्रतियोगिता का द्वंद्व
वासना का प्रेम से षड़यंत्र,
चंद टुकड़े बेईमानी ही सही
जीवन सफल है
इतना भी काफी है ।

  स्मिता पांडेय

एक रात की बात


रात के दो बजे हैं
आस-पास छिटकी चांदनी
से आकर्षित होकर
अनायास ही नज़रें
चाँद पर टिक गयी
चाँद को देखा.....
देखती ही रही....
मुझ पर मुस्कुराया
और जैसे और पास
और पास आ गया....

मैं भी भाव विभोर सी
उसके सानिध्य में
खोती ही जा रही थी...

मैंने धीरे से हाथ बढाया
और चाँद को छू लिया

उसकी किरणे अपनी शीतलता
मादकता में भिगोकर
मुझ पर उड़ेल रही थीं...
और जाने क्यों, पर
मैंने खुद को बहुत खूबसूरत
बहुत खूबसूरत महसूस किया

मेरी थकी हारी उदास
निश्चेष्ट अँगुलियों को
हौले से सहलाकर
उनमें चेतना भरता,
मेरे जीवन के प्रत्येक
अंधकारमय क्षण के अस्तित्व को
वो झुठलाता जा रहा था.

इस अलौकिक आलिंगन में
मृत्यु-लोक के हर संभव
सुख-दुःख के परे
आँचल भर प्यार बटोर
आँखें मूंदे मैं उसमें ही
जीती जा रही थी ...

भारी सपनीली पलकें
उसे आँखों में भरे
जाने कब सो गयी ...

अब भोर नें दस्तक दी है,
उसकी सिन्दूरी किरणों से नहाकर,
श्रृष्टि का हर एक कोना
नयी करवट ले रहा है,

हवाओं नें हर ओर
एक नयी हलचल पैदा की है
जीवन ने एक नया
ताज़ा पन्ना खोला है,
जिस पर एक नयी कहानी,
नया अनुभव,
लिखा जाना है,
नया दिन बाहें पसारे खड़ा है,

अब सुबह हो गयी है.

--स्मिता पाण्डेय

आधा-अधूरा एहसास


अधूरा-सा वादा
अधूरी-सी दोस्ती
अधूरा-सा प्यार
अधूरा-सा विश्वास
अधूरा-सा रिश्ता

जिसके "पूरा" होने की
कोई उम्मीद नहीं
फिर भी...

इतना अपना क्यों है
ये खालीपन...

शायद इसलिए
कि इसके साथ ही
जीना सीख लिया है,

या इसलिए
कि तुम्हारी कमी का
सतत एहसास भी
कहीं न कहीं
तुमसे ही जुड़ता है,

जैसे ये कहना -
"ईश्वर नहीं है"
कहीं न कहीं
ईश्वर के अस्तित्व को
बड़ी ही सहजता से
प्रमाणित कर देता है .

कवयित्री- स्मिता पाण्डेय

मेरी माँ का चेहरा


मेरे ईश्वर की
सबसे खूबसूरत रचना
मेरा सूरज, मेरा चंदा
कुछ परेशान-सा है...

आज कल देखती हूँ
एक ही सा भाव ...
वही भद्दी सलवटें
थके हुए से माथे पर...
वही उदास चेहरा
शून्य में ताकती
बोझिल सी पुतलियाँ,
जो यदा-कदा
चमक उठती हैं
छोटी-छोटी सफलता पर..

लेकिन फिर...
सोख लेती है "चिंता"
सारा उजाला आँखों से
"बेटी" के होने से
कहीं ज्यादा बड़ी है
बेटी के "समझदार"
होने की समस्या....

वो नहीं जानती ...
बेटी के "वैचारिक" होने पर
खुश हो या....

क्योंकि
उसे समझा नहीं पाती
उन रीतियों का औचित्य
जिन्हें उसने स्वयं भी
नाकारा था कभी...

उसे रिझा नहीं पाती
सुहावने दिखने वाले
सपनों के झुनझुने से

खोखली रूढ़ियों को
खूबसूरत रस्मों का
जामा नहीं पहना पाती

शायद इसीलिए....
बूढ़ा-सा दिखने लगा है
मेरी माँ का चेहरा ...

-स्मिता पाण्डेय

चलना एकाएक नहीं आता


चलना एकाएक नहीं आता...
घुटने-घुटने चली
घड़ी-घड़ी गिरी
लड़खड़ाई, चोट खाई,
और धीरे-धीरे नन्हे कदमों को
चलना आ गया...

पर मेरा मन...
उसने अभी चलना नहीं सीखा
और ज़िन्दगी भी
"घर का आँगन" तो नहीं,

एक जाल-सा है यहाँ
रास्तों और मंज़िलों का
एक जंगल-सा है
'अपने' और 'परायों' का...

