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Saturday, November 01, 2008

रहबरे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में...


'भगत सिंह विशेष' की आठवीं कड़ी


भगत सिंह की प्रबुद्धता और प्रखरता पर जितना कुछ लिखा जाए कम है. उनकी शख्सियत का हर पहलू अलग से वर्णित होने का अधिकार रखता है. उनकी लेखनी से पता चलता है कि उनमें एक साथ बेहद निर्भीकता व प्रबुद्धता के साथ साथ विनम्रता का अथाह सागर भी था . पंजाब प्रदेश की भाषा व लिपि पर लिखे एक लेख में वे गुरु गोविन्द सिंह का सन्दर्भ देते हुए निम्नलिखित दोहा भी उद्धृत करते हैं;

सूरा सो पहचानिये, लड़े दीन के हेत,
पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट मरे कबहुँ न छाड़े खेत


(बहादुर वही है, जो धर्म के लिए लड़े, चाहे शरीर का पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट जाए, पर जंग का मैदान वह कभी न छोड़े).
अन्तर केवल इतना, कि भगत सिंह के लिए देशभक्ति ही धर्मं था, सो वे अन्तिम साँस तक उसी के लिए लड़े.

पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

  7. हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...
(The Fragrance of Freedom: Writings of Bhagat Singh edited by KC Yadav, Babar Singh Ch. 29 Punjab: The Problem of Language and Script p 217)
दूसरी तरफ़ उनके द्वारा ही उद्धृत गुरु नानक का यह दोहा, जो उनकी विनम्रता की ओर संकेत करता है:

नानक नन्हे हो रहे , जैसी नन्हीं दूब
और घास जरि जात है, दूब खूब की खूब.


(अंहकार-मुक्त विनम्र लोग नन्हे ही बने रहे, जैसे पतली पतली दूब होती है. बाकी सारी घास जल जाएगी, तो भी दूब उतनी ही सुन्दरता से खिली रहेगी, जैसे पहले).
(वही पुस्तक वही लेख p 216)

द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान 'आज़ाद हिंद फौज' की स्थापना करने वाले प्रसिद्व क्रांतिकारी रास-बिहारी बोस द्वारा पंजाब में नियुक्त पहले क्रांतिकारी एल राम सरन दास के लेखों का सन्दर्भ भगत सिंह अपने लेख में देते हैं, और उसी से स्वयं पूरी तरह प्रेरित भी हैं. एल राम सरन दास कहते हैं:

नींव के अदृश्य पत्थर बनो,
और अपने सीने पर खुशी खुशी,
विशाल दीर्घकाय इमारत को झेलो.
कष्ट में ही सच्ची शरण लो,
प्लास्टर लगे शिखर के पत्थर से ईर्ष्या मत रखो,
जिस पर पूरे विश्व की प्रशंसा बरसती है.

(वही पुस्तक - Ch. 2 A Critique of the Indian Revolutionary Movement - Introduction to Ram Saran Das's book : 'Dreamland' p 46)

भगत सिंह को सर्वाधिक आक्रोश साम्प्रदायिकता से होता था. वे धर्म को प्रगति के रास्ते की रुकावट मानते थे. अपने एक लेख में 1928 में हुई किसी राजनैतिक सभा का सन्दर्भ दे कर वे लिखते हैं कि उस सभा में किसी मौलाना ज़फर अली साहब ने कई बार अपनी बात में - 'खुदा खुदा'. कहा. तब सभा के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने बीच में ही टोकते हुए कहा - 'इस मंच से 'खुदा खुदा' मत पुकारो. अगर आप धर्म (Religion) के संदेशवाहक हैं, तो मैं धर्मं-हीनता (Non-religion) का'.

(वही पुस्तक Ch 27 Religion and National Politics p 207)

उसी लेख में भगत सिंह लिखते हैं - 'क्या धर्म लोगों के बीच बुरा प्रभाव नहीं डालता? क्या वह संपूर्ण स्वतंत्रता के रास्ते में रुकावट नहीं पैदा करता? हम में से जो लोग संपूर्ण स्वतंत्रता के लिए काम करते हैं, वे धर्म को मानसिक गुलामी मानते हैं. उनका कहना है कि बच्चों को यह बताना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, और हम सब कुछ नहीं, हम तो केवल कांच के खिलोने मात्र हैं, उन्हें जीवन भर के लिए कमज़ोर बनाना है. इस से उनके ह्रदय कमज़ोर होते हैं तथा उनका आत्म-विश्वास मरता है'. (p 208).

