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Thursday, July 10, 2008

'पहली कविता' की आखिरी खेंप







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - पहली कविता (भाग-6)

विषय-चयन - अवनीश गौतम

अंक - पंद्रह

माह - जून-जुलाई 2008





पहली कविता की आखिरी किश्त लेकर हम हाज़िर हैं। अब तक इस आयोजन में ११५ कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आखिरी कड़ी में हम १० कविताएँ लेकर प्रस्तुत हैं। आशा है आपने 'पहली कविता' की धुँआधार बल्लेबाजी का मज़ा आपने खूब लिया होगा। अपने विचार अवश्य दें।

*** प्रतिभागी ***
| शशिकान्त शर्मा | प्रकाश यादव 'निर्भीक' | सुरेन्दर कुमार 'अभिन्न' | आलोक शंकर | श्रुति गर्ग |प्रभा पी. शर्मा | तसलीम अहमद | सचिन केजरीवाल | जया शर्मा | सुनिता (शानू)


~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





ये कविता मैंने कक्षा १२ यानी कि १९९३ मे लिखी थी। एक अंग्रेजी साहित्य की किताब में मैंने एक लेख पढ़ा था जिसका वर्णन यहाँ करने मे उचित समझा।

"Origin of Poem as has been believed was like a spring of thoughts, pushed by the emotions of great poet Valmiki, when the arrow of the hunter peirced into the hearts of a pair of birds lost in the congual world of calm forest"

इतना पढ़ते ही मुझे लगा कि वेदना की आह से ही उपजा होगा पहला मीठा गान। इन पँछियों ने मुझे इतनी प्रेरणा दी कि मैं खुद को रोक नहीं सका एवं इतिहास के सबसे पहली कविता के सृजन को अपने शब्दो में रच डाला।

चुभा तीर दिल मे,
जो युग्ल पँछियो के
प्रणयरत है वो
चिर नीँद में सो गये थे
तपस्यारत बाल्मीकि का
हृदय बिंद गया था
अश्रुजल बहते बहते ना जाने
कहा खो गये थे
अश्रुजल बन कर
जो लिख गये थे
वेदना के स्वर थे
काव्य बन गये थे
ये कविता पहली थी और,
बाल्मीकि कवि बन गये थे
शहादत पँछियो की वो
अमर कर गये थे
बाल्मीकि कवि बन गये थे

शशिकान्त शर्मा




एक सहर होते ही

जीवन में-
एक सहर होते ही,
एक शहर छोड दिया,
जिसकी वात्सल्यमयी आँचल,
समेटे रखा था मुझे,
इतने दिनों तक,
दोस्तों की दोस्ती का,
वह यादगार क्षण,
जो याद आती है मुझे,
अब बार-बार,
माँ की ममता,
बाबुजी का स्नेह और,
भाईयों का असीम प्यार,
जिसका हरेक शब्द,
छू लेता है दिल को,
अतीत के हर यादों को,
अब स्मृति के किताबों में,
कैदकर मैं आ गया,
एक अनजान शहर,
एक अजनबी बनकर,
अपरिचितों के बीच,
परिचितों से काफी दूर,
अब ये अपरिचित,
होते जा रहे हैं परिचित,
एक नये अध्याय के साथ,
इस नये जीवन में,
अपने अपने रुपों को लेकर...

प्रकाश यादव 'निर्भीक'




पूरे होश मे आकर देख,
मुझको पास बुलाकर देख

दिल मे तेरे मै धड़का हूँ,
गर्दन जरा झुका कर देख

वो भी हिस्सा तेरे घर का,
दिवार जरा गिरा कर देख

महसूस करेगा बुलंदियों को,
किसी गिरे को उठाकर देख

संदल जैसी धूल वतन की,
माथे पर इसे लगा कर देख

सुरेन्दर कुमार 'अभिन्न'



