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Sunday, October 12, 2008

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...


'भगत सिंह विशेष' श्रृंखला में आप पढ़ रहे है प्रेमचंद सहजवाला की कलम से भगत सिंह के जीवन के बारे में। इस श्रृंख्ला में हम अब तक पाँच कड़िया प्रकाशित कर चुके हैं।
ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)
क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...





सांडर्स की हत्या के बाद चंद्रशेखर आजाद ने एक साधू-मंडली बनाई और उसी का नेतृत्व करते एक गाड़ी में बैठ कर मथुरा पहुँच गए. भगत सिंह एक बड़ा साहब बन कर और दुर्गा भाभी को अपनी मेम बना कर लाहौर स्टेशन पर एक गाड़ी में बैठ गए. सिवाराम राजगुरु दोनों के घरेलू नौकर बन, सामान उठाते नज़र आए. पुलिस को शक नहीं पड़ा. गाड़ी लखनऊ पहुँची तो तीनों कुछ घंटे वहां रुके. फ़िर वहां से कलकत्ता पहुँच गए.
सांडर्स हत्या के बाद पुलिस लड़कों की तलाश करते करते थक गई थी और केस को लगभग बंद करने वाली थी. लेकिन...

8 अप्रैल 1929 का दिन है. दिल्ली. आज़ादी के बाद जिसे लोक सभा कहा गया, तब उसे Central Legislative Assembly' कहा जाता था...असेम्बली के अध्यक्ष थे विट्ठल भाई पटेल. वे उस दिन भी रोज़ की तरह अध्यक्ष की कुर्सी पर उपस्थित थे. असेम्बली में उपस्थित महत्तवपूर्ण लोगों में से थे मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय और मोहम्मद अली जिन्ना. इस के अलावा प्रखर वकील असफ अली भी अपनी सीट पर मौजूद थे. ऊपर जनता की महिला-गैलरी में थी उनकी पत्नी अरुणा असफ अली. और गैलरी में ही थे वल्लभ भाई पटेल के साथ देवदास गांधी (गांधी जी की सब से छोटे सुपुत्र) व महादेवन देसाई (गांधी जी के सचिव) . और सब से रोचक बात यह की 'साइमन कमीशन' के मुखिया जॉन साइमन भी गैलरी में मौजूद थे.

इस के अतिरिक्त गैलरी में उपस्थित थे दो नौजवान. दोनों ने खाकी शर्ट्स व खाकी नेकरें पहन रखी थी. एक ने नीला सा दिखने वाला कोट व दूसरे ने हल्का नीला कोट पहन रखा था. दोनों जांबाज़ नौजवान थे...

ब्रिटिश की निर्ममता हर भारतवासी जानता था. जब 'Rowlett Act' पारित हुआ था, तब जलिआंवाला बाग़ में जो दर्दनाक घटना घटी, वह हम पढ़ चुके हैं. Rowlett Act में भी जनता की आज़ादी व उसके वैधानिक अधिकारों का हनन था, जिस के विरोध में जलिआंवाला बाग़ में लोग एकत्रित हुए थे. ब्रिटिश ने इस डर से कि जनता कहीं उस घटना के बाद बगावत पर न उतर आए, सख्ती और बढ़ा दी. ब्रिटिश ने यह आदेश दिया कि यदि आप साइकिल पर जा रहे हैं और सामने कोई अँगरेज़ सार्जंट आता है, तो आप को साइकिल से उतरना है, व उसे सैल्यूट मारना है. वहां अमृतसर की एक गली में किसी अँगरेज़ महिला से किसी ने छेड़छाड़ कर दी थी. ब्रिटिश ने सख्त आदेश दे दिए कि उस गली से कोई नहीं गुजरेगा और यदि उस का वहां से जाना ज़रूरी है तो वह ज़मीन पर उल्टा लेट कर अपने शरीर को ज़मीन से रगड़ता हुआ गुजरे.

जनता को दबाए रखने के इन तानाशाह कानूनों से 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' के नौजवानों, जिन में भगत सिंह सब से प्रखर थे, के मन में ब्रिटिश के विरुद्ध आक्रोश उभरता था...