धर्म और व्यावहारिकिता के बीच के द्वंद्व पर करारी चोट करते भी वे संकोच नहीं करते. वे कहते हैं - 'गुरुद्वारों में सिख लोग 'खालसा राज' की बात करते हैं, पर जब वे बाहर आते हैं तो 'पंचायत राज' की बात करते हैं. इन दोनों के बीच हम कैसे सामंजस्य बैठाए?'

(वही पुस्तक वही लेख p 208)

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं - 'इस्लाम कहता है कि जो काफिर इस्लाम में विश्वास नहीं करता, उसे तलवार से उड़ा दो. और इस के बावजूद हम एकता की बात करते हैं... दरअसल धर्म रूपी यह पहाड़ हमारा रास्ता रोक रहा है. कल्पना करें कि स्वाधीनता संघर्ष आज ही शुरू होता है. दो सेनाएं आमने सामने खड़ी हैं. जब युद्ध शुरू ही होता है, तब जैसा कि एक कहानी में कहा गया है, कोई सामने गौएँ, सूअर, ग्रन्थ साहब, वेद, कुरान आदि रख देता है. यदि हम वास्तव में धार्मिक लोग हैं, तो युद्ध किए बिना घर लौट जाएंगे. हिंदू गाय पर गोली नहीं चला सकते. मुस्लिम और सिख सूअर का सामना नहीं कर सकते.. इस सब से क्या निष्कर्ष निकलता है? ..हम धर्म के विरुद्ध सोचने पर विवश हैं...' (p 209).

महात्मा गांधी अपने एक लेख में गोरक्षा पर होते झगड़ों को ले कर लिखते हैं कि हिंदू के लिए गोमांस खाना अधर्म है. पर इस के लिए उसका मुस्लिम से झगड़ना ज़रूरी नहीं है. 'मुसलमान हमारी बात समझ सके, इस के लिए ज़रूरी है कि हम अपना दृष्टिकोण उसके सामने रखें. गोरक्षा तलवार की नोंक पर तो नहीं हो सकती. गोरक्षा मुसलमान की सद्भावना के बिना नहीं हो सकती...'

(Hindu Dharma by MK Gandhi: Cow Protection p 112)

यानी गाँधी, जिन्होंने गाय का दूध पीना ही त्याग दिया था, क्यों कि गाय अपने बछड़े को भूखा रख कर हमें अपना रक्त देती है, किसी भी प्रकार के झगड़े के पक्ष में नहीं थे. या मुस्लिम के प्रति किसी भी प्रकार की आक्रामकता के. भगत सिंह, टकराती हुई आस्थाओं से जुड़ी इन्हीं बातों को अप्रत्यक्ष में दूसरे ढंग से कहते हैं - 'जिस दिन हम सरस्वती-पूजन करते हैं, उस दिन (लाहौर में) यह ज़रूरी है कि हम बैंड-बाजे समेत एक जुलूस निकालें. अब रास्ते में हरिमन रोड पर एक मस्जिद पड़ती है. इस्लाम कहता है कि मस्जिद के सामने संगीत न बजाओ. हम क्या करें? लोगों को संगीत बजाते हुए वहां से जाने का अधिकार है. पर इस्लाम कहता है नहीं. एक के धर्म में गाय की बलि अनिवार्य है, दूसरे के धर्म में गाय की पूजा होती है. हमें क्या करना चाहिए? हम उस समय क्या करें जब एक पीपल के पेड़ की डाली को काटना ही धर्म में हस्तक्षेप बन जाता है?'...

(The Fragrance of Freedom: Writings of Bhagat Singh edited by KC Yadav, Babar Singh Ch. 27 Religion and National Politics p 210)

यदि एक नज़र गांधी और भगत सिंह की बातों को आमने सामने रख कर देखें, तो आख़िर भगवान् में आस्था रखने वाले गांधी और भगवान् में अनास्था रखने वाले भगत सिंह के उद्देश्यों में क्या अन्तर है? गाँधी धर्म को हिंदू-मुस्लिम एकता का एक सेतु बनाना चाहते हैं, तो भगत सिंह धर्म से ही खिन्न हो उठते हैं. पर दोनों का निष्कर्ष यही कि यदि हिंदू-मुस्लिम लड़ेंगे, तो फ़िर ब्रिटिश के ख़िलाफ़ मोर्चा कौन बांधेगा?