हर सुबह एक नयी जंग होती है
सच और झूठ की
कुछ ख्वाब हारते हैं
कुछ आदर्श ढहते हैं
कुछ विश्वास घायल होते हैं
कुछ बचपन मरता है
और हर शाम
खून से लथपथ मेरा मन
कुछ और बड़ा होता है...

कवयित्री- स्मिता पाण्डेय

नया वक़्त!


तारीखें बदलने से
जिंदगियां नहीं बदलती
न ही
दुआएं देने से
तकदीरें बदलती हैं
नया वर्ष
नया जीवन नहीं लाता

नववर्ष की पूर्व संध्या पर
कैलेंडर के पन्ने बदलते हैं
परिस्थितियाँ नहीं

नए साल का सूर्योदय
नयी रौशनी नहीं लाता
ये तो वही रौशनी है
जो वो सदियों से ला रहा है

नया जीवन
नयी परिस्थितियां
नयी रौशनी
नया वक़्त

नया साल नहीं
नयी सोच ला सकती है
नया नजरिया ला सकता है

नए साल के आने-जाने का क्रम
तो निरंतर चलता जा रहा है

अब हमें
नए वक़्त की जरूरत है


-स्मिता पाण्डेय

मैं नाम तलाश रही हूँ


कुछ बहुत गहरा
बहुत अलग
बहुत ख़ास
एहसास है वो
जो तुमसे जुड़ा है...
ये वो फ़िक्र नहीं
जो एक दोस्त के लिए
महसूस होती है,

न ही ये वो प्यार है,
"शादी" जिसका अंतिम पड़ाव
माना जाता है
नहीं, इस परिधि में भी
नहीं समेट पाती मैं
इस रिश्ते को

तुम्हें पाने की कभी
ख्वाहिश नहीं हुई,
शायद इसलिए...
क्योंकि कभी लगा ही नहीं
तुम दूर हो,
चाहा की तुम्हें भुला दूं
पर भूलूँ भी तो क्या !
तुम्हें कभी
याद ही नहीं किया मैंने...

बहुत सोचा
ये क्या रिश्ता है
तुम्हारा मुझसे...
की जानना चाहती हूँ
"तुम कैसे हो ?"
दुआ करती हूँ
"तुम खुश रहो ?"
अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाने की
तम्मना नहीं तुम्हें...
अपना ही हिस्सा बना बैठी हूँ !

आस-पास की कई नज़रें
सवाल करती हैं मुझसे...
क्या कहूँ ,
क्या नाम दूँ,

मैं नाम तलाश रही हूँ...
ऐसा कुछ सूझता ही नहीं...
जिससे बाँध सकूं तुम्हें
किसी अदने से रिश्ते में...

कवयित्री- स्मिता पाण्डेय

आत्म विवेचन


आत्म विवेचन
बहुत जटिल शब्द है ये!!!
विवेचन करने बैठी
तो पहला प्रश्न
जो समक्ष था
वह यह कि
ये "आत्म " कौन है !

रोज़ कॉलेज जाती-आती
किताबों की उठा-पटक
नम्बरों की जोड़-तोड़
और शिक्षकों के सामने
अपना महत्व बनाये रखने
की मारा-मारी में
कहीं उलझी हुई
"मैं"

"पिज्जा" या "लेज़" के
पैकेट के साथ
दोस्तों के बीच बैठी
हाथ में
कोल्ड-ड्रिंक का कैन लिए
कभी गाने
कभी फिल्में
तो कभी पसंदीदा अभिनेताओं
की चर्चा करती
"मैं"

अपने कमरे में पड़ी
अपनी अव्यवहारिक किताबी पढ़ाई
और व्यवहारिक बनावटी
"रिश्तों की भीड़" की
सार्थकता-निरर्थकता को
आँकने के प्रयास में
डायरी के पन्ने रंगती
और सब "भूल जाने" के
व्यर्थ उद्देश्य से
"खलील जिब्रान की कहानियाँ"
के पन्नों में खोयी
"मैं"

या फिर
हॉस्टल की छत पर
किसी अकेले कोने में
अपने सूनेपन को खँगालती
अपनी ही सजायी दुनिया
के भ्रम को तोड़ती....
अपनी डबडबाई आँखों के
आँसू पोंछती
नज़रें आसमान से हटाकर
अपने लिए एक ज़मीन तलाशती
और अन्दर ही अन्दर कहीं
जीवन की कठोरता को
स्वीकारती
"मैं"

कवयित्री- स्मिता पाण्डेय

आज मैंने खुशी देखी


आज मैंने खुशी देखी
गहरे हरे पत्ते पर
ओस की बूँद की तरह
चमक रही थी...
मैंने ज्यों ही छूने को हाथ बढ़ाया
कि फिसल गयी !!!
झाँककर देखा तो
निचली डाल पर
एक चिडिया बैठी थी,
उसके पंखों पर भी
वही खुशी चमक रही थी ...
देखते ही देखते
वह बिल्कुल मेरे सामने
मुंडेर पर बैठ गयी ,
मैं और पास आई
तो वह उड़कर
नीचे सड़क पर चली गयी,
तेजी से सीढियां उतरकर
जब मैं नीचे पहुँची
तो चिड़िया वहां नही थी...
लेकिन खुशी थी !!!

