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वो कौन-सा सपना था भगत?


वह भी मार्च का कोई आज सा ही वक्त रहा होगा
जब पेड़ पलाश के सुर्ख फूलों से लद रहे होंगे
गेहूँ की पकती बालियाँ पछुआ हवाओं से सरगोशी कर रही होंगी
और चैत्र का स्निग्ध चाँद
उनींदी हरी वादियों को चांदनी की शुभ्र चादर से ढक रहा होगा
जब कोयल की प्यासी कूक
रात के दिल में किसी मीठे दर्द सी आहिस्ता से उतर रही होगी
और ऐसे बावरे बसंत में
तुमने शहादत की उँगली में
अपने नाम की अंगूठी पहना दी भगत?
तुम शहीद हो गये?
मैं हैरान होता हूँ
मुझे समझ नही आता है भगत!
जलियावाले बाग की जाफ़रानी मिट्टी में ऐसा क्या था भगत
कि तुमने सारे मुल्क में सरफ़रोशों के फ़स्ल उगा दी?

तुममें पढ़ने की इतनी लगन थी
मगर तुम्हें आइ सी एस पास कर
हाथों में हुकूमत का डंडा घुमाना गवारा न हुआ
तुम अपने शब्दों को जादुई छड़ी की तरह
जनता के सर पर घुमा सकते थे
मगर तुमने सफ़ेद, लाल, काली टोपियों की सियासत नही की
तुमने मिनिस्टर बनने का इंतजार भी नहीं किया
हाँ, तुमने जिंदगी से इतनी मुहब्बत की
कि जिंदगी को मुल्क के ऊपर निसार कर दिया!

भगत
तुम एक नये मुल्क का ख्वाब देखते थे
जिसमें कि चिड़ियों की मासूम परवाज को
क्रूर बाज की नजर ना लगे
जहाँ भूख किसी को भेड़िया न बनाये
और जहाँ पानी शेर और बकरी की प्यास में फ़र्क न करे
तुमने एक सपने के लिये शहादत दी थी, भगत!
और आज,
तुम्हारी शहादत के उनासी बरस बाद भी
मुल्क उसी कोल्हू के बैल की तरह चक्कर काट रहा है
जहाँ लगाम पकड़ने वाले हाथ भर बदल गये हैं
आज
जहाँ नेताओं की गरदन पर पड़े नोटों के एक हार की कीमत
वोट देने वाले मजदूर की
सात सौ सालों की कमाई से भी ज्यादा होती है
और जब क्रिकेट-फ़ील्ड पर उद्योगपतियों के मुर्गों की लड़ाई के तमाशे
टीवी पर बहुराष्ट्रीय चिप्स और शीतल पेयों के साथ
सर्व किये जा रहे होते हैं
तब तुम्हारा मुल्क मुँह-अंधेरे उठ कर
थके कंधों पर उम्मीदों का हल लिये
बंजर खेतों में भूख की फ़स्ल उगाने निकल जाता है
तब किसी लेबर चौराहे की सुबह
चमचम कारों के शोर के बीच
तुम्हारे मुल्क की आँखों में रोटी का सपना
एक उधड़े इश्तहार की तरह चिपका होता है
और शहर की जगमग फ़्लडलाइटों तले अंधेरे में
उसी मुल्क के खाली पेट से उसकी तंद्रिल आँखें
सारी रात भूखी बिल्लियों की तरह लड़ती रहती हैं!
और तरक्की के जिस चाँद की खातिर तुमने
कालकोठरी के अँधेरों को हमेशा के लिये गले से लगा लिया था
वह चाँद अब भी मुल्क के बहुत छोटे से हिस्से मे निकलता है
जबकि बाकी वतन की किस्मत के आस्माँ पे
अमावस की रात कभी खत्म नहीं होती.

आज जब तुम्हारा मुल्क
भूख में अपना ही बदन बेदर्दी से चबा रहा है
तुम्हारे वतन के हर हिस्से से खून टपक रहा है भगत!

मैं नहीं जानता
कि वतनपरस्ती का वह कौन-सा सपना था
जिसने तुम्हारी आँखों से
हुस्नो-इश्क, शौको-शोहरत के सपनों को
घर-बदर कर दिया
और बदले में तुमने अपनी नींद
आजादी के नाम गिरवी रख दी थी।
मुझे समझ नहीं आता भगत
क्योंकि हमारी नींदों पर अब
ई एम आई की किश्तों का कब्जा है
और अपने क्षणिक सुखों का भाड़ा चुकाने के लिये
हम अपनी सोचों का सौदा कर चुके हैं।

और आज फिर उसी मौसम में
जब कि पेड़ों पर सुर्ख पलाशों की आग लगी हुई है
गेहूँ की पकी बालियाँ खेतों में अपने सर कटा देने को तैयार खड़ी हैं
और हरी जख्मी वादियों पर
चाँदनी श्वेत कफ़न-सी बिछ रही है
बावरा बसंत फिर शहादत माँगता है
मगर महीने की तीस तारीख का इंतजार करते हुए
मुझे तेइस तारीख याद नहीं रहती है
मुझे तुम्हारी शहादत नहीं याद रहती है
क्योंकि हम अपने मुल्क के सबसे नालायक बेटे हैं
क्योंकि हम भागांवाला* नही हैं, भगत!

(भागांवाला-सौभाग्यशाली, भगत सिंह के बचपन का नाम)


कवि-अपूर्व शुक्ल

रहबरे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में...


'भगत सिंह विशेष' की आठवीं कड़ी


भगत सिंह की प्रबुद्धता और प्रखरता पर जितना कुछ लिखा जाए कम है. उनकी शख्सियत का हर पहलू अलग से वर्णित होने का अधिकार रखता है. उनकी लेखनी से पता चलता है कि उनमें एक साथ बेहद निर्भीकता व प्रबुद्धता के साथ साथ विनम्रता का अथाह सागर भी था . पंजाब प्रदेश की भाषा व लिपि पर लिखे एक लेख में वे गुरु गोविन्द सिंह का सन्दर्भ देते हुए निम्नलिखित दोहा भी उद्धृत करते हैं;

सूरा सो पहचानिये, लड़े दीन के हेत,
पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट मरे कबहुँ न छाड़े खेत


(बहादुर वही है, जो धर्म के लिए लड़े, चाहे शरीर का पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट जाए, पर जंग का मैदान वह कभी न छोड़े).
अन्तर केवल इतना, कि भगत सिंह के लिए देशभक्ति ही धर्मं था, सो वे अन्तिम साँस तक उसी के लिए लड़े.

पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

  7. हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...
(The Fragrance of Freedom: Writings of Bhagat Singh edited by KC Yadav, Babar Singh Ch. 29 Punjab: The Problem of Language and Script p 217)
दूसरी तरफ़ उनके द्वारा ही उद्धृत गुरु नानक का यह दोहा, जो उनकी विनम्रता की ओर संकेत करता है:

नानक नन्हे हो रहे , जैसी नन्हीं दूब
और घास जरि जात है, दूब खूब की खूब.


(अंहकार-मुक्त विनम्र लोग नन्हे ही बने रहे, जैसे पतली पतली दूब होती है. बाकी सारी घास जल जाएगी, तो भी दूब उतनी ही सुन्दरता से खिली रहेगी, जैसे पहले).
(वही पुस्तक वही लेख p 216)

द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान 'आज़ाद हिंद फौज' की स्थापना करने वाले प्रसिद्व क्रांतिकारी रास-बिहारी बोस द्वारा पंजाब में नियुक्त पहले क्रांतिकारी एल राम सरन दास के लेखों का सन्दर्भ भगत सिंह अपने लेख में देते हैं, और उसी से स्वयं पूरी तरह प्रेरित भी हैं. एल राम सरन दास कहते हैं:

नींव के अदृश्य पत्थर बनो,
और अपने सीने पर खुशी खुशी,
विशाल दीर्घकाय इमारत को झेलो.
कष्ट में ही सच्ची शरण लो,
प्लास्टर लगे शिखर के पत्थर से ईर्ष्या मत रखो,
जिस पर पूरे विश्व की प्रशंसा बरसती है.

(वही पुस्तक - Ch. 2 A Critique of the Indian Revolutionary Movement - Introduction to Ram Saran Das's book : 'Dreamland' p 46)

भगत सिंह को सर्वाधिक आक्रोश साम्प्रदायिकता से होता था. वे धर्म को प्रगति के रास्ते की रुकावट मानते थे. अपने एक लेख में 1928 में हुई किसी राजनैतिक सभा का सन्दर्भ दे कर वे लिखते हैं कि उस सभा में किसी मौलाना ज़फर अली साहब ने कई बार अपनी बात में - 'खुदा खुदा'. कहा. तब सभा के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने बीच में ही टोकते हुए कहा - 'इस मंच से 'खुदा खुदा' मत पुकारो. अगर आप धर्म (Religion) के संदेशवाहक हैं, तो मैं धर्मं-हीनता (Non-religion) का'.

(वही पुस्तक Ch 27 Religion and National Politics p 207)

उसी लेख में भगत सिंह लिखते हैं - 'क्या धर्म लोगों के बीच बुरा प्रभाव नहीं डालता? क्या वह संपूर्ण स्वतंत्रता के रास्ते में रुकावट नहीं पैदा करता? हम में से जो लोग संपूर्ण स्वतंत्रता के लिए काम करते हैं, वे धर्म को मानसिक गुलामी मानते हैं. उनका कहना है कि बच्चों को यह बताना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, और हम सब कुछ नहीं, हम तो केवल कांच के खिलोने मात्र हैं, उन्हें जीवन भर के लिए कमज़ोर बनाना है. इस से उनके ह्रदय कमज़ोर होते हैं तथा उनका आत्म-विश्वास मरता है'. (p 208).

धर्म और व्यावहारिकिता के बीच के द्वंद्व पर करारी चोट करते भी वे संकोच नहीं करते. वे कहते हैं - 'गुरुद्वारों में सिख लोग 'खालसा राज' की बात करते हैं, पर जब वे बाहर आते हैं तो 'पंचायत राज' की बात करते हैं. इन दोनों के बीच हम कैसे सामंजस्य बैठाए?'

(वही पुस्तक वही लेख p 208)

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं - 'इस्लाम कहता है कि जो काफिर इस्लाम में विश्वास नहीं करता, उसे तलवार से उड़ा दो. और इस के बावजूद हम एकता की बात करते हैं... दरअसल धर्म रूपी यह पहाड़ हमारा रास्ता रोक रहा है. कल्पना करें कि स्वाधीनता संघर्ष आज ही शुरू होता है. दो सेनाएं आमने सामने खड़ी हैं. जब युद्ध शुरू ही होता है, तब जैसा कि एक कहानी में कहा गया है, कोई सामने गौएँ, सूअर, ग्रन्थ साहब, वेद, कुरान आदि रख देता है. यदि हम वास्तव में धार्मिक लोग हैं, तो युद्ध किए बिना घर लौट जाएंगे. हिंदू गाय पर गोली नहीं चला सकते. मुस्लिम और सिख सूअर का सामना नहीं कर सकते.. इस सब से क्या निष्कर्ष निकलता है? ..हम धर्म के विरुद्ध सोचने पर विवश हैं...' (p 209).

महात्मा गांधी अपने एक लेख में गोरक्षा पर होते झगड़ों को ले कर लिखते हैं कि हिंदू के लिए गोमांस खाना अधर्म है. पर इस के लिए उसका मुस्लिम से झगड़ना ज़रूरी नहीं है. 'मुसलमान हमारी बात समझ सके, इस के लिए ज़रूरी है कि हम अपना दृष्टिकोण उसके सामने रखें. गोरक्षा तलवार की नोंक पर तो नहीं हो सकती. गोरक्षा मुसलमान की सद्भावना के बिना नहीं हो सकती...'

(Hindu Dharma by MK Gandhi: Cow Protection p 112)

यानी गाँधी, जिन्होंने गाय का दूध पीना ही त्याग दिया था, क्यों कि गाय अपने बछड़े को भूखा रख कर हमें अपना रक्त देती है, किसी भी प्रकार के झगड़े के पक्ष में नहीं थे. या मुस्लिम के प्रति किसी भी प्रकार की आक्रामकता के. भगत सिंह, टकराती हुई आस्थाओं से जुड़ी इन्हीं बातों को अप्रत्यक्ष में दूसरे ढंग से कहते हैं - 'जिस दिन हम सरस्वती-पूजन करते हैं, उस दिन (लाहौर में) यह ज़रूरी है कि हम बैंड-बाजे समेत एक जुलूस निकालें. अब रास्ते में हरिमन रोड पर एक मस्जिद पड़ती है. इस्लाम कहता है कि मस्जिद के सामने संगीत न बजाओ. हम क्या करें? लोगों को संगीत बजाते हुए वहां से जाने का अधिकार है. पर इस्लाम कहता है नहीं. एक के धर्म में गाय की बलि अनिवार्य है, दूसरे के धर्म में गाय की पूजा होती है. हमें क्या करना चाहिए? हम उस समय क्या करें जब एक पीपल के पेड़ की डाली को काटना ही धर्म में हस्तक्षेप बन जाता है?'...

(The Fragrance of Freedom: Writings of Bhagat Singh edited by KC Yadav, Babar Singh Ch. 27 Religion and National Politics p 210)

यदि एक नज़र गांधी और भगत सिंह की बातों को आमने सामने रख कर देखें, तो आख़िर भगवान् में आस्था रखने वाले गांधी और भगवान् में अनास्था रखने वाले भगत सिंह के उद्देश्यों में क्या अन्तर है? गाँधी धर्म को हिंदू-मुस्लिम एकता का एक सेतु बनाना चाहते हैं, तो भगत सिंह धर्म से ही खिन्न हो उठते हैं. पर दोनों का निष्कर्ष यही कि यदि हिंदू-मुस्लिम लड़ेंगे, तो फ़िर ब्रिटिश के ख़िलाफ़ मोर्चा कौन बांधेगा?

पर धर्म को ले कर सब से बड़ी विडम्बना भारत में यही रही, कि धर्म की रक्षा के नाम पर एक धर्म के लोगों की एकता का अर्थ दूसरे धर्मों के लोगों से शत्रुता हो गया. यह सर्वविदित है कि मुस्लिम शासकों के दौरान हिंदू-मुस्लिम कमोबेश सद्भावना और सौहार्द्र से ही रहते थे और दंगे शब्द से जनता अभी अपरिचित थी. पर मैंने जहाँ तक इतिहास पढ़ा है उस के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी में सब से पहले दंगे तब हुए जब स्वामी दयानंद सरस्वती ने अचानक गोरक्षा की बात छेड़ दी. मुसलमान आज की तरह तब भी बेहद महंगा गोमांस नहीं खाते थे. केवल कुछ अति धनाढ्य मुसलमान गो-मांस खाते थे. पर बात धर्म की आ गई, तो गरीब-अमीर मुसलमान सब के सब एकजुट हो गए. यानी धर्म की रक्षा दूसरे धर्म के लोगों को ललकारने का एक साधन बन गई! युद्ध का मैदान!. स्वामी दयानंद सरस्वती ने अचानक हिन्दुओं को आह्वान कर दिया कि चलो, वापस वैदिक काल में चलते हैं. वैदिक संस्कृति को ही मौलिक हिंदू धर्म घोषित करने के उनके रास्ते पर एक तो हिंदू समाज ने ही चलने से लगभग इनकार कर दिया. पारंपरिक हिंदू समाज न तो मूर्ति-पूजन भूल पाया, और न जाति-प्रथा से मुक्ति पा सका, जबकि स्वामी दयानंद सरस्वती को तो प्रकाश ही तब मिला, जब उनका किशोर मन शिवजी की एक मूर्ति पर निर्भीकता से घूम रहे एक चूहे को देख मूर्तियों के विरिद्ध विद्रोह कर उठा! पर अपने इस नए धर्म के तहत उन्होंने जो मुसलामानों पठानों तक को 'शुद्धिकृत' करना शुरू कर दिया, वह कतिपय विद्वानों को अस्वाभाविक ही लगा, क्यों कि स्वामीजी का कहना था कि यहाँ के मुस्लिम भी पहले हिंदू थे. वे स्वयं को शुद्ध करके वापस हिंदू धर्म में आ सकते हैं.! स्पष्ट है कि हिंदू-मुस्लिम समाज में एक दृश्य या अदृश्य दीवार खड़ी हो गई, जिस पर गोरक्षा आन्दोलन ने आग में घी जैसा काम किया.

लोकमान्य तिलक के विषय में भी इसी से मिलती-जुलती बातें कही गई थी. वे शुद्ध शास्त्र-प्रेमी थे. वेदों के प्रकांड पंडित. देश-भक्त व बेहद ऊंचे चरित्र के साथ साथ वे भारत के 'स्वाधीनता संघर्ष के पितामह' भी माने गए. 'भारत के पहले जन-नेता' या 'भारत के पहले पूर्ण-कालिक राजनीतिज्ञ', जिन्होंने जनता जनार्दन को भी स्वाधीनता संघर्ष से जोड़ा. उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के लिए जो जद्दो-जहद की, वह स्वाधीनता के इतिहास का एक स्वर्ण-पृष्ठ है. देश को पहली बार पता चला, Reading Room क्या होता है, या पुस्तकालय किसे कहते हैं. पर जब तिलक के अनुयायी घबरा कर उन्हें बताते हैं कि मुंबई में हिंदू-मुस्लिम दंगे हो गए हैं (जिनकी शुरुआत गोरक्षा-आन्दोलन के प्रारंभ से ही उत्तरी भारत के कुछ शहरों से हुई थी) तब वे कुछ ही समय बाद अचानक गणेश-पूजन का त्यौहार शुरू कर के हिन्दुओं को एकता का आह्वान दे देते हैं. तब गोपाल कृष्ण गोखले, गोपाल गणेश अगरकर व जस्टिस महादेव रानाडे जैसे प्रबुद्ध विचारकों व देश-भक्तों के गले, तिलक का यह धर्म-प्रेम ठीक से उतर नहीं पाया था, उनके अनुसार इससे हिंदू-मुस्लिम सौहार्द्र सहसा समाप्त हो गया. नतीजतन अगले ही वर्ष पूना में भी दंगे हो गए. धर्म से चिपके रहना या तो अस्तित्ववाद का ही दूसरा रूप बन जाता है, या अन्य धर्मों के लोगों से शत्रुता का.