पर धर्म को ले कर सब से बड़ी विडम्बना भारत में यही रही, कि धर्म की रक्षा के नाम पर एक धर्म के लोगों की एकता का अर्थ दूसरे धर्मों के लोगों से शत्रुता हो गया. यह सर्वविदित है कि मुस्लिम शासकों के दौरान हिंदू-मुस्लिम कमोबेश सद्भावना और सौहार्द्र से ही रहते थे और दंगे शब्द से जनता अभी अपरिचित थी. पर मैंने जहाँ तक इतिहास पढ़ा है उस के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी में सब से पहले दंगे तब हुए जब स्वामी दयानंद सरस्वती ने अचानक गोरक्षा की बात छेड़ दी. मुसलमान आज की तरह तब भी बेहद महंगा गोमांस नहीं खाते थे. केवल कुछ अति धनाढ्य मुसलमान गो-मांस खाते थे. पर बात धर्म की आ गई, तो गरीब-अमीर मुसलमान सब के सब एकजुट हो गए. यानी धर्म की रक्षा दूसरे धर्म के लोगों को ललकारने का एक साधन बन गई! युद्ध का मैदान!. स्वामी दयानंद सरस्वती ने अचानक हिन्दुओं को आह्वान कर दिया कि चलो, वापस वैदिक काल में चलते हैं. वैदिक संस्कृति को ही मौलिक हिंदू धर्म घोषित करने के उनके रास्ते पर एक तो हिंदू समाज ने ही चलने से लगभग इनकार कर दिया. पारंपरिक हिंदू समाज न तो मूर्ति-पूजन भूल पाया, और न जाति-प्रथा से मुक्ति पा सका, जबकि स्वामी दयानंद सरस्वती को तो प्रकाश ही तब मिला, जब उनका किशोर मन शिवजी की एक मूर्ति पर निर्भीकता से घूम रहे एक चूहे को देख मूर्तियों के विरिद्ध विद्रोह कर उठा! पर अपने इस नए धर्म के तहत उन्होंने जो मुसलामानों पठानों तक को 'शुद्धिकृत' करना शुरू कर दिया, वह कतिपय विद्वानों को अस्वाभाविक ही लगा, क्यों कि स्वामीजी का कहना था कि यहाँ के मुस्लिम भी पहले हिंदू थे. वे स्वयं को शुद्ध करके वापस हिंदू धर्म में आ सकते हैं.! स्पष्ट है कि हिंदू-मुस्लिम समाज में एक दृश्य या अदृश्य दीवार खड़ी हो गई, जिस पर गोरक्षा आन्दोलन ने आग में घी जैसा काम किया.

लोकमान्य तिलक के विषय में भी इसी से मिलती-जुलती बातें कही गई थी. वे शुद्ध शास्त्र-प्रेमी थे. वेदों के प्रकांड पंडित. देश-भक्त व बेहद ऊंचे चरित्र के साथ साथ वे भारत के 'स्वाधीनता संघर्ष के पितामह' भी माने गए. 'भारत के पहले जन-नेता' या 'भारत के पहले पूर्ण-कालिक राजनीतिज्ञ', जिन्होंने जनता जनार्दन को भी स्वाधीनता संघर्ष से जोड़ा. उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के लिए जो जद्दो-जहद की, वह स्वाधीनता के इतिहास का एक स्वर्ण-पृष्ठ है. देश को पहली बार पता चला, Reading Room क्या होता है, या पुस्तकालय किसे कहते हैं. पर जब तिलक के अनुयायी घबरा कर उन्हें बताते हैं कि मुंबई में हिंदू-मुस्लिम दंगे हो गए हैं (जिनकी शुरुआत गोरक्षा-आन्दोलन के प्रारंभ से ही उत्तरी भारत के कुछ शहरों से हुई थी) तब वे कुछ ही समय बाद अचानक गणेश-पूजन का त्यौहार शुरू कर के हिन्दुओं को एकता का आह्वान दे देते हैं. तब गोपाल कृष्ण गोखले, गोपाल गणेश अगरकर व जस्टिस महादेव रानाडे जैसे प्रबुद्ध विचारकों व देश-भक्तों के गले, तिलक का यह धर्म-प्रेम ठीक से उतर नहीं पाया था, उनके अनुसार इससे हिंदू-मुस्लिम सौहार्द्र सहसा समाप्त हो गया. नतीजतन अगले ही वर्ष पूना में भी दंगे हो गए. धर्म से चिपके रहना या तो अस्तित्ववाद का ही दूसरा रूप बन जाता है, या अन्य धर्मों के लोगों से शत्रुता का.