भीष्म

आदित्यों का तेज़, घनी छाया जिसको करता है
जिसकी धनु की प्रत्यंचा से निखिल भुवन डरता है
देवों का देवत्व ,नमन जिस नरता को करता है
कालजयी ,उस आदि पुरुष को मनुज कौन कहता है?
नहीं मनुज तुम भीष्म , मनुजता की तुम नव आशा हो
निष्ठा , भक्ति, प्रतिज्ञया -पालन की कोई भाषा हो।

भीष्म - प्रतिज्ञया

दिनकर अपना तेज़ त्याग, शीतलता धारण कर लें
या शशि अपनी धवल ज्योति सारे पिण्डों से हर लें ;
अग्नि त्याग दे पवित्रता, गंगा त्यागे निज़ -धारा
अमृत कलश विष बरसाये, म्रृत हो जाये जग सारा।
स्वर्ग धरातल में जाये, किन्नर दानव हो जायें
या अपनें हि प्रिय मधुकर को कुसुम मारकर खायें;
मही डोल जाये लेकिन पुरुषार्थ नहीं डोलेगा
टूट जाय अम्बर लेकिन यह वचन नहीं टूटेगा;
मैं अष्टम गांगेय आज यह भीषण प्रण करता हूँ ,
ब्रह्मचर्य पालन करने का पावन व्रत धरता हूँ ॥

--आलोक शंकर




जब शैलेश जी ने कहा कि काव्य पल्लवन में " पहली कविता" नाम से सब लोग अपनी प्रथम कविता लिखने का अनुभव बाँट रहे हैं, और मुझे भी उसमें अपना योगदान देना है, तो एक पल के लिए मन में और बहुत साल पहले कि स्मृतियाँ ताजा हो गयी... मेरे को याद आये वो स्कूल के दिन, जब में सातवी कक्षा में थी..मुझे हिंदी में अच्छे अंक प्राप्त होते थे, लेकिन कविता लिखना.. ऐसा तो कभी सोचा भी नहीं था.. हाँ तुकबंदी शायद कर लेते थे.. वैसे इतना अब याद नहीं.. एक दिन मेरे हिंदी का टेस्ट था आया मेरे पहली बार कम अंक आये.. मैंने अच्छे से पढाई नहीं कि थी.. मुझे लगता था कि हिंदी में तो कोई भी बिना पढा अच्छे अंक प्राप्त कर सकता है.. लेकिन मैं गलत थी.. उस दिन पहली बार एहसास हुआ था कि पढ़ना बहुत ज़रूरी है, चाहे वो कोई भी सब्जेक्ट हो..
यह कविता भी में उस दिन ही लिखी थी, हो सकता है इसका उस बात से कोई कनसर्न न हो.. लेकिन हाँ यह भाव पहली बार उस दिन ही मेरे भीतर से कागज़ पर उतरे थे..:) थोड़े अधूरे हैं.. पूरी तरह से कविता आज मुझे याद नहीं... लेकिन आशा करती हूँ कि जैसी भी है, आप सब इसका आनद मानेंगे..:)

हसरतों का दामन लिए
हम निकल पड़े उस राह पर
जिसमें मंजिल की छाव नहीं
अरमानो की धुप है
अपने मुक्क़दर को लिए
हम कह बैठे जहाँ से
सब खुदा की मर्ज़ी है
अपना उस पर कहाँ जोर है
बड़ा हौसला था मन में
कि मंजिल को पा लेंगे
लेकिन मन के अंधियारे में
गमो के ही दीप है
मुक्क़दर पर छोड़ा काम
ना आया रास हमें
नहीं तो कह रहे होते जहाँ से
यह चाँद पंक्तियाँ
मेरे मन की हार नहीं
कहने को सिर्फ एक गीत हैं.....