पंजाब में स्वामी रामतीर्थ की देश-भक्ति व शख्सियत से भगत सिंह बेहद प्रभावित थे. स्वामी रामतीर्थ प्रसन्नता से गाते हैं:

हम रूखे टुकड़े खाएंगे, भारत पर वारी जाएंगे,
हम सूखे चने चबाएंगे, भारत की बात बनाएंगे,
हम नंगे उमर बिताएंगे, भारत पर जान मिटाएंगे.

स्वामी रामतीर्थ जब अमेरिका में थे, तब शाम के सामय सूर्य को अस्त होते देख उनकी आंखों में आंसू आ जाते. वे सूर्य से नमन कर के कहते - 'इस क्षण तुम मेरे प्यारे देश में उदय हो रहे हो. मेरे ये अश्रु, भारत के सुंदर, सिंचित खेतों पर ओस कणों की तरह बिखेर देना'.

(The Fragrance of Freedom: Writings of Bhagat Singh edited by KC Yadav, Babar Singh Ch. 29 Punjab: The Problem of Language and Script pp 218, 219)

हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग को अछूत कहा जाता है, इस पर भगत सिंह की कलम एक चाबुक की तरह चलती थी. वे लिखते हैं - '30 करोड़ में से 6 करोड़ लोगों को अछूत माना जाता है, जिन के स्पर्श मात्र से धर्म प्रदूषित हो जाता है. मन्दिर में उनके प्रवेश करते ही देवी-देवता खिन्न हो उठेंगे. जिस कुँए से वे पानी पिएंगे, वह अपवित्र हो जाएगा. यह शर्मनाक है कि ऐसे प्रश्न बीसवीं सदी में भी उठते हैं'.

(वही पुस्तक Ch 31 The Problem of Untouchability p 231).

भारत की आध्यात्मिक विरासत पर खोखला व आक्रामक दंभ रखने वाले जो लोग 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' या 'हिन्दी हिंदू हिन्दुस्तान' जैसे नारों से गला फाड़ कर देश में अशांति फैलाते हैं, उनके सामने भगत सिंह का एक ही तर्क तलवार का काम कर सकता है. वे कहते हैं - 'हमारा देश आध्यात्मिक माना गया है और हम इंसान को ही इंसान नहीं समझते. इस के विरुद्ध कई योरपीय देशों में, जिन्हें हम भौतिकवादी कह देते हैं, इस प्रकार के तंत्र के विरुद्ध आवाजें उठती हैं'.
(वही पृष्ठ)
यह एक शर्मनाक सत्य है कि आज इक्कीसवीं सदी में भी ऐसे असंख्य दक्षिणपंथी व्यक्ति व संस्थाएं हैं, जो लोगों की चेतनाएं यह कह कर झकझोर देना चाहती हैं कि ब्रिटिश ने आ कर हमारी महान् हिंदू संस्कृति का ह्रास कर दिया व अपनी म्लेच्छ संस्कृति हम पर थोप दी. पर वे आईने उठा कर हिंदू समाज में व्याप्त असहिष्णुता व विषमता को नहीं देख पाते, जिस में आज भी दलित लोगों की हत्याएं होती हैं, व आज भी उच्च जाति की लड़की से प्रेम करने वाले दलित युवकों की आँखें निकाल देने तक जैसी शर्मनाक खबरें पढ़ने को मिलती हैं. पर भगत सिंह एक और आड़े हाथों लेने वाला प्रश्न भी उक्त लेख में उठाते हैं. 'हमें शिकायत है कि हमें विदेशों में सम्मान से नहीं देखा जाता और ब्रिटिश हमें अपनी ही भूमि पर अधिकार या बराबरी का दर्जा नहीं देती. क्या हमें ऐसी शिकायतें करने का अधिकार है? (वही पृष्ठ).
(जब कि हम स्वयं अपने देश में ही समाज के एक बड़े वर्ग को बराबरी का दर्जा न दे कर उसे ज़लालत से ही देखते हैं').

ऐसे विरोधाभासों की तरफ़ केवल भगत सिंह की तलवार-नुमा लेखनी ही संकेत कर सकती थी.

आज जितने शर्मनाक तरीके से हिंदू कट्टरपंथी, निहत्थे निर्दोष ईसाइयों को जिंदा जला रहे हैं, उनकी महिलाओं का बलात्कार कर के उन्हें नग्न-अर्ध-नग्न घुमा कर न जाने कौन सी हिंदू विरासत को बचा रहे हैं, गर्व से कहते हैं कि हम हिंदू हैं, 'पहले कसाई फिर ईसाई' जैसे अमानवीय नारे देते हैं, वह सब एक दर्पण है. इन सब को चाहिए कि भगत सिंह का उक्त लेख पढ़ें. भगत सिंह कहते हैं - 'यदि तुम उनको (अछूतों व दलितों को) जानवरों से भी बदतर कर के रखोगे, वे निश्चित रूप से उन धर्मों की तरफ़ जाएंगे, जो उन्हें अधिक अधिकार दें तथा अधिक मानवीय व्यवहार करें. तुम लोगों के ये वक्तव्य कि ईसाई तथा मुस्लिम हिन्दुओं को हानि पहुँचा रहे हैं, कोई अर्थ नहीं रखते...लाला लाजपत राय ने एक बार हिंदू महासभा जैसी कट्टर संस्था में चल रहे एक विवाद के दौरान सहसा अछूतों के पक्ष में खड़े हो कर कहा था - 'हमारी गोद में कुत्ता बैठ सकता है. एक चूहा हमारी रसोई में घूम सकता है. पर यदि एक इंसान वही करे या हमें स्पर्श मात्र करे तो हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाता है!' (p 232).
.
पर मदन मोहन मालवीय पर चुटकी लेने में भी भगत सिंह नहीं हिचकिचाते. वे कहते हैं - 'इन दिनों मालवीय जी जैसे सुधारक अछूतों के उद्धारक होने की बात करते हैं. वे एक जमादार द्वारा स्वयं को माला पहनाए जाने की अनुमति दे देंगे. पर जब तक वस्त्रों समेत नहा नहीं लेंगे तब तक स्वयं को प्रदूषित ही महसूस करेंगे. कैसा तो धोखा है!... (p 232-233).

क्रमशः॰॰॰॰॰॰

लेखक- प्रेमचंद सहजवाला

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...


'भगत सिंह विशेष' की सातवीं कड़ी


सन् 1897 में जब पूना शहर में प्लेग फ़ैल गया, तब 22 जून को इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की हीरक जयंती पर, ब्रिटिश के खिलाफ पहला क्रांतिकारी हमला हुआ. पूना में चापेकर बंधुओं, दामोदर हरि व बालकृष्ण हरि ने क्रमशः पूना के प्लेग कमिश्नर रैंड व ज़िला मजिस्ट्रेट एयरस्ट की हत्या कर दी. इस साज़िश में उनका तीसरा भाई वासुदेव भी शामिल था तथा उसने बाद में पुलिस को सूचना देने वाले एक व्यक्ति की भी हत्या कर दी थी. तब से ले कर भगत सिंह की शहादत तक युवकों की एक लम्बी सूची है, जिन के मन में फिरंगी कौम के ख़िलाफ़ एक विद्रोह की आग हर समय
पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...
भड़की रहती. वे न तो जान की परवाह करते, न क्रान्ति के मुश्किल रास्तों की. दामोदर चापेकर व उनके दोनों भाइयों, बालकृष्ण तथा वासुदेव ने मातृभूमि के लिए हँसते-हँसते फांसी के फंदे को चूम लिया... 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस व प्रफुल्ल चाकी ने बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले में मजिस्ट्रेट किंग्स्फोर्ड पर बम फेंकना चाहा, जो उन्हें लगा कि एक बग्गी में बैठा था. पर दरअसल बग्गी में दो अँगरेज़ महिलाएं, श्रीमती केनेडी व कुमारी केनेडी बैठी थी, जो इस हमले की शिकार हो कर चल बसी. खुदीराम बोस ने 11 अगस्त 1908 को खुशी-खुशी फांसी के तख्ते पर झूल कर शहादत ओढ़ ली, व प्रफुल्ल चाकी ने उसी वर्ष 1 मई को जेल में अपनी ही पिस्टल से मौत को गले लगा लिया... 2 जून 1908 को बंगाल के अरविन्द घोष 'मानक-तला बम षड्यंत्र' में गिरफ्तार हुए. चित्तरंजन दास, जो कि एक नामी-गिरामी वकील थे और देश के लिए लाखों की कमाई वाली वकालत छोड़ कर गाँधी जी की राह पर चल पड़े थे, ने बेहद निपुणता व निष्ठा से उनका मुकद्दमा लड़ा और अरविन्द बरी हो गए. फ़िर अरविन्द ब्रिटिश की सीमा से निकल कर फ्रांस की सीमा में पांडिचेरी चले गए, जहाँ उन्होंने आध्यात्मिकता की राह पकड़ ली... 1 जुलाई 1909 को लन्दन के 'इम्पीरिअल इंस्टीच्यूट' में मदन लाल ढींगरा ने राज्यसचिव मोरले के राजनैतिक सहायक सर विलियम हट्ट कर्ज़न विल्ली की गोली मार कर हत्या कर दी. वहाँ कोई समारोह हो रहा था और गोली चलते ही बीच बचाव की कोशिश करते एक पारसी डॉ कोवास लालकक्का भी मारे गए. 17 अगस्त 1909 को मदनलाल ढींगरा ने लन्दन के पेंटोनविल्ले जेल में मृत्यु का वरण किया (और 12 दिसम्बर 1976 को उनकी पवित्र अस्थियाँ भारत लाई गई)... 23 दिसम्बर 1912 को वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंग एक हाथी पर घूम रहे थे कि उन पर बम से हमला हुआ. वाइसरॉय बच गए, पर पर हाथी पर लगी उनकी छतरी की देखभाल करने वाला उनका सेवक मारा गया. इस योजना का षड्यंत्र रास बिहारी बोस ने रचा और क्रांतिकारी सचिन्द्र नाथ सान्याल भी इस में शामिल थे...जनवरी 1924 में बंगाल के क्रांतिकारी युवक गोपीनाथ साहा ने कलकत्ता के पुलिस-कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट को मारना चाहा, पर गलती से उन्होंने किसी मि. डे की हत्या कर दी और फांसी के तख्ते पर चढ़ कर देश के लिए आहूति दे दी...9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा आयोजित 'काकोरी रेल डकैती' हम पढ़ चुके हैं...18 अप्रैल 1930 को चिट्टागोंग (जो अब बांग्लादेश में है) में सूर्य सेन, जिन्हें लोग इज्ज़त से मास्टर-दा कहते थे, ने प्रसिद्ध 'चिट्टागोंग शास्त्र डकैती' का आयोजन किया. सूर्य सेन की संस्था 'इंडियन रिवोल्यूशनरी आर्मी' के गणेश घोष, लोकनाथ पाल व तारकेश्वर दस्तीदार आदि ने ब्रिटिश के शस्त्रागार से शस्त्रों की डकैती की. 22 अप्रैल 1930 को चिट्टागोंग की जलालाबाद पहाड़ियों की तलहटियों में पुलिस व इन सभी जांबाज़ जवानों के बीच मुठभेड़ हुई. कई जवान शहीद हुए. सूर्य सेन व दस्तीदार को चिट्टागोंग जेल में फांसी दी गई...जब 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलिआंवाला बाग़ में जनरल डायर ने अपनी नृशंसता का प्रमाण दिया, तब पंजाब के राज्यपाल माइकेल ओ ड्वायर थे. उन्हें 13 मार्च 1940 को लन्दन के कैक्सटन हॉल में ऊधम सिंह ने गोली से उड़ा दिया. ऊधम सिंह को 13 जून 1940 को लन्दन में मृत्यु-दंड दिया गया. (उनकी पवित्र अस्थियाँ भी 19 जुलाई 1974 को भारत लाई गई)....ऐसे कई जवान थे जिन्होंने उस 'वैयक्तिक शौर्य' से भारत का इतिहास रचना चाहा, इतिहासकार जिसे 'Individual Heroism' कहते हैं. ये सब चाहते तो जीवन के सुख भोग सकते थे, ऐशो-आराम की जिंदगी बिता सकते थे, पर उन्हें मातृभूमि के लिए बलिदान का रास्ता चुनना था, सो उसी पर चल पड़े और बलिदान को देश-भक्ति का पर्याय बना कर अपने लहू से ही भारत का इतिहास रचा. इस 'वैयक्तिक शौर्य' या Heroism ने आज़ादी ला कर दी या नहीं, इस पर विवाद हो सकता है, पर ये नौजवान देश-भक्ति व ऊंचे चरित्र की ऐसी बेजोड़ मिसाल थे, जो अन्यत्र मिलनी मुश्किल है. ये सब स्वाधीनता-संघर्ष की राह पर टिमटिमाते दीपक थे, जिन के सीनों में देश-प्रेम की ज्वाला मृत्यु के क्षण तक दमकती रही.

इन में से कई युवक केवल शारीरिक बहादुरी ही नहीं रखते थे, वरन उनका बौद्धिक स्तर भी बहुत ऊंचा था. जैसे अरविन्द ने आध्यात्मिकता की राह पकड़ी तो आध्यात्मिकता के शिखरों को छुआ और स्वामी विवेकानंद, राजा राम मोहन रॉय और अन्य कई प्रखर आध्यात्मिक विभूतियों की श्रेणी में गिने गए. रामप्रसाद 'बिस्मिल' बहुत आला स्तर के शायर थे, जिन्होंने 'सरफरोशी की तमन्ना...' जैसी कालजयी गज़लें लिखी, जो आज भी किसी नौजवान के सीने में एक बगावत का तूफ़ान खड़ा कर सकती हैं.

भगत सिंह एक अन्य प्रकार से इन सभी युवकों में प्रखरतम रहे. वे ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे, पर लेनिन उनका सब से पूज्य व्यक्ति रहा. इसीलिये उन्हें अक्सर भारतीय लेनिन कहा गया है. यहाँ भगत सिंह की बौद्धिक प्रखरता का वर्णन करते हुए यह ज़रूरी नहीं कि हम उनकी लेनिन प्रेरित वामपंथी वैचारिकता से भी सहमत हों. वामपंथी रास्तों पर चलने वाले देशों ने भी समय के साथ जान लिया कि 'साम्यवाद' एक मृग-तृष्णा है, पर भगत सिंह भी लेनिन की तरह सर्वहारा वर्ग की पीड़ा को बहुत गहराई तक महसूस करते थे व उसी वर्ग में उनकी आस्था भी थी. यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि प्रायः किसी भी युवक का 'साम्यवाद' से लगाव एक कच्चे घड़े की तरह हो जाता है. वह लगाव या तो भावात्मक होता है या 'कम्युनिस्ट' लाफ्फज़ी का शिकार. जैसे कोई नौजवान यह सुन ले कि दुनिया में कैसा अंधेर चल रहा है, कोई सोने-चांदी से नहाता है, तो कोई भीख मांगता है, बस इसी से वह 'कम्युनिज़म' का दीवाना हो जाए. ऐसे नौजवानों में भावना का तूफ़ान होता है, पर विश्लेषण-बुद्धि नहीं होती. भगत सिंह व उनके साथियों का 'साम्यवाद' से लगाव भी जेलों में जाने तक रागात्मक अधिक था. पर जब 'असेम्बली बम काण्ड' के बाद भगत सिंह ने बाकी की संक्षिप्त सी ज़िंदगी जेलों में काटी तब उन्हें अपनी बौद्धिक प्रखरता को मांजने-सँवारने का स्वर्णिम अवसर मिला. उनके लिए जेल एक पुस्तकालय सा बन गया. यहाँ भगत सिंह और पंडित जवाहरलाल नेहरू में बहुत गहरी समानता मिलती है. पंडित नेहरू ने भी जेल से प्राचीन-कालीन संस्कृतियों से शुरू कर के आधुनिक समय तक का पूरे विश्व का वृहद् इतिहास लिखा. भगत सिंह भी एक तपस्वी की तरह अध्ययन-मनन करते थे. चाहे रूसी उपन्यासकार दोस्तोयेव्स्की का उपन्यास 'अपराध और दंड' हो, चाहे ह्यूगो का उपन्यास 'पद-दलित', या फ़िर वर्ड्सवर्थ का काव्य ही क्यों न हो. विश्व के सभी देशों में हुई क्रांतियों के इतिहास, समय के हर पन्ने पर विश्व में मची उथल-पुथल को समझना, गहरा चिंतन करना. यही था भगत सिंह का जेल-जीवन. यह कहना अतिशयोक्ति न होगी, कि उनके समकालीन सभी क्रांतिकारी साथियों में जितना ज्ञान था, उन सब के कुल ज्ञान से भी अधिक अकेले भगत सिंह में था. भावात्मक लगाव के कच्चे गलियारों से निकल कर वे परिपक्वता-प्रखरता की उन मंज़िलों तक पहुंचे, जो उनकी परवर्ती युवा पीढियों के लिए आज भी एक मिसाल हैं. इसी परिपक्वता के दौरान ही उन्होंने वे चंद लेख लिखे थे, जिन में उन्होंने लिखा था कि बम और पिस्टल के रास्ते से आज़ादी नहीं मिल सकती. पर उनके कतिपय साथियों ने उनके इन नए विचारों को जेल में बीत रही ज़िंदगी के कारण हुआ हृदय-परिवर्तन समझने की भूल की. उनका मानना था कि अब क्यों कि भगत सिंह को मृत्यु-दंड घोषित हो चुका है, इसलिए किसी खौफ के मारे उनके विचारों में एक अप्रत्याशित परिवर्तन आया है और वे अपने ही चुने हुए रास्ते को नकार रहे हैं. पर यह उनके मित्रों की एक भारी भूल थी. जेल की कोठरी में लापरवाही से अपना बरमूडा, टी-शर्ट व हैट पहने पुस्तकें पढ़ने वाले भगत सिंह को यह पता भी नहीं था कि डर आख़िर है किस चिड़िया का नाम. उस गहरे चिंतन के दौरान ही उन्होंने अपनी कलम से क्रान्ति को परिभाषित भी किया था- 'क्रान्ति परिश्रमी विचारकों और परिश्रमी कार्यकर्ताओं की पैदावार होती है. दुर्भाग्य से भारतीय क्रान्ति का बौद्धिक पक्ष हमेशा दुर्बल रहा है. इसलिए क्रान्ति की आवश्यक चीज़ों और किए गए काम के प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया गया. इसलिए एक क्रांतिकारी को अध्ययन-मनन को अपनी पवित्र ज़िम्मेदारी बना लेना चाहिए.' ('शहीदे-आज़म की जेल नोटबुक - अनुवाद विश्वनाथ मिश्र, संपादन सत्यम वर्मा').