सांडर्स की हत्या तक ये सभी नौजवान पिस्टल या रेवोल्वर से काम लेते रहे. पर अब अपने तरीकों में उन्होंने बम भी जोड़ दिए. कलकत्ता में भगत सिंह की भेंट हुई जतीन दास व फणीन्द्रनाथ घोष से. आगरा, जो कि 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' का मुख्यालय था, को बम बनाने का केन्द्र बनाया जाता है. आगरा में एक मकान 'हींग की मंडी' में है, एक 'नाई की मंडी' में, जहाँ ये नौजवान मिलते हैं. जतीन दास बम के मामले में ज्ञान रखते हैं तथा ललित कुमार मुख़र्जी भी, जो इलाहाबाद में विज्ञान के विद्यार्थी रहे. जतीन दास एक प्रकार से बम बनाने के प्रशिक्षक बन जाते हैं और उनसे प्रशिक्षण लेने वाले नौजवानों में से हैं भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, फणीन्द्रनाथ घोष, सुखदेव, बी के सिन्हा, शिव वर्मा सदाशिव तथा ललित कुमार मुख़र्जी... भगत सिंह लाहौर जा कर बमों को ढालने वाले सांचे लाते हैं, और देखते देखते कुछ शहरों में बम के छोटे छोटे कारखाने खुल जाते हैं. भगत सिंह व आजाद ने मार्च 1929 में झांसी के जंगलों में जा कर इन बमों के सफल परीक्षण भी किए...

...इस नई खोज यानी बम के ज़रिये जेल में कैद जोगेशचंद्र चैटर्जी को रिहा करने की साजिश भी रची गई, पर वह सफल न हो सकी. एक बम को साइमन कमीशन पर फेंकने पर भी युवकों ने विचार किया था, पर वह योजना इसलिए विफल हुई कि उसमें यात्रा पर बहुत खर्चा हो सकता था, और इन युवकों पर पास पैसे की अक्सर तंगी रहती थी...

ब्रिटिश के दमन चक्र का ही एक रूप था 'पब्लिक सेफ्टी बिल' यानी 'जन सुरक्षा विधेयक'. यह हास्यास्पद बात ही थी कि जन सुरक्षा के नाम पर जनता को दबाने की एक अच्छी भली साजिश थी यह बिल. इस बिल में कई प्रावधान थे, जिन में एक तो यह था कि किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को गवर्नर-जनरल के आदेश पर देश से बाहर निकाला जा सकता था और गवर्नर-जनरल के आदेश के बिना वह व्यक्ति पुनः देश में प्रवेश नहीं कर सकता था. एक प्रावधान यह भी था कि ऐसे किसी भी संदिग्ध व्यक्ति या संस्था का बैंक खाता या शेयर या सिक्यूरिटी वगैरह, गवर्नर-जनरल के आदेश पर ज़ब्त हो सकते थे...

हमारी बिल्ली हमें ही म्याऊँ!...

स्पष्ट है कि ब्रिटिश ऐसे कानूनों का उपयोग मनमाने ढंग से करना चाहती थी. वह किसी भी विरोधी को देश से निकाल सकती थी व उस का पैसा भी ज़ब्त कर सकती थी...

...नौजवानों में बेहद आक्रोश है कि ऐसे एक एक बिल को ला कर ब्रिटिश भरतावासियों को पूर्णतः अपना गुलाम बनाना चाहती है...

....8 अप्रैल 1929 को इसी बिल पर चर्चा हो रही है. और ब्रिटिश तक अपनी आवाज़ पहुंचाने का इन जांबाज़ नौजवानों ने एक नायाब तरीका सोचा. ऐसे सभी बिलों व कानूनों से देश की जनता की असहमति व आक्रोश जताने की उन्होंने एक नायाब योजना बनाई. योजना को फलीभूत करने के लिए आगरा के 'हींग की मंडी' वाले मकान में 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' की केंद्रीय समिति की एक बैठक होती है. बैठक में भगत सिंह अपने भाषण में कहते हैं- ब्रिटिश के साम्राज्यवाद में कोई न्याय नहीं है. वे हम गुलामों को दमित कर लूटना और मौत के घाट उतार देना चाहते हैं. उन्हें चैन से एक साँस भी लेने देना नहीं चाहते.' यह पूछे जाने पर कि इस सारी समस्या का आख़िर समाधान क्या है, भगत सिंह ने एक ही शब्द कहा 'बलिदान'. हमें असेम्बली के ब्रिटिश व भारतीय सदस्यों की आँखें खोलनी पड़ेंगी.' भगत सिंह ने पुनः कहा - जिस दिन इस 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर सदन में चर्चा हो रही होगी, उस दिन असेम्बली की गैलरी से नीचे सदन में बम फेंके जाएँ...

