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क्या तमन्नाये शहादत भी किसी के दिल में है (2)


'भगत सिंह विशेष' शृंखला में आप पढ़ रहे है प्रेमचंद सहजवाला की कलम से भगत सिंह के जीवन के बारे में। पहली , दूसरी व तीसरी कड़ी की पहली किस्त हम पहले ही प्रकाशित कर चुके हैं। आज पढ़िए तीसरी कड़ी की दूसरी खेप॰॰॰॰



सन 1928 आते आते भगत सिंह के विचारों में एक परिवर्तन सा आना शुरू हो गया था. उन्हें यह बम और पिस्टल वाला गोपनीय रास्ता पसंद नहीं था. बल्कि लेनिन की तरह जनता को संगठित कर के सशस्त्र क्रांति का तरीका धीरे धीरे उनके ज़हन में उभर रहा था. पर एक पुस्तक में लिखा है कि विचार-परिवर्तन कभी भी एक झटके से नहीं होता, जैसे कि धर्म-परिवर्तन होता है. बल्कि विचार-परिवर्तन एक प्रक्रिया है, जो समय लेती है. भगत सिंह ने 6 अप्रैल 1928 को पंजाब में जो 'नौजवान भारत सभा' बनाई, तो वह नौजवानों के लिए एक खुला मंच था, ताकि देश-भक्ति के लिए प्रेरित युवक उसमें शामिल हों. पर वह उस विचार परिवर्तन की प्रक्रिया की एक शुरुआत मात्र थी. वैसे दुनिया में जितने भी महापुरुष हुए हैं, वे समय समय पर अपने विचारों को निखारते हैं तथा ज़रूरत पड़ने पर उन्हें बदल भी देते हैं. महात्मा गाँधी ने एक बार अपने किसी साप्ताहिक पत्र के संपादकीय में लिखा था कि कभी कभी उन्हें कुछ पाठकों के गुस्से भरे पत्र मिलते हैं, कि इस अमुक विषय पर कुछ अंक पहले आपने कुछ और ही विचार प्रकट किए थे, अब आप उससे विपरीत बात कर रहे हैं. उन्होंने ने पाठकों से निवेदन किया कि जब भी किसी विषय पर ऐसा हो, तब पाठक कृपया बाद की तिथि वाले विचारों को उनके विचार मानें. बाबा साहब अम्बेडकर इसी बात को बेहद रोचक ढंग से कहते थे. किसी विदेशी विचारक की कही हुई एक बात का सन्दर्भ दे कर कहते थे, कि विचारों की स्थिरता केवल किसी गधे में ही सम्भव है...

बात को आगे बढ़ाने से पहले एक और प्रसंग याद आ रहा है. गाँधी से किसी युवक ने एक पाठकीय पत्र लिख पर पूछा था कि यदि आप अहिंसा को इतना ही ज़रूरी मानते हैं, तो क्या आप गुरु गोविन्द सिंह और शिवाजी को भी दिग्भ्रमित मानेंगे? गाँधी ने इस पत्र के लंबे उत्तर में एक महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि गुरु गोविन्द सिंह तथा शिवाजी अपनी योजनाओं को कभी गोपनीय नहीं रखते थे. वे जो भी थे, प्रकट रूप में थे. भगत सिंह को भी लगने लगा था कि चंद लोगों के साथ छुप कर बम बनाने वाले तरीके से हमें आज़ादी नहीं मिल सकती . उनके रास्ते को तकनीकी तौर पर इतिहासकारों ने 'आतंकवाद' ही माना है, जिस पर देशवासियों में बहुत आक्रोश भी उभरा था. पिछले वर्ष इसी आक्रोश के मद्दे-नज़र देश के बुद्धिजीवियों ने सर्व-सम्मति से यह निर्णय लिया कि अब से हम उन्हें आतंकवादी नहीं कहेंगे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी कहेंगे. वैसे जो नौजवान संसद की बालकनी से नीचे एक बम फेंकेगा, वह तकनीकी तौर पर एक आतंकवादी ही कहलायेगा. भगत सिंह ने स्वयं यह शब्द इस्तेमाल किया था. दिनांक 2 फरवरी 1931 को कुछ युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को समबोधित करते हुए वे एक जगह कहते हैं - ज़ाहिरा तौर पर मैंने एक आतंकवादी की तरह व्यवहार किया है. पर मैं आतंकवादी नहीं हूँ. मैं एक क्रांतिकारी हूँ, जिस के पास एक लंबे कार्यक्रम को लेकर सुनिश्चित विचारधारा है...अपने भीतर की संपूर्ण शक्ति से मैं यह घोषणा करता हूँ, कि मैं आतंकवादी नहीं हूँ और मैं कभी भी नहीं था, सिवाय शायद अपने क्रांतिकारी जीवन के प्रारम्भ में (The Fragrance of Freedom - Writings of Bhagat Singh edited by KC Yadav & Babar Si ngh p 63) .