जब जेल में उनकी मनोवांछित पुस्तकें न पहुँच पाती, तब ऐसी परिस्थिति भगत सिंह के लिए असहनीय हो उठती. उन्होंने 24 जुलाई 1930 को 'लाहौर सेंट्रल जेल' से सुखदेव के भाई जयदेव के नाम एक पत्र भेजा, जिसमें किताबों की एक लम्बी सूची लिख दी, कि 'द्वारकानाथ पुस्तकालय' से निम्नलिखित पुस्तकें ले कर ज़रूर भिजवा देना. पुस्तकों के नामों से ही उनकी विद्वता का स्तर आँका जा सकता है. इनमें बर्ट्रेंड रूसेल की 'व्हाई मैन फाइट' भी होती तो कार्ल मार्क्स की 'सिविल-वार इन फ्रांस' भी होती. यह पहले ही कहा जा चुका है कि केवल आज़ादी पाना ही भगत सिंह की मंज़िल नहीं थी. वरन आज़ादी पाने के बाद देश के सर्वहारा वर्ग को खुशहाली की मंज़िल तक ले जाने वाले अंतहीन रास्ते पर चलना ही उनका ध्येय था. जैसे 'बिस्मिल' का एक शेर है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ,
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.

इसलिए निरंतर चिंतन भी जारी रहता, और जेल में ही उन्होंने असंख्य लेख भी लिखे, कुछ पुस्तकें भी, जो पिछले कई वर्षों से लगातार चल रहे शोध के बाद प्रकाश में भी आ रही हैं. जिस क्षण भगत सिंह को मृत्यु-दंड होना था, उस से कुछ घंटे पहले भी, वे जेल की कोठरी में अपने नीले रंग के बर्मूडे व टी- शर्ट तथा हैट में लापरवाह से बैठे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. ऊपर संदर्भित पुस्तक 'शहीदे-आज़म की जेल नोटबुक' के पृष्ठ 19 पर भगत सिंह की भतीजी वीरेंद्र सिन्धु द्वारा लिखित पुस्तक 'युगद्रष्टा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे' का सन्दर्भ दे कर उन्हीं की (वीरेंद्र सिन्धु की) कही हुई बात लिखी है - 'भगत सिंह के लिए लेनिन से अधिक करीबी और कौन था? वे अपनी मृत्यु से पहले उन से मिलने को उत्सुक थे और उनके लिए लेनिन की जीवनी पढ़ने का अर्थ लेनिन से मिलना था'. जब भगत सिंह दिल्ली में 'असेम्बली बम काण्ड' पर चल रहे मुकद्दमे के बाद लाहौर की जेलों में भेजे गए, तब के एक दिन का सन्दर्भ देना यहाँ काफ़ी है. 1930 की 24 जनवरी को रूस में मनाए जा रहे 'लेनिन दिवस' (लेनिन का देहांत 24 जनवरी 1924 को हुआ था) के अवसर पर भगत सिंह व उनके सभी आरोपी साथी लाल रंग के स्कार्फ पहन कर अदालत में आए. सभी आपस में देश की चर्चा कर रहे थे तथा बार-बार क्रांतिकारी नारे भी लगा उठते. भगत सिंह ने मजिस्ट्रेट की मेज़ पर एक टेलीग्राम रख दिया कि इसे कृपया मॉस्को भेजा जाए, जहाँ 'लेनिन दिवस' पर 'तृतीय अंतर्राष्ट्रीय' सम्मलेन हो रहा है. टेलीग्राम में भगत सिंह ने लिखा था- "हम 'लेनिन-दिवस' के सुअवसर पर कॉमरेड लेनिन द्वारा चलाए गए महान प्रयोग की सफलता पर हार्दिक बधाई देते हैं. हम विश्व के इस क्रांतिकारी आन्दोलन के साथ अपने नाम को जोड़ने के इच्छुक हैं. मज़दूर-हुकूमत जिंदाबाद. पूंजीवाद का सर्वनाश हो. साम्राज्यवाद मुर्दाबाद".

भगत सिंह व दत्त को 16 अप्रैल तक चांदनी चौक कोतवाली में रखा गया था. फिर उन्हें 'Old Secretariat' के निकट 'Civil Lines' पुलिस चौकी भेजा गया. तदनंतर दोनों को दिल्ली जेल भेजा गया. पुलिस ने तुंरत एक के बाद एक गिरफ्तारियां करनी शुरू कर दी. लाहौर में भगवती चरण वोहरा द्वारा किराये पर लिए गए एक मकान से सुखदेव, जय गोपाल व किशोरी लाल गिरफ्तार हो गए. उनके पास बम बनाने के कई उपकरण व बम बनाने के तरीके सिखाने वाला साहित्य भी मिला था. यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि सुखदेव ने न तो सांडर्स हत्या काण्ड में हिस्सा लिया था, न असेम्बली बम काण्ड में. फिर भी भगत सिंह व राजगुरु के साथ उन्हें भी मृत्यु दंड मिला, यह एक पहेली हो सकती है. दरअसल सुखदेव लाहौर में 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' के दफ्तर को बखूबी संभालते थे व नित नए रंगरूट संस्था में लाते थे. लाहौर में बम बनाने के सिलसिले में भी सुखदेव बेहद सक्रिय रहते. .

भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह लाहौर से दिल्ली जेल में उनसे मिलने आए. पर उन्हें मिलने की अनुमति नहीं दी गई. भगत सिंह ने पिता को एक पत्र लिख कर बताया कि उन्हें किसी भी वकील की ज़रूरत नहीं है. उन्होंने पिता को यह भी लिखा कि यदि आप फिर मुझसे मिलने आएं तो अकेले ही आएं, माँ को न लाएं, क्योंकि माँ बेवजह रोने लगेगी.

दिल्ली की ज़िला जेल में ही 7 मई 1929 को ऐडीशनल मजिस्ट्रेट एफ बी पूल के सम्मुख भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त के ख़िलाफ़ सुनवाई शुरू हुई. बचाव पक्ष की तरफ़ से प्रसिद्व वकील व कांग्रेस नेता असफ अली प्रस्तुत हुए. तदनंतर जून 1929 के प्रथम सप्ताह में आरोप तय होने के बाद दिल्ली के सेशन जज की अदालत में दोनों पर मुकद्दमा शुरू हुआ. दोनों बहादुर युवक अदालत में 'इन्कलाब जिंदाबाद' 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' के नारे लगाते. अदालत में उपस्थित अनेक लोगों की आंखों में अक्सर आंसू होते. 10 जून 1929 को मुकद्दमे की कार्रवाई सम्पन्न हुई और 12 जून को फ़ैसला सुनाया गया, जिस में भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त को असेम्बली में बम फेंकने के आरोप में देश-निष्कासन में उम्र-कैद की सज़ा सुनाई गई...

इसके शीघ्र बाद 'सांडर्स हत्या काण्ड' के सिलसिले में भगत सिंह को लाहौर भेजा गया. वे पंजाब की 'मिआंवाली वाली' जेल पहुंचे तो वहां अनेक राजनैतिक कैदियों से उनकी मुलाक़ात हुई. पर जेल में इन राजनैतिक कैदियों को जिस दुर्दशा में रखा जा रहा था, वह भगत सिंह से देखी नहीं गई और 15 जून से ही उन्होंने अपने साथियों समेत भूख हड़ताल शुरू कर दी, जो ब्रिटिश की निर्ममता के आगे अडिग रहने वाली इन नौजवानों की वीरता के इतिहास का एक और स्वर्णिम पन्ना है. जब भूख हड़ताल को 15 दिन हो गए तब 30 जून 1929 को अमृतसर के जलिआंवाला बाग़ में एक समारोह होता है. शहर की कांग्रेस और 'नौजवान भारत सभा' ने मिल कर डॉ. सैफुद्दीन किचलू की अध्यक्षता में 'भगत सिंह दिवस' मनाया, जिस में आकाश फिर उन्हीं नारों से गूँज उठा - इन्कलाब जिंदाबाद..साम्राज्यवाद मुर्दाबाद...'


लेखक- प्रेमचंद सहजवाला

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...


'भगत सिंह विशेष' श्रृंखला में आप पढ़ रहे है प्रेमचंद सहजवाला की कलम से भगत सिंह के जीवन के बारे में। इस श्रृंख्ला में हम अब तक पाँच कड़िया प्रकाशित कर चुके हैं।
ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)
क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...





सांडर्स की हत्या के बाद चंद्रशेखर आजाद ने एक साधू-मंडली बनाई और उसी का नेतृत्व करते एक गाड़ी में बैठ कर मथुरा पहुँच गए. भगत सिंह एक बड़ा साहब बन कर और दुर्गा भाभी को अपनी मेम बना कर लाहौर स्टेशन पर एक गाड़ी में बैठ गए. सिवाराम राजगुरु दोनों के घरेलू नौकर बन, सामान उठाते नज़र आए. पुलिस को शक नहीं पड़ा. गाड़ी लखनऊ पहुँची तो तीनों कुछ घंटे वहां रुके. फ़िर वहां से कलकत्ता पहुँच गए.
सांडर्स हत्या के बाद पुलिस लड़कों की तलाश करते करते थक गई थी और केस को लगभग बंद करने वाली थी. लेकिन...

8 अप्रैल 1929 का दिन है. दिल्ली. आज़ादी के बाद जिसे लोक सभा कहा गया, तब उसे Central Legislative Assembly' कहा जाता था...असेम्बली के अध्यक्ष थे विट्ठल भाई पटेल. वे उस दिन भी रोज़ की तरह अध्यक्ष की कुर्सी पर उपस्थित थे. असेम्बली में उपस्थित महत्तवपूर्ण लोगों में से थे मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय और मोहम्मद अली जिन्ना. इस के अलावा प्रखर वकील असफ अली भी अपनी सीट पर मौजूद थे. ऊपर जनता की महिला-गैलरी में थी उनकी पत्नी अरुणा असफ अली. और गैलरी में ही थे वल्लभ भाई पटेल के साथ देवदास गांधी (गांधी जी की सब से छोटे सुपुत्र) व महादेवन देसाई (गांधी जी के सचिव) . और सब से रोचक बात यह की 'साइमन कमीशन' के मुखिया जॉन साइमन भी गैलरी में मौजूद थे.

इस के अतिरिक्त गैलरी में उपस्थित थे दो नौजवान. दोनों ने खाकी शर्ट्स व खाकी नेकरें पहन रखी थी. एक ने नीला सा दिखने वाला कोट व दूसरे ने हल्का नीला कोट पहन रखा था. दोनों जांबाज़ नौजवान थे...

ब्रिटिश की निर्ममता हर भारतवासी जानता था. जब 'Rowlett Act' पारित हुआ था, तब जलिआंवाला बाग़ में जो दर्दनाक घटना घटी, वह हम पढ़ चुके हैं. Rowlett Act में भी जनता की आज़ादी व उसके वैधानिक अधिकारों का हनन था, जिस के विरोध में जलिआंवाला बाग़ में लोग एकत्रित हुए थे. ब्रिटिश ने इस डर से कि जनता कहीं उस घटना के बाद बगावत पर न उतर आए, सख्ती और बढ़ा दी. ब्रिटिश ने यह आदेश दिया कि यदि आप साइकिल पर जा रहे हैं और सामने कोई अँगरेज़ सार्जंट आता है, तो आप को साइकिल से उतरना है, व उसे सैल्यूट मारना है. वहां अमृतसर की एक गली में किसी अँगरेज़ महिला से किसी ने छेड़छाड़ कर दी थी. ब्रिटिश ने सख्त आदेश दे दिए कि उस गली से कोई नहीं गुजरेगा और यदि उस का वहां से जाना ज़रूरी है तो वह ज़मीन पर उल्टा लेट कर अपने शरीर को ज़मीन से रगड़ता हुआ गुजरे.

जनता को दबाए रखने के इन तानाशाह कानूनों से 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' के नौजवानों, जिन में भगत सिंह सब से प्रखर थे, के मन में ब्रिटिश के विरुद्ध आक्रोश उभरता था...

सांडर्स की हत्या तक ये सभी नौजवान पिस्टल या रेवोल्वर से काम लेते रहे. पर अब अपने तरीकों में उन्होंने बम भी जोड़ दिए. कलकत्ता में भगत सिंह की भेंट हुई जतीन दास व फणीन्द्रनाथ घोष से. आगरा, जो कि 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' का मुख्यालय था, को बम बनाने का केन्द्र बनाया जाता है. आगरा में एक मकान 'हींग की मंडी' में है, एक 'नाई की मंडी' में, जहाँ ये नौजवान मिलते हैं. जतीन दास बम के मामले में ज्ञान रखते हैं तथा ललित कुमार मुख़र्जी भी, जो इलाहाबाद में विज्ञान के विद्यार्थी रहे. जतीन दास एक प्रकार से बम बनाने के प्रशिक्षक बन जाते हैं और उनसे प्रशिक्षण लेने वाले नौजवानों में से हैं भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, फणीन्द्रनाथ घोष, सुखदेव, बी के सिन्हा, शिव वर्मा सदाशिव तथा ललित कुमार मुख़र्जी... भगत सिंह लाहौर जा कर बमों को ढालने वाले सांचे लाते हैं, और देखते देखते कुछ शहरों में बम के छोटे छोटे कारखाने खुल जाते हैं. भगत सिंह व आजाद ने मार्च 1929 में झांसी के जंगलों में जा कर इन बमों के सफल परीक्षण भी किए...

...इस नई खोज यानी बम के ज़रिये जेल में कैद जोगेशचंद्र चैटर्जी को रिहा करने की साजिश भी रची गई, पर वह सफल न हो सकी. एक बम को साइमन कमीशन पर फेंकने पर भी युवकों ने विचार किया था, पर वह योजना इसलिए विफल हुई कि उसमें यात्रा पर बहुत खर्चा हो सकता था, और इन युवकों पर पास पैसे की अक्सर तंगी रहती थी...

ब्रिटिश के दमन चक्र का ही एक रूप था 'पब्लिक सेफ्टी बिल' यानी 'जन सुरक्षा विधेयक'. यह हास्यास्पद बात ही थी कि जन सुरक्षा के नाम पर जनता को दबाने की एक अच्छी भली साजिश थी यह बिल. इस बिल में कई प्रावधान थे, जिन में एक तो यह था कि किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को गवर्नर-जनरल के आदेश पर देश से बाहर निकाला जा सकता था और गवर्नर-जनरल के आदेश के बिना वह व्यक्ति पुनः देश में प्रवेश नहीं कर सकता था. एक प्रावधान यह भी था कि ऐसे किसी भी संदिग्ध व्यक्ति या संस्था का बैंक खाता या शेयर या सिक्यूरिटी वगैरह, गवर्नर-जनरल के आदेश पर ज़ब्त हो सकते थे...

हमारी बिल्ली हमें ही म्याऊँ!...

स्पष्ट है कि ब्रिटिश ऐसे कानूनों का उपयोग मनमाने ढंग से करना चाहती थी. वह किसी भी विरोधी को देश से निकाल सकती थी व उस का पैसा भी ज़ब्त कर सकती थी...

...नौजवानों में बेहद आक्रोश है कि ऐसे एक एक बिल को ला कर ब्रिटिश भरतावासियों को पूर्णतः अपना गुलाम बनाना चाहती है...

....8 अप्रैल 1929 को इसी बिल पर चर्चा हो रही है. और ब्रिटिश तक अपनी आवाज़ पहुंचाने का इन जांबाज़ नौजवानों ने एक नायाब तरीका सोचा. ऐसे सभी बिलों व कानूनों से देश की जनता की असहमति व आक्रोश जताने की उन्होंने एक नायाब योजना बनाई. योजना को फलीभूत करने के लिए आगरा के 'हींग की मंडी' वाले मकान में 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' की केंद्रीय समिति की एक बैठक होती है. बैठक में भगत सिंह अपने भाषण में कहते हैं- ब्रिटिश के साम्राज्यवाद में कोई न्याय नहीं है. वे हम गुलामों को दमित कर लूटना और मौत के घाट उतार देना चाहते हैं. उन्हें चैन से एक साँस भी लेने देना नहीं चाहते.' यह पूछे जाने पर कि इस सारी समस्या का आख़िर समाधान क्या है, भगत सिंह ने एक ही शब्द कहा 'बलिदान'. हमें असेम्बली के ब्रिटिश व भारतीय सदस्यों की आँखें खोलनी पड़ेंगी.' भगत सिंह ने पुनः कहा - जिस दिन इस 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर सदन में चर्चा हो रही होगी, उस दिन असेम्बली की गैलरी से नीचे सदन में बम फेंके जाएँ...

