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क्या आपकी पहली कविता सुरक्षित है?


हिन्द-युग्म सदैव नये रचनाकारों को प्रोत्साहित करता रहा है। इसीलिए यूनिकवि प्रतियोगिता के माध्यम से 10 नये रचनाकारों को प्रत्येक माह पुरस्कृत करता है। 'अतिथि कवि' और 'सम्मानित कवि' स्तम्भ में नामचीन कवियों की कविताएँ प्रकाशित कर नव-अंकुरों को मार्गदर्शन देता रहता है।

आज से एक वर्ष पूर्व हमने काव्य-पल्लवन में प्रत्येक कवि की "पहली कविता" प्रकाशित की थी। इस विशेषांक की कामयाबी इसी से समझी जा सकती है कि यह विशेषांक सात अंकों तक प्रकाशित हुआ जिसमें 125 कवियों ने भाग लिया। हिन्दयुग्म के पुराने पाठकों को याद होगा जब नये और मँझे हुए दोनों तरह के कवियों ने अपनी-अपनी पहली कवितायें भेजीं थीं। प्रथम 100 में से 30 भाग्यशाली प्रतिभागियों को हमारी ओर से डॉ॰ अहिल्या मिश्रा और डॉ॰ रमा द्विवेदी द्वारा संपादित साहित्यिक पत्रिका 'पुष्पक' की एक-एक प्रति भेंट की गई।

परन्तु पिछले एक वर्ष में हिन्दयुग्म से कईं नये कवि जुड़े हैं तो हमने सोचा कि क्यों न इस बार नये कवियों को भी अपनी "पहली कविता" प्रकाशित करवाने का मौका दिया जाये। इससे नये रचनाकार अपनी कविता प्रकाशित करवा स्थापित कवियों के विचार जान सकेंगे और वरिष्ठ कवियों की पहली कविता पढ़कर वे अपनी सोच का दायरा बढ़ा सकते हैं। कवि की पहली कविता उसके लिए बहुत ख़ास होती है, हिन्द-युग्म सदैव के लिए उन कविताओं का दस्तावेज़ीकरण करना चाहता है। तो फिर सोच क्या रहे हैं, अपनी पुरानी डायरी से धूल हटायें। वो कागज़ ढूँढें जिस पर आपने अपनी पहली कविता की पंक्तियाँ लिख डालीं थीं और पता भी नहीं चला होगा कि कब उन पंक्तियों ने कविता का रूप ले लिया। कुछ पाठक ऐसे भी होंगे जिन्होंने चुपचाप कुछ पंक्तियाँ लिखीं पर कभी कहीं भेजी नहीं। कृपया संकोच न करें और वो पंक्तियाँ लिख भेजें जिन्हें आप ने छुपा रखा है।

रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी 'पहली कविता' भेजते वक़्त पूरी ईमानदारी बरतें, इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनायें बल्कि यह सोचें कि इससे बहुत से नये रचनाकारों का प्रोत्साहन होगा। अपने अंदर का कवि बाहर निकालें। "पहली कविता" की दूसरी शृंखला आपकी कविताओं का इंतज़ार कर रही है।

फिलहाल काव्यपल्लवन के दो अंक प्रतिमाह प्रकाशित किये जायेंगे। यानी इस महीने की 16 व 30 तारीख को काव्य-पल्लव्न का यह अंक आयेगा जिसमें नये-पुराने, चर्चित-अचर्चित कवियों की 'पहली कविता' हिन्द-युग्म पर प्रकाशित की जायेगी।

विशेष-
१) अपनी 'पहली कविता' kavyapallavan@gmail.com पर भेजें।
२) कई रचनाकार शुरू-शुरू में में किसी फिल्मी गीत की पैरोडी या किसी चर्चित कविता की पैरोडी लिख बैठते हैं। 'पहली कविता' उसे ही मानें जिसे आप अपनी पहली मौलिक रचना कह सकते हों।
३) कविताओं का अप्रकाशित होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। हिन्दयुग्म पर "पहली कविता" की प्रथम शृंखला में प्रकाशित कवितायें दोबारा नहीं ली जायेंगी।
४) कवि यदि ज़रूरी समझें तो क्यों लिखा?, कैसे लिखा? कहाँ लिखा? आदि ज़रूर लिख भेजें।
५) यदि आप अपनी पहली रचना संजोकर नहीं रख पाये हैं तो उपलब्ध रचनाओं में से प्राथमिक रचना लिख भेजें, लेकिन भूमिका में इस सच्चाई का उल्लेख अवश्य करें।
६) यह आयोजन तब तक चलता रहेगा जब तक कि हमें कवियों से कविताएँ मिलती रहेंगी, इसलिए अंतिम तिथि निर्धारित नहीं है।
7) जो कवि एक बार अपनी पहली कविता भेज चुके हैं, कृपया दुबारा न भेजें। यदि आप यह भूल गये हों कि आपने भेजी है या नहीं तो कृपया सूची-1 में अपना नाम देख लें।

पिछले वर्ष के सात अंकों में शामिल प्रतिभागियों की "पहली कवितायें" यहाँ पढ़ सकते हैं:

पहला अंक:
दूसरा अंक:
तीसरा अंक:
चौथा अंक:
पाँचवा अंक:
छठा अंक:
सातवाँ अंक:

सूची-1: कवियों ने नाम जिनकी पहली कविता संकलित की जा चुकी है

अजीत पांडेय
अनिता कुमार
अभिषेक पाटनी
अमित अरुण साहू
अमिता 'नीर'
अरविंद चौहान
अर्चना शर्मा
अर्पित सिंह परिहार
अवनीश गौतम
अवनीश तिवारी
अविनाश वाचस्‍पति
अशरफ अली "रिंद"
आकांक्षा यादव
आदित्य प्रताप सिंह
आलोक शंकर
आलोक सिंह "साहिल"
आशा जोगळेकर
आशीष जैन
उत्पल कान्त मिश्रा
एस. कुमार शर्मा
कमलप्रीत सिंह
कमला भंडारी
कवि कुलवंत सिंह
कु० स्मिता पाण्डेय
कुमार मुकुल
कुसुम सिन्हा
गरिमा तिवारी
गिरीश बिल्लोरे "मुकुल"
गीता मोटवानी
गीतिका भारद्वाज
गोविंद शर्मा
गोविन्द शर्मा
जया शर्मा
डा. आशुतोष शुक्ला
डा. रमा द्विवेदी
डा0 अनिल चड्डा
डॉ॰ एस के मित्तल
डॉ॰ शीला सिंह
तनु शर्मा
तपन शर्मा
तरुश्री शर्मा
तसलीम अहमद

दिनेश पारते
दिव्य प्रकाश दुबे
देवेंद्र पांडेय
देवेन्द्र कुमार मिश्रा
धर्म प्रकाश जैन
निखिल आनंद गिरि
निखिल सचन
पावस नीर
पीयूष तिवारी
पूजा अनिल
पूजा उपाध्याय
पूर्णिमा वर्मन
प्रकाश यादव 'निर्भीक'
प्रभा पी. शर्मा
प्रमेन्द्र प्रताप सिंह
प्राजक्ता
प्रेमचंद सहजवाला
बेला मित्तल
ब्रह्मनाथ त्रिपाठी 'अंजान'
भूपेंद्र राघव
मंजू भटनागर
मधुरिमा
मनीष वंदेमातरम
मनीषा वर्मा
ममता गुप्ता
ममता पंडित
महक
महेंद्र भटनागर
मीना जैन
मीनाक्षी धनवंतरि
मेनका कुमारी
मैत्रेयी बनर्जी
यश छाबड़ा
रंजना भाटिया
रचना श्रीवास्तव
रजत बख्शी
रश्मि सिंह
राकेश खंडेलवाल
राजिंदर कुशवाहा
राजीव तनेजा
राजीव रंजन प्रसाद
राहुल गडेवाडिकर

राहुल चौहान
रेनू जैन
लवली कुमारी
विजयशंकर चतुर्वेदी
विनय के जोशी
विपुल
विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र"
विश्व दीपक 'तन्हा'
शशिकान्त शर्मा
शिफ़ाली
शिवानी सिंह
शुभाशीष पाण्डेय
शैलेश भारतवासी
शोभा महेन्द्रू
श्याम सखा 'श्याम'
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
श्रीमती पुष्पा राणा
श्रुति गर्ग
संजीव कुमार बब्बर
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
सचिन केजरीवाल
सजीव सारथी
सतपाल ख्याल
सतीश वाघमारे
सतीश सक्सेना
समीर गुप्ता
सविता दत्ता
सी आर.राजश्री
सीमा गुप्ता
सीमा सचदेव
सुनिता (शानू)
सुनीता यादव
सुनील कुमार सोनू
सुनील डोगरा ’जालिम’
सुमित भारद्वाज
सुरिन्दर रत्ती
सुरेन्दर कुमार 'अभिन्न'
सोमेश्वर पांडेय
स्वाति पांडे
हरिहर झा
हेमज्योत्सना पराशर

'पहली कविता' की आखिरी खेंप







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - पहली कविता (भाग-6)

विषय-चयन - अवनीश गौतम

अंक - पंद्रह

माह - जून-जुलाई 2008





पहली कविता की आखिरी किश्त लेकर हम हाज़िर हैं। अब तक इस आयोजन में ११५ कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आखिरी कड़ी में हम १० कविताएँ लेकर प्रस्तुत हैं। आशा है आपने 'पहली कविता' की धुँआधार बल्लेबाजी का मज़ा आपने खूब लिया होगा। अपने विचार अवश्य दें।

*** प्रतिभागी ***
| शशिकान्त शर्मा | प्रकाश यादव 'निर्भीक' | सुरेन्दर कुमार 'अभिन्न' | आलोक शंकर | श्रुति गर्ग |प्रभा पी. शर्मा | तसलीम अहमद | सचिन केजरीवाल | जया शर्मा | सुनिता (शानू)


~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





ये कविता मैंने कक्षा १२ यानी कि १९९३ मे लिखी थी। एक अंग्रेजी साहित्य की किताब में मैंने एक लेख पढ़ा था जिसका वर्णन यहाँ करने मे उचित समझा।

"Origin of Poem as has been believed was like a spring of thoughts, pushed by the emotions of great poet Valmiki, when the arrow of the hunter peirced into the hearts of a pair of birds lost in the congual world of calm forest"

इतना पढ़ते ही मुझे लगा कि वेदना की आह से ही उपजा होगा पहला मीठा गान। इन पँछियों ने मुझे इतनी प्रेरणा दी कि मैं खुद को रोक नहीं सका एवं इतिहास के सबसे पहली कविता के सृजन को अपने शब्दो में रच डाला।

चुभा तीर दिल मे,
जो युग्ल पँछियो के
प्रणयरत है वो
चिर नीँद में सो गये थे
तपस्यारत बाल्मीकि का
हृदय बिंद गया था
अश्रुजल बहते बहते ना जाने
कहा खो गये थे
अश्रुजल बन कर
जो लिख गये थे
वेदना के स्वर थे
काव्य बन गये थे
ये कविता पहली थी और,
बाल्मीकि कवि बन गये थे
शहादत पँछियो की वो
अमर कर गये थे
बाल्मीकि कवि बन गये थे

शशिकान्त शर्मा




एक सहर होते ही

जीवन में-
एक सहर होते ही,
एक शहर छोड दिया,
जिसकी वात्सल्यमयी आँचल,
समेटे रखा था मुझे,
इतने दिनों तक,
दोस्तों की दोस्ती का,
वह यादगार क्षण,
जो याद आती है मुझे,
अब बार-बार,
माँ की ममता,
बाबुजी का स्नेह और,
भाईयों का असीम प्यार,
जिसका हरेक शब्द,
छू लेता है दिल को,
अतीत के हर यादों को,
अब स्मृति के किताबों में,
कैदकर मैं आ गया,
एक अनजान शहर,
एक अजनबी बनकर,
अपरिचितों के बीच,
परिचितों से काफी दूर,
अब ये अपरिचित,
होते जा रहे हैं परिचित,
एक नये अध्याय के साथ,
इस नये जीवन में,
अपने अपने रुपों को लेकर...