--श्रुति गर्ग



तपते मन

दुःख से तपते मन आपस में मिल जाते है .
जैसे तपते लौहखंड आपस में जुड़ जाते है.
वृक्ष जड़ों से नाता तोड़े, सूख ठूठ बन जाता है.
निज संस्कृति से कटने पर देश गर्त में धस जाता है.
धरा और अम्बर, क्षितिज पार जब मिल जाते है,
जैसे तपते लौहखंड,आपस में जुड़ जाते है.
पराधीनता का सुख से नाता कभी नहीं बन पाता है
स्वाधीनता की दिव्य उजास से देश अभिमान बढ़ जाता है.
सतरंगी इन्द्रधनुष आशा के पुल बन जाते है.
जैसे तपते लौहखंड, आपस में जुड़ जाते है.
चमत्कार पाखण्ड बढ़ रहा है, जात पात का भेद बढ़ रहा है.
राजनीति के दलदल में, शिखंडियों का भाव बढ़ रहा है.
प्रांजल मन हो यदि तो दिल से दिल मिल जाते है ,
जैसे तपते लौहखंड, आपस में जुड़ जाते है.
प्रेम नहीं व्यापार बने , प्रेम मयी यह संसार बने
अर्पण कर दो सब ईश्वर को तो यह जीवन सत्कार बने
झंकृत हो मन के तार-तार तो तपन मिट जाते है ,
जैसे तपते लौहखंड, आपस में जुड़ जाते है.

--प्रभा पी. शर्मा 'सागर'



मैंने यह कविता जुलाई 2001 में लखी थी। भोर से पहले पंछियों की चहचहाहट ने मुझे उसी समय कलम उठाने को मजबूर कर दिया था। उठा कमरे की लाइट जलाई, कॉपी उठाई और कविता उतर आई। लिखता पहले भी रहा था, लेकिन सहेज कर नहीं रख पाया। यह कविता उसी महीने दैनिक जागरण में प्रकाषित भी हुई। मैं इसी को अपनी पहली कविता मानता हूं।

उस पंछी को शुभ प्रभात

पहले मेरे आंगन में गाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

सुबह का पहला गीत सुनाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

मीठी भाशा मुझे सिखाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

मम्मी-पापा, गुड्डू-गुिड़या,
मेरे दोस्त राम रहीमा,

सब को मिलकर रहना सिखाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

दूर देष में चुगने जाती,
शाम को अपने घर आ जाती,

ह्दय में प्रेम का द्वीप जलाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।

शुभ प्रभात, शुभ प्रभात, शुभ प्रभात।

--तसलीम अहमद




ये कविता मैंने कब लिखी मुझे ठीक से कुछ याद नहीं पर इतना याद है की आज से लगभग ८ साल पहले मैंने कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में लिखी थी।

रिश्तों का खोया हुआ टुकडा हूँ मैं

रिश्तों का खोया हुआ टुकडा हूँ मैं
आपने आप में एक दुखरा
किसी कह नही सकता
किसी की सुन नही सकता
कोई सुन ले मुझे, औरों का ताकता
मुखर हूँ मैं
रिश्तों का ..........
बीमार बच्चे सफ़ेद जहर पीते
टुकडों में रहते, टुकडों में जीते
शहर में सर्केश की रौनक है, यहाँ फिर भी विवाद लगा है,
सूद और मूल की रकम है, कितनी यहाँ मसला पड़ा है,
मेले में ज्यादा बिकते बेजान पशु है,भूखमरी एक कलंक
का टुकडा है
रिश्तों का .........
फिर भी भोग और योग में है होती तुलना
कर्र्ता साक्षी मिल कर कहते,असफलता से है जूझना
कुछ अर्से बाद उसी मंच पर, एक दूजे का कच्चा चिट्टा है खोलते
खो जाते है रिश्ते इन्ही दुख्रो में
इन्ही रिश्तों का खोया टुकडा हूँ मैं
रिश्तों का ..........