प्रश्न उठा कि यह शुभ कार्य आख़िर किसे सौंपा जाए. भगत सिंह सब से कड़ी पहल कर के यह काम स्वयं करना चाहते थे . पर चंद्रशेखर आजाद को इस पर सख्त ऐतराज़ था. उनका कहना था कि सांडर्स हत्या के बाद पुलिस भगत सिंह की खोज कर रही है. इसलिए फ़ैसला किया गया कि असेम्बली में बम फेंकने व 'इन्कलाब जिंदाबाद' व 'ब्रिटिश साम्राज्यवाद' मुर्दाबाद' के नारे लगाने का कार्य बटुकेश्वर दत्त के साथ शिव वर्मा या बी के सिन्हा करेंगे. भगत सिंह की एक न चलने दी गई. पर एक रोचक बात यह हुई कि उस सभा में सुखदेव उपस्थित नहीं थे. जब उन्हें बाद में पता चला कि इस काम में भगत सिंह शामिल नहीं हैं, तब उन्होंने भगत सिंह पर कटाक्ष करने शुरू कर दिए, कि तुम शायद कायर हो. ऐसे बहादुरी के काम से पीछे हट रहे हो. कुछ लोगों का मानना है कि सुखदेव को दरअसल यह लगता था कि इस इतने बड़े काम को भगत सिंह के अलावा कोई और सरंजाम कर ही नहीं सकता, इसलिए उन्होंने ऐसे चुभने वाले शब्द कह दिए. अब भगत सिंह अड़ गए. इसलिए फ़ैसला हुआ कि असेम्बली की गैलरी में भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जाएँगे. वही दो बहादुर जवान गैलरी में बैठे हैं. खाकी शर्ट्स व नेकरों मे. भगत सिंह ने नीला दिखने वाला कोट पहना है व दत्त ने हल्का नीला.. भगत सिंह के सर पर उनका चिर परिचित हैट...

'पब्लिक सेफ्टी बिल' सब से पहले 10 सितम्बर 1928 को सदन में प्रस्तुत हुआ तथा उसे 5 दिन बाद सदन की 'चयन समिति' को भेज दिया गया. इस बात के पक्ष में सदन में 62 वोट पड़े तथा विपक्ष में 59. ऐसा इसलिए भी हुआ कि कई सदस्य सोचते थे कि देश के कतिपय नौजवान दिग्भ्रमित हो कर साम्यवादी (कम्युनिस्ट) हो गए हैं, इस लिए वे बिल पर पक्ष में थे. 24 सितम्बर को 'गृह सदस्य' (Home Member) (उन दिनों मंत्री को Member कहते थे) सर जेम्स क्रेरार ने सदन को सूचित किया कि चयन समिति के अनुसार अब 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर चर्चा हो सकती थी. परन्तु Home Member की इस बात के पक्ष-विपक्ष में 61 - 61 वोट पड़े. शुक्र कि विट्ठलभाई पटेल जो कि अध्यक्ष थे, का Casting Vote ऐसे समय लाज बचा गया और Home Member मुंह ताकते रह गए. विट्टल भाई पटेल ने तदनंतर सरकार को यह पत्र लिखा कि यह बिल क्यों कि मेरठ षडयंत्र से सम्बंधित कुछ जवानों पर चल रहे मुक़दमे को प्रभावित कर सकता है, इसलिए जब तक उस मुक़दमे का फ़ैसला न हो जाए, तब तक इस बिल को स्थगित रखा जाए. विट्ठल भाई ने सदन से यह वादा किया कि वे 8 अप्रैल को सदन को निर्णय सुनाएंगे. और 8 अप्रैल आज ही है. ऊपर भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त इसी विचलित कर देने वाले क्षण की प्रतीक्षा में हैं...

सदन उस से पहले एक और दमन-चक्र के परिचायक बिल यानी 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' को पारित कर चुका था...
अध्यक्ष विट्ठल भाई पटेल ने कहा - 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' अब (पारित हो कर) नज़रों से हट चुका है. और अब मैं 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर अपना निर्णय...

'धमाक'

एक बम का धमाका होता है.

फ़िर 'धमाक'. एक और धमाका.


फ़िर रिवोल्वर से हवा में एक के बाद एक दो गोलियों के चलने की आवाजें .