प्रकाश यादव 'निर्भीक'




पूरे होश मे आकर देख,
मुझको पास बुलाकर देख

दिल मे तेरे मै धड़का हूँ,
गर्दन जरा झुका कर देख

वो भी हिस्सा तेरे घर का,
दिवार जरा गिरा कर देख

महसूस करेगा बुलंदियों को,
किसी गिरे को उठाकर देख

संदल जैसी धूल वतन की,
माथे पर इसे लगा कर देख

सुरेन्दर कुमार 'अभिन्न'



भीष्म

आदित्यों का तेज़, घनी छाया जिसको करता है
जिसकी धनु की प्रत्यंचा से निखिल भुवन डरता है
देवों का देवत्व ,नमन जिस नरता को करता है
कालजयी ,उस आदि पुरुष को मनुज कौन कहता है?
नहीं मनुज तुम भीष्म , मनुजता की तुम नव आशा हो
निष्ठा , भक्ति, प्रतिज्ञया -पालन की कोई भाषा हो।

भीष्म - प्रतिज्ञया

दिनकर अपना तेज़ त्याग, शीतलता धारण कर लें
या शशि अपनी धवल ज्योति सारे पिण्डों से हर लें ;
अग्नि त्याग दे पवित्रता, गंगा त्यागे निज़ -धारा
अमृत कलश विष बरसाये, म्रृत हो जाये जग सारा।
स्वर्ग धरातल में जाये, किन्नर दानव हो जायें
या अपनें हि प्रिय मधुकर को कुसुम मारकर खायें;
मही डोल जाये लेकिन पुरुषार्थ नहीं डोलेगा
टूट जाय अम्बर लेकिन यह वचन नहीं टूटेगा;
मैं अष्टम गांगेय आज यह भीषण प्रण करता हूँ ,
ब्रह्मचर्य पालन करने का पावन व्रत धरता हूँ ॥

--आलोक शंकर




जब शैलेश जी ने कहा कि काव्य पल्लवन में " पहली कविता" नाम से सब लोग अपनी प्रथम कविता लिखने का अनुभव बाँट रहे हैं, और मुझे भी उसमें अपना योगदान देना है, तो एक पल के लिए मन में और बहुत साल पहले कि स्मृतियाँ ताजा हो गयी... मेरे को याद आये वो स्कूल के दिन, जब में सातवी कक्षा में थी..मुझे हिंदी में अच्छे अंक प्राप्त होते थे, लेकिन कविता लिखना.. ऐसा तो कभी सोचा भी नहीं था.. हाँ तुकबंदी शायद कर लेते थे.. वैसे इतना अब याद नहीं.. एक दिन मेरे हिंदी का टेस्ट था आया मेरे पहली बार कम अंक आये.. मैंने अच्छे से पढाई नहीं कि थी.. मुझे लगता था कि हिंदी में तो कोई भी बिना पढा अच्छे अंक प्राप्त कर सकता है.. लेकिन मैं गलत थी.. उस दिन पहली बार एहसास हुआ था कि पढ़ना बहुत ज़रूरी है, चाहे वो कोई भी सब्जेक्ट हो..
यह कविता भी में उस दिन ही लिखी थी, हो सकता है इसका उस बात से कोई कनसर्न न हो.. लेकिन हाँ यह भाव पहली बार उस दिन ही मेरे भीतर से कागज़ पर उतरे थे..:) थोड़े अधूरे हैं.. पूरी तरह से कविता आज मुझे याद नहीं... लेकिन आशा करती हूँ कि जैसी भी है, आप सब इसका आनद मानेंगे..:)

हसरतों का दामन लिए
हम निकल पड़े उस राह पर
जिसमें मंजिल की छाव नहीं
अरमानो की धुप है
अपने मुक्क़दर को लिए
हम कह बैठे जहाँ से
सब खुदा की मर्ज़ी है
अपना उस पर कहाँ जोर है
बड़ा हौसला था मन में
कि मंजिल को पा लेंगे
लेकिन मन के अंधियारे में
गमो के ही दीप है
मुक्क़दर पर छोड़ा काम
ना आया रास हमें
नहीं तो कह रहे होते जहाँ से
यह चाँद पंक्तियाँ
मेरे मन की हार नहीं
कहने को सिर्फ एक गीत हैं.....

--श्रुति गर्ग



तपते मन

दुःख से तपते मन आपस में मिल जाते है .
जैसे तपते लौहखंड आपस में जुड़ जाते है.
वृक्ष जड़ों से नाता तोड़े, सूख ठूठ बन जाता है.
निज संस्कृति से कटने पर देश गर्त में धस जाता है.
धरा और अम्बर, क्षितिज पार जब मिल जाते है,
जैसे तपते लौहखंड,आपस में जुड़ जाते है.
पराधीनता का सुख से नाता कभी नहीं बन पाता है
स्वाधीनता की दिव्य उजास से देश अभिमान बढ़ जाता है.
सतरंगी इन्द्रधनुष आशा के पुल बन जाते है.
जैसे तपते लौहखंड, आपस में जुड़ जाते है.
चमत्कार पाखण्ड बढ़ रहा है, जात पात का भेद बढ़ रहा है.
राजनीति के दलदल में, शिखंडियों का भाव बढ़ रहा है.
प्रांजल मन हो यदि तो दिल से दिल मिल जाते है ,
जैसे तपते लौहखंड, आपस में जुड़ जाते है.
प्रेम नहीं व्यापार बने , प्रेम मयी यह संसार बने
अर्पण कर दो सब ईश्वर को तो यह जीवन सत्कार बने
झंकृत हो मन के तार-तार तो तपन मिट जाते है ,
जैसे तपते लौहखंड, आपस में जुड़ जाते है.

--प्रभा पी. शर्मा 'सागर'



मैंने यह कविता जुलाई 2001 में लखी थी। भोर से पहले पंछियों की चहचहाहट ने मुझे उसी समय कलम उठाने को मजबूर कर दिया था। उठा कमरे की लाइट जलाई, कॉपी उठाई और कविता उतर आई। लिखता पहले भी रहा था, लेकिन सहेज कर नहीं रख पाया। यह कविता उसी महीने दैनिक जागरण में प्रकाषित भी हुई। मैं इसी को अपनी पहली कविता मानता हूं।

उस पंछी को शुभ प्रभात

पहले मेरे आंगन में गाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

सुबह का पहला गीत सुनाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

मीठी भाशा मुझे सिखाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

मम्मी-पापा, गुड्डू-गुिड़या,
मेरे दोस्त राम रहीमा,

सब को मिलकर रहना सिखाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

दूर देष में चुगने जाती,
शाम को अपने घर आ जाती,

ह्दय में प्रेम का द्वीप जलाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

शुभ प्रभात, शुभ प्रभात, शुभ प्रभात।

--तसलीम अहमद




ये कविता मैंने कब लिखी मुझे ठीक से कुछ याद नहीं पर इतना याद है की आज से लगभग ८ साल पहले मैंने कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में लिखी थी।

रिश्तों का खोया हुआ टुकडा हूँ मैं

रिश्तों का खोया हुआ टुकडा हूँ मैं
आपने आप में एक दुखरा
किसी कह नही सकता
किसी की सुन नही सकता
कोई सुन ले मुझे, औरों का ताकता
मुखर हूँ मैं
रिश्तों का ..........
बीमार बच्चे सफ़ेद जहर पीते
टुकडों में रहते, टुकडों में जीते
शहर में सर्केश की रौनक है, यहाँ फिर भी विवाद लगा है,
सूद और मूल की रकम है, कितनी यहाँ मसला पड़ा है,
मेले में ज्यादा बिकते बेजान पशु है,भूखमरी एक कलंक
का टुकडा है
रिश्तों का .........
फिर भी भोग और योग में है होती तुलना
कर्र्ता साक्षी मिल कर कहते,असफलता से है जूझना
कुछ अर्से बाद उसी मंच पर, एक दूजे का कच्चा चिट्टा है खोलते
खो जाते है रिश्ते इन्ही दुख्रो में
इन्ही रिश्तों का खोया टुकडा हूँ मैं
रिश्तों का ..........

--सचिन केजरीवाल



मैंने कवितायें १७ - १८ की उम्र में लिखना प्रारम्भ किया। सभी बहिनों की शादी के बाद, अकेलेपन को दूर करने के लिए मैंने लिखा, और आज तक लिख रही हूँ पर कहीं भेजने की नहीं सोची। हिन्द-युग्म में कवितायेँ भेजने के लिए मेरी बेटी ने मुझे प्रोत्साहित किया। और फ़िर मैंने हिन्दयुग्म का सहारा लिया।

बदलता युग

वक्त गुजर गया
इंसान बदल गया
युग बीत गया
ईमान बदल गया
गरीब आज अन्न अन्न के
दाने को तरस गया
सरकार सोती रही
घर घर खून का
फुब्बारा बरस गया
बेबस माँ लाचार बहिन की
आशाओं पर अंधकार छा गया
फैला है ऐसा भ्रष्टाचार कि
इंसान ही इंसान को खा गया

--जया शर्मा



मेरी यह कविता उस वक्त लिखी गई थी जब मै दसवीं कक्षा में पढ़ती थी,लिखी तो और भी कई थी मगर यह सबसे पहली थी,जो बाद में २००६ में कुछ संशोधन के उपरान्त मरुपन्ना पिलानी व मेरी दिल्ली नामक अखबार में प्रकाशित हुई,जिसने मुझे साहस दिया और लिखने का,यद्यपि इसमें बहुत सी खामियाँ हैं फ़िर भी मुझे यह अति प्रिय है...इस कविता में संशोंधित पंक्तियाँ निम्न है...
ऎश्वर्या जैसी चाल रितिक जैसे बाल
चाहते है सारे आज माँ के ये लाल...

बच्चे और उनकी परवरिश

फ़ैशन की मारी है ये दुनिया सारी,
देश भर में फ़ैली रहे चाहे बेकारी।

हमारी सभ्यता,संस्कृति,परम्पराएँ सारी,
सिसक रही है पहन के छः मीटर साड़ी।

आधा मीटर कपडा़ काफ़ी हो गया है,
अच्छा खासा लहंगा मिनी स्कर्ट हो गया है।

किसको दे ताने किस पर लगायें लांछ्न,
खुद हमसे उजड़ गया है आज हमारा आंगन।

न जाने कैसी चली है ये हवा...
फ़ैशन में गिरफ़्तार है हर एक जवां।

ऎश्वर्या जैसी चाल रितिक जैसे बाल,
चाहते है सारे आज माँ के ये लाल।

आज युवा पीढी दिशाहीन हो गई है,
स्वतंत्रता की आड़ में बेलगाम घोडे़ सी दौड़ रही है।

दौलत ऒर शौहरत पाने की चाह में,
खो गये है, नैतिक मूल्य न जाने किस राह में।

आदर संस्कार जो मिले थे विरासत में,
गंवा बैठे है सभी कुछ परिवर्तन की राह में।

माना कि परिवर्तन है प्रकृति का शाश्वत नियम,
परंतु आगे बढने की चाह ने तोङ दिये सारे संयम।

तुलसी,रहीम,गुरुनानक किताबों में दफ़न हो गये है,
पढना लिखना छोड कर सब फ़ैशन शो में चले है।

माँ से मम्मी, पिता से डैड हो गये है,
अच्छे खासे बच्चे भी आजकल मैड हो गये है।

इसके लिये शर्मिंदा है वे सारे लोग,
जो बिगङते बच्चों पर लगाते नही रोक।

अगर माता-पिता की परवरिश हो अच्छी,
तो कैसे बिगङेगी बच्चो की ये उम्र कच्ची।

कुछ नही कर सकते ये सिनेमां-दूरदर्शन,
अगर बच्चो को मिले घर में थोरा सा मार्गदर्शन।

सुनिता (शानू)



'पहली कविता' में शतक के आगे का........ हाल







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - पहली कविता (भाग-6)

विषय-चयन - अवनीश गौतम

अंक - पंद्रह

माह - जून 2008





पिछले ही वृहस्पतिवार को 'पहली कविता' ने पहला शतक लगाया था और जैसे एक बल्लेबाज लम्बी पारी खेलने के लिए रन बनाने की गति कम कर देता है, थमकर खेलता है वैसे ही हम ज़रा थमकर इस बार मात्र १५ कविताएँ प्रकाशित कर रहे हैं।