भगत सिंह इस बात के प्रति भी सचेत थे कि पैसा इकठ्ठा करने के लिए उन्हें आपराधिक तरीके तक अपनाने पड़ते हैं. एक बार लाहौर के पंजाब नेशनल बैंक में डकैती डालने की योजना में भगत सिंह एक साथी के साथ जीप में बैंक के निकट पहुंचे. किन्हीं कारणों से वह डकैती डाली नहीं जा सकी. पर ऐसे तरीकों का अवश्य भगत सिंह के मन पर गहरा असर ही पड़ता होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है. यदि एक नज़र हम आजकल फैले आतंकवाद पर डालें तो स्पष्ट होता है कि आज़ादी चाहने वाले नौजवान अपने भीतर उस उद्देश्य के लिए मर मिटने को तैयार रहते हैं, पर कुछ ठग किस्म के शोषक लोग उस का अनुचित लाभ उठाते हैं. जैसे कश्मीर का ही उदाहरण लें. कश्मीर में आज़ादी चाहने वाले युवक सही थे या ग़लत, यह इस लेख-माला का विषय नहीं है, पर उनके आज़ादी की इच्छा पैदा होते ही पाकिस्तान ने उन नौजवानों की भावना का शोषण किया. नशीली दवाइयाँ बेचने वालों ने व गैर कानूनी हथियार बनाने वालों ने उन की भावनाओं को पूरी तरह चूस कर करोड़ों कमाए. श्रीलंका में भी यही हुआ. बन्दूक के ज़रिये तमिल लोगों को इन्साफ दिलाने का अभियान शुरू करने वाले प्रभाकरन अब नशीली दवाइयों के दलाल हैं, क्यों कि पैसा कहाँ से आएगा. उनकी संस्था 'लिट्टे' के कार्यकर्ता किसी भी युवक या युवती का अपहरण कर के उस के माँ बाप को बताते हैं कि अबसे आप की संतान तमिल प्रदेश की आज़ादी के लिए काम आएगी. वहां पैसे वाले तमिल अब गरीब हो गए हैं क्यों कि उनसे चंदे के नाम पर पैसा लूटा जाता है. मैं ये तमाम कटु प्रसंग उठा कर आख़िर कहना क्या चाहता हूँ? में दरअसल विषय से दूर नहीं जाना चाहता, पर मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि भगत सिंह का रास्ता (जिसे वे स्वयं ही अपने उक्त भाषण में आतकवाद कह गए हैं और नकार चुके हैं) देश के युवक युवक के लिए प्रेरणा बन जाता और पूरे देश में हर जगह ब्रिटिश को भगाने लिए आतंकी घटनाएँ घटती, तो स्पष्ट है कि शोषक भी पैदा होते जो इन नौजवानों के मन में धधकती आज़ादी की ज्वाला का भरपूर अनुचित