प्रश्न उठा कि यह शुभ कार्य आख़िर किसे सौंपा जाए. भगत सिंह सब से कड़ी पहल कर के यह काम स्वयं करना चाहते थे . पर चंद्रशेखर आजाद को इस पर सख्त ऐतराज़ था. उनका कहना था कि सांडर्स हत्या के बाद पुलिस भगत सिंह की खोज कर रही है. इसलिए फ़ैसला किया गया कि असेम्बली में बम फेंकने व 'इन्कलाब जिंदाबाद' व 'ब्रिटिश साम्राज्यवाद' मुर्दाबाद' के नारे लगाने का कार्य बटुकेश्वर दत्त के साथ शिव वर्मा या बी के सिन्हा करेंगे. भगत सिंह की एक न चलने दी गई. पर एक रोचक बात यह हुई कि उस सभा में सुखदेव उपस्थित नहीं थे. जब उन्हें बाद में पता चला कि इस काम में भगत सिंह शामिल नहीं हैं, तब उन्होंने भगत सिंह पर कटाक्ष करने शुरू कर दिए, कि तुम शायद कायर हो. ऐसे बहादुरी के काम से पीछे हट रहे हो. कुछ लोगों का मानना है कि सुखदेव को दरअसल यह लगता था कि इस इतने बड़े काम को भगत सिंह के अलावा कोई और सरंजाम कर ही नहीं सकता, इसलिए उन्होंने ऐसे चुभने वाले शब्द कह दिए. अब भगत सिंह अड़ गए. इसलिए फ़ैसला हुआ कि असेम्बली की गैलरी में भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जाएँगे. वही दो बहादुर जवान गैलरी में बैठे हैं. खाकी शर्ट्स व नेकरों मे. भगत सिंह ने नीला दिखने वाला कोट पहना है व दत्त ने हल्का नीला.. भगत सिंह के सर पर उनका चिर परिचित हैट...

'पब्लिक सेफ्टी बिल' सब से पहले 10 सितम्बर 1928 को सदन में प्रस्तुत हुआ तथा उसे 5 दिन बाद सदन की 'चयन समिति' को भेज दिया गया. इस बात के पक्ष में सदन में 62 वोट पड़े तथा विपक्ष में 59. ऐसा इसलिए भी हुआ कि कई सदस्य सोचते थे कि देश के कतिपय नौजवान दिग्भ्रमित हो कर साम्यवादी (कम्युनिस्ट) हो गए हैं, इस लिए वे बिल पर पक्ष में थे. 24 सितम्बर को 'गृह सदस्य' (Home Member) (उन दिनों मंत्री को Member कहते थे) सर जेम्स क्रेरार ने सदन को सूचित किया कि चयन समिति के अनुसार अब 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर चर्चा हो सकती थी. परन्तु Home Member की इस बात के पक्ष-विपक्ष में 61 - 61 वोट पड़े. शुक्र कि विट्ठलभाई पटेल जो कि अध्यक्ष थे, का Casting Vote ऐसे समय लाज बचा गया और Home Member मुंह ताकते रह गए. विट्टल भाई पटेल ने तदनंतर सरकार को यह पत्र लिखा कि यह बिल क्यों कि मेरठ षडयंत्र से सम्बंधित कुछ जवानों पर चल रहे मुक़दमे को प्रभावित कर सकता है, इसलिए जब तक उस मुक़दमे का फ़ैसला न हो जाए, तब तक इस बिल को स्थगित रखा जाए. विट्ठल भाई ने सदन से यह वादा किया कि वे 8 अप्रैल को सदन को निर्णय सुनाएंगे. और 8 अप्रैल आज ही है. ऊपर भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त इसी विचलित कर देने वाले क्षण की प्रतीक्षा में हैं...

सदन उस से पहले एक और दमन-चक्र के परिचायक बिल यानी 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' को पारित कर चुका था...
अध्यक्ष विट्ठल भाई पटेल ने कहा - 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' अब (पारित हो कर) नज़रों से हट चुका है. और अब मैं 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर अपना निर्णय...

'धमाक'

एक बम का धमाका होता है.

फ़िर 'धमाक'. एक और धमाका.


फ़िर रिवोल्वर से हवा में एक के बाद एक दो गोलियों के चलने की आवाजें .

'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' की उस बैठक में यह निर्णय भी लिया गया था कि बम फेंकने के बाद दोनों जवान भागेंगे नहीं, वरन अपनी जगह पर चुपचाप खड़े रहेंगे. पुलिस के आने पर वे आत्म-समर्पण कर देंगे... इस निर्णय के पीछे बहुत गहरी कूटनीति थी. भगत सिंह की वैचारिकता का रहस्य भी. भगत सिंह चाहते थे कि बम फेंकने के बाद वे पकड़े जाएँ. उन पर मुकदमा चले और देश के सभी अखबार मुकदमों की खबरें छापें. देश की युवा पीढी जागे. ब्रिटिश के ख़िलाफ़ हथियार उठा कमर कस ले देश की युवा पीढी, एक निर्णायक युद्ध के लिए. भगत सिंह को पता था कि अंततः उन्हें तो शहादत का ही वरण करना है, और जो लोग उन्हें अन्तिम विदाई देने आएँगे, वे ही उन के बाराती होंगे.

बम गिरा कर किसी को भी मारने की उन की साजिश नहीं थी. ब्रिटिश के वाइसरॉय तक ने माना कि बम बहुत हलके थे. बम Home Member सर जेम्स क्रेरार के ठीक पीछे गिरे थे. मदन मोहन मालवीय, मोती लाल नेहरू, मुहम्मद अली जिन्ना व असफ अली आदि इन धमाकों से विचलित हुए बिना अपनी जगहों पर यथावत बैठे रहे. असफ अली ने सुखदेव का मुकदमा लड़ा था व मालवीय और मोतीलाल नेहरू ने अदालत में भगत सिंह के पक्ष में गवाहियाँ दी थी. गैलरी में उपस्थित अरुणा असफ अली हो या वल्लभ भाई पटेल, या देवदास गाँधी व महादेवन देसाई. इन सब को समझते देर न लगी होगी कि ये बम 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' के नौजवानों ने फेंके हैं. इन सब की वैचारिकता भले ही इन बहादुर लड़कों की वैचारिकता से भिन्न हो, पर यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि इन सब को कम से कम भारत माँ के इन वीर सपूतों
की देश भक्ति में लेश मात्र भी संदेह न होगा.

बम से कुछ जलते टुकड़े उड़ कर एक सदस्य सर बोम्मन जी दलाल की जांघ में लगे थे व उन्हें तुंरत हस्पताल पहुँचाया गया. इस के अतिरिक्त ब्रिटिश सांसद सर जॉर्ज स्कस्टर व चार अन्य लोग मामूली से ज़ख्मी हुए. बम गिरते ही सदन में थोडी भगदड़ मच गई थी . कहीं धुंआ भी उठा. अध्यक्ष विट्ठल भाई पटेल अपनी कुर्सी से उठ कर बाहर चले गए. पर थोडी देर बाद लौट भी आए. सदन को 11 अप्रैल तक स्थगित कर दिया...

...पर इस बम काण्ड में एक सब से महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि बम के धमाकों व गोलियों की आवाजों के साथ साथ गैलरी से नीचे सदन की और गिरते दिखाई दिए सैंकडों पर्चे. इन पर्चों में 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' द्वारा ब्रिटिश सरकार को एक नोटिस था. देखते देखते सैंकडों पर्चे ब्रिटिश को चेतावनी देने वाली छोटी छोटी जांबाज़ चिडियों की तरह ऊपर से उड़ते हुए नीचे सदन की ज़मीन व सदस्यों की टेबलों तक पहुँच गए. इन पर्चों में क्या था आख़िर?

इन पर्चों में थी एक चेतावनी. फ्रांस के एक क्रांतिकारी थे Valliant. उन्होंने भी ऐसे ही कभी अपनी सरकार को चेतावनी देते हुए बम फेंकने का कारण लिखा था - 'ताकि बहरे सुन सकें...'. भगत सिंह ने इसी वाक्य का सन्दर्भ दे कर पर्चों में छापा था - 'बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की ज़रूरत होती है, Valliant की तरह हम भी अपने इस बम फेंकने के कदम को न्याय संगत मानते हैं... जनता के प्रतिनिधि अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाएँ और जनता को आने वाली क्रान्ति के लिए तैयार करें. देश के असहाय लोगों की ओर से हम ब्रिटिश को वही सबक देना चाहते हैं जो इतिहास में अब तक कई बार दोहराया जा चुका है, कि आप व्यक्तियों को मार सकते हैं, पर विचारों को नहीं!...इन्कलाब जिंदाबाद..ब्रिटिश साम्राज्यवाद मुर्दाबाद.

.भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त अपनी जगहों पर खड़े रहे. भागने की की कोशिश नहीं की. देश के लिए अपनी जान हथेली पर ले कर चलने वाले जांबाज़ लोग डर नाम की किसी चीज़ को नहीं पहचानते. एक रोचक बात यह हुई कि सर सोभा सिंह (प्रसिद्द पत्रकार-लेखक खुशवंत सिंह के पिता), जो कि नई दिल्ली के निर्माण (यथा इंडिया गेट, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, कनाट प्लेस आदि) में एक प्रमुख ठेकेदार थे, अभी अभी गैलरी में प्रविष्ट हुए थे. वे अपने चंद मित्रों के चेहरे खोज रहे थे जिन के साथ उन्हें बाद में भोजन करना था. टटोलते टटोलते उनकी निगाहें उन्हीं कुर्सियों पर गई, जहाँ भगत सिंह व दत्त बैठे थे. उनके मित्र उन्हीं के आस पास बैठे नज़र आए. ठीक इसी क्षण 'धमाक' 'धमाक' से दोनों बम गिरे थे. सर सोभा सिंह ने दोनों पर नज़र रखी. शायद हैरान भी होंगे कि दोनों हिल डुल क्यों नहीं रहे. उन्होंने तुंरत दो पुलिस-कर्मियों को उसी दिशा में भेजा और स्वयं भी उनके पीछे पीछे हो लिए. पुलिस जब जवानों के निकट पहुँची तब किसी भी अपराध-बोध से मुक्त व अपने कृत्य पर गर्वान्वित दोनों वीर अडिग से अपनी जगहों पर खड़े रहे. उनके गर्वान्वित चेहरों पर एक कार्य को सरंजाम देने की खुशी थी, एक अलौकिक सी खुशी. जनता की दमित भावनाओं की एक अनूठी अभिव्यक्ति की सफलता की खुशी. जैसे बिस्मिल का यह शेर एक संदेश की तरह पूरे देश को सुना रहे हों:

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है.


गिरफ्तार कर के दोनों को एक 'वैन' में चांदनी-चौक कोतवाली की तरफ़ ले जाया जा रहा है. रास्ते में एक तांगे के पास से ही गुज़रता है 'वैन'. तांगे में बैठे हैं क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा, उनकी पत्नी दुर्गा भाभी, व उनका नन्हा सा बेटा सचिन्द्र, जो अचानक 'वैन' में भगत सिंह को देख कर पुलकित हो उठता है, चीख पड़ता है - लम्मे चाचा! (लंबे चाचा!). पर दुर्गा भाभी तुंरत नन्हे सचिन्द्र के होंठों पर हथेली रख कर उसे चुप करा देती है...

देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...


'भगत सिंह विशेष' श्रृंखला में आप पढ़ रहे है प्रेमचंद सहजवाला की कलम से भगत सिंह के जीवन के बारे में। पहली , दूसरी, तीसरी कड़ी की पहली किस्तदूसरी किस्त प्रकाशित कर चुके हैं। अब हम ला रहे हैं इसी श्रृंख्ला की अगली कड़ी..




10 दिसम्बर 1928. लाहौर के Mozang House में 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' की उस बैठक में उपस्थित युवकों का खून खौल रहा है. बैठक में उपस्थित हैं भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, शिवाराम राजगुरु, सुखदेव, जयगोपाल, किशोरी लाल तथा भगवतीचरण वोहरा की पत्नी जिसे सब लोग प्यार से दुर्गा भाभी कहते हैं. भगत सिंह ने कहा - 'सारे देश में तनाव है. बंगाल पार्टी ने अच्छा काम किया है. कुछ अधिकारीयों को ख़त्म कर दिया है. अँगरेज़ भयभीत हैं और अपने परिवारों को इंग्लैंड भेज रहे हैं.कुछ ही दिन में उन्हें महसूस होगा कि भारत उनके पास नहीं रहेगा ..लाला लाजपत राय की शहादत ने कांग्रेस नेताओं के दिल भी दहला दिए हैं. पंडित जवाहरलाल नेहरू कुछ ठोस कदम उठाने की तैय्यारियाँ कर रहे हैं. पर मुझे संदेह है कि वे कुछ कर पाएंगे. जब कि देश के नौजवानों का खून खौल रहा है'.
चंद्रशेखर आजाद ने कहा - केवल स्कॉट ही नहीं, हमें अन्य अंग्रेजों की भी हत्या करनी है. एक हिन्दुस्तानी की हत्या के बदले हमें दस अंग्रेजों को मौत के घाट उतार देना चाहिए. तब जा कर शत्रु के होश ठिकाने आयेंगे.'
दुर्गा भाभी ने प्रस्ताव रखा कि अब ये फ़ैसला करो कि स्कॉट की हत्या कौन करेगा. सब से पहले भगत सिंह ने अपना नाम प्रस्तावित किया - 'स्कॉट को मेरे हाथों से मरना चाहिए'.
राजगुरु, सुखदेव, जयगोपाल व दुर्गा भाभी आदि ने अपने अपने नाम प्रस्तावित किए. पर चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि यह काम महिलाओं को नहीं देना चाहिए. अंत में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जयगोपाल व चंद्रशेखर आजाद को यह सम्मिलित ज़िम्मेदारी दी गई, भगत सिंह ने जयगोपाल को यह ज़िम्मेदारी दी कि वह 11 से 15 दिसम्बर तक स्कॉट की हर गतिविधि पर नज़र रखे. स्कॉट किस समय दफ्तर जाता है किस समय लौटता है व कौन से रास्ते से आता जाता है. हर बात पर नज़र राखी जाए.
...भगत सिंह इन दिनों गुलाबी रंग के कई पोस्टर तैयार करने में लगे हैं. हर पोस्टर पर शीर्षक है 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' ('असोसिएशन' को कई बार 'आर्मी' भी लिखा जाता था). शीर्षक के नीचे मोटे मोटे अक्षरों में लिखा है - 'Scott is dead'... इस के साथ ही ब्रिटिश के नाम एक चेतावनी भरा नोटिस - 'इस हत्या के साथ लाला लाजपत राय की हत्या का बदला ले लिया गया है. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि देश की तीस करोड़ जनता जिस नेता का सम्मान करती रही, उस पर एक साधारण पुलिस अधिकारी ने लाठियां चलाई. राष्ट्र का यह अपमान युवकों के लिए एक चुनौती था...आज विश्व भर के लोगों ने देख लिया कि भारतवासियों का खून ठंडा नहीं हुआ है. वे सब निर्जीव नहीं हुए हैं. वे देश के सम्मान के लिए अपनी जान निछावर कर सकते हैं...
ऐ आततायी सरकार, सावधान रहो, इस देश के दमित व संतप्त लोगों को ठेस मत पहुँचाओ. अपने दानवीय तरीकों से बाज़ आ जाओ. तुम्हारे सभी कानूनों के बावजूद इस देश के लोग पिस्टल और रिवोल्वर हासिल करते रहेंगे. भले ही ये हथियार एक सशस्त्र क्रान्ति की दृष्टि से पर्याप्त नहीं हैं, पर देश के अपमान का बदला लेने के लिए वे काफ़ी होंगे. हालांकि हमारे अपने कई नेता हमारी निंदा करते हैं, व उपहास करते हैं... जो अत्याचारी फिरंगी, हमारे देश के गौरव का अपमान करते हैं, उनसे बदला लेने के लिए हम हर समय तैयार रहेंगे...जब हम फांसी के तख्ते तक जायेंगे, हम बुलंद आवाजों में चिल्लायेंगे - 'इन्कलाब...जिंदाबाद.' भगत सिंह ने ये गुलाबी पोस्टर 15 दिसम्बर 1928 को जयगोपाल व एच.आर.वोहरा को भी दिखाए थे, जिन्होंने बाद में अदालत में सरकारी गवाह बन कर भगत सिंह के ख़िलाफ़ गवाही दी थी...जयगोपाल व एच.आर.वोहरा ने 17 दिसम्बर की आधी रात को भी भगत सिंह को ये पोस्टर लिखते हुए देखा था....
...17 दिसम्बर 1928 का सनसनी खेज़ दिन. दोपहर 2 बजे सब को हथियार दे दिए गए हैं. जयगोपाल पुलिस कार्यालय गए थे तथा एक अँगरेज़ पुलिस अधिकारी को युनिफोर्म में मोटर साइकिल पर जाते हुए उन्होंने देखा था. उन्होंने समझा कि यही स्कॉट है, जो आज कार की बजाय मोटर साइकिल पर आया है. दरअसल वह Assistant Supernindent सांडर्स था, जो अभी probation पर था व अभी तक केवल 1 वर्ष 8 महीने व 8 दिन नौकरी कर चुका था. उसका पूरा नाम था John Poyntz Saunders. उस दिन वह 21 वर्ष 4 महीने व 24 दिन की आयु का था...
...जयगोपाल को यही ड्यूटी दी गई की वह पुलिस कार्यालय के आसपास बना रहे तथा ज्यों ही स्कॉट बाहर आए वह रूमाल से एक इशारा कर दे . चंद्रशेखर आजाद ने एक साधारण पिस्टल ले ली तथा भगत सिंह को एक ऑटोमेटिक पिस्टल मिली. शिवाराम राजगुरु को एक रिवोल्वर दी गई.
... जयगोपाल व भगत सिंह साइकलों पर पुलिस कार्यालय गए. जयगोपाल ने अपनी साइकल पुलिस कार्यालय के सामने स्थित DAV कॉलेज के हॉस्टल के बाहर बने टॉयलेट की दीवार से टिका दी. भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद अपनी साइकलें कॉलेज के कम्पाऊंड में ले आए. जयगोपाल ने इन में से एक साइकल को हटा कर टॉयलेट के बाहर रखी अपनी साइकल के साथ खड़ी कर दी. फ़िर वे लौट आए और तीसरी साइकल ले कर पुलिस कार्यालय के बाहर सड़क पर लाये जहाँ से कि कचहरी की गली भी शुरू होती थी. जय गोपाल यह साइकल यहाँ इसलिए लाए ताकि यदि शिकार मोटर साइकिल पर बच निकले तो भगत सिंह इस साइकिल पर उस का पीछा कर के उसे गोली से उड़ा दें. चंद्रशेखर आजाद कॉलेज कम्पाउंड के अन्दर खड़े रहे तथा भगत सिंह व शिवाराम राजगुरु पुलिस कार्यालय के बाहर के रोड पर टहलने लगे. लगभग चार बजे Assistant Supernindent जे पी सांडर्स जिसे जयगोपाल गलती से जे अ स्कॉट समझ रहे थे, अपनी मोटर साइकिल पर पुलिस कार्यालय से बाहर निकला. उसके पीछे हेड कांस्टेबल चानन सिंह भी था. सांडर्स की मोटर साइकिल गेट से निकल कर धीरे धीरे रोड पर फिसलनी शुरू हुई और जयगोपाल ने इशारा कर दिया. राजगुरु तैयार हो गए और ज्यों ही सांडर्स उनके नज़दीक आए, उन्होंने अपनी रिवोल्वर से गोली चला दी. सांडर्स की मोटर साइकिल गिर गई और उस की टांग मोटर साइकिल के नीचे दब गई. तब तक भगत सिंह दौड़ पड़े और उनकी ऑटोमेटिक रिवोल्वर से एक साथ कई गोलियां बरसने लगीऔर सांडर्स के शरीर को छलनी करने लगी . यह पिस्टल अदालत में सबूत के तौर पर प्रर्दशित भी की गई.
भगत सिंह राजगुरु व जयगोपाल कचहरी वाली गली में दौड़ने लगे. हेड कांस्टेबल चानन सिंह ने उन का पीछा किया. इस के साथ ही ट्रैफिक इंसपेक्टर WJG Fearn भी तीनों के पीछे दौडे. पर कचहरी की गली में पीछा कर रहे Fearn को भी गोली लगी, शायद भगत सिंह या राजगुरु में से किसी एक ने मारी हो . ये दोनों गली से निकल कर एक छोटे से गेट के रास्ते कॉलेज कम्पाऊंड में घुस गए. चानन सिंह अभी तक उन के पीछे था, जबकि जयगोपाल अभी तक गली में साइकिल पर भागे जा रहे थे. कॉलेज कम्पाऊंड में घुसते ही एक गोली हवा में सरसराती सी आ कर चानन सिंह को लगी, जो शायद चंद्रशेखर आजाद ने चलाई हो. चानन सिंह घंटे भर बाद लाहौर के मेयो हस्पताल में चल बसा...
...कॉलेज के volleyball मैदान के बीच से दौड़ते भगत सिंह राजगुरु व चंद्रशेखर आजाद हॉस्टल के एक ब्लाक में घुस गए. एक और ब्लाक की ऊपरी मंजिल पर कमरा नंबर 28 में इनके ही कोई क्रन्तिकारी साथी देसराज रहते थे. वहां से ये लोग किसी प्रकार दूसरी तरफ़ निकल आए. तब तक जयगोपाल एक और रास्ते से यहीं पहुँच गए. जो दो साइकलें टॉयलेट के बाहर जयगोपाल ने एक साथ रखी थी, उनमें से एक को तो देसराज ने बिल्कुल ही गायब करवा दिया था व दूसरी वहां से हटवा कर हॉस्टल की रसोई के बाहर रखवा दी थी.
चंद्रशेखर आजाद ने जयगोपाल से साइकिल ले ली. उसी साइकिल पर राजगुरु भी थे. भगत सिंह ने रसोई के बाहर रखी दूसरी साइकिल ले ली. भगत सिंह ने वेश बदलने के लिए जयगोपाल से उसकी लुंगी ले ली थी तथा अपना हैट उसे दे दिया था. पर क्यों कि हडबडी में वे लुंगी को अपने सर पर एक पगडी की तरह बाँध नहीं सके थे, इसलिए उसे वहीं छोड़ कर साइकिल दौडाते चल पड़े. वह लुंगी बाद में एक हेड कांस्टेबल तालेह मांड को मिली थी. कॉलेज के छोटे गेट से साइकलें दौड़ाते भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद व राजगुरु बाहर निकल पड़े. क्यों कि एक साइकिल पर दो जने थे, इसलिए असुविधा भी हो रही थी. रास्ते में एक साइकिल सवार विद्यार्थी अजमेर सिंह दिखा. उस से साइकिल छीनने की कोशिश की गई. पर अजमेर सिंह तगड़ा निकला और इन तीनों को भागने की हडबडी थी. कोशिश विफल हुई. इसलिए दो साइकलों पर तीनों जने फ़िर भाग पड़े. इसी विद्यार्थी अजमेर सिंह ने अदालत में भगत सिंह को पहचान कर उनके ख़िलाफ़ गवाही दी थी. आगे जा कर दोनों साइकलें किसी अत्ता मोहम्मद की साइकलों की दूकान की तरफ़ बढ़ी. वहां कुछ दूर भगत सिंह अपनी साइकिल से उतर कर खड़े हो गए बाकी दोनों में से एक जना पैदल चलने लगा और अत्ता मोहम्मद की दूकान से एक साइकिल चुरा कर तीनों फ़िर चल पड़े. पर अत्ता मोहम्मद ने एक और साइकिल अपनी दूकान से उठा कर तीनों का पीछा किया. उन तीनों को तो किसी प्रकार बच निकलना था. इसलिए एक Swimming Pool के पास अत्ता मोहम्मद की साइकिल छोड़ कर तीनों फ़िर आगे बढ़ गए और किसी प्रकार Mozang House पहुँच गए. इस बीच जयगोपाल एक और कॉलेज की दीवार फांद कर उसी Swimming Pool के नज़दीक आए जहाँ पुलिस का एक Deputy Superintendent मोरिस उन तीनों की खोज कर रहा था. मोरिस ने जयगोपाल से पूछताछ करनी शुरू कर दी. पर उस ने कह दिया कि उसने किसी को भी वहां से साइकलों पर गुज़रते नहीं देखा और कि वह तो एक विद्यार्थी है...
जयगोपाल फ़िर किसी प्रकार Mozang House पहुँच गए जहाँ तीनों साथियों को देख आश्वस्त हुए.
अगले दिन शहर की हर दीवार पर भगत सिंह द्वारा तैयार किए गए गुलाबी पोस्टर चिपके है . केवल स्कॉट का नाम बदल कर सांडर्स कर दिया गया है...