चूँकि हम यह सप्ताह 'पिता सप्ताह' की तरह मना रहे हैं इसलिए हैडर को पितामय ही रहने दे रहे हैं। आज के बाद 'पहली कविता' ११५ की संख्या तक पहुँच गई है। अब तो हमें पूरा विश्वास है कि अभी तक जो कवि जो अपनी चुप्पी नहीं तोड़े हैं वे भी अब इस समर में कूदेंगे और अपनी पहली कविता भेजेंगे। पुरानी १०० कविताएँ पढ़ने के लिए नीचे का लिंक इस्तेमाल करें।





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*** प्रतिभागी ***
| आकांक्षा यादव | सी आर.राजश्री | निखिल आनंद गिरि | गीतिका भारद्वाज | मनीषा वर्मा |धर्म प्रकाश जैन | मीना जैन | अर्पित सिंह परिहार | प्रमेन्द्र प्रताप सिंह | श्रीमती पुष्पा राणा | उत्पल कान्त मिश्रा |
| विश्व दीपक 'तन्हा' | कुमार मुकुल | अवनीश गौतम | अनिता कुमार ।


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यूँ ही डायरी में अपने मनोभावों को लिखना मेरा शगल रहा है। ऐसे ही किसी क्षण में इन मनोभावों ने कब कविता का रूप ले लिया, पता ही नहीं चला। पर यह शगल डायरी तक ही सीमित रहा, कभी इनके प्रकाशन की नहीं सोची। फिलहाल तो देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में मेरी कविताएं प्रकाशित हो रही हैं, पर मेरी प्रथम कविता कादिम्बनी पत्रिका में ``युवा बेटी`` शीर्षक `नये पत्ते` स्तम्भ के अन्तर्गत दिसम्बर 2005 में प्रकाशित हुई थी।

युवा बेटी

जवानी की दहलीज पर
कदम रख चुकी बेटी को
माँ ने सिखाये उसके कर्तव्य
ठीक वैसे ही
जैसे सिखाया था उनकी माँ ने

पर उन्हें क्या पता
ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है
जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते
अपने आँसुओं को
चुपचाप पीना नहीं जानती है

वह उतनी ही सचेत है
अपने अधिकारों को लेकर
जानती है
स्वयं अपनी राह बनाना
और उस पर चलने के
मानदण्ड निर्धारित करना।

--आकांक्षा यादव



एक कवि चाहे कितनी भी कविता लिख ले वह अपनी पहली कविता को कभी नहीं भूल सकता जिसकी वजह से उसे काव्य-सृजन की प्रेरणा मिली है। आपने बिल्कुल ठीक कहा पहली कविता लिखने के बारे में मुझे भी जोश आ गया।
मेरे पिता जी मुझे कभी लड़की होने का एहसास नहीं होने दिया। मैंने अपनी पूरी पढ़ाई मध्य प्रदेश के भिलाई में की है। मेरे पिताजी मुझे हमेशा श्रीमती इंदिरा गांधी का उदाहरण दे कर मेरा हौसला बढ़ाते रहते और मैं भी उन्हीं को अपना रोल मॉडल मानती रही। जब उनकी मृत्यु हुई में बहुत रोई और सोचा कि मुझे अपने भावों को शब्दों में ढाल कर जरूर देखना चाहिए और मैंने उन्हीं पर अपनी पहली कविता लिखी जब में १९८५ में बारहवीं कक्षा में थी। वहीं से मेरे काव्य-सृजन की प्रक्रिया जारी है। मेरी कविता को मैंने कहीं नहीं छपवाया फ़िर कई छोटी-छोटी कवितायिएँ लिखी। जब मैं स्कूल में पढ़ा रही थी स्कूल मैगजीन के लिए प्रिंसिपल ने लिखने का आग्रह किया और मैंने भी अपनी पहली कविता दे दी और १९९१ को स्कूल मैगजीन में अपनी पहली कविता को देख कर बहुत अच्छा लगा। अपनी पहली कविता लिखने के अनुभव को प्रकट करने के लिए में हिंद युग्म की हृदय से सदैव आभारी रहूंगी।

इन्दिरा गाँधी

इन्दिरा गाँधी, इन्दिरा गाँधी,
तुम थी सब लोगों की प्यारी,
न केवल इस भारत देश में,
बल्कि सारे अन्य देश में।

जवाहर कमला की पुत्री बनकर,
पत्नी बड़ी लाड़ प्यार से,
रहती थी आनन्द महल में,
लिये भारत के प्रति जगह मन में।

जवाहर, गाँधी के बाद इन्दिरा आपने,
राह नई दिखाई हम सब को,
जो श्रद्धा भक्ति के दीप तुमने जलाये,
फर्ज हमारा उसे न कभी हम बुझाये।

इन्दिरा जी ने भारत के लिये अपने,
अमूल्य प्राण दिये,
इसलिये जब तक सूरज चाँद रहेगा
इन्दिरा जी आपका नाम रहेगा।

--सी आर.राजश्री




तीसरी क्लास में था तो एक बार "रेनी सीज़न' पर निबंध लिखना था....टीचर ने कॉपी पर लिखा "गुड, पोएटिक थौट्स..." शायद तभी से लगा कि थोड़ा सोच कर लिखने से सुकून भी मिलता है और तारीफ भी...फ़िर छठी या सातवीं में था तो झारखण्ड के अखबार "प्रभात ख़बर" ने कविता लिखो प्रतियोगिता शुरू की...दिए गए शब्द पर (हिन्दयुग्म के काव्य-पल्लवन जैसा) १६ पंक्तियों में कविता भेजनी होती थी और दिया गया शब्द शुरूआती पंक्ति में आना चाहिए .....उसमें जब भी भेजता, अक्सर कुछ न कुछ पुरस्कार जीत जाता...घरवाले तस्वीर देखकर खुश होते.... लेकिन मैं ही जानता हूँ कि कैसे सबसे छुपाकर कविता लिखी जाती थी और लिफाफा चुपके से, डर-डर कर,खरीदकर पोस्ट किया जाता था..आज भी अखबार की कटिंग्स सहेज कर रखी हैं.. देखता हूँ तो लगता है कि एक बार पीछे मुड़ कर हाथ बढाया तो शायद उन लम्हों में से कुछ हाथ में आ जाएँ...अखबार में भेजी गई पहली कविता थी "किलकारी" जो प्रकाशित नहीं हुई थी..

किलकारी

जब भी कोई किलकारी हूँ सुनता,
मंत्रमुग्ध मैं हो जाता हूँ,
उलटता हूँ अतीत के पन्ने,
उन्ही राहों में खो जाता हूँ...
मेरा एक बचपन था प्यारा,
गुज़रा था जो माँ की गोद में,
रोता था पहले पल में फ़िर,
अगला पल गुज़रता आमोद-प्रमोद में...
छोटे-छोटे दुःखडे होते थे,
सुख के फूल बिखरे होते थे,
भावुक इतना मन था मेरा,
पल-पल मेरे नैन रोते थे...
काश! कोई मेरा बचपन लौटा दे,
उससे जुड़ी मेरी सारी यादें,
खिलौने, गुडिया, मेरी गाड़ी प्यारी,
माँ की गोद में वो किलकारी...

--निखिल आनंद गिरि



लोग कहते है कि ना देखो तुन सपने,
पर मै कहती हूँ कि देखो तुम ये सपने
बडे सुन्दर थोडे अपने,
है चाह जो तेरे दिल मे और जज्बा है तुझमे
तो यकीनन ये होगे पूरे तेरे सपने

--गीतिका भारद्वाज



मैं १३ साल की थी जब मैंने यह कविता लिखी थी और तब से ही लिखती आ रही हूँ, पर कभी प्रकाशित नहीं की. पहली बार हिम्मत कर के अब कविता भेजी है.

बड़े बड़े शहरों की
छोटी छोटी गलियों में
ऊँचे ऊँचे महलों के साये में
कहीं गरीबी भी पलती है
बड़ी बड़ी इमारतों के नीचे
गरीब की झोंपड़ी में
भूख सोती है
अमीरों का जश्न जब गरीबों के
आँसुओं पर मनाया जाता है
उन छलकते जामों में
कहीं गरीब का खून सिसकता है
रोती कराहती गरीबी चीख पड़ती है
और एक गरीब की अर्थी पर दया का कफ़न पड़ता है
चिता की आग पर उधार का पानी सर चढता है
बेटी की इज़्ज़त बाज़ार में आँसू बहाती है
बेवा की चीखें ऊँचे महलों से उठते ठहाकों में
दब जाती है.

--मनीषा वर्मा



मैंने हिन्दी भाषा में पहली कविता 1970 में लिखी थी. आशा है आपको पसंद आयेगी।

निमंत्रणों में

निमंत्रणों में जीता मैं तेरी खुली बाहों के
तेरी मुस्कराहटों से मेरे पग बढ़ते हैं
निगाहों से कुछ एसी बातें होती
गीत लिखते तेरे होठों के थिरकने से

तेर मुलायम अलकों के झटकने से
मस्तिष्क का संत्रास हट जाता है
तुमने नहीं बाँधा इस जूड़े को क्यों
मेरा स्वर फिज़ाओं में बहक जाता है

कितना आशिकाना है तेरा मिज़ाज
चाहने वाले का प्याला भर देती हो
मदिरा मदिरा वह चिल्लाता है
मादकता से मग भर देती हो

तेरी खुली कलाई के व्युत्कृम घुमाव ने
तेरी गोरी बाहों ने सूनी निगाहों ने
मदहोश कर रखा है मन आशिक़ का
तन आशिक़ के बोल स्वर आशिक़ के

तेरे अंतर्मन की मधुर खुशबू ने
मायावी मन को भोला रूप दिया
धधकते हुए अंतर्द्वन्दित मानस को
शांत किया स्वसुबोध दिया

कितनी भंगिमाओं में मैं तुझको देखूँ
मदहोश नेत्र तुझे देख न पाये
समीप खड़ी सामने बैठी
ये नेत्र तुझे पहचान न पाये

मौन हुये हम बैठे रहे थे तब
अँधियारी रात्रि का होता था शोर
तुम तो मुस्काती थी मंद मंद
मुस्काती ओठों की कोर

रहस्यमयी बैठी रही तुम ,अव्यक्त
प्यार का कभी इज़हार न किया
प्याले पर प्याले भरे मदुरा के
प्याले का कभी स्वाद न लिया।

--धर्म प्रकाश जैन



यह कविता सन् १९६८ में लिखी गई थी ।सन् १९८० तक छिट-पुट लेखन चलता रहा। इसके बाद हिंदी में सक्रिय लेखन जारी है ।
मन करता है

मन करता है हर दिन
एक नई कल्पना लेकर
हृदय में एक नई भावना लेकर
हर दिन एक नई कविता लिखूँ
मन करता है हर दिन
नई-नई सी चित्रपटी पर
नई तूलिका नये रंग लेकर
हर दिन एक नई सी छवि बनाऊँ
मन करता है हर दिन
प्रीत की भावना मन में लेकर
नयनों में नूतन स्वप्न संजोकर
हर दिन नये-नये से मीत बनाऊँ
मन करता है हर दिन
नये- नये से स्वर संजोकर
नई सी ताल, एक नई धुन पर
हर दिन एक नया गीत गुनगुनाऊँ
मन करता है हर दिन
एक नई अभिलाषा लेकर
नई-नई सी आशा लेकर
हर दिन एक नया आदर्श सजाऊँ
मन करता है हर दिन
निज हृदय से कर स्नेह सिंचन
पावन मुस्कान से भर सूनापन
हर दिन अँधियारे पथ पर दीप जलाऊँ ।

--मीना जैन



ये मेरी पहली कविता तो नहीं, ये मैंने तब लिखी थी जब मैं १६ वर्ष का था..अभी मेरी आयु १९ वर्ष है..ये एक कवि और भगवान के बीच के संवाद को बतलाती एक रचना है.