'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' की उस बैठक में यह निर्णय भी लिया गया था कि बम फेंकने के बाद दोनों जवान भागेंगे नहीं, वरन अपनी जगह पर चुपचाप खड़े रहेंगे. पुलिस के आने पर वे आत्म-समर्पण कर देंगे... इस निर्णय के पीछे बहुत गहरी कूटनीति थी. भगत सिंह की वैचारिकता का रहस्य भी. भगत सिंह चाहते थे कि बम फेंकने के बाद वे पकड़े जाएँ. उन पर मुकदमा चले और देश के सभी अखबार मुकदमों की खबरें छापें. देश की युवा पीढी जागे. ब्रिटिश के ख़िलाफ़ हथियार उठा कमर कस ले देश की युवा पीढी, एक निर्णायक युद्ध के लिए. भगत सिंह को पता था कि अंततः उन्हें तो शहादत का ही वरण करना है, और जो लोग उन्हें अन्तिम विदाई देने आएँगे, वे ही उन के बाराती होंगे.

बम गिरा कर किसी को भी मारने की उन की साजिश नहीं थी. ब्रिटिश के वाइसरॉय तक ने माना कि बम बहुत हलके थे. बम Home Member सर जेम्स क्रेरार के ठीक पीछे गिरे थे. मदन मोहन मालवीय, मोती लाल नेहरू, मुहम्मद अली जिन्ना व असफ अली आदि इन धमाकों से विचलित हुए बिना अपनी जगहों पर यथावत बैठे रहे. असफ अली ने सुखदेव का मुकदमा लड़ा था व मालवीय और मोतीलाल नेहरू ने अदालत में भगत सिंह के पक्ष में गवाहियाँ दी थी. गैलरी में उपस्थित अरुणा असफ अली हो या वल्लभ भाई पटेल, या देवदास गाँधी व महादेवन देसाई. इन सब को समझते देर न लगी होगी कि ये बम 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' के नौजवानों ने फेंके हैं. इन सब की वैचारिकता भले ही इन बहादुर लड़कों की वैचारिकता से भिन्न हो, पर यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि इन सब को कम से कम भारत माँ के इन वीर सपूतों
की देश भक्ति में लेश मात्र भी संदेह न होगा.

बम से कुछ जलते टुकड़े उड़ कर एक सदस्य सर बोम्मन जी दलाल की जांघ में लगे थे व उन्हें तुंरत हस्पताल पहुँचाया गया. इस के अतिरिक्त ब्रिटिश सांसद सर जॉर्ज स्कस्टर व चार अन्य लोग मामूली से ज़ख्मी हुए. बम गिरते ही सदन में थोडी भगदड़ मच गई थी . कहीं धुंआ भी उठा. अध्यक्ष विट्ठल भाई पटेल अपनी कुर्सी से उठ कर बाहर चले गए. पर थोडी देर बाद लौट भी आए. सदन को 11 अप्रैल तक स्थगित कर दिया...

...पर इस बम काण्ड में एक सब से महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि बम के धमाकों व गोलियों की आवाजों के साथ साथ गैलरी से नीचे सदन की और गिरते दिखाई दिए सैंकडों पर्चे. इन पर्चों में 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' द्वारा ब्रिटिश सरकार को एक नोटिस था. देखते देखते सैंकडों पर्चे ब्रिटिश को चेतावनी देने वाली छोटी छोटी जांबाज़ चिडियों की तरह ऊपर से उड़ते हुए नीचे सदन की ज़मीन व सदस्यों की टेबलों तक पहुँच गए. इन पर्चों में क्या था आख़िर?

इन पर्चों में थी एक चेतावनी. फ्रांस के एक क्रांतिकारी थे Valliant. उन्होंने भी ऐसे ही कभी अपनी सरकार को चेतावनी देते हुए बम फेंकने का कारण लिखा था - 'ताकि बहरे सुन सकें...'. भगत सिंह ने इसी वाक्य का सन्दर्भ दे कर पर्चों में छापा था - 'बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की ज़रूरत होती है, Valliant की तरह हम भी अपने इस बम फेंकने के कदम को न्याय संगत मानते हैं... जनता के प्रतिनिधि अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाएँ और जनता को आने वाली क्रान्ति के लिए तैयार करें. देश के असहाय लोगों की ओर से हम ब्रिटिश को वही सबक देना चाहते हैं जो इतिहास में अब तक कई बार दोहराया जा चुका है, कि आप व्यक्तियों को मार सकते हैं, पर विचारों को नहीं!...इन्कलाब जिंदाबाद..ब्रिटिश साम्राज्यवाद मुर्दाबाद.

.भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त अपनी जगहों पर खड़े रहे. भागने की की कोशिश नहीं की. देश के लिए अपनी जान हथेली पर ले कर चलने वाले जांबाज़ लोग डर नाम की किसी चीज़ को नहीं पहचानते. एक रोचक बात यह हुई कि सर सोभा सिंह (प्रसिद्द पत्रकार-लेखक खुशवंत सिंह के पिता), जो कि नई दिल्ली के निर्माण (यथा इंडिया गेट, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, कनाट प्लेस आदि) में एक प्रमुख ठेकेदार थे, अभी अभी गैलरी में प्रविष्ट हुए थे. वे अपने चंद मित्रों के चेहरे खोज रहे थे जिन के साथ उन्हें बाद में भोजन करना था. टटोलते टटोलते उनकी निगाहें उन्हीं कुर्सियों पर गई, जहाँ भगत सिंह व दत्त बैठे थे. उनके मित्र उन्हीं के आस पास बैठे नज़र आए. ठीक इसी क्षण 'धमाक' 'धमाक' से दोनों बम गिरे थे. सर सोभा सिंह ने दोनों पर नज़र रखी. शायद हैरान भी होंगे कि दोनों हिल डुल क्यों नहीं रहे. उन्होंने तुंरत दो पुलिस-कर्मियों को उसी दिशा में भेजा और स्वयं भी उनके पीछे पीछे हो लिए. पुलिस जब जवानों के निकट पहुँची तब किसी भी अपराध-बोध से मुक्त व अपने कृत्य पर गर्वान्वित दोनों वीर अडिग से अपनी जगहों पर खड़े रहे. उनके गर्वान्वित चेहरों पर एक कार्य को सरंजाम देने की खुशी थी, एक अलौकिक सी खुशी. जनता की दमित भावनाओं की एक अनूठी अभिव्यक्ति की सफलता की खुशी. जैसे बिस्मिल का यह शेर एक संदेश की तरह पूरे देश को सुना रहे हों:

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है.


गिरफ्तार कर के दोनों को एक 'वैन' में चांदनी-चौक कोतवाली की तरफ़ ले जाया जा रहा है. रास्ते में एक तांगे के पास से ही गुज़रता है 'वैन'. तांगे में बैठे हैं क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा, उनकी पत्नी दुर्गा भाभी, व उनका नन्हा सा बेटा सचिन्द्र, जो अचानक 'वैन' में भगत सिंह को देख कर पुलकित हो उठता है, चीख पड़ता है - लम्मे चाचा! (लंबे चाचा!). पर दुर्गा भाभी तुंरत नन्हे सचिन्द्र के होंठों पर हथेली रख कर उसे चुप करा देती है...

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

14 कविताप्रेमियों का कहना है :

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर का कहना है कि -

भगत सिंह पर बढ़िया , गम्भीर जानकारी देने के लिए मेरा साधुवाद स्वीकार करें/

ईश्वर से प्राथना है कि आप इसी तरह कि जानकारियां देने की लिए प्रेरणा प्राप्त करते रहें/

Kavi Kulwant का कहना है कि -

sShahidon ki yaad phir se dil me taaja ho uthi...
unko hum bharatwasiyon ka sat sat naman...
11 oct ko ek kavi sammelan program me Hari om panwar ji ko suna.. ek kavita sunayee unhone- Azad par..chandrashekhar azaad par.. jab unka dil toota to unhone yah kavita rachi...dil toota zab aaj ke kisi rajneta ne kaha tha.. azaad.. woh terrorsit!!!

rachana का कहना है कि -

बहुत ही अच्छा लिखा है .कहाँ से लायें है आप इतनी जानकारी? बहुत मेहनत से लिखा है
बधाई हो
रचना

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

बहुत हीं नई बातें जानने को मिल रही हैं। तमाम शहीदों को मेरा नमन!

