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Monday, October 20, 2008

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...


'भगत सिंह विशेष' की सातवीं कड़ी


सन् 1897 में जब पूना शहर में प्लेग फ़ैल गया, तब 22 जून को इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की हीरक जयंती पर, ब्रिटिश के खिलाफ पहला क्रांतिकारी हमला हुआ. पूना में चापेकर बंधुओं, दामोदर हरि व बालकृष्ण हरि ने क्रमशः पूना के प्लेग कमिश्नर रैंड व ज़िला मजिस्ट्रेट एयरस्ट की हत्या कर दी. इस साज़िश में उनका तीसरा भाई वासुदेव भी शामिल था तथा उसने बाद में पुलिस को सूचना देने वाले एक व्यक्ति की भी हत्या कर दी थी. तब से ले कर भगत सिंह की शहादत तक युवकों की एक लम्बी सूची है, जिन के मन में फिरंगी कौम के ख़िलाफ़ एक विद्रोह की आग हर समय
पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...
भड़की रहती. वे न तो जान की परवाह करते, न क्रान्ति के मुश्किल रास्तों की. दामोदर चापेकर व उनके दोनों भाइयों, बालकृष्ण तथा वासुदेव ने मातृभूमि के लिए हँसते-हँसते फांसी के फंदे को चूम लिया... 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस व प्रफुल्ल चाकी ने बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले में मजिस्ट्रेट किंग्स्फोर्ड पर बम फेंकना चाहा, जो उन्हें लगा कि एक बग्गी में बैठा था. पर दरअसल बग्गी में दो अँगरेज़ महिलाएं, श्रीमती केनेडी व कुमारी केनेडी बैठी थी, जो इस हमले की शिकार हो कर चल बसी. खुदीराम बोस ने 11 अगस्त 1908 को खुशी-खुशी फांसी के तख्ते पर झूल कर शहादत ओढ़ ली, व प्रफुल्ल चाकी ने उसी वर्ष 1 मई को जेल में अपनी ही पिस्टल से मौत को गले लगा लिया... 2 जून 1908 को बंगाल के अरविन्द घोष 'मानक-तला बम षड्यंत्र' में गिरफ्तार हुए. चित्तरंजन दास, जो कि एक नामी-गिरामी वकील थे और देश के लिए लाखों की कमाई वाली वकालत छोड़ कर गाँधी जी की राह पर चल पड़े थे, ने बेहद निपुणता व निष्ठा से उनका मुकद्दमा लड़ा और अरविन्द बरी हो गए. फ़िर अरविन्द ब्रिटिश की सीमा से निकल कर फ्रांस की सीमा में पांडिचेरी चले गए, जहाँ उन्होंने आध्यात्मिकता की राह पकड़ ली... 1 जुलाई 1909 को लन्दन के 'इम्पीरिअल इंस्टीच्यूट' में मदन लाल ढींगरा ने राज्यसचिव मोरले के राजनैतिक सहायक सर विलियम हट्ट कर्ज़न विल्ली की गोली मार कर हत्या कर दी. वहाँ कोई समारोह हो रहा था और गोली चलते ही बीच बचाव की कोशिश करते एक पारसी डॉ कोवास लालकक्का भी मारे गए. 17 अगस्त 1909 को मदनलाल ढींगरा ने लन्दन के पेंटोनविल्ले जेल में मृत्यु का वरण किया (और 12 दिसम्बर 1976 को उनकी पवित्र अस्थियाँ भारत लाई गई)... 