स्कूल जाती छोटी-छोटी बच्चियों
की मुस्कान में..
मन्दिर की घंटियों
की धुन में...
रिक्शेवाले की
"बोहनी" के १० रुपये में...
बहुत दिनों बाद मिले
दो बुजुर्ग मित्रों की
"हर-हर महादेव" में...
रेडियो पर आने वाले
"भूले-बिसरे गीतों " में...
"कचौडी-जलेबियों" की
खुशबू में ...

रहती तो हमेशा से
यहीं कहीं आस-पास ही थी...
पर,
कई दिनों से नज़र नहीं आई थी

आज बहुत दिनों बाद
मैंने खुशी देखी!!!



कवयित्री- कु॰ स्मिता पाण्डेय

जाने क्यों


जाने क्यों,
कब,
कैसे,
लेकिन कुछ छूट जाता है

बहुत सहेजा,
नाज़ुक रिश्ता,
टूट जाता है....

माँ से हर बात बाँटना
पिता से छोटी-छोटी
चीजों पर ज़िद करना

ज़रा-ज़रा सी बात पर
बहन से रूठना,
भाई से झगड़ना,
परिवार के
हर सदस्य ...
हर वस्तु ...
पर अपना अधिकार
खोने लगता है

जाते हुए मुड़ कर देखना,
किसी के माँगने पर दे देना,
ख़ुशी होते ही हँस देना,
दर्द होते ही रो देना,

ये सभी आदतें
बचकानी-सी लगती हैं,

दोस्तों पर विश्वास,
प्यार पर आस्था,
जड़ों की अहमियत,
यहाँ तक कि
ईश्वर के अस्तित्व पर भी
संदेह होने लगता है ...

लेकिन घूम-फिर कर
थक-हार कर
कभी-न-कभी
जिंदगी में
फिर वो वक़्त
आता है,

जब ज़रुरत महसूस होती है
तलाशने की,
उन खोई हुई जड़ों को,
उन टूटे हुए धागों को,
उन छूटे हुए रिश्तों को ...
अपने अस्तित्व को ....

कवयित्री- कु॰ स्मिता पाण्डेय

मैं चल पडती हूँ


स्मिता पाण्डेय की अन्य कविताएँ

  1. तक़लीफ़ तो होती है

  2. तुम्हारे इंतज़ार में........

नदी के किनारे
ठंडी हवा,
ठिठुरती ठंड में
गर्म धूप,
गर्म रजाई में
उनींदी आँखें,
माँ से बतियाना
और प्याली भर चाय...

दिल तो कहता है रुक जाऊँ...
मगर मैं चल पड़ती हूँ।

भविष्य की तलाश में,
किताबों में
जिंदगी ढूँढ़ते हुए,
साल दर साल
वक़्त बीतता जाता है,

भागते-भागते जब ये एहसास होता है...
दिल तो कहता है रुक जाऊँ...
मगर मैं चल पड़ती हूँ।

बातों-बातों में
जब माँ कहती है,
"मैं तो बूढ़ी हो चली..."
तो दिल में टीस सी उठती है,

क्या मेरा बचपन भी......
अभी तो बहुत सी बातें करनी है इससे,

दिल तो कहता है रूक जाऊँ...
मगर मैं चल पड़ती हूँ।

--स्मिता पाण्डेय

मैं आज भी तुम्हें उसी लाइब्रेरी में मिलूँगी


प्रतियोगिता की सातवीं कविता की रचयिता स्मिता पाण्डेय वाराणसी (सारनाथ) में रहती हूँ। बचपन से ही साहित्य में रुचि रही है। जब भी किसी बात ने इनके मन को छुआ, बस उसे कविता के रूप में काग‍‌ज़ पर उतार दिया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा हूँ। पहली कविता छठवीं कक्षा में लिखी थी और अब जीवन पर्यंत साहित्य से जुड़े रहने की इच्छा है। इनकी एक कविता 'तक़लीफ़ तो होती है' पिछले महीने प्रकाशित हो चुकी है।

पुरस्कृत कविता- तुम्हारे इंतज़ार में........