नेता और भगवान

भगवान हमारी तपस्या से प्रसन्न हुए
हमारे सामने प्रकट हुए और बोले
माँग क्या माँगता है
मैंने कहा कितना अच्छा हो जाये
अगर देश के सभी नेता नष्ट हो जायें
भगवान ने उत्तर दिया, अगर ऐसा हो गया
तो तुम कवि भूखे मर जाओगे
अपनी कविताओं के लिये रोल माड्ल किसे बनाओगे
चमचागिरी करने वाले, न्यूज़ चैनल वाले, अखबार वाले
न जाने कितने बेकार हो जायेंगे
और देश में बेरोजगार की संख्या को और बढ़ायेंगे
मैंने कहा भगवान इस देश का क्या होगा
भगवान ने कहा जो होगा मंजूरे नेता होग
मैंने कहा ये जनता कहाँ जायेगी
आप ही हाथ झटक रहे हैं तो अपना दुखड़ा किसे सुनायेगी
भगवान ने कहा इस समस्या से मेरा कोई नाता नहीं
ये सब तुम्हारी ही देन है
कोई हिंदू कोई मुसलमान को सिख कोई ईसाई तो कोई जैन है
तुमन्हे इंसान, जमीन सबका बँटवारा कर दिया
ये हमार तो वो तुम्हारा कर दिया
अगर हुम तुम्हारी पहुँच से स्वर्ग नहीं बनाते
क्या मालूम तुम उस पर भी अतिक्रमण कर डालते

--अर्पित सिंह परिहार




पेड़ लगाओं पेड़ लगाओ
अपना जीवन और बढ़ाओ।
फिर धरती पर आयेगी हरियाली,
कहीं नही पड़ेगा सूखा।।
पेड़ हमें अन्‍न फूल फल देते,
फिर भी हम इन्‍हे काट देते।
पेड़ हमारे बहुत काम कें,
पेड़ लगाओं पेड़ लगाओं

जून, सन् 1993

--प्रमेन्द्र प्रताप सिंह



मैं बचपन में साधारण रुप से किसी नौकरी वाले के साथ शादी करना चाहती थी किन्तु मेरे घर वाले मेरी इस इच्छा को पूरी नहीं कर पाये. पारंपरिक रूप से मेरी शादी भी नहीं हो सकी. मेरे पिता ने अपने घर मेरे भाई की बहू लाने के लिये बदले मे मुझे माला पहनाकर भाई के साले को दे दिया, मैं उसके साथ वैवाहिक जीवन के कुछ ही दिन बिता पाई थी कि मेरे पति पेड़ से लकड़ी काटते समय पेड़ से गिर पड़े और रीड़ की हड्डी टूट गयी. मैंने उनकी सात वर्ष तक सेवा की. पति के देहावसान के बाद मैं भावनात्मक रूप से टूट चुकी थी और मुझे कोई सहारा नहीं दिखाई दे रहा था. अतः मैंने आश्रम में जीवनयापन करने का निश्चय किया. इसी दौरान मुझे एक ऐसा आदमी मिला जिसने बहन के रूप में जीवन भर सहारा देने का प्रस्ताव रखा, मेरी पढ़ाई प्रारम्भ करवाई. मुझे लगा कि इस तरह के रिश्ते में शायद साथ-साथ रहना संभव न हो सके. अतः हमने पति-पत्नी के रूप में ही साथ रहने को उचित समझा. किन्तु हम दोनों के स्वभाव में भिन्न्ताओं के कारण उसके साथ भी रहना सम्भव न हो सका. ओपन स्कूल से दसवीं व बारहवीं की और वर्तमान में राजकीय महाविद्यालय बडकोट जिला उत्तरकाशी उत्तराखण्ड से स्नातक द्वितीय वर्ष की नियमित छात्रा हूँ.

किसका था इन्तजार?

थी बसन्त की भोर
उर में मचा था शोर
दिल बहलाने निकली
जंगल की ओर
किसका था इन्तजार?
छिन्न-भिन्न हो रहे थे
स्मृतिओं के तार
पहाड़ी पर खिले थे बुरांश
झूम रहे थे नाच रहे थे मदमस्त
उठ गये मेरे हाथ
लगाने को वेणी में पुष्प
मना किया उसने हिलाकर माथ
अचानक हवा हो गयी बन्द
बादल आ गये चन्द
कविता के हों ज्यों छ्न्द
वर्षा की रिम-झिम से
तन भीगने लगा
स्मृतिओं के घन से
मन सीझने लगा
पेड झूमकर झांकने लगे
गुन-गुन करते भंवरे
मुझे आंकने लगे
चल पडी हवा धूप निकल आई
कोयल ने भी आवाज सुनाई
किसका था इन्तजार?
मैं समझ न पाई.

--श्रीमती पुष्पा राणा



भावों का संप्रेषण करने को एवं एकाकीपन के अहसास को भ्रिन्गुरित करने को कब कागज पर शब्दों को उकेरना शुरु किया ख़ुद को भी पता नहीं चल पाया। कुछ लोगों नें कहा यह कविता है तो भागा भागा परम पूजनीय पिता के पास पहुँचा। तब से शुरू हुई साहित्य सीखनें की क्रिया तो आज तक चल रही है। वर्तमान में दिल्ली में विपणन के कार्य में संलग्न।

जीवन संग्राम

हे रति
एक बार पुनश्च
तुझको नृत्य करना होगा
कमादग्नी का काम लास्य
तुझको फिर से धरना होगा
पिनाकिना का शक्ति उन्माद
नाग फनी सम करता निन्नाद
भग्न्मनोर्था हो रही सती फिर
काम देव का निकट विनाश
गर्वोन्मत्त शव का शिव हास
त्रिनेत्र किन्तु हा ! अंध भास
काम देव के दग्ध पुष्प वाण
जज्ज्वल, विदेह फिर तेरा नाथ
शक्ति धरती है विद्रूप रूप
यही मही का सत्य स्वरूप
तप ताप से विदग्ध धाम
पशुपति में करो प्रेम विधान
हे रति
गर्भित कर दो नृत्य प्रधान .......
अरी मेनका .....
धर लो सोलह श्रिंगार भाव
निर्निमेष हठधर्मी सम बैठा
चिदाकाश धारे विश्वामित्र अकेला
प्रीथ्वी की चिंता रेखाओं का
स्वर्ग लोक में वितान हुआ
हस्त कम्पन मैं वज्र हुआ
ऐरावत भी सहम रहा
शुक्र, गुरु स्तब्ध हुए
एक बार पुनश्च
भय का अवसान हुआ
री मेनका .....
याद तेरी अब आई
अरी वासना की व्याली
लास्य नृत्य मुद्रा वाली
रति मही पर सबको भाई
अहम्, शक्ति, भय, वासना
मोह, जीवन के आधार
भू धारा शमशान किया
सदियों से, क्या पाया ....
रे मानव .......
अब तो बुद्ध बनो ....... !!!!

--उत्पल कान्त मिश्रा



मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है कि मेरी पहली कविता कौन-सी है। एक पुरानी डायरी पड़ी है मेरे पास, इसलिए उसकी पहली कविता को हीं अपनी जिंदगी की पहली कविता मानने को विवश हूँ, जबकि मुझे ज्ञात है कि मैने इस कविता को लिखने से पहले लगभग ५०-६० कविताएँ लिख डाली थीं। अब यह अलग बात है कि वे सारी कविताएँ बालपन की कविताएँ है, जो मैने जूता, चप्पल, पेड़, पौधों पर लिखी थीं। वैसे जो कविता मैं प्रस्तुत करने जा रहा हूँ , वह भी एक बच्चों वाली हीं कविता है और शायद इसे मैने अपनी आठवीं कक्षा में लिखा था।

दीनता:एक अभिशाप

वातावरण था अत्यंत नम,
छाया चारों ओर था तम,
सभी घरों के बंद किंवाड़,
सड़कों पर व्यक्ति थे कम।

गिर रहे थे हिम-कण,
कर अतिशीत रूप धारण,
और उर भी काँप रहा था,
ठंढ उजागर या गोपन।

तभी कोने में दीख पड़ा वह,
ठंढक को रहा था सह,
वस्त्र भी थे फटे हुए,
जमे देह पर तुषार के तह।

उसकी ओर न किसी का ध्यान,
न दृष्टिधारी पूत पावन,
सूखे घासों को जलाकर,
किसी तरह बचाता जान।

पीठ से पेट था सटा हुआ,
था समाज से कटा हुआ,
लेकिन अधर्मी नहीं था वह,
धर्म पर था डँटा हुआ।

गली का कोना कक्ष-शयन,
झुके हुए थे उभय-नयन,
उसके समीप था एक श्वान,
जो भूख से करता क्रंदन।

चार शतक हीं देखा जीवन,
लेकिन नहीं थी आशा-किरण,
नीरव, अकेला पड़ा वह,
जैसे इंतजार करते भगवन।

मुख था मक्खियों का आलय,
पैर सिकुड़े ठंढ के भय,
कर भी साथ नहीं देते,
अवस्था थी पूर्ण दयनीय।

शरीर में जमने लगा रूधिर,
जैसे निर्दयी बना हो शिशिर,
इसकी अवस्था देख आज,
भगवन भी गए सिहर।

अंतत: दीन ने पाया परलोक,
कोई नहीं था, जो करे शोक,
कुछ उरधारी खोले किंवाड़,
पर ठंढ ने उनको दिया रोक।

--विश्व दीपक 'तन्हा'




मां सरस्‍‍वती

मां सरस्‍वती! वरदान दो
कि हम सदा फूलें-फलें
अज्ञान सारा दूर हो
और हम आगे बढ़ें
अंधकार के आकाश को
हम पारकर उपर उठें
अहंकार के इस पाश को
हम काट कर के मुक्‍त हों
क्रोध की अग्नि हमारी
शेष होकर राख हो
प्रेम की धारा मधुर
फिर से हृदय में बह चले
मां सरस्‍वती! वरदान दो
कि हम सदा फूलें-फलें!

मां सरस्‍वती - शुद्ध गद्य है - यह कविता कैसे हुई। एक प्रार्थना मात्र है।इसे गद्य की तरह पढ़ें। क्‍या गद्य को तोड़-तोड़कर मुद्रित कर देने से ही कविता हो जाती है मात्राएं भी सब पंक्तियों की एकसी नहीं हैं:15,13,14,12 - यह पहली चार पंक्तियों की मात्राएं हैं - छन्‍द भी ठीक नहीं - डॉ.प्रभाकर माचवे/3-1-88

.............. यह मेरी पहली कविता है , निराला की 'वर दे वीणा वादिणी वर दे' का असर था मन पर उसी को ध्‍यान में रख मैंने अपने ढंग से यह कविता लिखी थी जिस पर माचवे ने यह टिप्‍पणी की थी

--कुमार मुकुल


ये उन दिनों की बात है जब दूरदर्शन पर एक ऐसा सीरियल आता था जिसमें जहाँ तक मुझे याद है साहित्यकारों का बचपन दिखाया जाता था। इस कार्यक्रम का नाम अभी मैं भूल रहा हूँ। ५ दिसम्बर १९८९ को शायद सुकुमार राय (प्रसिद्ध बंगाली साहित्यकार) के बारे में बताया जा रहा था, उस सीरियल में सुकुमार राय को कक्षा के अध्यापक द्वारा कविता लिखकर लाने को कहा जाता है जोकि स्वयं की लिखी हो। सुकुमार बच्चा हैं, कैसे लिखें? समझ नहीं आता। उनके परिवार का कोई सदस्य कहता है कि जैसा तुम देखते हो वैसा ही लिख दो। उसी बात से प्रेरित होकर मैंने कविता लिखने की ठानी और उसी दिन कविताएँ लिखी, पहली आपकी नज़र कर रहा हूँ।

चित्र

सुना है-
चित्र समाज के दर्पण होते हैं
यथार्थ के लकीरों पे खिंचे हुए
मुझे भी एक चित्र बनाना है
चटकीले रंगों से सजाना है।
लेकिन यह क्या
मेर चटकीले रंग तो कहीं खो गये हैं
या फिर नफ़रत के धुएँ से काले हो गये हैं।
मेरी तूलिका में रह गये हैं
अंधकार को दर्शानेवाले
कुछ रक्तोच्छिष्ट रंग?
लेकिन
जानता हूँ मैं कि-
मेरी कृति लोकप्रिय होगी
क्योंकि
लोग नहीं चाहते हैं देखना
वही पुराने फीके
प्रेम
त्याग
सहिष्णुता
अहिंसा के रंग
अब उनकी बदली आँखों को अच्छे लगते हैं
साम्प्रादयिकता के
घृणा के
स्वार्थसिक्त हिंसा के
गढ़े गाढ़े उष्ण रंग
क्योंकि लो तो विभ्रान्त हैं
अरण्य के मरुस्थल की मृगतृष्णा में!
विराट सी मृगतृष्णा में!!
उन्हें नहीं मालूम
दूर से प्यारे लगने वाले ये रंग
कितनी अमा, विनष्टि और भयानकता किये हैं अंतर्मुक्त
क्योंकि
लोग तो स्वयं मृग हैं
और उन्हें यह भी नहीं मालूम
कि उनके हरे-भरे वन से उलझाकर
मृगतृष्णा में चाँदी का सा आभास देते
निर्जन, तपते मरुस्थल में
क्यों हाँका गया है
लेकिन जानता हूँ मैं
कि अब उस वन में
सफेद रंग से पुते बनेंगे काले भव्य अड्डे
उसी वन की छायांका हरीतिमा में
और मुझे यह सब दिखाना है
मुझे एक चित्र बनाना है।