23 दिसम्बर 1912 को वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंग एक हाथी पर घूम रहे थे कि उन पर बम से हमला हुआ. वाइसरॉय बच गए, पर पर हाथी पर लगी उनकी छतरी की देखभाल करने वाला उनका सेवक मारा गया. इस योजना का षड्यंत्र रास बिहारी बोस ने रचा और क्रांतिकारी सचिन्द्र नाथ सान्याल भी इस में शामिल थे...जनवरी 1924 में बंगाल के क्रांतिकारी युवक गोपीनाथ साहा ने कलकत्ता के पुलिस-कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट को मारना चाहा, पर गलती से उन्होंने किसी मि. डे की हत्या कर दी और फांसी के तख्ते पर चढ़ कर देश के लिए आहूति दे दी...9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा आयोजित 'काकोरी रेल डकैती' हम पढ़ चुके हैं...18 अप्रैल 1930 को चिट्टागोंग (जो अब बांग्लादेश में है) में सूर्य सेन, जिन्हें लोग इज्ज़त से मास्टर-दा कहते थे, ने प्रसिद्ध 'चिट्टागोंग शास्त्र डकैती' का आयोजन किया. सूर्य सेन की संस्था 'इंडियन रिवोल्यूशनरी आर्मी' के गणेश घोष, लोकनाथ पाल व तारकेश्वर दस्तीदार आदि ने ब्रिटिश के शस्त्रागार से शस्त्रों की डकैती की. 22 अप्रैल 1930 को चिट्टागोंग की जलालाबाद पहाड़ियों की तलहटियों में पुलिस व इन सभी जांबाज़ जवानों के बीच मुठभेड़ हुई. कई जवान शहीद हुए. सूर्य सेन व दस्तीदार को चिट्टागोंग जेल में फांसी दी गई...जब 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलिआंवाला बाग़ में जनरल डायर ने अपनी नृशंसता का प्रमाण दिया, तब पंजाब के राज्यपाल माइकेल ओ ड्वायर थे. उन्हें 13 मार्च 1940 को लन्दन के कैक्सटन हॉल में ऊधम सिंह ने गोली से उड़ा दिया. ऊधम सिंह को 13 जून 1940 को लन्दन में मृत्यु-दंड दिया गया. (उनकी पवित्र अस्थियाँ भी 19 जुलाई 1974 को भारत लाई गई)....ऐसे कई जवान थे जिन्होंने उस 'वैयक्तिक शौर्य' से भारत का इतिहास रचना चाहा, इतिहासकार जिसे 'Individual Heroism' कहते हैं. ये सब चाहते तो जीवन के सुख भोग सकते थे, ऐशो-आराम की जिंदगी बिता सकते थे, पर उन्हें मातृभूमि के लिए बलिदान का रास्ता चुनना था, सो उसी पर चल पड़े और बलिदान को देश-भक्ति का पर्याय बना कर अपने लहू से ही भारत का इतिहास रचा. इस 'वैयक्तिक शौर्य' या Heroism ने आज़ादी ला कर दी या नहीं, इस पर विवाद हो सकता है, पर ये नौजवान देश-भक्ति व ऊंचे चरित्र की ऐसी बेजोड़ मिसाल थे, जो अन्यत्र मिलनी मुश्किल है. ये सब स्वाधीनता-संघर्ष की राह पर टिमटिमाते दीपक थे, जिन के सीनों में देश-प्रेम की ज्वाला मृत्यु के क्षण तक दमकती रही.