--सचिन केजरीवाल



मैंने कवितायें १७ - १८ की उम्र में लिखना प्रारम्भ किया। सभी बहिनों की शादी के बाद, अकेलेपन को दूर करने के लिए मैंने लिखा, और आज तक लिख रही हूँ पर कहीं भेजने की नहीं सोची। हिन्द-युग्म में कवितायेँ भेजने के लिए मेरी बेटी ने मुझे प्रोत्साहित किया। और फ़िर मैंने हिन्दयुग्म का सहारा लिया।

बदलता युग

वक्त गुजर गया
इंसान बदल गया
युग बीत गया
ईमान बदल गया
गरीब आज अन्न अन्न के
दाने को तरस गया
सरकार सोती रही
घर घर खून का
फुब्बारा बरस गया
बेबस माँ लाचार बहिन की
आशाओं पर अंधकार छा गया
फैला है ऐसा भ्रष्टाचार कि
इंसान ही इंसान को खा गया

--जया शर्मा



मेरी यह कविता उस वक्त लिखी गई थी जब मै दसवीं कक्षा में पढ़ती थी,लिखी तो और भी कई थी मगर यह सबसे पहली थी,जो बाद में २००६ में कुछ संशोधन के उपरान्त मरुपन्ना पिलानी व मेरी दिल्ली नामक अखबार में प्रकाशित हुई,जिसने मुझे साहस दिया और लिखने का,यद्यपि इसमें बहुत सी खामियाँ हैं फ़िर भी मुझे यह अति प्रिय है...इस कविता में संशोंधित पंक्तियाँ निम्न है...
ऎश्वर्या जैसी चाल रितिक जैसे बाल
चाहते है सारे आज माँ के ये लाल...

बच्चे और उनकी परवरिश

फ़ैशन की मारी है ये दुनिया सारी,
देश भर में फ़ैली रहे चाहे बेकारी।

हमारी सभ्यता,संस्कृति,परम्पराएँ सारी,
सिसक रही है पहन के छः मीटर साड़ी।

आधा मीटर कपडा़ काफ़ी हो गया है,
अच्छा खासा लहंगा मिनी स्कर्ट हो गया है।

किसको दे ताने किस पर लगायें लांछ्न,
खुद हमसे उजड़ गया है आज हमारा आंगन।

न जाने कैसी चली है ये हवा...
फ़ैशन में गिरफ़्तार है हर एक जवां।

ऎश्वर्या जैसी चाल रितिक जैसे बाल,
चाहते है सारे आज माँ के ये लाल।

आज युवा पीढी दिशाहीन हो गई है,
स्वतंत्रता की आड़ में बेलगाम घोडे़ सी दौड़ रही है।

दौलत ऒर शौहरत पाने की चाह में,
खो गये है, नैतिक मूल्य न जाने किस राह में।

आदर संस्कार जो मिले थे विरासत में,
गंवा बैठे है सभी कुछ परिवर्तन की राह में।

माना कि परिवर्तन है प्रकृति का शाश्वत नियम,
परंतु आगे बढने की चाह ने तोङ दिये सारे संयम।

तुलसी,रहीम,गुरुनानक किताबों में दफ़न हो गये है,
पढना लिखना छोड कर सब फ़ैशन शो में चले है।

माँ से मम्मी, पिता से डैड हो गये है,
अच्छे खासे बच्चे भी आजकल मैड हो गये है।

इसके लिये शर्मिंदा है वे सारे लोग,
जो बिगङते बच्चों पर लगाते नही रोक।

अगर माता-पिता की परवरिश हो अच्छी,
तो कैसे बिगङेगी बच्चो की ये उम्र कच्ची।

कुछ नही कर सकते ये सिनेमां-दूरदर्शन,
अगर बच्चो को मिले घर में थोरा सा मार्गदर्शन।

सुनिता (शानू)



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15 कविताप्रेमियों का कहना है :

seema gupta का कहना है कि -

"it was really great experience indeed to read the first poetry written my so many writers and presentation by hInd yugm in such a wonderful way" it was no doubt an inspirable effort by the hind Yugm team" today as it is the last epesode of "Pahli kavita" i congrulates every participant and wish good luck to allof them"

Regards

शोभा का कहना है कि -

पहली कविता के रूप में बहुत सुन्दर रचनाएँ हैं। सभी कवियों को बधाई। मुझे श्रुति, शशिकान्त और आलोकशंकर जी की कविताएँ बहुत अच्छी लगी ।

Anonymous का कहना है कि -

ऎश्वर्या जैसी चाल रितिक जैसे बाल,
चाहते है सारे आज माँ के ये लाल।
aaj se 20-22 saal pahle ash, rit par kavitaa ?