पंजाब में स्वामी रामतीर्थ की देश-भक्ति व शख्सियत से भगत सिंह बेहद प्रभावित थे. स्वामी रामतीर्थ प्रसन्नता से गाते हैं:

हम रूखे टुकड़े खाएंगे, भारत पर वारी जाएंगे,
हम सूखे चने चबाएंगे, भारत की बात बनाएंगे,
हम नंगे उमर बिताएंगे, भारत पर जान मिटाएंगे.

स्वामी रामतीर्थ जब अमेरिका में थे, तब शाम के सामय सूर्य को अस्त होते देख उनकी आंखों में आंसू आ जाते. वे सूर्य से नमन कर के कहते - 'इस क्षण तुम मेरे प्यारे देश में उदय हो रहे हो. मेरे ये अश्रु, भारत के सुंदर, सिंचित खेतों पर ओस कणों की तरह बिखेर देना'.

(The Fragrance of Freedom: Writings of Bhagat Singh edited by KC Yadav, Babar Singh Ch. 29 Punjab: The Problem of Language and Script pp 218, 219)

हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग को अछूत कहा जाता है, इस पर भगत सिंह की कलम एक चाबुक की तरह चलती थी. वे लिखते हैं - '30 करोड़ में से 6 करोड़ लोगों को अछूत माना जाता है, जिन के स्पर्श मात्र से धर्म प्रदूषित हो जाता है. मन्दिर में उनके प्रवेश करते ही देवी-देवता खिन्न हो उठेंगे. जिस कुँए से वे पानी पिएंगे, वह अपवित्र हो जाएगा. यह शर्मनाक है कि ऐसे प्रश्न बीसवीं सदी में भी उठते हैं'.

(वही पुस्तक Ch 31 The Problem of Untouchability p 231).

भारत की आध्यात्मिक विरासत पर खोखला व आक्रामक दंभ रखने वाले जो लोग 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' या 'हिन्दी हिंदू हिन्दुस्तान' जैसे नारों से गला फाड़ कर देश में अशांति फैलाते हैं, उनके सामने भगत सिंह का एक ही तर्क तलवार का काम कर सकता है. वे कहते हैं - 'हमारा देश आध्यात्मिक माना गया है और हम इंसान को ही इंसान नहीं समझते. इस के विरुद्ध कई योरपीय देशों में, जिन्हें हम भौतिकवादी कह देते हैं, इस प्रकार के तंत्र के विरुद्ध आवाजें उठती हैं'.
(वही पृष्ठ)
यह एक शर्मनाक सत्य है कि आज इक्कीसवीं सदी में भी ऐसे असंख्य दक्षिणपंथी व्यक्ति व संस्थाएं हैं, जो लोगों की चेतनाएं यह कह कर झकझोर देना चाहती हैं कि ब्रिटिश ने आ कर हमारी महान् हिंदू संस्कृति का ह्रास कर दिया व अपनी म्लेच्छ संस्कृति हम पर थोप दी. पर वे आईने उठा कर हिंदू समाज में व्याप्त असहिष्णुता व विषमता को नहीं देख पाते, जिस में आज भी दलित लोगों की हत्याएं होती हैं, व आज भी उच्च जाति की लड़की से प्रेम करने वाले दलित युवकों की आँखें निकाल देने तक जैसी शर्मनाक खबरें पढ़ने को मिलती हैं. पर भगत सिंह एक और आड़े हाथों लेने वाला प्रश्न भी उक्त लेख में उठाते हैं. 'हमें शिकायत है कि हमें विदेशों में सम्मान से नहीं देखा जाता और ब्रिटिश हमें अपनी ही भूमि पर अधिकार या बराबरी का दर्जा नहीं देती. क्या हमें ऐसी शिकायतें करने का अधिकार है? (वही पृष्ठ).
(जब कि हम स्वयं अपने देश में ही समाज के एक बड़े वर्ग को बराबरी का दर्जा न दे कर उसे ज़लालत से ही देखते हैं').