इन में से कई युवक केवल शारीरिक बहादुरी ही नहीं रखते थे, वरन उनका बौद्धिक स्तर भी बहुत ऊंचा था. जैसे अरविन्द ने आध्यात्मिकता की राह पकड़ी तो आध्यात्मिकता के शिखरों को छुआ और स्वामी विवेकानंद, राजा राम मोहन रॉय और अन्य कई प्रखर आध्यात्मिक विभूतियों की श्रेणी में गिने गए. रामप्रसाद 'बिस्मिल' बहुत आला स्तर के शायर थे, जिन्होंने 'सरफरोशी की तमन्ना...' जैसी कालजयी गज़लें लिखी, जो आज भी किसी नौजवान के सीने में एक बगावत का तूफ़ान खड़ा कर सकती हैं.

भगत सिंह एक अन्य प्रकार से इन सभी युवकों में प्रखरतम रहे. वे ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे, पर लेनिन उनका सब से पूज्य व्यक्ति रहा. इसीलिये उन्हें अक्सर भारतीय लेनिन कहा गया है. यहाँ भगत सिंह की बौद्धिक प्रखरता का वर्णन करते हुए यह ज़रूरी नहीं कि हम उनकी लेनिन प्रेरित वामपंथी वैचारिकता से भी सहमत हों. वामपंथी रास्तों पर चलने वाले देशों ने भी समय के साथ जान लिया कि 'साम्यवाद' एक मृग-तृष्णा है, पर भगत सिंह भी लेनिन की तरह सर्वहारा वर्ग की पीड़ा को बहुत गहराई तक महसूस करते थे व उसी वर्ग में उनकी आस्था भी थी. यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि प्रायः किसी भी युवक का 'साम्यवाद' से लगाव एक कच्चे घड़े की तरह हो जाता है. वह लगाव या तो भावात्मक होता है या 'कम्युनिस्ट' लाफ्फज़ी का शिकार. जैसे कोई नौजवान यह सुन ले कि दुनिया में कैसा अंधेर चल रहा है, कोई सोने-चांदी से नहाता है, तो कोई भीख मांगता है, बस इसी से वह 'कम्युनिज़म' का दीवाना हो जाए. ऐसे नौजवानों में भावना का तूफ़ान होता है, पर विश्लेषण-बुद्धि नहीं होती. भगत सिंह व उनके साथियों का 'साम्यवाद' से लगाव भी जेलों में जाने तक रागात्मक अधिक था. पर जब 'असेम्बली बम काण्ड' के बाद भगत सिंह ने बाकी की संक्षिप्त सी ज़िंदगी जेलों में काटी तब उन्हें अपनी बौद्धिक प्रखरता को मांजने-सँवारने का स्वर्णिम अवसर मिला. उनके लिए जेल एक पुस्तकालय सा बन गया. यहाँ भगत सिंह और पंडित जवाहरलाल नेहरू में बहुत गहरी समानता मिलती है. पंडित नेहरू ने भी जेल से प्राचीन-कालीन संस्कृतियों से शुरू कर के आधुनिक समय तक का पूरे विश्व का वृहद् इतिहास लिखा. भगत सिंह भी एक तपस्वी की तरह अध्ययन-मनन करते थे. चाहे रूसी उपन्यासकार दोस्तोयेव्स्की का उपन्यास 'अपराध और दंड' हो, चाहे ह्यूगो का उपन्यास 'पद-दलित', या फ़िर वर्ड्सवर्थ का काव्य ही क्यों न हो. विश्व के सभी देशों में हुई क्रांतियों के इतिहास, समय के हर पन्ने पर विश्व में मची उथल-पुथल को समझना, गहरा चिंतन करना. यही था भगत सिंह का जेल-जीवन. यह कहना अतिशयोक्ति न होगी, कि उनके समकालीन सभी क्रांतिकारी साथियों में जितना ज्ञान था, उन सब के कुल ज्ञान से भी अधिक अकेले भगत सिंह में था. भावात्मक लगाव के कच्चे गलियारों से निकल कर वे परिपक्वता-प्रखरता की उन मंज़िलों तक पहुंचे, जो उनकी परवर्ती युवा पीढियों के लिए आज भी एक मिसाल हैं. इसी परिपक्वता के दौरान ही उन्होंने वे चंद लेख लिखे थे, जिन में उन्होंने लिखा था कि बम और पिस्टल के रास्ते से आज़ादी नहीं मिल सकती. पर उनके कतिपय साथियों ने उनके इन नए विचारों को जेल में बीत रही ज़िंदगी के कारण हुआ हृदय-परिवर्तन समझने की भूल की. उनका मानना था कि अब क्यों कि भगत सिंह को मृत्यु-दंड घोषित हो चुका है, इसलिए किसी खौफ के मारे उनके विचारों में एक अप्रत्याशित परिवर्तन आया है और वे अपने ही चुने हुए रास्ते को नकार रहे हैं. पर यह उनके मित्रों की एक भारी भूल थी. जेल की कोठरी में लापरवाही से अपना बरमूडा, टी-शर्ट व हैट पहने पुस्तकें पढ़ने वाले भगत सिंह को यह पता भी नहीं था कि डर आख़िर है किस चिड़िया का नाम. उस गहरे चिंतन के दौरान ही उन्होंने अपनी कलम से क्रान्ति को परिभाषित भी किया था- 'क्रान्ति परिश्रमी विचारकों और परिश्रमी कार्यकर्ताओं की पैदावार होती है. दुर्भाग्य से भारतीय क्रान्ति का बौद्धिक पक्ष हमेशा दुर्बल रहा है. इसलिए क्रान्ति की आवश्यक चीज़ों और किए गए काम के प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया गया. इसलिए एक क्रांतिकारी को अध्ययन-मनन को अपनी पवित्र ज़िम्मेदारी बना लेना चाहिए.' ('शहीदे-आज़म की जेल नोटबुक - अनुवाद विश्वनाथ मिश्र, संपादन सत्यम वर्मा').