--अवनीश गौतम



बहुत दिनों से हिन्द-युग्म से निमंत्रण आ रहा था कि अपनी पहली कविता भेजें। चाह कर भी हम ये निमंत्रण स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। हमने पहली कविता स्कूल के दिनों में लिखी थी शायद नौवीं क्लास में थे। कविता कहना भी उसे ठीक न होगा क्यों कि वो हमारे कोर्स में लगी सरोजनी नायडू की एक अंग्रेजी की कविता की पैरोडी थी, उसका शीर्षक था "राम रे राम, आई शैल डाई" अब ये तो याद नहीं कि सरोजनी नायडू ने ये शीर्षक अपनी कविता को क्यूँ दिया था लेकिन हमने इस कविता की तर्ज पर अपनी परीक्षा के डर को जाहिर किया था। खैर वो तो बात आयी गयी हो गयी। सब लोग खूब हंसे थे, बस इतना याद है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र की सीढ़ियां चढ़ने लगे तो जैसे सबकी जिन्दगी में होता है हमारे साथ भी वही हो रहा था। हम अक्सर मन ही मन भगवान से बातें किया करते थे ( अब भी करते हैं ) तो उसी समय की हमारी पहली हिन्दी कविता यहां पेश है।

अस्तित्व

जब से तुमसे पहचान हुई है
मैं कुछ न कुछ मांगती आई हूँ
सभी मांगते हैं,
शर्म कैसी?
कभी तुम दे देते हो
कभी मुंह फ़ेर लेते हो
जब देते हो तो मैं
प्रथानुसार
धन्यवाद करने तेरे दर पर चली आती हूँ
जब नहीं देते तो?
तो ये सोच कर के मेरे मांगने में ही कमी थी
खुद को दोषी ठहरा देती हूँ
मगर ये बकवास है दिल की
वर्ना
दिमाग ये सोचत है
कि मांगने में भी क्या
कमी रह जाती है
जब हाथ फ़ैलाया है
तो फ़ैलाया है
चारों उंगलियां खोली हैं
और अजुंली बनायी है
बाकी तो तुम्हें रखना है
हथेली पर
इसमें कमी मांगने की हुई
या देने की?
पर जाने दो
तुम जगपिता हो
सर्वदाता
तुम्हें गलत कहने का
क्या अधिकार मुझे
कोई मायने भी नहीं रखता
फ़िर भी मेरी संस्मरणावली में
बचपन की कोई ऐसी कोई याद नहीं
जब मैने कुछ मांगा हो
और तुमने दिया हो
शायद! मैं एहसानफ़रामोश हूँ
मन भटकता है
आस्था कण कण कर टूटती है
फ़िर भी
ये इतनी बड़ी है कि
कण कण कर टूटे तो भी
मेरी जिन्दगी चुकने से पहले
इसका अस्तित्व न मिट पायेगा।

--अनिता कुमार



30 कवियों को हमारी भेंट


'पहली कविता' के आयोजन के बाद प्रतिभागियों और सहयोगियों दोनों का आगे बढ़कर के आने ने हमें बल दिया और २० की संख्या से आगे निकलकर पिछले गुरुवार को १०० की संख्या पर पहुँच गये। 'पहली कविता' के तीसरे अंक के प्रकाशन के साथ हमने यह उद्घोषणा की थी कि मई माह ३० भाग्यशाली प्रतिभागियों को डॉ॰ अहिल्या मिश्रा और डॉ॰ रमा द्विवेदी द्वारा संपादित साहित्यिक पत्रिका 'पुष्पक' की एक-एक प्रति भेंट करेंगे। हमने निम्नलिखित प्रतिभागियों को यह पुस्तक भेंट करने का निश्चय किया है-

संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
ब्रह्मनाथ त्रिपाठी 'अंजान'
मैत्रेयी बनर्जी
सतीश सक्सेना
राहुल गडेवाडिकर
मधुरिमा गुल
कुसुम सिन्हा
स्वाति पांडे
अशरफ अली "रिंद"
ममता गुप्ता
रजत बख्शी
राजिंदर कुशवाहा
यश छाबड़ा
एस. कुमार शर्मा
शुभाशीष पाण्डेय
शिफ़ाली
अविनाश वाचस्‍पति
सोमेश्वर पांडेय
सविता दत्ता
देवेन्द्र कुमार मिश्रा
रश्मि सिंह
विजयशंकर चतुर्वेदी
आदित्य प्रताप सिंह
अमित अरुण साहू
मंजू भटनागर
कु० स्मिता पाण्डेय
ममता पंडित
समीर
लवली कुमारी
राहुल चौहान

सभी विजेताओं को बधाई और अनुरोध कि कृपया अपने मित्र कवियों से 'पहली कविता' भेजने को कहें ताकि हर कवि की प्रथम रचना इस मंच पर लाई जा सके।

पहली कविता का पहला शतक







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - पहली कविता (भाग-5)

विषय-चयन - अवनीश गौतम

अंक - पंद्रह

माह - जून 2008





मई महीने के पहले सप्ताह से हिन्द-युग्म ने प्रत्येक वृहस्पतिवार को कविताकारों की 'पहली कविता' को प्रकाशित करना शुरू किया। और अब तो धूम सी मची हुई है। 'पहली कविता' का यह शतकीय अंक है। हिन्द-युग्म को खुशी है कि धीरे-धीरे यह इंटरनेट पर विचरते सभी हिंदी कवियों की पहली कविताओं को एक-एक करके प्रकाशित कर रहा है। हमें उम्मीद है कि 'पहली कविता' का काव्य-पल्लवन रूपी बल्लेबाज अपना दोहरा शतक भी लगायेगा। शुरू के अंकों में कुछ कवियों ने अपनी 'पहली कविता' के लिखने की भूमिका (पृष्ठभूमि) नहीं भेजी, लेकिन अब रचनाकारों को कविता के साथ उसकी भूमिका का सौंदर्य समझ में आने लगा है, इसलिए इस बार कविताओं से अधिक भूमिकाएँ रसपूर्ण है। उम्मीद है कि आपको 'पहली कविता' का यह पाँचवा भाग आपको अवश्य पसंद आयेगा। २०-२० कविताओं के पिछले चार अंक आप निम्न सूत्रों से पढ़ें-






इस बार का थीम हैडर हिन्द-युग्म के नये डिजाइनर राहुल पाठक ने बनाया है।

जिन्होंने अभी तक अपनी 'पहली कविता' नहीं भेजी है, अब तो उनमें जोश आ जाना चाहिए। आप अपनी पहली कविता रूपी गेंद फेंकिए, हम काव्य-पल्लवन में रन जोड़ते जायेंगे। अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें।

आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| पूर्णिमा वर्मन | कमला भंडारी | आशीष जैन | प्राजक्ता | दिनेश पारते | सुनीता यादव |भूपेंद्र राघव | हेमज्योत्सना पराशर | राजीव रंजन प्रसाद | गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" | तनु शर्मा | श्याम सखा 'श्याम' |
| बेला मित्तल | तरुश्री शर्मा | मेनका कुमारी | संजीव कुमार बब्बर | अरविंद चौहान | सुनील डोगरा ’जालिम’ | गीता मोटवानी | पूजा उपाध्याय |


~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~




पहली कविता कब लिखी वह तो ठीक से याद नहीं है पर पहली जो कविता छपी वह याद है। उस समय में छठी कक्षा में पढ़ती थी और वह कविता पाठशाला की पत्रिका के लिए लिखी थी। पाठशाला में किसी ने विश्वास नहीं किया था कि कविता मैंने खुद लिखी है और मैंने भी नहीं बताया था कि मैंने खुद लिखी है। बहुत सी रचनाएँ हिन्दी अध्यापिकाएँ खुद ही लिखती थीं। कुछ रचनाएँ छात्राओं के माता पिता जो भी रचनात्मक रुचि रखते थे लिख भेजते थे और छात्राओं के नाम से छप जाती थीं। इस कविता के छपने के बाद पहली बार मेरे माता पिता को पता चला था कि मैं कविता लिख सकती हूँ।

बात एक पेरेंट टीचर मीटिंग की है जब मेरी अध्यापिका ने मेरी माँ को बधाई दी, "आपकी कविता बहुत अच्छी थी जो पूर्णिमा के नाम से हमने छापी।"
मेरी माँ दंग! बोलीं, "मैं तो कविता लिखती नहीं। हाँ सालाना पत्रिका में देखी ज़रूर थी पूर्णिमा के नाम से पर मुझे लगा कि आप लोगों ने उसके नाम से लिख दी होगी।"
"अच्छा तो क्या कविता तुमने खुद लिखी थी?" अध्यापिका ने मुझसे पूछा।
मैंने हाँ में सिर हिलाया पर इस बात से मुझे कोई खुशी या गर्व नहीं महसूस हुआ था। शर्म से मैं माँ की साड़ी के पल्ले (पल्लू) में छुप गई थी। बाद में मेरी हिन्दी की अध्यापिका ने कविताओं को कॉपी में लिखकर सहेजने की सलाह दी थी। सो उसके बाद की कविताएँ मेरे पास हैं। कविता थी---

देश हमारा आँख का तारा

देश हमारा आंख का तारा,
हम सब इस पर हों कुर्बान।
जय जय भारत देश महान।

इसी देश पर अमरतिरंगा
लहर लहर लहरा कर के
इसी देश में गंगाजमुना
कल कल नीर बहा कर के
हमें ज्योतिमय राह दिखाएं
करें हमारा ही कल्यान।
जय जय भारत देश महान।

जिसको सबने सदा दुलारा
इसी देश पर ताज है प्यारा
सारे जग का एक सितारा
काश्मीर हैसदा हमारा
सदा बढाएंगे हम भारत
तेरे यश का गौरवगान।
जय जय भारत देश महान।

-पूर्णिमा वर्मन




जब कश्मीर युद्ध चल रहा था तब एक दिन मैं शाम के समय टी.वी पर एक
कार्यक्रम देख रही थी । सब लोग कश्मीर युद्ध पर कुछ न कुछ सुना रहे थे ।
तभी दिमाग मे ख्याल आया की क्यों न मैं भी कुछ लिखूं क्युकी लिखने का शौक
तो मुझे था ही पर पहले या तो शायरियाँ लिखती थी या किसी किताब मैं से कुछ
भी अच्छा लगता था तो उत्तार लेती थी ।


हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की लड़ाई थी
दोनों ही तरफ़ के सैनिकों ने
अपनी - अपनी जान लड़ाई थी
अचनाक दुश्मन लाइन आफ कंट्रोल पर पहुँचा तो
अपने सैनिक ने भी उसे धर दबोचा
बोला आज तुझे मारुंगा और
तेरे खून से अपने देश की प्यास बुझाऊंगा ,
दुश्मन डर गया और बोला
थोड़ा सा अपने मन को मोड़ लो
मेरे प्यारे भाई मुझे छोड़ दो
जाने कौन सी हवा चल गई
अपने प्यारे सैनिक को दया आ गई
सैनिक बोला ठीक है छोड़ दूंगा
तेरे लिए अपना मन भी मोड़ लूँगा
पर मेरी भी एक शर्त है
मान ले यदि तू एक मर्द है
दुश्मन मन ही मन मुस्कान
सोचा ये इसकी भूल है
और बाहर बोला मुझे सब मंजूर है
इत्तिफाक से अपना सैनिक एक कवि था
उसका कवि मन जागा और
इधर - उधर भागा
उसने दुश्मन को कविता सुनाई
दुश्मन की सारी इन्द्रियाँ झ्न्नाई
दुश्मन को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था
फिर भी सैनिक के गुण गाये जा रहा था
उम्मीद थी की कभी तो कविता ख़त्म होगी
और उसके दिल की इच्छा भी पूरी होगी
इतने मैं कवि बोला
अरे ! मेरा साहस तो बढ़ाओ
जरा जोर - जोर से तालियाँ तो बजाओ
कवि अपनी कविता सुनाता गया
दुश्मन से तालियाँ बजवाता गया
उसने दुश्मन से ताली बजवाई तबतक
ताली बजाते - बजाते दुश्मन की
जान नही चली गई जबतक
इसतरह सैनिक ने दुश्मन को मिटाया
अपने सैनिक होने का फ़र्ज़ और
कवि होने का गर्व
दोनों को साथ - साथ निभाया ।