सुरेश कुमार शर्मा का कहना है कि -

दुनिया की क्रांतियों का इतिहास कहता है कि परिवर्तन के लिए दो चीजों की आवश्यकता है । एक अकाट्य तर्क और दूसरा उस तर्क के पीछे खड़ी भीड़ । अकेले अकाट्य तर्क किसी काम का नही और अकेले भीड़ भी कुम्भ के मेले की शोभा हो सकती है परिवर्तन की सहयोगी नही ।
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इस युग के कुछ अकाट्य तर्क इस प्रकार है -
* मशीनों ने मानवीय श्रम का स्थान ले लिया है ।
* कम्प्यूटर ने मनवीय मस्तिष्क का काम सम्भाल लिया है ।
* जीवन यापन के लिए रोजगार अनिवार्य होने की जिद अमानवीय है ।
* 100% रोजगार सम्भव नही है ।
* अकेले भारत की 46 करोड़ जनसंख्या रोजगार के लिए तरस रही है ।
* संगठित क्षेत्र में भारत में रोजगार की संख्या मात्र 2 करोड़ है ।
* दुनिया के 85% से अधिक संसाधनों पर मात्र 15 % से कम जनसंख्या का अधिपत्य है ।
* 85 % आबादी मात्र 15 % संसाधनों के सहारे गुजर बसर कर रही है ।
धरती के प्रत्येक संसाधन पर पैसे की छाप लग चुकी है, प्राचीन काल में आदमी जंगल में किसी तरह जी सकता था पर अब फॉरेस्ट ऑफिसर बैठे हैं ।
* रोजगार की मांग करना राष्ट्र द्रोह है, जो मांगते हैं अथवा देने का वादा करते हैं उन्हें अफवाह फैलाने के आरोप में सजा दी जानी चाहिए ।
* रोजगार देने का अर्थ है मशीनें और कम्प्यूटर हटा कर मानवीय क्षमता से काम लेना, गुणवता और मात्रा के मोर्चे पर हम घरेलू बाजार में ही पिछड़ जाएंगे ।
* पैसा आज गुलामी का हथियार बन गया है । वेतन भोगी को उतना ही मिलता है जिससे वह अगले दिन फिर से काम पर लोट आए ।
* पुराने समय में गुलामों को बेड़ियाँ बान्ध कर अथवा बाड़ों में कैद रखा जाता था ।
अब गुलामों को आजाद कर दिया गया है संसाधनों को पैसे की दीवार के पीछे छिपा दिया गया है ।
* सरकारों और उद्योगपतियों की चिंता केवल अपने गुलामों के वेतन भत्तों तक सीमित है ।
* जो वेतन भत्तों के दायरों में नही है उनको सरकारें नारे सुनाती है, उद्योग पति जिम्मेदारी से पल्ला झाड़े बैठा है ।
* जो श्रम करके उत्पादन कर रही हैं उनकी खुराक तेल और बिजली है ।
* रोटी और कपड़ा जिनकी आवश्यकता है वे उत्पादन में भागीदारी नही कर सकते, जब पैदा ही नही किया तो भोगने का अधिकार कैसे ?
ऐसा कोई जाँच आयोग बैठाने का साहस कर नही सकता कि मशीनों के मालिकों की और मशीनों और कम्प्यूटर के संचालकों की गिनती हो जाये और शेषा जनसंख्या को ठंडा कर दिया जाये ।
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दैनिक भास्कर अखबार के तीन राज्यों का सर्वे कहता है कि रोजगार अगले चुनाव का प्रमुख मुद्दा है , इस दायरे में 40 वर्ष तक की आयु लोग मांग कर रहे हैं।
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देश की संसद में 137 से अधिक सांसदों के द्वारा प्रति हस्ताक्षरित एक याचिका विचाराधीन है जिसके अंतर्गत मांग की गई है कि
* भारत सरकार अब अपने मंत्रालयों के जरिये प्रति व्यक्ति प्रति माह जितनी राशि खर्च करने का दावा करती है वह राशि खर्च करने के बजाय मतदाताओं के खाते में सीधे ए टी एम कार्डों के जरिये जमा करा दे।
* यह राशि यू एन डी पी के अनुसार 10000 रूपये प्रति वोटर प्रति माह बनती है ।
* अगर इस आँकड़े को एक तिहाई भी कर दिया जाये तो 3500 रूपया प्रतिमाह प्रति वोटर बनता है ।
* इस का आधा भी सरकार टैक्स काट कर वोटरों में बाँटती है तो यह राशि 1750 रूपये प्रति माह प्रति वोटर बनती है ।