ऐसे विरोधाभासों की तरफ़ केवल भगत सिंह की तलवार-नुमा लेखनी ही संकेत कर सकती थी.

आज जितने शर्मनाक तरीके से हिंदू कट्टरपंथी, निहत्थे निर्दोष ईसाइयों को जिंदा जला रहे हैं, उनकी महिलाओं का बलात्कार कर के उन्हें नग्न-अर्ध-नग्न घुमा कर न जाने कौन सी हिंदू विरासत को बचा रहे हैं, गर्व से कहते हैं कि हम हिंदू हैं, 'पहले कसाई फिर ईसाई' जैसे अमानवीय नारे देते हैं, वह सब एक दर्पण है. इन सब को चाहिए कि भगत सिंह का उक्त लेख पढ़ें. भगत सिंह कहते हैं - 'यदि तुम उनको (अछूतों व दलितों को) जानवरों से भी बदतर कर के रखोगे, वे निश्चित रूप से उन धर्मों की तरफ़ जाएंगे, जो उन्हें अधिक अधिकार दें तथा अधिक मानवीय व्यवहार करें. तुम लोगों के ये वक्तव्य कि ईसाई तथा मुस्लिम हिन्दुओं को हानि पहुँचा रहे हैं, कोई अर्थ नहीं रखते...लाला लाजपत राय ने एक बार हिंदू महासभा जैसी कट्टर संस्था में चल रहे एक विवाद के दौरान सहसा अछूतों के पक्ष में खड़े हो कर कहा था - 'हमारी गोद में कुत्ता बैठ सकता है. एक चूहा हमारी रसोई में घूम सकता है. पर यदि एक इंसान वही करे या हमें स्पर्श मात्र करे तो हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाता है!' (p 232).
.
पर मदन मोहन मालवीय पर चुटकी लेने में भी भगत सिंह नहीं हिचकिचाते. वे कहते हैं - 'इन दिनों मालवीय जी जैसे सुधारक अछूतों के उद्धारक होने की बात करते हैं. वे एक जमादार द्वारा स्वयं को माला पहनाए जाने की अनुमति दे देंगे. पर जब तक वस्त्रों समेत नहा नहीं लेंगे तब तक स्वयं को प्रदूषित ही महसूस करेंगे. कैसा तो धोखा है!... (p 232-233).

क्रमशः॰॰॰॰॰॰

लेखक- प्रेमचंद सहजवाला

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

neelam का कहना है कि -

लेख बहुत ,बहुत बहुत ही बढ़िया है ,धार्मिक संकिर्ता पर उठाये गए भगत जी के सवाल
हमे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करते हैं ,इतनी अच्छी सोच और समझ रखने वाला
इंसान जिसके बारे में हम कुछ भी नही जानते ,हमारी भावी पीढी इनसे प्रेरणा ले ,यही हमारी दुआ है |
हिंद युग्म के सदस्यों को भी आभार है ,जिनके प्रयास से इतने अच्छे लेख हमे पढने को मिले ,ऐसे ही उत्कृष्ट लेख हमे आगे भी पढने को मिले ,इसी कामना के साथ |
आपकी शुभाकान्छी

sahil का कहना है कि -

kya kahne aapke sahajwala ji,maja aa gaya padhkar.
ALOK SINGH 'SAHIL'

rachana का कहना है कि -

भगत सिंह एक सम्पूर्ण व्यक्ति थे
धर्म के बारे में जो भी उनके कथन है बहुत सही है गोरक्षा हम तलवार के जोर पे तो बिल्कुल भी नही कर सकते कितना सच कहा है
आप का बहुत बहुत धन्यवाद भगत जी के जीवन के इस अछूते पहलू को उजागर करने के लिए
सादर
रचना

mahesh का कहना है कि -

mene aap ke likh se bhagat singh ji ke bare me bahut kuchh sikha
mahesh

小 Gg का कहना है कि -

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