--कमला भंडारी




ये कविता या उससे मिलती-जुलती चीज मैंने पिछले दिसंबर में रात को सोने से पहले लिखी थी। शब्द कहां से आए, मुझे नहीं पता। शायद उस रात किसी ने उधार दिए थे। उन्हीं के सहारे छोटी सी और पहले-पहल कोशिश की थी।


चल चला चल
कोई नहीं है तेरा,
तू हंसता चल।
राह के साथी के,
दर्द में फंसता चल।।
मंजिलें मिलेंगी तुझे,
ना घबरा।
तूफानों में फंस,
मझधारों से निकलता चल।।
खूब हंस,
नाच ले, झूम ले।
दिल तोड़ दे कोई,
तो सिसकता चल।।
दूर है किनारा,
सेहरा में फंस गया।
लेकर दिल के अरमां,
मचलता चल।।
मिले खुशियां,
तरक्की, शोहरत।
राह भर फिर तू चहकता चल।
इंसां है तू भी,
दर्द होता है।
जाम बनके,
तू भी होठों से छलकता चल।।

--आशीष जैन

>


संगीत

प्राणो का आधार यही है,
जीवन की झंकार यही है,
हर कण में संगीत बसा है,
परमेश्वर का प्यार यही है

सात सुरों की मधुरिमा का,
अप्रतिम विस्तार यही है,
भावनाओं की अभिव्यक्ति का,
स्नेहमय संसार यही है,

हृदय का स्पंदन हृदयंगम हैं,
श्वांस में सुरों का संगम है,
हर तार की हर तरंग में,
जीवंतता की नयी उमंग है

तमस को ज्योति स्वरूप दे,
ऐसा 'दीपक' राग यही है,
प्राणों की तृष्णा को तृप्ति दे,
राग 'मेघ मल्हार' यही है

धर्म जाति में भेद ना जाने,
संकीर्णता का उपचार यही है,
प्रेम ही बाँटे, प्रेम सिखाए,
भावनाओं का अंबार यही है

मनुजता का आभूषण है
मनुज का उद्धार यही है
असहिष्णुता की आँधी में,
अचल अडिग दीवार यही है

सुख की आँधी, दुख की वर्षा,
हर मौसम का प्यार यही है
जीवन के हर मोड़ की व्याख्या,
करता हर 'आकर' यही है

जीवन सीमाओं से मुक्त है
क्षितिज के उस पार यही है
आत्म-परमात्म के संबंधों का,
विस्तृत आधार यही है

ज़ीवन की लयबद्धता का,
सृजन का सब सार यही है
संगीत से जीवित हर कण है
संगीत बिना संसार नही है !

--प्राजक्ता




बात सैनिक स्कूल रीवा (म. प्र.) में आठवीं कक्षा की है। पाँचवी कक्षा तक गाँव में पढा़ई करके के कारण मेरी स्पीकिंग इंग्लिश अच्छी नहीं थी। अंग्रेजी के अध्यापक मुझे उलाहना देते थे कि मेरी बोलचाल की अंग्रेजी अच्छी नहीं है फिर भी मैं अच्छे मार्क्स कैसे ले आता हूँ ! यह कविता लिखकर मैंने अपने आपको दृढ़ प्रतिज्ञ किया था और फिर अगले वर्ष डिबेट कॉम्प्टीशन में प्रथम स्थान पाप्त किया था। मुझे पता है कि यह कविता अपरिपक्व है मगर इसी ने मुझे परिपक्व बनाया था। पहले मुझे इसे भेजने में थोडी़ झिझक हो रही थी फिर बाद में सभी लोगों की रचनायें देखने के बाद थोडा़ बल मिला। मुझे मेरी पहली कविता याद दिलाने के लिये ’हिन्द-युग्म’ का आभार।


कर्कश वचनों पर ध्यान न दे
मीठी बातों को सुनता जा
ग़म के काटों की चुभन देख
और फूल खुशी के चुनता जा

थककर जो तू बैठ गया
कुछ भी होगा हासिल कैसे
बिन किये जतन अब तू ही बता
मिल पायेगी मंज़िल कैसे
जो पाना है बेदाग रुई, तो मलिन कपास को धुनता जा !
ग़म के काटों की चुभन देख, और फूल खुशी के चुनता जा !

रोडे़ तो आयेंगे ही
हर राह पर, हर बाट पर
चट्टानें हैं सुख-दुख के
जीवन सरिता के घाट पर
दम साध, कमर कस, आगे बढ़, किस्मत के जाले बुनता जा !
ग़म के काटों की चुभन देख और फूल खुशी के चुनता जा !

--दिनेश पारते




मेरी पहली कविता का उदगम धरातल एक छोटी -सी बच्ची से जुडी भावना है जो मेरे अंतरात्मा को छेड़ने में समर्थ रही जिसे मैंने चर्म चक्षु से देखा , भाषा का सहारा दिया ..कविता का शीर्षक है...

कजरी का दुःख

मालकिन छोटी -सी पतंग दे गई थी,
पल भर की खुशी उधार दे गयी थी,
पतंग लिए कजरी बावरी हुई थी,
मगन होकर आसमान निहारी थी .
छत पर चढी थी , दीवानी बनी थी
पल भर की खुशी को जिए जा रही थी ,
पल भर की खुशी को जिए जा रही थी ,
चैत की साँझ मेहरबान न थी
घास से भरी खुली जमीन भी न थी
चक्कर काटती पतंग हवा में
एंटीना के तार में लटक गयी थी ...
न रो सकी थी , न निकाल सकी थी,
चुप-चाप पतंग को निहारी जा रही थी ,
टूटे धागे को लपेटती जा रही थी ,
एंटिना के सामने रोई जा रही थी ...
और एंटीना ?
पल भर की खुशी का चित्र न खींच पाई थी ,
न कजरी की आवाज़ को पहुँचा पाई थी ,
बालमन के कमजोर द्वार को खोल न पाई थी ,
उसके दुःख से जुड़ी कोई कविता सूना न पाई थी ,
उसके दुःख से जुड़ी कोई कविता सूना न पाई थी .

--सुनीता यादव




दोस्तों मैं 14-15 साल का रहा होऊँगा 10वीं कक्षा में था 1989 की बात है भूत सवार हुआ था
फिल्मी गाने लिखने का, लिखे भी बहुत गाने, अभी भी याद आ जाते है उनके कुछ मुखड़े कभी कभी जैसे :-
'किधर चली ओ जानेमन ये मस्ताना रूप लिये
बाइस कैरट का हुस्न लिये गालों पर खिलती धूप लिये
रुक जा.............. मै भी आता हू....'
पर वो कॉपी कहीं खो गयी या फिर कोई रद्दी वाला अथवा चाट वाला ले गया काफी तलाश की
मगर मिली नहीं उसी में शायद दूसरे या तीसरे नम्बर पर यह कविता थी जो मुझे याद है तभी
से क्यूँकि इसको मेरे दोस्त मुझसे बार बार सुना करते थे तो याद रह गयी बाकी और भी आंशिक
याद हैं मगर ये पूरी याद है..अब इसको मेरा सौभाग्य कहें या इस कविता का..
इस कविता को लिखने की प्रेरणा मुझे फिल्म 'एक फूल दो माली'के एक सीन को देखकर मिली

कविता से पहले सभी श्रीमतिओं से अग्रिम क्षमा याचना.....


ओ रब्बा मेरी आफत आई

हे भगवान खैर कर....
मुझे बचा ले, वरना मैं मर जाऊँगा
अभी तो सत्तर साल का ही हूँ
इतनी जल्दी जिन्दगी से किनारा कर जाऊँगा..

ओ रब्बा..... मेरी आफत आई
मुझे बचा ले मेरी आयी तबाही....
मेरी घरवाली
काली महा-काली
ऐसी है मोटी
अरे तन्दूरी रोटी
कभी सैंडल मँगवाती
कहे कभी शूज, हवाई.....
ओ रब्बा..... मेरी आफत आई

रोज बाजार जाये
सौ का नोट उड़ाये
पैर पैदल ना धरती
हमेशा चरे इमरती
कहीं पर कटिंग कराती
कहीं लगवाती डाई........
ओ रब्बा..... मेरी आफत आई

जब भी घर में आये
एक तूफान लाये
कहे छोड़ो हे कीर्तन
उठो अब मांझो बर्तन
मैं हारी थकी आयी हूँ
करो ये साफ कढ़ाई......
ओ रब्बा..... मेरी आफत आई

करके सैर सपाटे
सोये लेकर खर्राटे
मैं ठंड में मारा फिरता
अटक चप्पल से गिरता
वो सुकूं से सोती रहतीं
ओढ़कर नर्म रजाई
ओ रब्बा..... मेरी आफत आई

बैंक बेलेंस उजड गया
बलि मैडम की चढ़ गया
कहाँ से लाऊँ पैसा
कि खर्चा हाथी जैसा
और एक हथनी घर में
पली है मेरे भाई.......
ओ रब्बा..... मेरी आफत आई

शर्म के मारे भाई
बात नही जाये बताई
कि एक दिन बैंत पकड़कर
मैं बोला जरा अकड़कर
लो पासा उल्टा पड़ गया
मेरी जब हुई पिटाई......
ओ रब्बा..... मेरी आफत आई
मुझे बचा ले मेरी आयी तबाही....

--भूपेंद्र राघव




यह कविता मेरी पहली कविता है , जो मैंने कक्षा 11 (1999) में लिखी थी। इस कविता को मैंने एक व्यक्ति विशेष पर , उनके व्यवहार पर लिखी थी| जब मैंने इसे अपनी इंग्लिश टीचर को सुनाया था तब उन्होने इसमें एक परिवर्तन करवाया था ।
मैंने इसमें महान शब्द के स्थान पर भगवान शब्द लिखा जिसे मेरी फ़ेवरेट इंग्लिश टीचर ने यह कह कर हटवाया के भगवान की ये परिभाषा नहीं हैं। और तब से मैंने शब्दो का सही प्रयोग करना सीखा ।

धन है तो मन है ,
ज्ञान है तो सम्मान है ,
चरित्र है तो इन्सान है ,
नहीं है असत्य तो ड़र भी नहीं है ।
जिसमें है ये सभी , वही तो महान है, वही तो महान है ।
अहिंसा बिन मानव नहीं ,
प्यार बिन मानव नहीं ,
आत्मा बिन मानव नहीं ,
वह तो पशु समान है ,
जिसमें है ये सभी , वही तो महान है, वही तो महान है ।

--हेमज्योत्सना पराशर




मेरी पहली कविता एक रोचक घटना की परिणति थी और चूंकि तब की विद्यालय पत्रिका में प्रकाशित हुई थी अत: मेरे संग्रह में बची भी रही। बस्तर प्रांत के छोटे से नगर बचेली में रेडियो पर प्रसारित होना तब बडी बात मानी जाती थी। हमारे पडोस में ही विज्ञान के अध्यापक श्री शिव कुमार 'शिवेश' डहरिया रहते थे, जिनकी कविता रेडियो में सुन कर मेरे मन में कवि हो जाने की उत्कंठा हुई। तीसरी कक्षा का छात्र क्या कविता लिखता और मास्टर साहब भी क्या समझाते कि कविता कैसे लिखी जाती है, अत: मेरी स्वाभाविक जिज्ञासा को उन्होने हमेशा टाल ही दिया। किंतु कवि बनने की ललक तो थी ही। मैं एक दिन चुपके से उनकी डायरी चुरा लाया। घंटो पन्ने उलटे-पलटे, किंतु मेरी समझ में कुछ आता तब था। अंतत: मैने यह बात अपनी माता जी को बता दी। बिना यह जाने कि मेरा उद्देश्य कविता लिखना सीखना है, मुझे डायरी की चोरी पर झंन्नाटेदार थप्पड पडा और डायरी माफी माँग कर लौटाने की नसीहत दी गयी। मैं डरते डरते शिवेश सर के पास पहुँचा और माफी माँग कर अपनी गलती कारण सहित बता दी। वे मुस्कुराये और बोले कविता लिखना बेहद आसान है। बस तुक मिलाते चलो, जैसे राम के साथ श्याम, सीता के साथ गीता या पपीता।
यह गुरुमंत्र ले कर मैं लौटा और आहिस्ता आहिस्ता कविता मेरी संगिनी हो गयी। मैं शिवेश सर का एकलव्य रहा हूँ। सौभाग्य की बात यह कि हिन्द-युग्म पर मेरी कविता पढ कर लगभग 28 वर्षों बाद भोपाल से उन्होंने मुझे फोन किया...मैं अपनी पहली और बेहद अनमोल रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ

पंडित पेटू राम जी
गये कथा कहने को
कहने कथा जब बैठे
आया पानी मुँह में उनको
रसगुल्ले कचौडी पूडी
पंजीरी नरियल
सेव संतरे, लीची आम
और रखे सीता फल
सीता राम की जगह बोले
कचौडी पूडियाय नम:
एक बच्चा जोर से बोला
पंडित पेटू रामाय नम:

--राजीव रंजन प्रसाद




पहली कविता भेज रहा हूँ छठी कक्षा में छुप के लिखी थी . डर था कि कोई देखेगा शायद डांट पड़ेगी...!माँ देखेगी तो ठीक बाबूजी देखेंगे तो शायद पिटाई होने की पूरी संभावना पढाई के फरमान के बीच कविता ..?यानी हुकुम-उदूली .उन दिनों परिवारों में माँ और बाप में वही अंतर होता था जो कि "धूप-छाँह"के बीच,हुआ करता था.....ये केवल भय था...... माँ के हाथ लगी कविता की काॅपी में लिखी कविता ने मुझे जो दर्जा दिलाया उसका सुखद एहसास ज़िंदगी भर साथ है मेरे

बाक़ी रह जाती है...बाक़ी रह जाती है

दिन में सरोवर के तट पर
सांझ ढले पीपल या वट पर
गुनगुनाहट पंछी की,मुस्कराहट पंथी की
बाक़ी रह जाती है...बाक़ी रह जाती है
बाक़ी रह जाती है...बाक़ी रह जाती है
हर दिन नया दिन है
हर रात नई रात
मेरे मीत इनमें
दिन की धूमिल-स्मृति
रात की अविरल गति
बाक़ी रह जाती है...बाक़ी रह जाती है
बाक़ी रह जाती है...बाक़ी रह जाती है !
सपने सतरंगी समर्पण बहुरंगी
जीवन के हरेक क्षण दरपन के लघुतम कण
टूट-टूट जाएंगे,
हर कण में क्षण स्मृति
हर क्षण में कण स्मृति
बाक़ी रह जाती है...बाक़ी रह जाती है
बाक़ी रह जाती है...बाक़ी रह जाती है !
अर्पण में दर्पण को
दर्पण में अर्पण को
भूल कहाँ पाओगे
श्रृद्धा के अक्षत से मन मोहक
बातें उनकी अक्सर वीराने में बाक़ी रह जाएगी !

--गिरीश बिल्लोरे "मुकुल"




ये कविता मैंने पिछले साल अक्तूबर के महीने में लिखी थी. मैं उस समय कुछ परेशान थी और इसी दौरान ये कविता लिख डाली. इसके बाद मुझे बड़ा सुकून मिला.

रिश्ते....

ये रिश्तों की दुनिया
कितनी अजीब सी होती है,
जितना इन्हें करीब से जानो,
उतनी ही मुश्किल "पहेली" होती है।

ये रिश्ते ही तो हैं, जो हमारे जन्म के साथ हमसे जुड़ जाते हैं,
कुछ ज़िन्दगी भर साथ निभाते हैं,
तो कुछ वक्त से पहले ही छूट जाते हैं।
रिश्ते किसी के लिये सिर्फ एक शब्द हैं,
तो किसी के लिये ज़िन्दगी,
किसी के लिये बंधन हैं,
तो किसी के लिये बंदगी
मैं भी इन रिश्तों की दुनिया में जीती हूँ,
बहुत से रिश्ते मन से तो कुछ बेमन से भी जीती हूँ।
इन रिश्तों की दुनया से मैंने बहुत कुछ सीखा,
अपनों का समझना तो गैरों को अपनाना भी सीखा,
कुछ रिश्ते जो चाहे उन्हें पा न पाई,
और कुछ अनचाहे रिश्तों को चाहकर भी निभा न पाई।
ईश्वर की दुनिया में हम एक बार जीते हैं,
और एक बार मरते हैं।
पर रिश्तों की दुनिया में कभी हर पल जीते हैं,
तो कभी हर पल मरते हैं।
अब धीरे-धीरे मैं भी इन रिश्तों की दुनिया में रम रहीं हूँ,
और अपना सब कुछ इन रिश्तों को देने की कोशिश कर रही हूँ।

और कर रही कोशिश इस दुनिया में खुश रहनर की,
कोशीश अपने हर रिश्ते में बसने की,
कोशिश अपने हर रिश्ते को जीने की,
और कोशिश कुछ खोकर भी मुस्कुराने की।

--तनु शर्मा




मैंने कविता लिखना तो ११-१२ बरस की उम्र में आरम्भ किया था। पहली कविता का पाठ भी, मेरे पंजाबी के अध्यपक स्वर्गीय श्री दयाल चंद जी मिगलानी के साथ ऑल-इंडिया रेडियो पर हुआ दिल्ली में। तब रोहतक में रेडियो स्टेशन न था। मगर वह कविता उपलब्ध नहीं है। मेरी कॉपी में अप्रैल १९६८ की तिथि को हेडिंग systemic writing ke अन्तर्गत जो पहली रचना है, वह ही पहली रचना माननी पड़ेगी अब तो। यह रचना १९६५-१९६६ में लिखी गई थी जब मैं १७-१८ बरस का रहा हूंगा। पड़ोस में एक बहुत सुन्दर कन्या आ बसी थी, जो उस वक्त मेरे लिये आकाश-कुसुम थी। उस समय १३-१४ बरस के बाद लड़के-लड़की का बतियाना Eloping सरीखा गंभीर अपराध माना जाता था। उसी कन्या को लेकर लगभग ३० साल बाद एक कहानी रसभरी लिखी।

आ बसी जब तुम नयन में

चाँद नजर आये भी तो कैसे
आ बसीं जब तुम नयन में
चाँद भी उस रात का
जिसमें टंके सलमे सितारे
वो समां है बंध रहा,फीके
जिसके आगे सब नजारे
फूल भी मुस्कायें, तो कैसे
आ गई जब तुम चमन में
फूल भी उस बाग का
हर फूल जिसका गुलमोहर
जिसकी इक झलक को
तरसे दुनिया शामो-सहर
गीत भी तड़पायें तो कैसे
आ बसीं जब तुम चमन में
गीत भी उस कलम का
आँसू से जो लिखती कहानी
आँख पढ़ पाये न उसको
बोले वो दिल की जुबानी
दिल को अब बहकायें कैसे
आ बसीं जब तुम मनन में

श्याम सखा 'श्याम'




मैंने अपनी पहली कविता स्पर्श अपने पति अशोक को समर्पित की है, मेरी सामाजिक क्षेत्र में काम करने की रूचि रही है और मेरे पति हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते हैं एक शाम इन्ही यादों मैं खोकर यह कविता लिख डाली, यदि आपकी ओर से प्रोत्साहन मिला तो एक एक करके प्रकृति, परिवार और सामाजिक रचनाएँ भेजूंगी

तेरे प्यार के स्पर्श ने
मुझे क्या से क्या बना दिया
मेरी बावनाओं को शब्दों में
सजाकर उसे नया रूप दिया
मेरी सांसों को छन्दों में पिरोकर
उसे नया गीत दिया।।

मेरे अनुभवों को देकर तुमने काया,
मेरे नीरस जीवन को संजोया
तुम्हारे स्पर्श शब्द और तुम्हारे तुम से,
मैं जीवन का उद्देश्य नया पाया।।

हाथ पकड़कर तुमने दिखाया,
सुंदरता इस जीवन की मरुभूमि में
कुछ लेने देने का,
कुछ पाने खोने का यह सुख दुख
तुमने हंसना रोना सिखाया,
इस जग के अपार कोलाहल में।।

मुझे प्यार है उस तुम्हारे तुम से...
जो तुम नहीं
वरन् जो बना देता है मुझे क्या से क्या
जब रहता है साथ तुम्हारे

मुझे प्यार है उस तुम से,
जो मेरे जीवन में लाता बहार
मुझे प्यार है मुझ से,
जो तुम में समा जाता है अपार।।

बेला मितल




ये मेरी पहली कविता है, ये तो नहीं कह सकती...लेकिन संग्रहित कविताओं में से पहली जरूर है। क्योंकि इससे पहले जो कविता फॉर्म में लिखा होगा... वो महज टाइम पास या लोगों के बीच कुछ वैचारिकता झाड़ने के लिहाज से शायद लिखा हो। मेरी डायरी में संकलित कविताओं में यह मेरी पहली कविता के रूप में दर्ज है... सो इसे ही अपनी पहली कविता मैं मानती हूं। 1 अगस्त 1999 को लिखी यह कविता... शायद उस वक्त रही मेरी पीड़ा के बाद, लिए गए निर्णय को दिखाती है.... पहली कविता भेजने की वजह से वक्त का वो दौर और ये संकल्प मुझे एक बार फिर याद आ गया।

उड़ान

मेरे मन की उड़ान,
उस आवाज सी है,
जो दीवारों से टकरा कर,
लौट आती है,
वहीं वापस....
जहां से सफर शुरू हुआ था।
मैं कब चाहती हूं,
बहुत ऊंची उड़ान?
बस चाहती हूं,
धरातल के इर्द गिर्द की
छोटी छोटी उड़ान।
वो उड़ान जो,
बांधे रखे अपनी जड़ों से,
हिलाने की कोशिश ना करे।
तभी होगा मुझे सफर का गुमान,
कल मैं यहां थी,
और आज यहां हूं...
मैं कहां से चली थी,
और अब कहां हूं।
आखिर मुझे तय करना है,
एक ऊंचा सफर...
अपने दायरों के साथ।

तरुश्री शर्मा



मेरे लिए ये बताना मुश्किल है की मैं कब से कवितायें लिख रहीं हूँ| और इसी कारन मैं अपनी पहली कविता सहेज ना पायी, फिर भी यहाँ कनाडा आकर मैंने अपना ब्लॉग बनाया "सुरभि", और इसी ब्लॉग मे "चाँद के साथ-साथ...." मेरी पहली कविता है, जो मैंने एक शाम को चाँद और बादल की लुका-छुपी को देखते हुए लिखा था|

चाँद के साथ साथ...............
आसमान पर खिल उठा है , वो पुरा चाँद आज,
बादल की कुछ परतें कर रहीं हैं
संग उसके अटखेलियाँ ....................

बहती हुई हवा की मस्त धीमी चाल ,
छेड़ रही है चाँदनी को,
वो मुस्कुराता हुआ धीमे धीमे पुरा चाँद............

आज उसे भी क्या , किसी का ख्याल आया है,
जैसे ऊठ रहे है मन मे कई विचार ,
कुछ शरमाता , कुछ सकुचाता वो चाँद..............

दूर घटाओं को देख कर कभी डर रहा है उसका मन ,
अपनी चाँदनी को छुपा रहा है वो ख़ुद मे,
समेट रहा है अपना हर प्रकाश ..........................

कुछ छुपा छुपा सा , लगता है जैसे,
कर रहा हो कोई खेल , या
डर गया है , वो अपनी ही भावनाओ से ...................

उसके मन मे चल रहा है, जैसे कोई द्वंद ,
कोई लड़ाई ख़ुद से ही ,
और अब झांक रहा है उस पेड़ की डाली से .......................

फिर भी डरते हुए, फिर भी सकुचाते हुए,
डाली डाली कभी निकलता हुआ, कभी छुपता हुआ
कभी डरपोक और कभी निर्भय वो चाँद.....................

उसकी चाँदनी फिर लगी है बिखरने ,
फिर उसका प्रकाश लगा है जगमगाने
आसमान हुआ सुनहला जैसे ,शरमाती हुई कोई दुलहन ......................