क्या तमन्नाये शहादत भी किसी के दिल में है (2)


'भगत सिंह विशेष' शृंखला में आप पढ़ रहे है प्रेमचंद सहजवाला की कलम से भगत सिंह के जीवन के बारे में। पहली , दूसरीतीसरी कड़ी की पहली किस्त हम पहले ही प्रकाशित कर चुके हैं। आज पढ़िए तीसरी कड़ी की दूसरी खेप॰॰॰॰



सन 1928 आते आते भगत सिंह के विचारों में एक परिवर्तन सा आना शुरू हो गया था. उन्हें यह बम और पिस्टल वाला गोपनीय रास्ता पसंद नहीं था. बल्कि लेनिन की तरह जनता को संगठित कर के सशस्त्र क्रांति का तरीका धीरे धीरे उनके ज़हन में उभर रहा था. पर एक पुस्तक में लिखा है कि विचार-परिवर्तन कभी भी एक झटके से नहीं होता, जैसे कि धर्म-परिवर्तन होता है. बल्कि विचार-परिवर्तन एक प्रक्रिया है, जो समय लेती है. भगत सिंह ने 6 अप्रैल 1928 को पंजाब में जो 'नौजवान भारत सभा' बनाई, तो वह नौजवानों के लिए एक खुला मंच था, ताकि देश-भक्ति के लिए प्रेरित युवक उसमें शामिल हों. पर वह उस विचार परिवर्तन की प्रक्रिया की एक शुरुआत मात्र थी. वैसे दुनिया में जितने भी महापुरुष हुए हैं, वे समय समय पर अपने विचारों को निखारते हैं तथा ज़रूरत पड़ने पर उन्हें बदल भी देते हैं. महात्मा गाँधी ने एक बार अपने किसी साप्ताहिक पत्र के संपादकीय में लिखा था कि कभी कभी उन्हें कुछ पाठकों के गुस्से भरे पत्र मिलते हैं, कि इस अमुक विषय पर कुछ अंक पहले आपने कुछ और ही विचार प्रकट किए थे, अब आप उससे विपरीत बात कर रहे हैं. उन्होंने ने पाठकों से निवेदन किया कि जब भी किसी विषय पर ऐसा हो, तब पाठक कृपया बाद की तिथि वाले विचारों को उनके विचार मानें. बाबा साहब अम्बेडकर इसी बात को बेहद रोचक ढंग से कहते थे. किसी विदेशी विचारक की कही हुई एक बात का सन्दर्भ दे कर कहते थे, कि विचारों की स्थिरता केवल किसी गधे में ही सम्भव है...

बात को आगे बढ़ाने से पहले एक और प्रसंग याद आ रहा है. गाँधी से किसी युवक ने एक पाठकीय पत्र लिख पर पूछा था कि यदि आप अहिंसा को इतना ही ज़रूरी मानते हैं, तो क्या आप गुरु गोविन्द सिंह और शिवाजी को भी दिग्भ्रमित मानेंगे? गाँधी ने इस पत्र के लंबे उत्तर में एक महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि गुरु गोविन्द सिंह तथा शिवाजी अपनी योजनाओं को कभी गोपनीय नहीं रखते थे. वे जो भी थे, प्रकट रूप में थे. भगत सिंह को भी लगने लगा था कि चंद लोगों के साथ छुप कर बम बनाने वाले तरीके से हमें आज़ादी नहीं मिल सकती . उनके रास्ते को तकनीकी तौर पर इतिहासकारों ने 'आतंकवाद' ही माना है, जिस पर देशवासियों में बहुत आक्रोश भी उभरा था. पिछले वर्ष इसी आक्रोश के मद्दे-नज़र देश के बुद्धिजीवियों ने सर्व-सम्मति से यह निर्णय लिया कि अब से हम उन्हें आतंकवादी नहीं कहेंगे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी कहेंगे. वैसे जो नौजवान संसद की बालकनी से नीचे एक बम फेंकेगा, वह तकनीकी तौर पर एक आतंकवादी ही कहलायेगा. भगत सिंह ने स्वयं यह शब्द इस्तेमाल किया था. दिनांक 2 फरवरी 1931 को कुछ युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को समबोधित करते हुए वे एक जगह कहते हैं - ज़ाहिरा तौर पर मैंने एक आतंकवादी की तरह व्यवहार किया है. पर मैं आतंकवादी नहीं हूँ. मैं एक क्रांतिकारी हूँ, जिस के पास एक लंबे कार्यक्रम को लेकर सुनिश्चित विचारधारा है...अपने भीतर की संपूर्ण शक्ति से मैं यह घोषणा करता हूँ, कि मैं आतंकवादी नहीं हूँ और मैं कभी भी नहीं था, सिवाय शायद अपने क्रांतिकारी जीवन के प्रारम्भ में (The Fragrance of Freedom - Writings of Bhagat Singh edited by KC Yadav & Babar Si ngh p 63) .

भगत सिंह इस बात के प्रति भी सचेत थे कि पैसा इकठ्ठा करने के लिए उन्हें आपराधिक तरीके तक अपनाने पड़ते हैं. एक बार लाहौर के पंजाब नेशनल बैंक में डकैती डालने की योजना में भगत सिंह एक साथी के साथ जीप में बैंक के निकट पहुंचे. किन्हीं कारणों से वह डकैती डाली नहीं जा सकी. पर ऐसे तरीकों का अवश्य भगत सिंह के मन पर गहरा असर ही पड़ता होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है. यदि एक नज़र हम आजकल फैले आतंकवाद पर डालें तो स्पष्ट होता है कि आज़ादी चाहने वाले नौजवान अपने भीतर उस उद्देश्य के लिए मर मिटने को तैयार रहते हैं, पर कुछ ठग किस्म के शोषक लोग उस का अनुचित लाभ उठाते हैं. जैसे कश्मीर का ही उदाहरण लें. कश्मीर में आज़ादी चाहने वाले युवक सही थे या ग़लत, यह इस लेख-माला का विषय नहीं है, पर उनके आज़ादी की इच्छा पैदा होते ही पाकिस्तान ने उन नौजवानों की भावना का शोषण किया. नशीली दवाइयाँ बेचने वालों ने व गैर कानूनी हथियार बनाने वालों ने उन की भावनाओं को पूरी तरह चूस कर करोड़ों कमाए. श्रीलंका में भी यही हुआ. बन्दूक के ज़रिये तमिल लोगों को इन्साफ दिलाने का अभियान शुरू करने वाले प्रभाकरन अब नशीली दवाइयों के दलाल हैं, क्यों कि पैसा कहाँ से आएगा. उनकी संस्था 'लिट्टे' के कार्यकर्ता किसी भी युवक या युवती का अपहरण कर के उस के माँ बाप को बताते हैं कि अबसे आप की संतान तमिल प्रदेश की आज़ादी के लिए काम आएगी. वहां पैसे वाले तमिल अब गरीब हो गए हैं क्यों कि उनसे चंदे के नाम पर पैसा लूटा जाता है. मैं ये तमाम कटु प्रसंग उठा कर आख़िर कहना क्या चाहता हूँ? में दरअसल विषय से दूर नहीं जाना चाहता, पर मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि भगत सिंह का रास्ता (जिसे वे स्वयं ही अपने उक्त भाषण में आतकवाद कह गए हैं और नकार चुके हैं) देश के युवक युवक के लिए प्रेरणा बन जाता और पूरे देश में हर जगह ब्रिटिश को भगाने लिए आतंकी घटनाएँ घटती, तो स्पष्ट है कि शोषक भी पैदा होते जो इन नौजवानों के मन में धधकती आज़ादी की ज्वाला का भरपूर अनुचित लाभ उठाते. गाँधी इसलिए कहते थे कि हमें ब्रिटिश से लड़ना नहीं चाहिए, क्यों कि यदि हम में लड़ने की आदत पड़ गई तो ब्रिटिश के जाते ही हम आपस में लड़ना शुरू कर देंगे! गाँधी की बातें पहली नज़र में अबोधता से भरी लग सकती हैं, पर भीतर की गहराइयों में जायें तो जो वे कहते रहे, वह अक्षरशः सत्य साबित हुआ. वैसे भगत सिंह जनता को संगठित कर के जिस सशस्त्र क्रांति की बात कहते थे, वह बाद में एक और तरीके से सुभाष चंद्र बोस ने पूरी करने की कोशिश की. सुभाष चंद्र बोस जैसे देशभक्त का देश में होना भी देश के लिए एक वरदान ही था. उन्होंने 'आजाद हिंद फौज' द्बारा ब्रिटिश से युद्ध किया पर विफल रहे. दरअसल सुभाष चंद्र बोस को भी हिटलर जैसे लोगों पर निर्भर रहना पड़ा. हिटलर ने उनकी केवल इतनी सहायता की कि उन्हें 'आजाद हिंद रेडियो' के लिए एक गुप्त frequency दे दी. पर जो 'आजाद हिंद फौज' सुभाष ने जर्मन में बनाई, वह उन्हें काम नहीं आई. उन्हें एक साथी के साथ बहुत गुप्त तरीके से ब्रिटिश की खूफिया एजेंसियों को धोखा दे कर जापान जाना पड़ा. पीछे उनकी ही बनाई गई 'आजाद हिंद फौज' को हिटलर ने कुछ जहाज़ों की रक्षा के लिए तैनात कर दिया. हिटलर से जब सुभाष चन्द्र बोस ने भारत की आज़ादी के लिए मदद मांगी, तब हिटलर ने कहा कि भारत को अभी कम से कम डेढ़ सौ वर्ष तक आज़ादी नहीं मिल सकती. और कि में नहीं चाहता कि भारत से ब्रिटिश हटे, क्यों कि ब्रिटिश हटेगी तो वहां संभवतः रूस आ जाएगा! जापान में सुभाष चन्द्र बोस ने रास बिहारी बोस द्वारा बनाई 'आजाद हिंद फौज' को आगे बढाया. वे सशक्त तो साबित हुए, पर जापान के उद्देश्यों का कुछ पता नहीं था. जापान चीन जैसे देश को कब्जे में कर चुका था. जापान ने जब इंडोनेशिया को तीन सौ वर्ष से राज कर रही डच कौम से मुक्ति दिलाई तब इंडोनेशिया से निकली नहीं, वरन इंडोनेशिया अब जापान का गुलाम बन गया. अब जापान को हटाने के लिए इंडोनेशिया ने अलग से संघर्ष किया...
...युद्ध के दौरान जब अचानक जापान ने कलकत्ता पर बमबारी की तब सुभाष चन्द्र बोस आहत से हो गए थे...

बहरहाल यहाँ लाला लाजपत राय की कुर्बानी वाले प्रसंग पर आने से पहले मुझे एक और महत्वपूर्ण प्रसंग अचानक याद आया है. मैं केवल इस बात में विश्वास रखता हूँ कि स्वाधीनता संग्राम पर हर भारतवासी को गौरव होना स्वाभाविक है. पर इतिहास पढ़ना हो तो मन में हर महापुरूष या हर प्रसंग को विश्लेषणकारी दृष्टि से पढ़ना अधिक बेहतर है.