हाँ
बहुत वक़्त बीत गया,
शायद सदियाँ...
ठीक से याद नहीं,
आखि़री बार कब देखा तुम्हें
पर॰॰॰ फिर भी...
तुम जाते ही नहीं,
अभी तक यहीं हो...
मेरी सांसों में!
कल जब छत पर खडी़
अकेली जूझ रही थी
अपनी उदासियों से,
हवा के झोंके की तरह
तुम्ही नें बाहों में
भर लिया था मुझे !
उस दिन
जब सभी मेरे लिये
तालियाँ बजा रहे थे,
खुशी बनकर
तुम्हीं छलक आए थे
मेरी आँखों से !
रात में जब सो नहीं
पा रही थी मैं,
चाँदनी बनकर
तुमने ही सहलाया था
मुझे प्यार से!
मंदिर की भीड़ से
घबराकर जब कोने में
बैठ गई थी मैं,
विश्वाश की तरह
तुम्हीं मेरी बाँहें थामकर
ईश्वर के करीब
ले आए थे मुझे !
उस लाइब्रेरी में,
जहाँ घंटों साथ होते थे हम
आज भी जाती हूँ मैं...
पहले की ही तरह
१० बजते ही
अब भी नज़रें
घडी़ पर चली जाती हैं,
लगता है अभी आओगे तुम
हाथ में किताब लिए...
बार-बार दरवाज़े की ओर
देखती हूँ,
पर तुम नहीं आते !
कभी वैसे ही चले आओ
हाथ में किताब लिए,
मैं आज भी तुम्हें
उसी लाइब्रेरी में मिलूँगी,
तुम्हारे इंतज़ार में..........


प्रथम चरण मिला स्थान- आठवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- सातवाँ


पुरस्कार- कवयित्री निर्मला कपिला के कविता-संग्रह 'सुबह से पहले' की एक प्रति

स्मिता पाण्डेय को तक़लीफ़ तो होती है


प्रतियोगिता की दसवीं कविता शायद सबसे कम उम्र की कवयित्री की है। इनसे कम उम्र के कवियों की कविताएँ तो हिन्द-युग्म प्रकाशित हुई हैं, लेकिन ये सबसे युवा कवयित्री हैं। कवयित्री स्मिता पाण्डेय वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय में बी॰ए॰ प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। इनकी बचपन से ही साहित्य में रुचि रही। जब भी किसी बात ने इनके मन को छुआ, बस उसे कविता के रूप में काग‍‌ज़ पर उतार दिया। पहली कविता छठवीं में लिखी थी और अब जीवन पर्यंत साहित्य से जुड़े रहने की इच्छा है।

पुरस्कृत कविता- तक़लीफ़ तो होती है

मुझे पता है
जिंदगी हमेशा एक सीधी
लकीर पर नहीं चलती।
मैंने अक्सर देखा है
कलियों के खिलने पर
फ़िज़ा की रौनक
और एक दिन उसका
"पूजा" या "अरथी" के नाम पर
तोड़ लिया जाना।
मुझे पता है,
पर तकलीफ़ तो होती है।
मैं जानती हूँ
दुनिया के लिए
कोई अपना नहीं होता।
मैंने अक्सर देखा है,
धूप में पेड़ की छाँव में
खड़े लोग,
और सर्द रातों में
उसकी बाँहे काट कर
जला दिया जाना।
मैं जानती हूँ,
पर तकलीफ़ तो होती है।
मैं समझती हूँ,
दिल की सुनना,
हमेशा सही नहीं होता।
मैंने अक्सर देखा है
दीए की रौशनी पर
पतंगे का मोहित होना ,
और उसी की लौ से
जलकर उसका मर जाना।
मैं समझती हूँ,
पर तकलीफ़ तो होती है।


प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- २, ६॰७५, ६॰७५
औसत अंक- ५॰१६६७
स्थान- तेरहवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५, ६, ५॰१६६७ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ५॰३८८८
स्थान- पाँचवाँ


अंतिम चरण के जजमेंट में मिला अंक-
स्थान- दसवाँ
टिप्पणी- सिर्फ़ शब्द और संवेदनायें ही अच्छी कविता नहीं रच सकती, उसके भावावेग और अंतर्वस्तु में संतुलन के लिये गहरा जीवनानुभव और पका हुआ इन्द्रियबोध भी उतना ही जरूरी कारक है कविता को प्रभावी और आत्मीय बनाने के लिये। साथ ही कवि की आत्मबद्धता से कविता जितनी मुक्त होगी उतनी ही वह व्यापक हो पायेगी और उसका सामाजिक मूल्य उसी अनुपात में बढ़ता चला जायेगा।


पुरस्कार- ग़ज़लगो द्विजेन्द्र द्विज का ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' की एक स्वहस्ताक्षरित प्रति।