पेड़ की डाली डाली झूमती, देती है उसका साथ,
बादल भी खेल रहा, चाँद के साथ साथ
जीत रहा है वो चाँद ,अपनी हर सोच पर........................

फिर से खिल गया वो पुरा चाँद आसमान मे ,
फिर से पुरी हो गई उसकी हर आस ,
कदम से कदम बढ़ चले अब चाँद के साथ साथ.......................

मेनका कुमारी




मैंने अपनी पहली कविता १९९४ में लिखी थी. आशा है आपको पसंद आयेगी.

याद आई

आज उनकी याद आई
आंसू भर आए आंखों में
फिर सोच में पड़ गया मैं
हमें भी याद करेंगी संतानें हमारी
आज हम कुछ ऐसा कर रहे हैं
जिससे कायम रहेगी आज़ादी हमारी।
आज तो देश का यह हाल है
ख्याल नहीं किसी को आज़ादी का
आज हम एक ऐसे चोर हैं
जो लूटते हैं अपने ही घर को
आज अपना हाल देख
आंसू भर आए आंखों में
क्षमा चाहता हूं उनसे
जिन्होंने हमे आज़ादी दी।
क्षमा कर सकते हैं मुझको वो
क्षमा कर नहीं सकता मैं खुद को
आज़ादी के नशे में इतना खो गया था मैं
याद नहीं रही आज़ादी की परिभाशा मुझको।

--संजीव कुमार बब्बर




मेरा हिन्दी में कविता लिख्नने की शुरुआत बहुत ही रोचक है. इससे पहले मैं पिछ्ले पांच सालों से अंग्रेज़ी में कविताएँ लिखता रहा हूँ. जनवरी 2007 मे मेरी अंग्रेज़ी की एक कविता को पढ़कर मेरे एक मित्र श्री डी. पी. जैन मुझे डा. हेम भट्नागर के पास ले गये, जोकि दिल्ली वि. वि. के जानकीदेवी मेमोरिअल कालेज की पूर्व प्राचार्या रह चुकीं हैं. डा. हेम भटनागर सेवानिवृति के बाद पूर्वी दिल्ली में ‘संस्कार’ नाम की समिति का संचालन करती हैं जो बौद्धिक, सांस्कृतिक तथा सेवा के कार्यक्रमों के द्वारा समाज और हिन्दी से जुडी हुई है. ‘संस्कार’ द्वारा एक हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका ‘कलरव’ का भी प्रकाशन होता है.
डा. हेम भटनागर ने मेरी अंग्रेजी की कविता सुनने के बाद उसको सराहते हुए कहा कि जब मैं अंग्रेज़ी में लिख सकता हूँ तो हिन्दी में क्यों नहीं ? उनकी यह बात मुझपर गहरा असर कर गई और मेरी हिन्दी कविताओं का सिलसिला यूँ शुरू हो गया.
कलरव ने फरवरी 2007 में रचना के लिये एक विषय दिया ‘तेरे बिना’. यूँ तो यह विषय प्रेम की ओर ज्यादा इंगित करता है, पर मैने अपनी जन्मस्थली देहरादून में पर्यावरण का ह्रास होते हुए देखा है और पहाडों व पेड-पौधों की चीत्कार भी सुनी है. यही कारण बना मेरी पहली हिन्दी कविता का, जिसका शीर्षक है ‘ओ मेरी प्यारी वादी’. ‘ओ मेरी प्यारी वादी’ कलरव व अनुभूति में प्रकाशित हो चुकी है.

ओ मेरी प्यारी वादी

तेरे बिना न होती
सुबह की सुनहरी धूप
न होता अठखेलियाँ करता वो पवन
और न ही मचलते मासूम सुमन।
हिमालय की न होती हिमाच्छादित चोटियाँ
न ही होती सफ़ेद कोरी चादर निश्चल
और हरियाले मैदानों पर न रंग बिखेरती तितलियाँ
हाँ यही तो थीं मेरी प्यारी वादियाँ।
पर अब कहाँ है वो धूप
न ही हैं धवल चोटियाँ
कहाँ है वो निश्चल पवन
बस हैं अब नंगे पहाड़ और मैला पवन।
निगाह गड़ाए हैं हम पर
शिकायतों का पुलिंदा लिए
जो निर्झर स्रोत बहा करते थे कल-कल
अब बहा रहे हैं आँसू अविरल।
बेबस भीगी नज़रें कह रही हैं मानों
बस भी करो अब निर्दयी मानव
ऐसा न हो हमें कर खाक
खुद हो न जाओ तुम ही खाक।

--अरविन्द चौहान



पहली कविता तो पता नहीं कब लिखी थी.. ना ही उसके बारे मैं कुछ याद है, हाँ मेरी जो कविता सबसे पुरानी है.. वो यह है. भारत-पाकिस्तान के मुद्दे पर मैं हमेशा ही संवेदनशीन रहा हूँ... उसी का परिणाम है यह कविता.

हि‍मालय क्‍यों डगमगा रहा है

उधर देखो, हि‍मालय क्‍यों डगमगा रहा है
ना कोई भूकंप आया है
ना कि‍सी तूफान में ताकत है
फि‍र क्‍या है
जो इस पहाड़ को हि‍ला रहा है
शायद यह नाराज है
हमने जो खून बहाया है
इसकी गोद में
आतंक का दामन छुपाया है
भारत को चीरा
और पाकि‍स्‍तान को बनाया है
खैर थी इतनी भी
पर हमने दुश्‍मनी को बढ़ाया है
यही वजह है शायद
आज हि‍मालय हि‍लता ही जा रहा है
पहले खीचं डाली सरहद
फि‍र आसमां को बाटां
मां की छाती से बच्‍चे को छीना
मजहब के नाम पर
यह क्‍या गुनाह कि‍या
रास ना आया तभी
अडि‍ग गि‍री डगमगा रहा है
सि‍यासत के गलि‍यारों से
गदंगी की बू आती है
जो अमन के बजाए
कारगि‍ल को लाती है
ना छुपने दो उन फरि‍श्‍तों को
ना झुकने दो उन अरमानों कों
जिन्होने दोस्‍ती का दि‍या जलाया है
वरना देख लो अभी से
हि‍मालय डगमगा रहा है
घर जले थे पंजाब में
तपि‍श है अभी उस आग में
देख लो चाहे तुम
महीने लग जाते हैं पहुचने में
अमृतसर और लाहौ्र के
चन्‍द लम्‍हों के फासले में
ना जाने हश्र क्‍या हो्गा
यह हि‍मालय हि‍लता ही जा रहा है
गलती जो कर दी थी कभी
ना दोहराओ तुम अभी
छा जाने दो खुशी
उन बुझे बुझे से चेहरों पर
जो दो ना पायें हैं जी भर
बि‍छड़े हैं जबसे दि‍ल जि‍गर
कैसे भूल जाते हो
दर्द धरती के स्‍वर्ग का
इंसान हैं वो
जीने का हक उन्हे भी दो
दोस्ती का पैगाम लाऔ
तोड़ डालो मुहं उस तीसरे का
जो हुंकारता है दूर से
और हमारे बीच टागं अड़ाता है
देर ना हो जाए कहीं
क्‍योंकि‍ हि‍मालय डगमगा रहा है
सब रास्‍ते खोल दो
मिटा दो सरहद की जंजीरों को
भारत-पाक चलो उस राह पर
जहां अमन नजर आता है
कहीं एसा ना हो जाए 'ज़ालि‍म'
अपवादों की धरती पे
टूट जाए यह पहाड़
और मि‍टा दे सरहद सदा के लि‍ए
यह हो जाएगा
क्‍योंकि‍ हि‍मालय हि‍लता ही जा रहा है

--सुनील डोगरा ’जालिम’




मैंने कवितायें लिखना १९९४ में शुरू किया था। किसी भी चीज़ पर, अपने आसपास देख कर कवितायें लिख लिया करती थी। तब डायरी नहीं लिखती थी इसलिये किसी भी कागज़ पर लिख लिया करती थी। पर बाद में जब डायरी में कविताओं को लिखना प्रारंभ किया तो पहले की लिखी हुई कवितायें भी उसमें लिख डाली। मुझे ठीक से अब याद नहीं कि कौन सी कविता मेरी पहली थी। लेकिन इतना जरूर है कि जो कविता मैं भेज रही हूँ वो पहली कुछ कविताओं में से ही एक है। वर्ष १९९४ पर तारीख याद नहीं। ये कविता मैंने छत से आकाश में चाँद की ओर देखते हुए लिखी।

चाँदनी

काश कि मैं एक तारा होती
चाँद के एकदम पास मैं होती
चाँद के उजियारे से मैं
अपने अँधेरे को मिटाती।

दूर आसमान से मैं
पूरी दुनिया को देखा करती
इतने बड़े जहान में
अपने प्यार को खोजा करती।

किसी बात की चिंता न होती
किसी का मुझको डर न होता
एक तरफ होता चंदा प्यारा
उसकी चंदनिया बनके चमका करती।

--गीता मोटवानी




वैसे तो माँ कहती थी की मैं जब चार साल की थी तो टेलीफोन पर कुछ राईम कर के गाती रहती थी, तो पहली कविता तो वही हुयी पर उसका लेखा कहीं नहीं है. उसके कई सालों बाद पहली कविता ९७ में लिखी थी, फ़िर लगभग दो साल बाद ९९ में लिखनी शुरू की, पर डायरी खो गई. ये कविता जो भेज रही हूँ २००० की है. इसे ही पहली कविता मानती हूँ. उसके पहले कुछ छोटी तुकबंदियाँ सी की थी.

उस साल पापा के ट्रांसफर के कारण हम सपरिवार पटना आ गए थे. नए घर की खिड़की से एक विशाल पेड़ नज़र आता था जिसमें पीले फूल खिलते थे. उस वक्त आस पास वालो से ज्यादा दोस्ती नहीं हुयी थी और पुराने शहर और मित्रो की बहुत याद आती थी. खिड़की के सामने टेबल कुर्सी पर बैठे पेड़ को देखते हुए ये कविता लिखी थी. ये मेरी उस वक्त की सबसे लम्बी कविता थी, और अतुकांत थी. उसके पहले मेरे ख्याल से तुक का मिलना अनिवार्यता थी.

लिखने का सिलसिला शुरू हुआ तो लिखती ही रही फ़िर मीडिया से जुड़े रहने के कारण समीक्षाएं, कहानी वगैरह भी लिखी पर मन कविता लिखने में ही लगता था. अपनी कविताओं को लेकर काफ़ी दिनों तक बहुत स्वतात्मक(possessive) रही थी इसलिए कम लोगो को पढ़ाती/सुनाती थी. ब्लॉग पर पहली बार अपनी कवितायेँ लिखनी शुरू की हैं, और अपनी पहली कविता आज हिंद युग्म को भेज रही हूँ.

इंतज़ार

मेरे घर के सामने एक पेड़ है
उस पेड़ में खिले थे पीले फूल
एक पीली चादर बिछी रहती थी उसके नीचे
मैं जब भी वहाँ से गुजरती
हवा के झोंके से एक दो फूल मुझपर गिर जाते

मुझे लगता था
इन चटख रंगों, फूल की कोमलता से
पेड़ मुझे दिखाना चाहता है
की अभी भी दुनिया में खुशी है
वह पेड़ फूलों से ढका बहुत खुश दिखता था
उसी तरह जैसे मेरे होठों पर एक मुस्कान रहती है

मैं अक्सर सोचती थी
की जब सारे फूल गिर जायेंगे तो?

मौसम बदला,
मेरे घर के सामने अब एक ठूंठ है
जब हवा चलती है
उसकी नंगी शाखें मातम मनाती हैं
रास्ते की धूल जब मुझपर गिरती है
तो मन में हाहाकार उठता है

कितना करूँ लगता है वह पेड़
अपनी नंगी शाखों से आस्मान को देखता है
जहाँ फूल थे अब वीरानगी है
अब हवा पीली चादर नहीं बिछाती
अब उसकी फलियाँ मधुर सरगम नहीं छेड़ती
सब रीता सा लगता है
मुझे अब पता चला अकेलापन क्या है

पर अब वह पेड़ मुझे और भी अच्छा लगता है
क्योंकि मैं उसके साथ अपना अकेलापन बाँटती हूँ
और जब वसंत आएगा
तो उसकी पत्तियों को देख कर
मेरा यकीन और पक्का होगा की

तुम जरूर आओगे...

--पूजा उपाध्याय