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Friday, September 26, 2008

ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार




२७ सितम्बर को शहीद भगत सिंह की १०१वीं जयंती है और २ अक्टूबर को महात्मा गाँधी की १३९वीं जयंती। आज से ही प्रेमचंद सहजवाला भगत सिंह के जीवन और गाँधी जी के साथ उनके मतभेदों पर अपनी आलेख-शृंखला शुरू कर रहे हैं। यह लगातार २ अक्टूबर तक प्रकाशित होगी। पढ़िए पहली किश्त॰॰॰॰


सन 1919 का बैसाखी का दिन यानी 13 अप्रैल भारत के इतिहास में एक ज़बरदस्त मोड़ लाने वाला दिन था. इस दिन 400से भी अधिक भारतवासी अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में शहीद हो चले थे. ब्रिटिश काल था और भारतवासी यदा-कदा ब्रिटिश द्वारा बनाये गए कानून से त्रस्त रहते. रोलेट कानून भी एक ऐसा ही कानून था. जलियांवाला बाग़ में कई भारतीय एकत्रित हुए, इस कानून के विरोध में एक सभा करने. पर ब्रिटिश के निर्मम सेना अधिकारी ब्रिगेडिएर आर ई एच डायर ने गोली चलाने का हुक्म दिया. कई लोग शहीद हो गए.

इस एक दिन ने भारत के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दो व्यक्तियों की जीवन दिशाएँ बदल दी. एक थे मोहनदास करमचंद गाँधी. इस घटना से उनके हृदय को बहुत गहरी ठेस पहुँची. उस दिन तक वे ब्रिटिश से अच्छे सम्बन्ध बनाये रखने में विश्वास रखते थे. कई ब्रिटिश वासी जो भारत में रहते थे वे मानते थे कि गाँधी का विरोध ब्रिटिश के शासन से है न कि ब्रिटिश वासियों से. दक्षिण अफ्रीका में पूरे दो दशक गाँधी जी ने भारत वासियों की समस्याओं को ले कर अथक परिश्रम किया पर वह सारा संघर्ष अहिंसात्मक था व ब्रिटिश से बातचीत के दौरान वे कभी भी आक्रामक तेवर नहीं दिखाते थे. पर जलियांवाला बाग़ ने उन्हें गहरा चिंतन करने पर विवश कर दिया. वे जानते थे कि ब्रिटिश से सशस्त्र क्रान्ति का रास्ता घातक सिद्ध हो सकता था. पर उन्हें कांग्रेस का रवैय्या भी पसंद न था जिसमें असेम्बली में तकरीरें करो या जनता की समस्याओं को ले कर वाइस रॉय के पास मुक़दमे ले जाओ या आवेदन पत्र. गांधी जी ने जलिआंवाला बाग़ की इस दर्दनाक घटना के बाद बीच का रास्ता चुन लिया. असहयोग का. जो लोग गाँधी जी की अहिंसा को कायरता या कमजोरी मानने की भूल करते हैं उन के लिए यह जानना काफ़ी होगा कि असहयोग का रास्ता भी कोई फूलों भरा रास्ता नहीं था. ब्रिटिश से असहयोग करके हजारों नौजवान जेलों में जाते थे...