लाभ उठाते. गाँधी इसलिए कहते थे कि हमें ब्रिटिश से लड़ना नहीं चाहिए, क्यों कि यदि हम में लड़ने की आदत पड़ गई तो ब्रिटिश के जाते ही हम आपस में लड़ना शुरू कर देंगे! गाँधी की बातें पहली नज़र में अबोधता से भरी लग सकती हैं, पर भीतर की गहराइयों में जायें तो जो वे कहते रहे, वह अक्षरशः सत्य साबित हुआ. वैसे भगत सिंह जनता को संगठित कर के जिस सशस्त्र क्रांति की बात कहते थे, वह बाद में एक और तरीके से सुभाष चंद्र बोस ने पूरी करने की कोशिश की. सुभाष चंद्र बोस जैसे देशभक्त का देश में होना भी देश के लिए एक वरदान ही था. उन्होंने 'आजाद हिंद फौज' द्बारा ब्रिटिश से युद्ध किया पर विफल रहे. दरअसल सुभाष चंद्र बोस को भी हिटलर जैसे लोगों पर निर्भर रहना पड़ा. हिटलर ने उनकी केवल इतनी सहायता की कि उन्हें 'आजाद हिंद रेडियो' के लिए एक गुप्त frequency दे दी. पर जो 'आजाद हिंद फौज' सुभाष ने जर्मन में बनाई, वह उन्हें काम नहीं आई. उन्हें एक साथी के साथ बहुत गुप्त तरीके से ब्रिटिश की खूफिया एजेंसियों को धोखा दे कर जापान जाना पड़ा. पीछे उनकी ही बनाई गई 'आजाद हिंद फौज' को हिटलर ने कुछ जहाज़ों की रक्षा के लिए तैनात कर दिया. हिटलर से जब सुभाष चन्द्र बोस ने भारत की आज़ादी के लिए मदद मांगी, तब हिटलर ने कहा कि भारत को अभी कम से कम डेढ़ सौ वर्ष तक आज़ादी नहीं मिल सकती. और कि में नहीं चाहता कि भारत से ब्रिटिश हटे, क्यों कि ब्रिटिश हटेगी तो वहां संभवतः रूस आ जाएगा! जापान में सुभाष चन्द्र बोस ने रास बिहारी बोस द्वारा बनाई 'आजाद हिंद फौज' को आगे बढाया. वे सशक्त तो साबित हुए, पर जापान के उद्देश्यों का कुछ पता नहीं था. जापान चीन जैसे देश को कब्जे में कर चुका था. जापान ने जब इंडोनेशिया को तीन सौ वर्ष से राज कर रही डच कौम से मुक्ति दिलाई तब इंडोनेशिया से निकली नहीं, वरन इंडोनेशिया अब जापान का गुलाम बन गया. अब जापान को हटाने के लिए इंडोनेशिया ने अलग से संघर्ष किया...
...युद्ध के दौरान जब अचानक जापान ने कलकत्ता पर बमबारी की तब सुभाष चन्द्र बोस आहत से हो गए थे...