BRAHMA NATH TRIPATHI का कहना है कि -

पहली कविता के लिए सभी कवियों को बधाई सभी ने काफ़ी अच्छा लिखा है

वेदना के स्वर थे
काव्य बन गये थे
ये कविता पहली थी

शशिकांत जी ये लाइन अच्छी है

दोस्तों की दोस्ती का,
वह यादगार क्षण,
जो याद आती है मुझे,
अब बार-बार,
माँ की ममता,
बाबुजी का स्नेह और,
भाईयों का असीम प्यार,
जिसका हरेक शब्द,
छू लेता है दिल को,

प्रकाश जी ने भावनाओ को काफ़ी अच्छी तरह से उकेरा है



प्रेम नहीं व्यापार बने , प्रेम मयी यह संसार बने
अर्पण कर दो सब ईश्वर को तो यह जीवन सत्कार बने
झंकृत हो मन के तार-तार तो तपन मिट जाते है ,

प्रभा जी की ये लें बहुत अच्छी है

महसूस करेगा बुलंदियों को,
किसी गिरे को उठाकर देख

सुरेंदर जी का ये शेर गज़ब का है

आलोक जी की पुरी कविता मुझे अच्छी लगी

श्रुति जी ने भी अच्छा लिखा है
तसलीम जी की शुभ प्रभात कविता भी अच्छी है
बाकी सचिन, जया और सुनीता जी की कविता भी अच्छी रचित है

Moulshree का कहना है कि -

आज के युग में इतनी भावपूर्ण रसयुक्त कविताओं का संकलन करने हेतु बहुत बहुत dhanyavad

maitrayee का कहना है कि -

आदरणीय शशिकांत जी, विषय मे आपका गहरा चिंतन सराहनीय है, कविता अच्छी लगी. ऐसे ही और विषयों पर भी लिखते रहिये

maitrayee का कहना है कि -

आदरणीय शर्मा जी,
"तपते मन" कविता को पढ़ कर सोच रही हूँ अगर आपकी पहली काव्यात्मक सोच ऐसी थी तो अब आपकी सोच कहाँ तक पहुँच गई होगी? संक्षेप मे कविता अच्छी लगी.

देवेन्द्र कुमार मिश्रा का कहना है कि -

पहली कविता के रूप में बहुत सुन्दर रचनाएँ हैं। सभी कवियों को बधाई। मुझे श्रुति, और आलोकशंकर जी की कविताएँ बहुत अच्छी लगी ।

रंजना [रंजू भाटिया] का कहना है कि -

सभी बहुत सुंदर लगी

सजीव सारथी का कहना है कि -

पहली कविता के रूप में एक नायब संकलन जमा हो गया है युग्म के पास, मुझे तो अनुभव कवियों के बहुत पसंद आए, और पहली कविता वाली मासूमियत तो है ही हर कविता में...शशिकांत जी शर्ती गर्ग और शानू की कविता और अनुभव लाजावाब लगे

kamalpreetsingh@rediffmail.com का कहना है कि -

ग़ज़ल

तमीज को ताक पे रखिये ये हक अपना है
अंगारे को राख पे रखिये ये हक अपना है
किस ने कहा शराफत के लिए शाइस्तगी ज़रूरी है
इत्मीनान से अकरिए ये हक अपना है
ज़िंदगी में कहीं बात कहीं खामोशी ज़रूरी है
खामोशी से मतलब निकालें यह हक अपना है
नसीहतों के दौर दूजों के लिए हैं
अफसरी अपनी बनाये रखें यह हक अपना है
सिलसिला ऐ ताल्लुकात बिगड़ता है बिगड़ता रहे
अपनी इत्मीनान से छानिये ये हक अपना है
आप को दूजों के हक से क्या
ख़ुद ही संभाल लेंगे ये हक अपना है
किसी और की कही जानने की ज़रूरत क्या है
सिर्फ़ अपनी ही थानिये ये हक अपना है

-कमल प्रीत सिंह

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