पर इस घटना के कुछ समय बाद वहां एक बारह साल का लड़का भी अपने पिता के साथ आया. इस किशोर के हृदय पर जलिआं वाला बाग़ की घटना का बहुत गहरा असर पड़ा. वहां घूमते-घूमते उस ने देखा कि वहां की मिट्टी भी शहीदों के खून से लाल थी. उसने शहीदों के खून से गीली उस मिट्टी को एक छोटी सी बोतल में भर लिया और घर ले आया. उस कच्ची उम्र में ही उस ने शपथ ली कि वह जालिम अंग्रेजों को इस मुल्क से रुख्सत करवा कर ही दम लेगा. उस बालक के पिता और दोनों चाचा भी क्रान्ति कारी ही थे. वह बालक कोई और नहीं शहीद-ऐ-आज़म भगत सिंह ही था जिस की दादी ने उस के जन्म लेने वाले दिन उस का नाम रखा था भागांवाला. तारिख 27 सितम्बर 1907 शनिवार प्रातः नौ बजे की शुभ घड़ी को पंजाब के ल्यालपुर जिले के बंगा गांव में जन्मे इस बालक का नाम भागांवाला क्यों रखा गया? उस के क्रांतिकारी पिता सरदार किशन सिंह जेल में थे तथा ज़मानत की अर्जी दे रखी थी. उस के चाचा स्वर्ण सिंह भी जेल में थे. इस बालक में जन्म लेते ही दोनों को ज़मानत मिल गई. एक दो दिन बाद जब वे घर पहुंचे तो उस बालक के दूसरे क्रांतिकारी चाचा जो बर्मा के मांडले जेल में सज़ा भुगत रहे थे, उन्हें भी रिहा कर दिया गया. इसीलिए तो, दादी के लिए इस बालक का आना सौभाग्य का सूचक था. उस का नाम पड़ गया भागांवाला. कुछ वर्षों बाद उस का नाम पड़ गया भगत सिंह, आज जिस का नाम हम अति श्रद्धा से लेते हैं. वह नौजवान जो देश पर शहीद हो गया केवल 23-24 वर्ष की आयु में ही, के विषय में सोच कर उस के प्रति सर स्वयमेव आदर से झुक जाता है.

भगत सिंह के चाचा अजित सिंह पंजाब के एक धुरंधर नेता थे. ब्रिटिश ने ज़मीन को ले कर भी कुछ निर्मम से क़ानून बनाये. अजित सिंह उसी सिलसिले में गिरफ्तार कर के बर्मा भेज दिए गए थे. नियति की कैसी निर्ममता है कि अजित सिंह उस के बाद चालीस वर्ष तक भारत नहीं आ सके. कई अन्य देशों में आते जाते रहे. वे लौटे तो ठीक 15 अगस्त 1947 को और उसी दिन देश को एक सदमा सा दे कर चले भी गए. डलहौजी में उनकी समाधि है. आज भी देश के असंख्य लोग डलहौजी जाते हैं तो अजित सिंह की पवित्र समाधि पर नमन करने ज़रूर जाते हैं.

...छोटा सा बालक भगत सिंह बचपन में एक दिन खेलते खेलते मिट्टी के टीले बनाने लगता है. एक एक टीले में एक एक छोटी छड़ी से अटका देता है. पूछने पर तीन साल का वह बालक कहता है कि मैं बंदूकें बो रहा हूँ. कभी वह थोडी सी बड़ी उम्र में बच्चों का नेतृत्व करता है तो युद्ध करने वाली दो टीमें बना देता है!...

पूछे जाने पर की तुम्हारा धर्म क्या है, वह बालक जवाब देता है - देशभक्ति!

ब्रिटिश के निर्मम ज़मीन सम्बन्धी कानून और उस के खिलाफ भड़कते संघर्ष के दीवानों का हुजूम ... सरदार किशन सिंह के घर एकत्रित होता रहता है. भगत सिंह उन सब की बातें सुन कर अपने भीतर एक आक्रोश ब्रिटिश के विरुद्ध पाता है. उस पर प्रसिद्द क्रान्ति कारी करतार सिंह सराभा का बहुत प्रभाव है. सराभा जो गीत अक्सर गाता है, वही भगत सिंह भी गाता है.
जिनां देश सेवा विच पैर पाया
उनां लाख मुसीबतां झलिआं ने