बहरहाल यहाँ लाला लाजपत राय की कुर्बानी वाले प्रसंग पर आने से पहले मुझे एक और महत्वपूर्ण प्रसंग अचानक याद आया है. मैं केवल इस बात में विश्वास रखता हूँ कि स्वाधीनता संग्राम पर हर भारतवासी को गौरव होना स्वाभाविक है. पर इतिहास पढ़ना हो तो मन में हर महापुरूष या हर प्रसंग को विश्लेषणकारी दृष्टि से पढ़ना अधिक बेहतर है.

पंडित नेहरू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि एक बार इलाहाबाद में वे अपने कमरे में बैठे काम कर रहे थे कि एक अजनबी युवक उनसे मिलने आया. उन्हें बताया गया कि वह व्यक्ति चंद्रशेखर आजाद है, पंडित नेहरू को याद आया कि इस नाम का नौजवान किशोरावस्था में अपनी स्कूली पढ़ाई छोड़ कर असहयोग आन्दोलन आया था और गिरफ्तार भी हो गया था. जेल में उसे जेलर ने किसी गलती पर हंटर मार दिया था. जब वह जेल से निकला तब उसने गांधी का रास्ता छोड़ दिया था और आतंकवादियों में शामिल हो गया था . आज जब चंद्रशेखर आजाद नेहरू से मिलने अचानक आए तो उस समय भी वह ब्रिटिश के रिकॉर्ड में एक भगोड़े युवक थे, क्यों कि जब रामप्रसाद बिस्मिल ने रेलगाड़ी से रेलवे का खजाना चुराया था, तब उस योजना में चंद्रशेखर भी थे. पर पुलिस की पकड़ में न आ कर वे लापता हो गए थे. नेहरू ने चंद्रशेखर आजाद को बहुत आत्मीयता ने अपने चैंबर में बिठाय. चंद्रशेखर जानना चाहते थे कि यदि ब्रिटिश व कांग्रेस किसी समझौते तक पहुंचे तो क्या उनके (चंद्रशेखर) के ग्रुप के लोगों को भी कोई शान्ति मिलेगी. क्या उन्हें तब भी कानून-बहिष्कृत, जगह जगह खोजे जाने वाले, जिनके सर पर कोई कीमत रखी गई है, और जिन के सामने सदा फांसी के फंदे की संभावनाएं बनी रहती हैं में गिना जाएगा? या कि उनके भी शांतिपूर्ण जीवन-यापन करने की कोई सम्भावना थी ?' नेहरू चकित थे. चंद्रशेखर ने नेहरू से कहा कि जहाँ तक उनका सम्बन्ध है, या उनके कई साथियों का, वे सब इस बात को अब मान चुके हैं कि शुद्ध आतंकवादी तरीके लाभहीन हैं और उनसे कोई भला नहीं होगा. हालांकि इस बात पर भी चंद्रशेखर विश्वास करने को तैयार नहीं थे, कि आज़ादी पूर्णतः शांतिपूर्ण तरीकों से मिलेगी. उनका विचार था कि भविष्य में कभी एक हिंसक मुकाबला ब्रिटिश से हो सकता है, पर वह मुकाबला आतंकवाद से नहीं होगा. पर चंद्रशेखर आजाद ने फिर पूछा कि उन्हें स्वयं क्या करना चाहिए, जब कि उन्हें स्थिर होने का कोई मौका नहीं दिया जा रहा, और हर समय उनका पीछा किया जा रहा है. चंद्रशेखर ने एक और चकित कर देने वाली बात कही कि हाल ही में हुई कई आतंकवादी गतिविधियाँ केवल आत्म-रक्षा के लिए थी....नेहरू ने आजाद से केवल इतना ही कहा कि यदि तुम ऐसा समझते हो, तो तुम्हें अपने प्रभाव से भविष्य में होने वाली आतंकवादी घटनाओं को रोकना चाहिए, क्यों कि उस से केवल आज़ादी का बड़ा उद्देश्य व तुम्हारे अपने साथी ही आहत होंगे (An Autobiography - Jawaharlal Nehru pp 274-75). पर चंद्रशेखर आजाद को युवकों में ऐसी चेतना फैलाने का कोई अवसर नहीं मिला. 27 फरवरी 1931 को इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में उनका ही एक साथ धोखे से पुलिस ले आया और एक पेड़ की छांव में साथी की प्रतीक्षा कर रहे चंद्रशेखर आजाद ने जब आती हुई पुलिस देखी, तो मुकाबले के तैयार हो गए. पेड़ के पीछे छुप कर उन्होंने कुछ गोलियों से कुछ पुलिस वालों को ज़ख्मी भी किया. पर पुलिस की गोलियों की वर्षा व पुलिस का घेरा काफ़ी मज़बूत थे. आजाद अधिक पढ़े लिखे नहीं थे. उन्होंने जिंदगी में केवल एक ही शेर लिखा था -

दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे
आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे.


और सचमुच, आजाद ने स्वयं को पुलिस के हवाले करने से बेहतर समझा कि वे अब शहादत ओढ़ लें और स्वयं को आजाद कर दें. . भारत माता पर अपना सर न्योछावर करने वाले उस जांबाज़ जवान ने अपनी ही पिस्टल से स्वयं पर गोली चलाई और शहादत की ;पवित्र शैय्या पर सो गए.भले ही इन तमाम नौजवानों ने अपने ही तरीकों की सीमायें पहचान ली थी, पर उनकी देश-भक्ति व बहादुरी पर कभी किस को संदेह हो ही नहीं सकता....