पंडित नेहरू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि एक बार इलाहाबाद में वे अपने कमरे में बैठे काम कर रहे थे कि एक अजनबी युवक उनसे मिलने आया. उन्हें बताया गया कि वह व्यक्ति चंद्रशेखर आजाद है, पंडित नेहरू को याद आया कि इस नाम का नौजवान किशोरावस्था में अपनी स्कूली पढ़ाई छोड़ कर असहयोग आन्दोलन आया था और गिरफ्तार भी हो गया था. जेल में उसे जेलर ने किसी गलती पर हंटर मार दिया था. जब वह जेल से निकला तब उसने गांधी का रास्ता छोड़ दिया था और आतंकवादियों में शामिल हो गया था . आज जब चंद्रशेखर आजाद नेहरू से मिलने अचानक आए तो उस समय भी वह ब्रिटिश के रिकॉर्ड में एक भगोड़े युवक थे, क्यों कि जब रामप्रसाद बिस्मिल ने रेलगाड़ी से रेलवे का खजाना चुराया था, तब उस योजना में चंद्रशेखर भी थे. पर पुलिस की पकड़ में न आ कर वे लापता हो गए थे. नेहरू ने चंद्रशेखर आजाद को बहुत आत्मीयता ने अपने चैंबर में बिठाय. चंद्रशेखर जानना चाहते थे कि यदि ब्रिटिश व कांग्रेस किसी समझौते तक पहुंचे तो क्या उनके (चंद्रशेखर) के ग्रुप के लोगों को भी कोई शान्ति मिलेगी. क्या उन्हें तब भी कानून-बहिष्कृत, जगह जगह खोजे जाने वाले, जिनके सर पर कोई कीमत रखी गई है, और जिन के सामने सदा फांसी के फंदे की संभावनाएं बनी रहती हैं में गिना जाएगा? या कि उनके भी शांतिपूर्ण जीवन-यापन करने की कोई सम्भावना थी ?' नेहरू चकित थे. चंद्रशेखर ने नेहरू से कहा कि जहाँ तक उनका सम्बन्ध है, या उनके कई साथियों का, वे सब इस बात को अब मान चुके हैं कि शुद्ध आतंकवादी तरीके लाभहीन हैं और उनसे कोई भला नहीं होगा. हालांकि इस बात पर भी चंद्रशेखर विश्वास करने को तैयार नहीं थे, कि आज़ादी पूर्णतः शांतिपूर्ण तरीकों से मिलेगी. उनका विचार था कि भविष्य में कभी एक हिंसक मुकाबला ब्रिटिश से हो सकता है, पर वह मुकाबला आतंकवाद से नहीं होगा. पर चंद्रशेखर आजाद ने फिर पूछा कि उन्हें स्वयं क्या करना चाहिए, जब कि उन्हें स्थिर होने का कोई मौका नहीं दिया जा रहा, और हर समय उनका पीछा किया जा रहा है. चंद्रशेखर ने एक और चकित कर देने वाली बात कही कि हाल ही में हुई कई आतंकवादी गतिविधियाँ केवल आत्म-रक्षा के लिए थी....नेहरू ने आजाद से केवल इतना ही कहा कि यदि तुम ऐसा समझते हो, तो तुम्हें अपने प्रभाव से भविष्य में होने वाली आतंकवादी घटनाओं को रोकना चाहिए, क्यों कि उस से केवल आज़ादी का बड़ा उद्देश्य व तुम्हारे अपने साथी ही आहत होंगे (An Autobiography - Jawaharlal Nehru pp 274-75). पर चंद्रशेखर आजाद को युवकों में ऐसी चेतना फैलाने का कोई अवसर नहीं मिला. 27 फरवरी 1931 को इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में उनका ही एक साथ धोखे से पुलिस ले आया और एक पेड़ की छांव में साथी की प्रतीक्षा कर रहे चंद्रशेखर आजाद ने जब आती हुई पुलिस देखी, तो मुकाबले के तैयार हो गए. पेड़ के पीछे छुप कर उन्होंने कुछ गोलियों से कुछ पुलिस वालों को ज़ख्मी भी किया. पर पुलिस की गोलियों की वर्षा व पुलिस का घेरा काफ़ी मज़बूत थे. आजाद अधिक पढ़े लिखे नहीं थे. उन्होंने जिंदगी में केवल एक ही शेर लिखा था -

दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे
आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे.


और सचमुच, आजाद ने स्वयं को पुलिस के हवाले करने से बेहतर समझा कि वे अब शहादत ओढ़ लें और स्वयं को आजाद कर दें. . भारत माता पर अपना सर न्योछावर करने वाले उस जांबाज़ जवान ने अपनी ही पिस्टल से स्वयं पर गोली चलाई और शहादत की ;पवित्र शैय्या पर सो गए.भले ही इन तमाम नौजवानों ने अपने ही तरीकों की सीमायें पहचान ली थी, पर उनकी देश-भक्ति व बहादुरी पर कभी किस को संदेह हो ही नहीं सकता....

सन 1928 की बातें करते करते मन जाने कहाँ का कहाँ चला जाता है.

लाहौर स्टेशन पर साइमन कमीशन पहुँचने वाला है. एक रेल गाड़ी से. गाड़ी को आने में काफ़ी देर हो गई है. बाहर शेरे-पंजाब लाला लाजपत राय के नेतृत्व में हजारों लोग खड़े हैं. जब साइमन अपनी टीम समेत बाहर आयेंगे तब भीड़ चीख पड़ेगी - साइमन वापस जाओ...साइमन वापस जाओ...बल्कि भीड़ तो गाड़ी के आने से पहले भी यही कह रही है - साइमन वापस जाओ...साइमन वापस जाओ...भगत सिंह ने कुछ दिन पूर्व 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' की एक विशेष सभा बुला कर नौजवानों को साइमन कमीशन का कड़ा विरोध करने के लिए पहले ही से तैयार कर दिया था.

यह 30 अक्टूबर 1928 का दिन है. ब्रिटिश पुलिस के suprintendent J A Scott स्वयं परिस्थिति को पूरी तरह सूंघ लेना चाहते हैं . वातावरण में बेहद तनाव है. लाजपत राय के नेतृत्व में नौजवान गीत गा रहे हैं, भगत सिंह भी अपने साथियों समेत आगे आगे डटे हैं:

हिन्दोस्तानी हैं हम, हिन्दोस्तान हमारा,
मुड़ जाओ साइमन जहाँ है देश तुम्हारा..


स्कॉट को घबराहट सी होती है. भीड़ की देशभक्ति उस से सहन नहीं हो पा रही. उसे लगता है कि गाड़ी आ जायेगी तब क्या होगा. उसने अचानक लाठी चार्ज का आदेश दे दिया.

लाजपत राय बिस्मिल की इन पंक्तियों को सार्थक करते डटे हैं :

आज फ़िर मकतल पे कातिल कह रहा है बार बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है.


अपने अहिंसावादी तरीकों से सचमुच उनके ह्रदय में भी मानो तमन्ना-ए-शहादत उमड़ रही थी.

भीड़ को कई चेतावनियाँ स्कॉट ने दी थी. लाजपत राय से विशेष कहा था, कि इन सब को ले कर पीछे हट जाओ, पर लाजपत राय निर्भीक व्यक्ति थे. किसी अँगरेज़ के हुक्म पर अपने रास्ते से हट जायें यह असंभव था. स्कॉट ख़ुद एक लाठी अपने हाथ में लेता है और लाठी चार्ज में इधर उधर तितर-बितर होती भीड़ में वह स्वयं लाजपत राय पर लाठियां बरसाता है. वे भागते नहीं, पर किसी छुपी हुई तमन्ना-ए-शहादत से वहीं डटे रहते हैं, जब तक कि उनके तन में डटे रहने की शक्ति थी...

17 नवम्बर 1928 को लाला लाजपत राय अपनी अन्तिम साँस गिन कर भारत माँ को अपनी आहूति दे कर चले जाते हैं. . देश की जनता को एक असहनीय धक्का सा पहुँचता है. सब से ज़्यादा आहत हैं गांधी . 19 नवम्बर, यानी लाजपत राय की क्रिया के दिन को वे लाजपत राय दिवस कर के मनाने और उन्हें श्रद्धांजलि देने का दिवस घोषित करते हैं. गाँधी को लगा था कि देश का एक अनमोल सपूत ब्रिटिश की लाठियों से शहीद हो कर चला गया. पर क्या ब्रिटिश को किसी भी किस्म का अपराध बोध हुआ था? लोगों ने जांच बिठाने की बात कही. पर ब्रिटिश केवल निर्मम ही नहीं थी, निर्लज्ज भी थी. ब्रिटिश ने वक्तव्य दिया कि लाजपत राय की मृत्यु साइमन विरोध की सभा में लगी चोटों के कारण हुई, इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं...

ब्रिटिश की इस निर्लज्जता का जवाब देने के लिए 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' की एक सभा में क्या सोचा जा रहा है, वह सचमुच बेहद सनसनी खेज़ सा है...

क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)


'भगत सिंह विशेष' शृंखला में आप पढ़ रहे है प्रेमचंद सहजवाला की कलम से भगत सिंह के जीवन के बारे में। पहली और दूसरी कड़ी हम पहले ही प्रकाशित कर चुके हैं। आज पढ़िए तीसरी कड़ी की पहली खेप॰॰॰॰


(निवेदन - लाजपत राय से सम्बंधित दो किस्तें में एक ही शीर्षक के अंतर्गत दे रहा हूँ. यह पहली किस्त है).

सन 1928. भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक महत्वपूर्व वर्ष. गाँधी को कुछ भड़काने वाले लेख लिखने के कारण 10 मार्च 1922 को साबरमती आश्रम से गिरफ्तार किया गया था और 18 मार्च 1922 से उन पर मुकदमा चला कर आख़िर छः वर्ष के लिए बर्मा जेल भेज दिया गया था. पर स्वास्थय की खराबी के कारण उन्हें 11 जनवरी 1924 को ही रिहा कर दिया गया. बंगाल के धुरंधर नेता चित्तरंजन दास गुप्ता ने गाँधी पर चले मुक़दमे की तुलना रोम में ईसा मसीह पर चले मुक़दमे से की थी. सुभाष चंद्र बोस गाँधी की तुलना गौतम बुद्ध व ईसा मसीह से करते थे. वे अपनी पुस्तक 'Indian struggle' में लिखते हैं कि महात्मा का बैठ कर काम करने का अंदाज़ गौतम बुद्ध जैसा था, व जब वे खड़े होते तो ईसा मसीह से लगते. पर चित्तरंजन दास गुप्ता गांधी की शख्सियत की अलौकिकता के बावजूद गाँधी से गहरा मतभेद रखते थे. बंगाल कांग्रेस के दो गुट थे. एक गाँधी-समर्थक व एक गाँधी-विरोधी. दरअसल बंगाल के कई लोग गाँधी के शुद्ध शाकाहारीपन पर भी गाँधी से मतभेद रखते थे. कुछ गाँधी से यह कहते थे कि कम से कम मछली खाने को आप मांसाहारी भोजन में शामिल न करें, क्योंकि मछली मस्तिष्क के लिए एक पौष्टिक भोजन है. पर चित्तरंजन दास व गांधी के मतभेद इस बात पर अधिक थे कि कांग्रेस को असेम्बली चुनावों में हिस्सा लेना चाहिए या नहीं. गाँधी के जेल जाते ही चित्तरंजन दास ने मोतीलाल नेहरू व विठल भाई पटेल से मिल कर एक 'स्वतंत्र पार्टी' बना ली व असेम्बली चुनावों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. गाँधी जेल से रिहा हुए तब तक असेम्ब्लियाँ अपना कार्य शुरू कर चुकी थी. गाँधी किसी भी नेता के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते थे. इसलिए जेल से निकल कर राजनीति से दूर रहे. ताकि चित्तरंजन दास के नेतृत्व में कांग्रेस के सभी नेता स्वतंत्र रूप से देश का कार्यभार संभाल सकें . लोकतंत्र का तकाजा यही था कि वे अपनी तानाशाही न चला कर दूसरों को भी अपने रास्ते पर चलने दें. यह उनकी महानता का एक विशेष आयाम था. पर दुर्भाग्य से 16 जून 1925 को चित्तरंजन दास का देहांत हो गया . गाँधी जेल से निकल कर खाली बैठने वाले लोगों में से न थे. वे तो श्रीमद भगवत गीता के कर्म सिद्धांत में अटूट विश्वास रखते थे. उनके पास चरखे का प्रचार करने से ले कर हरिजन उद्धार व हिंदू-मुस्लिम एकता जैसे असंख्य कार्य थे. वे कर्मशीलता की एक अभूतपूर्व मिसाल थे. कहीं भाषण करते तो हजारों नर नारी किसी राजनीतिक नेता के नहीं, वरन किसी महात्मा के दर्शन करने आते. पर 1928 आते-आते मोतीलाल नेहरू को लगा कि 'स्वतंत्र पार्टी' बना कर असोम्ब्लियों में हिस्सा लेने का प्रयोग केवल मृग-तृष्णा साबित हुआ. सब ने सोचा था कि सांसद बन कर भीतर से ही ब्रिटिश के संविधान को फ़ेल कर देंगे. ब्रिटिश जो क़ानून बनाना चाहेगी हम उसे मतदान में ही विफल कर देंगे तथा हम जनता के पक्ष में जो क़ानून बनायेंगे वह पारित कर के छोडेंगे. पर ब्रिटिश बड़ी शातिर कौम थी. वह अपने कानून वायसराय को दिए विशेषाधिकारों द्वारा पारित करा कर छोड़ती तथा कांग्रेस द्वारा पारित विधेयकों को उन्हीं अधिकारों के हथियार से से विफल करा देती. अब मोतीलाल नेहरू आख़िर किस के पास जाते. वे दरअसल उन दिनों एक और विपदा में भी फंसे थे और वह यह कि वे कांग्रेस के अध्यक्ष तो बन गए थे पर उनके सब से बड़े विरोधी उन के घर के चराग़ ही थे . यानी जवाहरलाल नेहरू! सन 1928 में कांग्रेस ने सोचा कि जनता के लिए हमें एक संविधान बनाना चाहिए. और इस के लिए मोतीलाल के नेतृत्व में एक 'नेहरू-समिति' बनी जिसने 'नेहरू रिपोर्ट' बनाई. उस रिपोर्ट में ब्रिटिश से आज़ादी संपूर्ण नहीं मांगी गई थी, वरन ब्रिटिश के अधीन आज़ादी की मांग की गई थी (Dominion Status). पर जवाहरलाल नेहरू अड़ गए थे कि नहीं, आज़ादी लेंगे तो संपूर्ण आज़ादी लेंगे, वरना! और कलकत्ता में कांग्रेस का सत्र होना था जिसमें मोतीलाल नेहरू को सब से ज़्यादा विरोध का डर था अपने ही साहबजादे से. गाँधी को उन्होंने पुकार भरा पत्र भेजा कि आ कर कोई रास्ता निकालें और गाँधी पिता-पुत्र की सुलह कराने के बहाने सहसा फ़िर राजनीति में आ गए! देश के मसीहा थे न वे.

गाँधी ने जवाहरलाल को बहुत प्रेम से समझाया. गाँधी कभी कभी जवाहरलाल को बहुत प्यार से पत्र लिखा करते थे, कि तुम कांग्रेस के अधिवेशनों में कुछ ऐसे जोशीले भाषण क्यों करते हो, जैसे स्कूली बच्चे वाद-विवाद प्रतियोगिता में करते हैं! जवाहरलाल और गाँधी के बीच कलकत्ता अधिवेशन से पहले ही समझौता हो गया कि हम अंग्रेजों से अभी Dominion Status ही मांगेंगे और उसे एक वर्ष का अल्टीमेटम देंगे. अगर एक वर्ष बाद भी संपूर्ण आज़ादी नहीं मिली, तो हम संपूर्ण आज़ादी की मांग को ज़ोर शोर से रखेंगे ...

इधर ब्रिटिश को सूझी कि भारत के लोगों के लिए कोई संवैधानिक परिवर्तन हम भी करें. इसलिए ब्रिटिश ने 'नेहरू रिपोर्ट' की परवा न कर के एक 'साइमन कमीशन' भेज दिया. इस 'साइमन कमीशन' का भारत में कड़ा विरोध हुआ. सभी पार्टियों ने डट कर इस कमीशन को लताड़ा कि जो कमीशन भारतवासियों की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए भारत के शहर -शहर गांव-गांव जाएगा, क्या उसमें एक भी भारतीय प्रतिनिधि नहीं होगा? सब भड़क उठे. जिन्ना तक ने कमीशन का विरोध किया. साइमन कमीशन की टीम जहाँ जहाँ जाती, लाखों लोग एकत्रित हो कर उस का विरोध करते. 'साइमन .. वापस जाओ' 'साइमन.. वापस जाओ'' के नारों से आकाश गूँज उठता. लखनऊ के एक नेता खालिकज़म्मान ने लखनऊ में सैंकड़ों पतंगें उडवाई और आसमान से बातें करती हर पतंग पर लिखा था - 'साइमन...वापस जाओ' 'साइमन...वापस जाओ'. बंबई-पूना में क्या हुआ कि जब साइमन टीम रेलगाडी में पूना गई तो साथ साथ दौड़ती सड़क पर कई नौजवान जीपों या अन्य गाड़ियों में रेलगाडी के साथ साथ धुआंधार गति से चलते और नारों से आसमान गूंजता - 'साइमन...वापस जाओ'.. 'साइमन...वापस जाओ'

...साइमन कमीशन एक रेलगाडी में लाहौर जाने वाला है
....और वहां जनता के कर्णधार हैं 'शेरे पंजाब' लाला लाजपत राय...
...यहाँ लाला लाजपत राय के बारे में चंद बातें कहनी ज़रूरी हैं .

लाजपत राय के विषय में हर भारतीय जानता है कि वे बहुत ऊंचे चरित्र के एक शुद्ध-ह्रदय देश-भक्त व्यक्ति थे, जिन्होंने शुरुआत अंग्रेजों के ज़मीन-सम्बन्धी कानूनों के विरोध से की. छः वर्ष वे भी बर्मा की जेल में गए थे. तब पंजाब के किसानों के बीच एक गीत बहुत चलता था- 'पगड़ी संभाल जट्टा...पगड़ी संभाल ..' पगड़ी जो कि किसी भी गांववासी के लिए सम्मान का प्रतीक है और फिरंगी कौम के आगे उस सम्मान को बचाना अनिवार्य है..