१९१६ में भगत सिंह लाहौर के DAV स्कूल में छठी कक्षा में प्रवेश लेते हैं. अंग्रेज़ी उर्दू संस्कृत सब भाषाओँ में अच्छे और मित्र बनाने में माहिर. एक बेहद संवेदनशील विद्यार्थी भगत सिंह. लाहौर में लाला लाजपत राय से बड़ा कोई नेता नहीं. भगत सिंह को एक पथ प्रदर्शक मिल जाता है. फिर जब वह नौवीं में पहुँचता है तो देश में असहयोग की आंधी आयी हुई है. गाँधी की पुकार पर लोग ब्रिटिश द्वारा चलाये गए संस्थान छोड़ने में लगे हैं. विद्यार्थी भारतीय कॉलेजों में जाते हैं. भगत सिंह कैसे पीछे रहते. पर नौवीं का विद्यार्थी लाहौर के नेशनल कॉलेज में कैसे प्रवेश लें. सब विद्यार्थियों को दो-दो महीने का समय दिया जाता है. नेशनल कॉलेज भाई परमानन्द व लाजपत राय द्वारा संचालित है. भगत सिंह दिन रात अथक परिश्रम करते हैं और एक विशेष रूप से की गई प्रवेश परीक्षा में पास हो कर कॉलेज के प्रथम वर्ष में प्रविष्ट हो जाते हैं. भगत सिंह F.A. तो पास कर लेते हैं. कॉलेज में देश भक्ति के गीत गाने से ले कर नाटकों में राणा प्रताप सिंह जैसे वीर पात्रों का अभिनय करते करते वे B.A. तक पहुँचते हैं. पर तभी उनके जीवन में एक मोड़ आता है और वे B.A नहीं कर पाते. उनकी दादी की बहुत तमन्ना जो है, भागंवाला बेटा अब शादी करे. सरदार किशन सिंह भगत सिंह को पत्र लिखते हैं की बेटा तेरी दादी ने एक लड़की देख रखी है. वह शेखूपुरा जिले के मन्नावाला गांव के तेजा सिंह की बहन है. अब जल्दी-जल्दी फेरे लगाने की सोचो बेटे. भगत सिंह के दिल को एक धक्का सा लगता है. अगर मैं शादी के बंधन में बँध जाऊंगा तो देश के करोड़ों लोगों की सेवा आख़िर कौन करेगा. वे पिता को आश्चर्य में एक पत्र लिखते हैं की हमारा सारा घर देश भक्तों का घर है. हम सब देश के लिए अपना सर्वस्व त्याग चुके हैं. मैं तो आप ही के क़दमों के पीछे-पीछे चल रहा हूँ पिताजी. ऐसे में आप को मेरी शादी का ख्याल क्योंकर आया? पर दादी नहीं मानती. उसे तो एक बहू चाहिए. पिता पलट कर भगत सिंह को पत्र लिखते हैं कि तुझे शादी करनी ही पड़ेगी बेटे. भगत सिंह को और अधिक गहरा आघात पहुँचता है. उस के पास अब एक ही तरीका है. वह लाहौर से दूर चला जाए. पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय लिया. B.A नहीं कर पाते भगत सिंह. पिता को एक कड़ा पत्र लिखते हैं कि मुझे आपके पत्र पर बेहद आश्चर्य हुआ है. यदि आपके जैसे देशभक्त शादी जैसी तुच्छ बातों से लालायित हो सकते हैं तो एक सामान्य व्यक्ति की क्या दशा होगी.
भगत सिंह बचपन से ले कर देश पर मर मिटने का जो स्वप्न देखते रहे थे उसे पूरा करने के पथ पर लाहौर छोड़ कर कानपुर चले गए. यह सन १९२४ था. राम प्रसाद बिस्मिल की यह ग़ज़ल भगत सिंह के लिए एक प्रेरणा थी -

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है.


उन के हृदय में जैसे हर समय आवाज़ गूंजती थी -

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.


जाते-जाते भगत सिंह ने अपने साथियों से कहा- यदि गुलाम भारत में मेरी शादी होती है तो मेरी दुल्हन केवल शहादत ही होगी. मेरी अन्तिम यात्रा ही मेरी बरात होगी और देश के शहीद ही मेरी शादी के बाराती!

क्रमशः....

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

RC का कहना है कि -

मुझे 'सरफरोशी की तमन्ना' पढ़कर/सुनकर बड़ा आश्चर्य होता है ... इतने तीव्र क्रांतिकारी .... और कितने बढ़िया कवि ! ग़ज़ल, उसके भाव, ... क्रांति की भावनाएं ... और कितनी बखूबी ग़ज़ल में व्यक्त किया है ... ! सलाम !

सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बात चीत
देखता हूं मैं जिसे वो चुप तिरी मेहफ़िल में है।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।

खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद
आशिक़ों का आज झमघट कूचा-ए-क़ातिल में है।

है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है।

हाथ जिन में हो जुनू कटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है।

हम तो घर से निकले ही थे बांध कर सर पे क़फ़न
जान हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये क़दम
ज़िंदगी तो अपनी मेहमाँ मौत की महफ़िल में है।

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इंक़िलाब
होश दुशमन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज
दूर रह पाए जो हम से दम कहां मंज़िल में है।

यूं खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है।

sahil का कहना है कि -

अच्छा लगा पढ़कर.सुंदर वर्णन.
आलोक सिंह "साहिल"

शोभा का कहना है कि -

भगत सिंह के बारे मैं इतना विस्तार से जान कर मस्तक श्रद्धा से झुक गया. उस अमर बलिदानी को नमन

Anonymous का कहना है कि -

birth date is 28th plz correct, plz refer standard books. regards.

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

सिंह था वो राष्ट्रप्रहरी मातृ भूमि भक्त था
मा को चंगुल से छुडाऊँ इक जुनूँ हर वक्त था

राष्ट्रपुत्र को नमन...

rachana का कहना है कि -

एसे लेख कम ही पढने को मिलते हैं बहुत ही अच्छा लिखा है आप ने
सादर
रचना

RAVI KANT का कहना है कि -

रोचक आलेख है।

Prem Chand Sahajwala का कहना है कि -

श्री anonymus जी को नमस्कार. आपने भगत सिंह की जन्म तिथि का सवाल उठाया है. मैंने निम्न तीन पुस्तकों से जन्म तिथि लिखी है:

1. Shaheed-e-Azam Sardar Bhagat Singh: The Man and His Ideology by GS Deol p 8.
2. The Trial of Bhagat Singh: Politics of Justice by AG Noorani. P 9
3. Encyclopaedia of Indian Events and Dates by SB Bhattacherjee p A 139 and B 62.
तीनों बहुत प्रसिद्ध लेखक हैं जिन्होंने इतिहास व राजनीति पर बहुत कुछ लिखा है. आप ने जिन पुस्तकों से जन्म-तिथि पढ़ी है, जानना चाहूँगा. धन्यवाद्.

तपन शर्मा का कहना है कि -

भगत सिंह और गाँधी जी दोनों पर एक साथ!!!
आगे के लेख का इंतज़ार...

sahil का कहना है कि -

sundar
ALOK SINGH "SAHIL"

mohammad ahsan का कहना है कि -

शहीद भगत सिंह के लेखन एवं कृत्यों पर एक अत्यन्त विचारोतेज्जक लेख .
सहजवाला साहेब को बधाई . बिस्मिल के बारे में में आर सी ने बिल्कुल सही कहा. असली कवि वही है जिस के शब्द और कर्म एक जैसे होते हैं. कविता मात्र लफ्फाजी नही है. यह आत्म अभिव्यक्ति जो स्वतः कर्म में परिवर्तित हो , के सिवा और कुछ नही हो सकती है संयोग वश उस समय के सभी बड़े क्रांति कारी बिस्मिल, अश्फाखुल्लाह खान aadi कवि थे और कविता उन की धमनियों में बहती थी .
मुहम्मद अहसन

JAI SINGH का कहना है कि -

शहीद भगतसिंह के बारे में लोगों को जागृत करने का आपका प्रयास सराहनीय है। भगतसिंह के विचारों को मानने वाली और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने वाले नौजवानों और इंसाफपसंद नागरिकों के संगठन नौजवान भारत सभा का मैं कार्यकर्ता हूं। भगतसिंह के साहित्‍य, पोस्‍टर, पर्चे आदि प्रकाशित करके हम हिंदी पट्टी के लोगों को उलब्‍ध करा रहे हैं। उनकी जन्‍मतिथि के विषय में मैं अनुरोध करूंगा कि आप राहुल फाउंडेशन लखनऊ से प्रकाशित किताबें, डा. चमनलाल की किताबें और डा. एस. इरफान हबीब की किताब 'बहरों को सुनाने के लिए' जरूर देखें। कृपया निम्‍न ब्‍लॉग पर भी जरूर जाएं smritisankalp.blogspot.com

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