सन 1928 की बातें करते करते मन जाने कहाँ का कहाँ चला जाता है.

लाहौर स्टेशन पर साइमन कमीशन पहुँचने वाला है. एक रेल गाड़ी से. गाड़ी को आने में काफ़ी देर हो गई है. बाहर शेरे-पंजाब लाला लाजपत राय के नेतृत्व में हजारों लोग खड़े हैं. जब साइमन अपनी टीम समेत बाहर आयेंगे तब भीड़ चीख पड़ेगी - साइमन वापस जाओ...साइमन वापस जाओ...बल्कि भीड़ तो गाड़ी के आने से पहले भी यही कह रही है - साइमन वापस जाओ...साइमन वापस जाओ...भगत सिंह ने कुछ दिन पूर्व 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' की एक विशेष सभा बुला कर नौजवानों को साइमन कमीशन का कड़ा विरोध करने के लिए पहले ही से तैयार कर दिया था.

यह 30 अक्टूबर 1928 का दिन है. ब्रिटिश पुलिस के suprintendent J A Scott स्वयं परिस्थिति को पूरी तरह सूंघ लेना चाहते हैं . वातावरण में बेहद तनाव है. लाजपत राय के नेतृत्व में नौजवान गीत गा रहे हैं, भगत सिंह भी अपने साथियों समेत आगे आगे डटे हैं:

हिन्दोस्तानी हैं हम, हिन्दोस्तान हमारा,
मुड़ जाओ साइमन जहाँ है देश तुम्हारा..


स्कॉट को घबराहट सी होती है. भीड़ की देशभक्ति उस से सहन नहीं हो पा रही. उसे लगता है कि गाड़ी आ जायेगी तब क्या होगा. उसने अचानक लाठी चार्ज का आदेश दे दिया.

लाजपत राय बिस्मिल की इन पंक्तियों को सार्थक करते डटे हैं :

आज फ़िर मकतल पे कातिल कह रहा है बार बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है.


अपने अहिंसावादी तरीकों से सचमुच उनके ह्रदय में भी मानो तमन्ना-ए-शहादत उमड़ रही थी.

भीड़ को कई चेतावनियाँ स्कॉट ने दी थी. लाजपत राय से विशेष कहा था, कि इन सब को ले कर पीछे हट जाओ, पर लाजपत राय निर्भीक व्यक्ति थे. किसी अँगरेज़ के हुक्म पर अपने रास्ते से हट जायें यह असंभव था. स्कॉट ख़ुद एक लाठी अपने हाथ में लेता है और लाठी चार्ज में इधर उधर तितर-बितर होती भीड़ में वह स्वयं लाजपत राय पर लाठियां बरसाता है. वे भागते नहीं, पर किसी छुपी हुई तमन्ना-ए-शहादत से वहीं डटे रहते हैं, जब तक कि उनके तन में डटे रहने की शक्ति थी...

17 नवम्बर 1928 को लाला लाजपत राय अपनी अन्तिम साँस गिन कर भारत माँ को अपनी आहूति दे कर चले जाते हैं. . देश की जनता को एक असहनीय धक्का सा पहुँचता है. सब से ज़्यादा आहत हैं गांधी . 19 नवम्बर, यानी लाजपत राय की क्रिया के दिन को वे लाजपत राय दिवस कर के मनाने और उन्हें श्रद्धांजलि देने का दिवस घोषित करते हैं. गाँधी को लगा था कि देश का एक अनमोल सपूत ब्रिटिश की लाठियों से शहीद हो कर चला गया. पर क्या ब्रिटिश को किसी भी किस्म का अपराध बोध हुआ था? लोगों ने जांच बिठाने की बात कही. पर ब्रिटिश केवल निर्मम ही नहीं थी, निर्लज्ज भी थी. ब्रिटिश ने वक्तव्य दिया कि लाजपत राय की मृत्यु साइमन विरोध की सभा में लगी चोटों के कारण हुई, इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं...

ब्रिटिश की इस निर्लज्जता का जवाब देने के लिए 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' की एक सभा में क्या सोचा जा रहा है, वह सचमुच बेहद सनसनी खेज़ सा है...