जब जेल में उनकी मनोवांछित पुस्तकें न पहुँच पाती, तब ऐसी परिस्थिति भगत सिंह के लिए असहनीय हो उठती. उन्होंने 24 जुलाई 1930 को 'लाहौर सेंट्रल जेल' से सुखदेव के भाई जयदेव के नाम एक पत्र भेजा, जिसमें किताबों की एक लम्बी सूची लिख दी, कि 'द्वारकानाथ पुस्तकालय' से निम्नलिखित पुस्तकें ले कर ज़रूर भिजवा देना. पुस्तकों के नामों से ही उनकी विद्वता का स्तर आँका जा सकता है. इनमें बर्ट्रेंड रूसेल की 'व्हाई मैन फाइट' भी होती तो कार्ल मार्क्स की 'सिविल-वार इन फ्रांस' भी होती. यह पहले ही कहा जा चुका है कि केवल आज़ादी पाना ही भगत सिंह की मंज़िल नहीं थी. वरन आज़ादी पाने के बाद देश के सर्वहारा वर्ग को खुशहाली की मंज़िल तक ले जाने वाले अंतहीन रास्ते पर चलना ही उनका ध्येय था. जैसे 'बिस्मिल' का एक शेर है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ,
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.

इसलिए निरंतर चिंतन भी जारी रहता, और जेल में ही उन्होंने असंख्य लेख भी लिखे, कुछ पुस्तकें भी, जो पिछले कई वर्षों से लगातार चल रहे शोध के बाद प्रकाश में भी आ रही हैं. जिस क्षण भगत सिंह को मृत्यु-दंड होना था, उस से कुछ घंटे पहले भी, वे जेल की कोठरी में अपने नीले रंग के बर्मूडे व टी- शर्ट तथा हैट में लापरवाह से बैठे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. ऊपर संदर्भित पुस्तक 'शहीदे-आज़म की जेल नोटबुक' के पृष्ठ 19 पर भगत सिंह की भतीजी वीरेंद्र सिन्धु द्वारा लिखित पुस्तक 'युगद्रष्टा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे' का सन्दर्भ दे कर उन्हीं की (वीरेंद्र सिन्धु की) कही हुई बात लिखी है - 'भगत सिंह के लिए लेनिन से अधिक करीबी और कौन था? वे अपनी मृत्यु से पहले उन से मिलने को उत्सुक थे और उनके लिए लेनिन की जीवनी पढ़ने का अर्थ लेनिन से मिलना था'. जब भगत सिंह दिल्ली में 'असेम्बली बम काण्ड' पर चल रहे मुकद्दमे के बाद लाहौर की जेलों में भेजे गए, तब के एक दिन का सन्दर्भ देना यहाँ काफ़ी है. 1930 की 24 जनवरी को रूस में मनाए जा रहे 'लेनिन दिवस' (लेनिन का देहांत 24 जनवरी 1924 को हुआ था) के अवसर पर भगत सिंह व उनके सभी आरोपी साथी लाल रंग के स्कार्फ पहन कर अदालत में आए. सभी आपस में देश की चर्चा कर रहे थे तथा बार-बार क्रांतिकारी नारे भी लगा उठते. भगत सिंह ने मजिस्ट्रेट की मेज़ पर एक टेलीग्राम रख दिया कि इसे कृपया मॉस्को भेजा जाए, जहाँ 'लेनिन दिवस' पर 'तृतीय अंतर्राष्ट्रीय' सम्मलेन हो रहा है. टेलीग्राम में भगत सिंह ने लिखा था- "हम 'लेनिन-दिवस' के सुअवसर पर कॉमरेड लेनिन द्वारा चलाए गए महान प्रयोग की सफलता पर हार्दिक बधाई देते हैं. हम विश्व के इस क्रांतिकारी आन्दोलन के साथ अपने नाम को जोड़ने के इच्छुक हैं. मज़दूर-हुकूमत जिंदाबाद. पूंजीवाद का सर्वनाश हो. साम्राज्यवाद मुर्दाबाद".

भगत सिंह व दत्त को 16 अप्रैल तक चांदनी चौक कोतवाली में रखा गया था. फिर उन्हें 'Old Secretariat' के निकट 'Civil Lines' पुलिस चौकी भेजा गया. तदनंतर दोनों को दिल्ली जेल भेजा गया. पुलिस ने तुंरत एक के बाद एक गिरफ्तारियां करनी शुरू कर दी. लाहौर में भगवती चरण वोहरा द्वारा किराये पर लिए गए एक मकान से सुखदेव, जय गोपाल व किशोरी लाल गिरफ्तार हो गए. उनके पास बम बनाने के कई उपकरण व बम बनाने के तरीके सिखाने वाला साहित्य भी मिला था. यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि सुखदेव ने न तो सांडर्स हत्या काण्ड में हिस्सा लिया था, न असेम्बली बम काण्ड में. फिर भी भगत सिंह व राजगुरु के साथ उन्हें भी मृत्यु दंड मिला, यह एक पहेली हो सकती है. दरअसल सुखदेव लाहौर में 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' के दफ्तर को बखूबी संभालते थे व नित नए रंगरूट संस्था में लाते थे. लाहौर में बम बनाने के सिलसिले में भी सुखदेव बेहद सक्रिय रहते. .

भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह लाहौर से दिल्ली जेल में उनसे मिलने आए. पर उन्हें मिलने की अनुमति नहीं दी गई. भगत सिंह ने पिता को एक पत्र लिख कर बताया कि उन्हें किसी भी वकील की ज़रूरत नहीं है. उन्होंने पिता को यह भी लिखा कि यदि आप फिर मुझसे मिलने आएं तो अकेले ही आएं, माँ को न लाएं, क्योंकि माँ बेवजह रोने लगेगी.

दिल्ली की ज़िला जेल में ही 7 मई 1929 को ऐडीशनल मजिस्ट्रेट एफ बी पूल के सम्मुख भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त के ख़िलाफ़ सुनवाई शुरू हुई. बचाव पक्ष की तरफ़ से प्रसिद्व वकील व कांग्रेस नेता असफ अली प्रस्तुत हुए. तदनंतर जून 1929 के प्रथम सप्ताह में आरोप तय होने के बाद दिल्ली के सेशन जज की अदालत में दोनों पर मुकद्दमा शुरू हुआ. दोनों बहादुर युवक अदालत में 'इन्कलाब जिंदाबाद' 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' के नारे लगाते. अदालत में उपस्थित अनेक लोगों की आंखों में अक्सर आंसू होते. 10 जून 1929 को मुकद्दमे की कार्रवाई सम्पन्न हुई और 12 जून को फ़ैसला सुनाया गया, जिस में भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त को असेम्बली में बम फेंकने के आरोप में देश-निष्कासन में उम्र-कैद की सज़ा सुनाई गई...

इसके शीघ्र बाद 'सांडर्स हत्या काण्ड' के सिलसिले में भगत सिंह को लाहौर भेजा गया. वे पंजाब की 'मिआंवाली वाली' जेल पहुंचे तो वहां अनेक राजनैतिक कैदियों से उनकी मुलाक़ात हुई. पर जेल में इन राजनैतिक कैदियों को जिस दुर्दशा में रखा जा रहा था, वह भगत सिंह से देखी नहीं गई और 15 जून से ही उन्होंने अपने साथियों समेत भूख हड़ताल शुरू कर दी, जो ब्रिटिश की निर्ममता के आगे अडिग रहने वाली इन नौजवानों की वीरता के इतिहास का एक और स्वर्णिम पन्ना है. जब भूख हड़ताल को 15 दिन हो गए तब 30 जून 1929 को अमृतसर के जलिआंवाला बाग़ में एक समारोह होता है. शहर की कांग्रेस और 'नौजवान भारत सभा' ने मिल कर डॉ. सैफुद्दीन किचलू की अध्यक्षता में 'भगत सिंह दिवस' मनाया, जिस में आकाश फिर उन्हीं नारों से गूँज उठा - इन्कलाब जिंदाबाद..साम्राज्यवाद मुर्दाबाद...'


लेखक- प्रेमचंद सहजवाला

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

rachana का कहना है कि -

बहुत से नाम तो मुझको पता भी नही थे .आप इतनी मेहनत से लिखते है आप का धन्यवाद .
वरना शायद मुझे बहुत कुछ पता न होता
सादर
रचना

Harihar का कहना है कि -

कुछ राजनीतिक कारणों से आजादी के बाद क्रान्तिकारी इतिहास छिपाया गया था । हम भी गर्व में फूलना चाहते थे कि हमने आजादी अहिंसा से ली।
दर असल क्रांति या अहिंसा किसी भी भाग को छिपाना इतिहास का अपमान होगा, शहिदों का अपमान होगा । प्रेमजी इस लेख के लिये बहुत धन्यवाद !

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत अच्छी श्रंखला.. बहुत कुछ मिल रहा है..

प्रेम जी का बहुत बहुत धन्यवाद

Major का कहना है कि -

आपका प्रयास अत्यन्त सराहनीय है. मैं आपके प्रयास को सह्रदय नमन करता हूँ.

Roney Kever का कहना है कि -

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