* इलेक्ट्रोनिक युग में यह कार्य अत्यंत आसान है ।
* श्री राजीव गान्धी ने अपने कार्यकाल में एक बार कहा था कि केन्द्र सरकार जब आपके लिए एक रूपया भेजती है तो आपकी जेब तक मात्र 15 पैसा पहूँचता है ।
* अभी हाल ही में राहुल गान्धी ने इस तथ्य पर पुष्टीकरण करते हुए कहा कि तब और अब के हालात में बहुत अंतर आया है आप तक यह राशि मात्र 3 से 5 पैसे आ रही है ।
राजनैतिक आजादी के कारण आज प्रत्येक नागरिक राष्ट्रपति बनने की समान हैसियत रखता है ।
जो व्यक्ति अपना वोट तो खुद को देता ही हो लाखों अन्य लोगों का वोट भी हासिल कर लेता है वह चुन लिया जाता है ।
* राजनैतिक समानता का केवल ऐसे वर्ग को लाभ हुआ है जिनकी राजनीति में रूचि हो ।
* जिन लोगों की राजनीति में कोई रूचि नही उन लोगों के लिए राज तंत्र और लोक तंत्र में कोई खास अंतर नही है ।
* काम के बदले अनाज देने की प्रथा उस जमाने में भी थी आज भी है ।
* अनाज देने का आश्वासन दे कर बेगार कराना उस समय भी प्रचलित था आज भी कूपन डकार जाना आम बात है ।
* उस समय भी गरीब और कमजोर की राज में कोई सुनवाई नही होती थी आज भी नही होती ।
* जो बदलाव की हवा दिखाई दे रही है थोड़ी बहुत उसका श्रेय राजनीति को नही समाज की अन्य व्यवस्थाओं को दिया जाना युक्ति संगत है ।
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राष्ट्रीय आय में वोटरों की नकद भागीदारी अगले चुनाव का प्रमुख मुद्दा होना चाहिए ।
* अब तक इस विचार का विस्तार लगभग 10 लाख लोगों तक हो चुका है ।
* ये अकाट्य मांग अब अपने पीछे समर्थकों की भीड़ आन्धी की तरह इक्क्ट्ठा कर रही है ।
* संसद में अब राजनीतिज्ञों का नया ध्रूविकरण हो चुका है ।
* अधिकांश साधारण सांसद अब इस विचार के साथ हैं । चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न हो ।
* समस्त पार्टियों के पदाधिकारिगण इस मुद्दे पर मौन हैं ।
* मीडिया इस मुद्दे पर कितनी भी आँख मूँद ले, इस बार न सही अगले चुनाव का एक मात्र आधार 'राष्ट्रीय आय मं. वोटरों की नकद भागीदारी' होगा, और कुछ नही ।
* जो मिडिया खड्डे में पड़े प्रिंस को रातों रात अमिताभ के बराबर पब्लिसिटी दे सकता है उस मीडिया का इस मुद्दे पर आँख बन्द रखना अक्षम्य है भविष्य इसे कभी माफ नही करेगा|
knol में जिन संवेदनशील लोगों की इस विषय में रूचि हो वे इस विषय पर विस्तृत जान कारी के लिए fefm.org के डाउनलोड लिंक से और इसी के होम पेज से सम्पर्क कर सकते हैं ।
मैं नही जानता कि इस कम्युनिटी के मालिक और मोडरेटर इस विचार से कितना सहमत या असहमत हैं परंतु वे लोग इस पोस्टिंग को यहाँ बना रहने देते हों तो मेरे लिए व लाखों उन लोगों के लिए उपकार करेंगे जो इस आन्दोलन में दिन रात लगे हैं ।
सांसदों का पार्टीवार एवं क्षेत्र वार विवरण जिनने इस याचिका को हस्ताक्षरित किया, वेबसाइट पर उपलब्ध है ।

Anonymous का कहना है कि -

सुरेश कुमार शर्मा जी ने इतना लंबा सा लेख भगत सिंह के लेख पर एक धमाके की तरह क्यों फेंका है. बेहतर कि वे इसे अलग लेख के रूप में छपवाएँ - शालिनी

jagat का कहना है कि -

vastav men bahut badiya lekh tha itne vistar se bhaghat singh ke bare me pahlibaar pada hai such aankhe nam ho gayee

Suraj का कहना है कि -

जय भारती मित्र, शहीद शिरोमणि पूज्य भगत सिंह के सम्बन्ध में अति महत्वपूर्ण जानकारी के लिए कोटि कोटि धन्यवाद ! हमें नाज़ है भारत के ऐसे वीरों पर ...... वंदे भारती वंदे मातरम

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