पर लाजपत राय अपनी पुस्तक ' The Story of My Life' में अपने परिवार का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि उनके पिता बचपन में एक बहुत प्रखर विद्यार्थी थे और हमेशा प्रथम आते. उनके स्कूल के प्रिंसिपल एक बहुत ही पवित्र-हृदय व धार्मिक वृत्ति के मुस्लिम विद्वान् थे. अपने सभी विद्यार्थियों को इस्लाम की पवित्र शिक्षा से उन्होंने इस सीमा तक प्रभावित कर रखा था कि कई विद्यार्थी मुस्लिम भी बन गए थे . लाजपत राय के पिता मुंशी राधा किशन आज़ाद मुस्लिम तो नहीं बने, पर एक मुस्लिम जैसा जीवन जीते थे. नमाज़ पढ़ते थे व रमजान के महीनों में रोज़े रखते थे. और संयोग कि उनकी शादी हुई एक सिख महिला गुलाब देवी से! और इन दोनों से जन्मे लाजपत राय बड़े हो कर बने आर्य-समाज के प्रखर विद्वान्! आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने मूर्ति पूजा भले ही समाप्त कर दी, हो पर चारों वेदों की पुस्तकें किसी भी आर्य समाजी व्यक्ति के लिए पूज्य पुस्तकें बन गई. लाजपत राय भी वेदों को पूरे ब्रह्माण्ड में सर्वोपरि मानते थे, जब कि उन के पिता हिंदू धर्म की आलोचना करते थे. माँ जपजी साहब पढ़ती पर देवताओं की पूजा भी करती, पर अक्सर रो पड़ती क्यों कि उसे पति के इस्लामी तरीके पसंद नहीं थे! पर गुलाब देवी ने पति को कभी त्यागने का विचार किया हो, ऐसा नहीं है. और मुंशी राधा किशन को पता था कि यदि वे मुस्लिम बन गए तो गुलाब देवी बच्चों समेत अपने मैके चली जायेगी! परिवार के सदस्यों का आपसी प्रेम अटूट था व सब का अपना अपना ऊंचा चरित्र व मानवीयता उनके साथ. वरना ये तीनों तो मानो दूर-दूर स्थापित द्वीप थे. लाजपत राय लिखते हैं कि अपने जीवन के चालीसवें वर्ष तक उन के पिता शुद्ध इस्लामी जीवन व्यतीत करते रहे, पर धीरे धीरे उनमें परिवर्तन तब आया जब लाजपत राय ने आर्य-समाज अपना लिया. तब, लाजपत राय का कहना है कि उनके पिता को हिंदू ग्रंथों में सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ पढ़ने को मिले जिस के बाद उनमें हृदय परिवर्तन होता गया.

ये सब बातें मैं ने लाजपत राय जैसे महान देश भक्त के विषय में क्यों लिखी? सब जानते हैं कि अपने-अपने धर्म में अटूट आस्था होना बहुत अच्छा है. पर अपने धर्म के पीछे हम अक्सर इस कदर धर्मांध हो जाते हैं कि दूसरे के धर्म को तुच्छ व हीन समझते हैं. यहीं से मानव-मानव में भेद शुरू हो जाता है. जहाँ लाजपत राय के पिता हिंदू धर्म के आलोचक थे, वहीं उन की माँ कमरे में बंद हो कर कर अक्सर रोती रहती, क्योंकि उन्हें लगता कि शायद वे एक दिग्भ्रमित व्यक्ति के साथ जी रही हैं जो इस्लाम के इस कदर दीवाने हैं कि उन्हें घर में कोई मूर्ति तक अच्छी नहीं लगती ! अपने घर में आए मुसलमान अतिथियों की वह आवभगत बहुत अच्छी पत्नी होने के नाते करती, पर पति के धार्मिक विश्वाशों से उसे वितृष्णा थी! अब लाजपत राय को समझना भी कठिन नहीं. भारत के स्वाधीनता-पूर्व काल में देश के पास लोकमान्य तिलक, मदन मोहन मालवीय व लाजपत राय जैसे पवित्र-चरित्र नेताओं का होना देश के लिए एक वरदान ज़रूर था, पर विशेष कर इन तीनों के विषय में इतिहासकारों ने यह भी लिखा है कि तीनों में एक गोपनीय सी साम्प्रदायिकता भरी थी, जो उनके कई समकालीन लोग पसंद नहीं करते थे. उदाहरण के तौर पर लोकमान्य तिलक ने जब गणेश का त्यौहार प्रारम्भ किया, तब आम हिंदू जनता बेहद प्रसन्न थी पर अचानक हिंदू- मुस्लिम समीकरण गड़बड़ा गए थे. गोपाल कृष्ण गोखले, गोपाल गणेश अगरकर व महादेव रानाडे जैसे महापुरुषों को, जो स्वयं ऊंचे इखलाक वाले हिंदू थे, यह कदम पसंद नहीं आया, क्यों कि गणेश का त्यौहार प्रारम्भ होते ही हिंदू-मुस्लिम जनता के बीच एक असहजता सी आ गई. अगले ही वर्ष बम्बई में दंगे भी हो गए. गोखले और तिलक के अनुयायी तो एक दूसरे के ख़िलाफ़ इतने आक्रामक थे कि 1909 के गणेश त्यौहार में तिलक समर्थक नारे लगाने लगे- गोखले कातिल है, गोखले कातिल है..

जब हम इतिहास पढेंगे तो वरदानों से ही साक्षात्कार नहीं होगा, वरन कड़वी से कड़वी बातें भी पढ़ने को मिलेंगी. लाजपत राय व मदन मोहन मालवीय के विषय में इतिहास यही कहता है कि दोनों को हिंदू संस्कृति पर अटूट गर्व था पर इसीलिए दोनों के ह्रदय में एक गोपनीय सी संकीर्णता भी थी कि कदाचित मुस्लिम व ब्रिटिश संस्कृतियाँ हमारे हिंदू culture को समाप्त कर देंगी! वे तो महापुरुष थे, अपने-अपने विश्वासों तक सीमित रहते, पर आज जिन्हें संस्कृति के गिद्ध कहा जाता है, यानी culture vultures, वे तो तोड़ फोड़ व हत्या तक पर उतर आते है...

लाजपत राय की धार्मिक कट्टरता भगत सिंह को अच्छी नहीं लगती थी. वे तो कार्ल मार्क्स के कायल थे और लेनिन के. इसलिए नास्तिक थे. धर्म ने और अंधविश्वासों ने देश व दुनिया को इतनी ज़्यादा हानि पहुंचाई है, कि उसकी भरपाई करना बहुत मुश्किल है. पर क्या भगत सिंह लाजपत राय का निरादर करते थे? यह कहना सरासर ग़लत होगा. भगत सिंह के लिए लाजपत राय से अधिक श्रद्धेय व्यक्ति कोई था ही नहीं. उनकी देश-भक्ति भगत सिंह के लिए प्रेरणा थी. लाजपत राय के ही कॉलेज में वे स्कूल छोड़ कर गए थे. पर नास्तिकता और आस्तिकता (जो कि हृदय की गहराइयों में कहीं साम्प्रदायिकता का रूप ले चुकी थी) की टकराहट में इन दोनों महापुरुषों के बीच एक रोचक सा अध्याय भी आया, यही लिखना इस किस्त का ध्येय है. भगत सिंह लाजपत राय से लगभग 42 वर्ष छोटे थे. युवा हो गए तब भी वे उनके आगे बालक ही थे. पर लाजपत राय की धार्मिकता भगत सिंह को स्वाधीनता के रास्ते में एक रुकावट सी लगती है. उन्हें लगता है कि आज़ादी के लिए किसी भी व्यक्ति पर किसी भी धर्म का लेबल नहीं होना चाहिए. इसलिए एक दिन क्या होता है, कि लोगों के हाथों में भगत सिंह द्वारा छपवा कर बांटा हुआ एक pamphlet आ जाता है. उस pamphlet में और कुछ नहीं, एक अंग्रेज़ी कविता है, जिस पर लाजपत राय का नाम नहीं है, पर बाहर उनकी तस्वीर है. कविता अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध कवि Robert Browning की है 'The Lost Leader'. Robert Browning ने वह कविता William Wordsworth पर व्यंग्य करने के लिए लिखी थी क्यों Wordsworth उदारता को स्वीकार नहीं कर रहे थे. भगत सिंह और लाजपत राय में भी प्रश्न संकीर्णता व उदारता का था. जब भगत सिंह ने 6 अप्रैल 1928 को पंजाब में अपनी नई संस्था 'नौजवान भारत सभा' का घोषणा-पत्र प्रस्तुत किया, तब उन्होंने अपने भाषण में साफ़ शब्दों में कहा था कि धार्मिक अंधविश्वास तथा धर्मान्धता हमारी प्रगति के लिए एक बड़ी रुकावट हैं...हमें इनसे मुक्ति पानी ही चाहिए...हिन्दुओं की संकीर्णता व पुरातन पंथता, मुसलामानों की सार्वभौमिकता व कट्टरता, तथा सामान्य रूप में सभी सम्प्रदायों की संकीर्ण मानसिकता का विदेशी शत्रुओं ने हमेशा शोषण ही किया है.. ('The Fragrance of Freedom: Writings of Bhagat Singh' edited by KC Yadav, Babar Singh pp 332-333). उस सभा में भगत सिंह के नेतृत्व में सभी उपस्थित युवक इस बात पर सहमत थे कि 'नौजवान भारत सभा' में आने वाला कोई भी सदस्य किसी भी सांप्रदायिक संस्था यथा 'हिंदू महासभा' या 'राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ' आदि का सदस्य नहीं होगा. इधर लाला लाजपत राय के जब मोतीलाल नेहरू से मतभेद हुए तो उन्होंने स्वतंत्र पार्टी छोड़ दी और हिंदू महासभा में चले गए. मदन मोहन मालवीय, तथा एन सी केलकर भी गए . इन तीनों ने कांग्रेस व मोतीलाल नेहरू पर हिंदू-विरोधी, इस्लाम-प्रेमी आदि होने के इल्जाम लगाये तथा उन्हें गो-हत्या को बढावा देने वाले व गोमांस खाने वाले बताया..

Robert Browning ने अपनी कविता में लिखा था:
(कुछ पंक्तियों का अनुवाद) :

केवल मुट्ठी भर चांदी के लिए उस ने हमें छोड़ दिया!
केवल एक रिबन उसके कोट से चिपका रहे, इसलिए!
हम,
जिन्होंने उसे ऐसे प्यार किया, उसका अनुसरण किया, सम्मान किया,
उसकी महान भाषा सीखी, उसके स्पष्ट उच्चारणों को समझा,
उसे अपना प्रतीक बनाया, जीने और मरने के लिए!...

केवल वही... पिछवाडे में और गुलामों के बीच डूब रहा है!..

हम आगे बढ़ते रहेंगे - उसकी उपस्थिति के माध्यम से नहीं,
गीत हमें उत्तेजित करेंगे.. पर उसकी गीतावली से नहीं..
उसका नाम मिटा दो!.. एक और आत्मा खो गई है, यह लिख डालो...


ऐसी बेबाकी, अपने स्तुत्य नेता के लिए, केवल भगत सिंह ही कर सकते थे न!

आशिकों का आज जमघट कूचए कातिल में है...


भगत सिंह विशेष की दूसरी किश्त

पिछले अंक में आपने भगत सिंह के बचपन, शादी से उनका विद्रोह, नास्तिक बनने की प्रक्रिया और कानपुर तक पहुँचने की बातें पढ़ी, अब पढ़िए आगे॰॰॰॰



... जिस प्रकार भगत सिंह बचपन में मिट्टी के टीलों पर बंदूकें बोते रहे और शहीदों के खून से सनी मिट्टी को बोतल में डाल कर घर लाए, ब्रिटिश को देश से खदेड़ने की शपथ ली उसी प्रकार मोहन दास करमचंद गाँधी के बचपन की भी कुछ प्रतिक्रियाएँ थी. पाँच-छः वर्षों के मोहनदास जिन के पिता गुजरात में किसी रियासत के प्रधानमंत्री थे, जब समुन्दर किनारे से आते-जाते पानी के जहाज़ देखते तो बालसुलभ तरीके से मन में ठान लेते की एक दिन मैं भी इन्हीं जहाजों में कहीं जाऊँगा. पर जब माँ ने बताया कि बेटे इस देश में तो एक फिरंगी कॉम राज करती है. भारत देश उनका गुलाम है. तब छोटे से मोहनदास भी मन में प्रण कर लेते हैं कि मैं बड़ा हो कर इन अंग्रेजों को देश से भगा दूँगा...जब भगत सिंह ने शपथ ली थी तब गाँधी 50 वर्ष के हो चुके थे. भगत सिंह जब कानपूर गए तब उनकी वैचारिकता स्वतंत्र रूप से बन रही थी. वे केवल जोश में आ कर देश को ले कर एक दीवानगी ओढ़े नहीं रहते थे. बल्कि भगत सिंह व अन्य सभी क्रांतिकारी युवकों में एक बड़ा अन्तर यह था कि वे बहुत बड़े विद्वान् भी थे. एक प्रखर बुद्धिजीवी. सन 1917 में लेनिन ने जो रूस में जो मजदूरों की क्रांति ला कर रूस का इतिहास ही बदल दिया, उस का प्रभाव केवल भगत सिंह जैसे युवकों पर ही नहीं पड़ा, वरन समस्त एशिया में लेनिन एक प्रेरणा स्रोत बन गए. 1924 में लेनिन गए तो पूरे विश्व ने सोचा कि दुनिया का सब से बड़ा नास्तिक संत चला गया है. जो व्यक्ति किसी भी देवता की पूजा नहीं करता था, रूसी बहुत श्रद्धा से उसी को पूज्य मानने लगे. पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, जय प्रकाश नारायण, आचार्य कृपलानी,, ऐसे असंख्य कांग्रेसी बुद्धिजीवी लेनिन के कायल थे. भगत सिंह एक प्रकार से लेनिन की प्रतिलिपि थे. यदि इतनी छोटी आयु में शहीद न हो जाते वे भारतीय लेनिन ही बन जाते. यह बात दीगर है कि बाद के दशकों में वामपंथी वैचारिकता पिट गई, पर भगत सिंह की विशिष्टता यह थी कि वे सोचते थे कि क्या आज़ादी मिलने पर हम सब को लक्ष्य मिल चुका होगा? नहीं. बल्कि आज़ादी के बाद तो असली तपस्या शुरू होगी, जिस में हम देश के मजदूरों को उन का अधिकार दिलाएंगे, किसानों को ज़मींदारों के शोषण से बचायेंगे..

गाँधी वामपंथी विचारों में विश्वास नहीं करते थे. यही गाँधी और नेहरू तथा गाँधी और सुभाष में मतभेद था. सुभाष चंद्र बोस के गाँधी से अलग होने की शुरूआत उसी समय हो गई थी जब सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बने और मजदूरों के संघर्ष को गहरा करने की योजना बना रहे थे. भगत सिंह, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस आदि वर्ग संघर्ष में विश्वास करते थे तो गांधी वर्ग समन्वय में..

रोचक बात यह है कि भगत सिंह जो कि गांधी से 38 वर्ष छोटे थे का गाँधी से समीकरण वही था जो लेनिन का लियो तोल्स्तोय से था. लेनिन कहते थे - लियो तोल्स्तोय दुनिया के सब से दिग्भ्रमित व्यक्ति हैं, क्योंकि वे इश्वर में आस्था रखते हैं और अहिंसा को धर्म मानते हैं. भगत सिंह अपने एक लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' में गांधी को ले कर कहते हैं - आलोचना व स्वतंत्र चिंतन- किसी क्रांतिकारी के लिए दो अनिवार्य गुण हैं. क्यों कि महात्मा जी महान हैं इसलिए क्या किसी को भी उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए? क्यों कि व ऊंचे उठ चुके हैं इसलिए जो कुछ वे कहते हैं -चाहे राजनीति या धर्म, आर्थिक नीतियों या नैतिकता के बारे में - सही है? चाहे आप उस से सहमत हैं चाहे नहीं, आप को कहना ही चाहिए - हाँ हाँ यह सत्य है? यह मनोवृत्ति प्रगति की ओर नहीं ले जाती. यह स्पष्टतः प्रतिक्रियावाद है. (The Fragrance of Freedom: Writings of Bhagat Singh edited by KC Yadav, Babar Singh p 29).

कुछ महापुरुषों ने ठीक ही कहा है - संसार में कुछ भी ग़लत या सही नहीं है. केवल सोच ही उसे ग़लत या सही बनाती है है. गाँधी नेहरू सुभाष पटेल ये सब अलग-अलग तरीकों से सोचते थे. पर सब का लक्ष्य एक ही था - आज़ादी.

भगत सिंह कानपुर पहुँच कर गणेश शंकर विद्यार्थी के पास गए जिन के नाम एक पत्र उन्हें प्रो. जय चाँद विद्यालंकार ने दिया था. गणेश शंकर विद्यार्थी एक देश भक्त व ऊंचे इखलाक वाले व्यक्ति थे. दुर्भाग्य से भगत सिंह को मृत्यु-दंड मिलने से अगले दिन यानी 24 मार्च 1931 को कानपुर में अचानक भड़के हिंदू-मुस्लिम दंगों में कुछ मुसलामानों को बचाते-बचाते गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महापुरुष शहीद हो गए.

भगत सिंह से मिल कर वे उनकी शख्सियत से बेहद प्रभावित थे. प्रबुद्धता में भगत सिंह अपनी आयु के सभी युवकों को पीछे छोड़ चुके थे. विश्व के सभी देशों के स्वाधीनता संग्राम पढ़ते व विभिन्न वैचारिकताएँ. कार्ल मार्क्स की तरह भगत सिंह भी मानते थे कि धर्म एक अफीम है, जिस का नशा विनाशकारी ही हो सकता है.

