सब कुछ ठीक नहीं है
इस तथ्य की उपेक्षा कर
यथासंभव जीते ही जाना,
आज के वक़्त में
इतना भी काफी है
सड़क जाम में एम्बुलेंस
जीवन-मृत्यु का संघर्ष
छटपटाता हुआ शासन-तंत्र
हालत मात्र गंभीर
इतना भी काफी है
जूठे बर्तन, ईंट-बालू, धुआँ
इनमें सना देश का भविष्य,
संविधान में प्रावधान है
बाल-श्रम निषेध
इतना भी काफी है
अपने मूर्ति रूप में आराध्य
अनेकों "राधा-कृष्ण" की लाशें,
उन्हीं मुहल्लों में दोबारा
प्रेम पनपा है
इतना भी काफी है
मित्रता-प्रतियोगिता का द्वंद्व
वासना का प्रेम से षड़यंत्र,
चंद टुकड़े बेईमानी ही सही
जीवन सफल है
इतना भी काफी है ।
स्मिता पांडेय




आज मैंने खुशी देखी
जाने क्यों,
प्रतियोगिता की सातवीं कविता की रचयिता स्मिता पाण्डेय वाराणसी (सारनाथ) में रहती हूँ। बचपन से ही साहित्य में रुचि रही है। जब भी किसी बात ने इनके मन को छुआ, बस उसे कविता के रूप में कागज़ पर उतार दिया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा हूँ।
प्रतियोगिता की दसवीं कविता शायद सबसे कम उम्र की कवयित्री की है। इनसे कम उम्र के कवियों की कविताएँ तो हिन्द-युग्म प्रकाशित हुई हैं, लेकिन ये सबसे युवा कवयित्री हैं। कवयित्री स्मिता पाण्डेय वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय में बी॰ए॰ प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। इनकी बचपन से ही साहित्य में रुचि रही। जब भी किसी बात ने इनके मन को छुआ, बस उसे कविता के रूप में कागज़ पर उतार दिया। पहली कविता छठवीं में लिखी थी और अब जीवन पर्यंत साहित्य से जुड़े रहने की इच्छा है।