गणेश शंकर विद्यार्थी ने भगत सिंह को अपनी 'प्रताप-प्रेस' का प्रभार दिया. उनके सुझाव पर उन्होंने अपना नाम बदल कर बलवंत सिंह रख दिया. भगत सिंह ने वहां वीर-अर्जुन समाचार पत्र में भी काम किया व कानपुर के निकट 'नेशनल स्कूल' के हेड मास्टर भी बने. पर उनकी शख्सियत को उस समय स्फूर्ति मिली जब वे राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा संचालित 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन' के सदस्य बन गए. वहीं उनका परिचय चंद्रशेखर आजाद जोगेश चंद्र चैटरजी, बेजोय कुमार सिन्हा जैसे जांबाज़ नौजवानों से हुआ . भगत सिंह का अब एक ही ध्येय था - लोगों को सशस्त्र क्रान्ति के लिए तैयार करना. उनके भीतर का लेनिन सक्रिय हो चुका था. केवल एक ही अन्तर था लेनिन और भगत सिंह में, जिसे जीवन के अंत तक पहुँच कर भगत सिंह ने अप्रत्यक्ष तरीके से स्वीकारा. सब जानते हैं रूस में लेनिन की bolshevik पार्टी की सरकार बनने से पूर्व रूस में ज़ार (रूसी राजा) का राज था. ज़ार एक के बाद जो भी बनता बहुत जालिम होता. जनता भूखों मरती. कभी-कभी जनता ऐसी बदहालत तक भी पहुँच जाती कि पाँच सितारा होटलों की नालियों से बाहर निकल रही शराब को चुल्लुओं में भर कर पीती और डबल रोटी की टुकड़े उठा उठा कर खाती. जनता जार के जुल्मों के नीचे छटपटाती. कई नौजवान आतंकवाद के रस्ते पर चल पड़े. एक दिन लेनिन को पता चला कि उस के भाई को पुलिस पकड़ ले गई है. क्योंकि उसने ज़ार की हत्या करने का प्रयास किया है. पूरा झुंड ही पकड़ा गया है. लेनिन को दुःख होता है. सोचते हैं मेरे भाई, यदि तुम्हारी गोली से ज़ार मर जाता तो क्या रूस की जनता के दुःख दूर हो जाते!

यही लेनिन की दृष्टि थी, यही लेनिन का दर्शन. लेनिन छुप-छुप कर गोली चलाने में विश्वास नहीं करते थे. वे जनता को साथ ले कर चलने में और अंततः सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे. जनता के बीच उस समय तक केवल छटपटाहट थी. आक्रोश था. पर जनता को एकत्रित करना उस के भीतर संघर्ष की और युद्ध की चेतना पैदा करना सब से पहला काम था. लेनिन ने यही किया. मजदूरों को एकत्रित किया. जब मजदूरों की पहली हड़ताल कराई तब ज़ार के भी होश उड़ गए थे....

'हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन' के जांबाज़ नौजवान अपनी जान को हथेली पर रख कर जीते. इनमें से रामप्रसाद बिस्मिल तो एक जुनूनी से नौजवान थे. बहुत सुंदर कवितायें गजलें लिखते. आर्य समाजी होने के नाते इश्वर की बहुत भक्ति करते. वे कहते -

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे.
जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे,
तेरा ही जिक्रे-यार तेरी जुस्तजू रहे.

उनके जीवन का एक ही सपना होता:

उरूज़े कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा
रिहा सैय्याद के हाथों से अपना गुलसितां होगा

ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंजरे-कातिल
बता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा.

मृत्यु विचार उन्हें भयभीत नहीं करता था. इसीलिए कहते:

वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है,
सुना है आज मकतल पर हमारा इम्तिहाँ होगा.

पर जो फर्क लेनिन में और उस के भाई में था वही लेनिन और इन जांबाज़ नौजवानों में था. ये लोग लेनिन की तरह जनता को आयोजित नहीं करते थे. बल्कि जनता से छुप कर इन सब को रहना पड़ता था. कभी नाम बदलते तो कभी मकान. कभी वेशभूषा. आम जनता से अलग रह कर भी संपर्क में आए नौजवानों को देख-परख कर अपने साथ मिला लेते और उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार काम देते. पर सभी की आंखों का सपना एक ही होता, आज़ादी.

धन के लिए इन्हें छुप कर ही चंदा एकत्रित करना पड़ता. अक्सर ऐसे तरीके भी अपनाने पड़ते जो आम भाषा में नैतिक नहीं माने जाते. राम प्रसाद बिस्मिल और उस के साथियों ने 9 अगस्त 1925 को एक रेलगाड़ी 8-down जो काकोड़ी (उत्तर प्रदेश) स्टेशन जा रही थी, के एक डिब्बे से रेलवे का कैश चुराया. पूरा गुट पकड़ा गया. मुकदमा चला. चार जांबाज़ नौजवानों को फांसी की सज़ा सुनाई गई. 17 जनों को उम्र कैद. केवल चंद्रशेइखर आजाद उर्फ़ पंडितजी लापता हो गए. जिन चार जवानों को मृत्युदंड मिला, वे थे- राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिरी अशफाक-उल्ला-खान और रोशन सिंह. इन सब ने हँसते-हँसते मृत्यु का वरण कर लिया. शहादत जिनके लिए जश्न होती है, उन्हीं के लिए बिस्मिल स्वयं ही लिख गए-

शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा.

बिस्मिल ने फांसी के तख्ते पर खड़े हो कर बुलंद आवाज़ में ब्रिटिश को एक संदेश दिया -

I want the downfall of the British empire.

अशफाक-उल्ला मुस्लिम थे. पर क्या धर्म के अन्तर को इन सब नौजवानों ने कभी सोचा? उनका एक ही धर्म था, जो भगत सिंह ने बचपन में कहा था- देशभक्ति!

अशफाक-उल्ला को जब फैजाबाद की जेल में फांसी के लिए चलने का आदेश मिला, तब उन्होंने भी अपने एक शेर में ब्रिटिश का दो टूक परिचय दे दिया.

तंग आ कर हम उनके ज़ुल्म से बेदाद से,
चल दिए सू-ऐ अदम जिन्दाने फैजाबाद से

(अर्थ- बेदाद = अत्याचार, सूए अदम = अदम के मुल्क यानी स्वर्ग की तरफ़, जिन्दाने = जेल).

ये सब नौजवान इतिहास के पन्नों को अपने खून का बलिदान दे कर चले गए. पर क्या उनके द्वारा जलाई गई आज़ादी की पवित्र ज्योति बुझ चुकी थी? नहीं. उसे अपने खून रुपी तेल देने के लिए भगत सिंह जो थे. दिल्ली के फिरोजशाह कोटला जाने वाले सब जानते हैं. सितम्बर 1928 में भगत सिंह के नेतृत्व में अनेक नौजवान एकत्रित हुए, ऐसे, जैसे बिस्मिल की पंक्तियाँ हैं:

खींच लाई है सभी को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है.

किसी गरीब से लड़के ने जो वहां पार्क में कोई काम करता था, वहां पूछा- ये सब लड़के यहाँ क्यों इकठ्ठा हुए हैं?
भगत सिंह ने उत्तर दिया - ये सब किसी परीक्षा की तैय्यारी करने आए हैं. कोई और बात नहीं है.

उसी परीक्षा में न जाने जिंदगी से जुड़े कौन-कौन से कठिन प्रश्न होंगे. भगत सिंह बिस्मिल की पार्टी 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन' को एक नया नाम देते हैं, अपनी वैचारिकता के अनुकूल - 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन'. भारत को एक समाजवादी रस्ते पर ले जाने का उनका सपना जो था.

क्रमशः.................

ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार




२७ सितम्बर को शहीद भगत सिंह की १०१वीं जयंती है और २ अक्टूबर को महात्मा गाँधी की १३९वीं जयंती। आज से ही प्रेमचंद सहजवाला भगत सिंह के जीवन और गाँधी जी के साथ उनके मतभेदों पर अपनी आलेख-शृंखला शुरू कर रहे हैं। यह लगातार २ अक्टूबर तक प्रकाशित होगी। पढ़िए पहली किश्त॰॰॰॰


सन 1919 का बैसाखी का दिन यानी 13 अप्रैल भारत के इतिहास में एक ज़बरदस्त मोड़ लाने वाला दिन था. इस दिन 400से भी अधिक भारतवासी अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में शहीद हो चले थे. ब्रिटिश काल था और भारतवासी यदा-कदा ब्रिटिश द्वारा बनाये गए कानून से त्रस्त रहते. रोलेट कानून भी एक ऐसा ही कानून था. जलियांवाला बाग़ में कई भारतीय एकत्रित हुए, इस कानून के विरोध में एक सभा करने. पर ब्रिटिश के निर्मम सेना अधिकारी ब्रिगेडिएर आर ई एच डायर ने गोली चलाने का हुक्म दिया. कई लोग शहीद हो गए.

इस एक दिन ने भारत के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दो व्यक्तियों की जीवन दिशाएँ बदल दी. एक थे मोहनदास करमचंद गाँधी. इस घटना से उनके हृदय को बहुत गहरी ठेस पहुँची. उस दिन तक वे ब्रिटिश से अच्छे सम्बन्ध बनाये रखने में विश्वास रखते थे. कई ब्रिटिश वासी जो भारत में रहते थे वे मानते थे कि गाँधी का विरोध ब्रिटिश के शासन से है न कि ब्रिटिश वासियों से. दक्षिण अफ्रीका में पूरे दो दशक गाँधी जी ने भारत वासियों की समस्याओं को ले कर अथक परिश्रम किया पर वह सारा संघर्ष अहिंसात्मक था व ब्रिटिश से बातचीत के दौरान वे कभी भी आक्रामक तेवर नहीं दिखाते थे. पर जलियांवाला बाग़ ने उन्हें गहरा चिंतन करने पर विवश कर दिया. वे जानते थे कि ब्रिटिश से सशस्त्र क्रान्ति का रास्ता घातक सिद्ध हो सकता था. पर उन्हें कांग्रेस का रवैय्या भी पसंद न था जिसमें असेम्बली में तकरीरें करो या जनता की समस्याओं को ले कर वाइस रॉय के पास मुक़दमे ले जाओ या आवेदन पत्र. गांधी जी ने जलिआंवाला बाग़ की इस दर्दनाक घटना के बाद बीच का रास्ता चुन लिया. असहयोग का. जो लोग गाँधी जी की अहिंसा को कायरता या कमजोरी मानने की भूल करते हैं उन के लिए यह जानना काफ़ी होगा कि असहयोग का रास्ता भी कोई फूलों भरा रास्ता नहीं था. ब्रिटिश से असहयोग करके हजारों नौजवान जेलों में जाते थे...

पर इस घटना के कुछ समय बाद वहां एक बारह साल का लड़का भी अपने पिता के साथ आया. इस किशोर के हृदय पर जलिआं वाला बाग़ की घटना का बहुत गहरा असर पड़ा. वहां घूमते-घूमते उस ने देखा कि वहां की मिट्टी भी शहीदों के खून से लाल थी. उसने शहीदों के खून से गीली उस मिट्टी को एक छोटी सी बोतल में भर लिया और घर ले आया. उस कच्ची उम्र में ही उस ने शपथ ली कि वह जालिम अंग्रेजों को इस मुल्क से रुख्सत करवा कर ही दम लेगा. उस बालक के पिता और दोनों चाचा भी क्रान्ति कारी ही थे. वह बालक कोई और नहीं शहीद-ऐ-आज़म भगत सिंह ही था जिस की दादी ने उस के जन्म लेने वाले दिन उस का नाम रखा था भागांवाला. तारिख 27 सितम्बर 1907 शनिवार प्रातः नौ बजे की शुभ घड़ी को पंजाब के ल्यालपुर जिले के बंगा गांव में जन्मे इस बालक का नाम भागांवाला क्यों रखा गया? उस के क्रांतिकारी पिता सरदार किशन सिंह जेल में थे तथा ज़मानत की अर्जी दे रखी थी. उस के चाचा स्वर्ण सिंह भी जेल में थे. इस बालक में जन्म लेते ही दोनों को ज़मानत मिल गई. एक दो दिन बाद जब वे घर पहुंचे तो उस बालक के दूसरे क्रांतिकारी चाचा जो बर्मा के मांडले जेल में सज़ा भुगत रहे थे, उन्हें भी रिहा कर दिया गया. इसीलिए तो, दादी के लिए इस बालक का आना सौभाग्य का सूचक था. उस का नाम पड़ गया भागांवाला. कुछ वर्षों बाद उस का नाम पड़ गया भगत सिंह, आज जिस का नाम हम अति श्रद्धा से लेते हैं. वह नौजवान जो देश पर शहीद हो गया केवल 23-24 वर्ष की आयु में ही, के विषय में सोच कर उस के प्रति सर स्वयमेव आदर से झुक जाता है.

भगत सिंह के चाचा अजित सिंह पंजाब के एक धुरंधर नेता थे. ब्रिटिश ने ज़मीन को ले कर भी कुछ निर्मम से क़ानून बनाये. अजित सिंह उसी सिलसिले में गिरफ्तार कर के बर्मा भेज दिए गए थे. नियति की कैसी निर्ममता है कि अजित सिंह उस के बाद चालीस वर्ष तक भारत नहीं आ सके. कई अन्य देशों में आते जाते रहे. वे लौटे तो ठीक 15 अगस्त 1947 को और उसी दिन देश को एक सदमा सा दे कर चले भी गए. डलहौजी में उनकी समाधि है. आज भी देश के असंख्य लोग डलहौजी जाते हैं तो अजित सिंह की पवित्र समाधि पर नमन करने ज़रूर जाते हैं.

...छोटा सा बालक भगत सिंह बचपन में एक दिन खेलते खेलते मिट्टी के टीले बनाने लगता है. एक एक टीले में एक एक छोटी छड़ी से अटका देता है. पूछने पर तीन साल का वह बालक कहता है कि मैं बंदूकें बो रहा हूँ. कभी वह थोडी सी बड़ी उम्र में बच्चों का नेतृत्व करता है तो युद्ध करने वाली दो टीमें बना देता है!...

पूछे जाने पर की तुम्हारा धर्म क्या है, वह बालक जवाब देता है - देशभक्ति!

ब्रिटिश के निर्मम ज़मीन सम्बन्धी कानून और उस के खिलाफ भड़कते संघर्ष के दीवानों का हुजूम ... सरदार किशन सिंह के घर एकत्रित होता रहता है. भगत सिंह उन सब की बातें सुन कर अपने भीतर एक आक्रोश ब्रिटिश के विरुद्ध पाता है. उस पर प्रसिद्द क्रान्ति कारी करतार सिंह सराभा का बहुत प्रभाव है. सराभा जो गीत अक्सर गाता है, वही भगत सिंह भी गाता है.
जिनां देश सेवा विच पैर पाया
उनां लाख मुसीबतां झलिआं ने

१९१६ में भगत सिंह लाहौर के DAV स्कूल में छठी कक्षा में प्रवेश लेते हैं. अंग्रेज़ी उर्दू संस्कृत सब भाषाओँ में अच्छे और मित्र बनाने में माहिर. एक बेहद संवेदनशील विद्यार्थी भगत सिंह. लाहौर में लाला लाजपत राय से बड़ा कोई नेता नहीं. भगत सिंह को एक पथ प्रदर्शक मिल जाता है. फिर जब वह नौवीं में पहुँचता है तो देश में असहयोग की आंधी आयी हुई है. गाँधी की पुकार पर लोग ब्रिटिश द्वारा चलाये गए संस्थान छोड़ने में लगे हैं. विद्यार्थी भारतीय कॉलेजों में जाते हैं. भगत सिंह कैसे पीछे रहते. पर नौवीं का विद्यार्थी लाहौर के नेशनल कॉलेज में कैसे प्रवेश लें. सब विद्यार्थियों को दो-दो महीने का समय दिया जाता है. नेशनल कॉलेज भाई परमानन्द व लाजपत राय द्वारा संचालित है. भगत सिंह दिन रात अथक परिश्रम करते हैं और एक विशेष रूप से की गई प्रवेश परीक्षा में पास हो कर कॉलेज के प्रथम वर्ष में प्रविष्ट हो जाते हैं. भगत सिंह F.A. तो पास कर लेते हैं. कॉलेज में देश भक्ति के गीत गाने से ले कर नाटकों में राणा प्रताप सिंह जैसे वीर पात्रों का अभिनय करते करते वे B.A. तक पहुँचते हैं. पर तभी उनके जीवन में एक मोड़ आता है और वे B.A नहीं कर पाते. उनकी दादी की बहुत तमन्ना जो है, भागंवाला बेटा अब शादी करे. सरदार किशन सिंह भगत सिंह को पत्र लिखते हैं की बेटा तेरी दादी ने एक लड़की देख रखी है. वह शेखूपुरा जिले के मन्नावाला गांव के तेजा सिंह की बहन है. अब जल्दी-जल्दी फेरे लगाने की सोचो बेटे. भगत सिंह के दिल को एक धक्का सा लगता है. अगर मैं शादी के बंधन में बँध जाऊंगा तो देश के करोड़ों लोगों की सेवा आख़िर कौन करेगा. वे पिता को आश्चर्य में एक पत्र लिखते हैं की हमारा सारा घर देश भक्तों का घर है. हम सब देश के लिए अपना सर्वस्व त्याग चुके हैं. मैं तो आप ही के क़दमों के पीछे-पीछे चल रहा हूँ पिताजी. ऐसे में आप को मेरी शादी का ख्याल क्योंकर आया? पर दादी नहीं मानती. उसे तो एक बहू चाहिए. पिता पलट कर भगत सिंह को पत्र लिखते हैं कि तुझे शादी करनी ही पड़ेगी बेटे. भगत सिंह को और अधिक गहरा आघात पहुँचता है. उस के पास अब एक ही तरीका है. वह लाहौर से दूर चला जाए. पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय लिया. B.A नहीं कर पाते भगत सिंह. पिता को एक कड़ा पत्र लिखते हैं कि मुझे आपके पत्र पर बेहद आश्चर्य हुआ है. यदि आपके जैसे देशभक्त शादी जैसी तुच्छ बातों से लालायित हो सकते हैं तो एक सामान्य व्यक्ति की क्या दशा होगी.
भगत सिंह बचपन से ले कर देश पर मर मिटने का जो स्वप्न देखते रहे थे उसे पूरा करने के पथ पर लाहौर छोड़ कर कानपुर चले गए. यह सन १९२४ था. राम प्रसाद बिस्मिल की यह ग़ज़ल भगत सिंह के लिए एक प्रेरणा थी -

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है.


उन के हृदय में जैसे हर समय आवाज़ गूंजती थी -

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.


जाते-जाते भगत सिंह ने अपने साथियों से कहा- यदि गुलाम भारत में मेरी शादी होती है तो मेरी दुल्हन केवल शहादत ही होगी. मेरी अन्तिम यात्रा ही मेरी बरात होगी और देश के शहीद ही मेरी शादी के बाराती!

क्रमशः....