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याद का जब भी कबूतर निकला


प्रतियोगिता की नवीं कविता एक गज़ल है, जिसे लिखा है हिन्द-युग्म से बहुत लम्बे समय से जुड़ीं युवा कवयित्री अनुराधा शर्मा ने।

पुरुस्कृत कविता: ग़ज़ल

जिस्म से रूह को ले कर निकला....
याद का जब भी कबूतर निकला.....

मुझको तोड़ा गया सच कहने पर,
आईने जैसा मुक़द्दर निकला....

झील के जैसा लगा, था मुझको,
छू के देखा तो समंदर निकला.....

उन निगाहों मे नशा कितना है,
हर दफ़ा पहले से बढ़कर निकला.....

इश्क़ का शहर अजब है मौला,
जो मिला हमको वो बेघर निकला,....

हमला करता था अंधेरे में,
धूप मे आँख चुरा कर निकला....

ताजपोशी में, कुंवर से कहना,
बीरबल से ही था, अकबर निकला....

हाथ फिर वो ना आ पाया, मेरे,
ख्वाब चादर से जो बाहर निकला....

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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

अनुराधा शर्मा की आह


प्रतियोगिता की पाँचवी कविता एक आज़ाद नज़्म है, जिसे लिखा है हिन्द-युग्म से बहुत लम्बे समय से जुड़ीं युवा कवयित्री अनुराधा शर्मा ने।
पुरस्कृत कविता- आह

अनुराधा की अन्य रचनाएँ

ग़ज़ल

बहुत सा फ़र्क है
दिल एक चार दीवारों वाला कमरा
बुजुर्ग यादों को याद करने का वक़्त नहीं मिलता
जिस कूचे-गली से मेरा यार हो कर गया
खामोशी की पैराहन पहने
एक नन्ही सी आह,
जाने कब-कब में
सांसों के साथ, बाहर आके
ज़मीं पे जा गिरी....

दिमाग़ ने इसे देखते ही, कदमों को दौड़ाया,
और आह को, कुचल के मारने का फरमान सुनाया,
फिर दिल को, ज़ोर से डाँटा,
कोई देख लेता तो, ज़ेहन की कमज़ोरी का एहसास होता
दिल बड़बड़ाया,
अच्छा हुआ, पैदा होते ही मार गयी
जवान होती तो, सिसकी बनती
और बूढ़ी होके चीख..
फिर मेरी तनहाई कहाँ रहती

हाथ, उस आह की लाश हो उठाने के लिए बढ़े
तो
देखा,
कदमों के नीचे कुछ नहीं था
पैरों के छालों के, ज़ख़्मों से
वो आह,
फिर से जिस्म में जा पहुँची थी...

बहुत कुछ हुआ था और कुछ भी नहीं


प्रथम चरण मिला स्थान- छठवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- पाँचवाँ


पुरस्कार- अनुराग शर्मा तथा अन्य 5 कवियों के कविता-संग्रह 'पतझड़ सावन बसंत बहार' की एक प्रति।


जिस कूचे-गली से मेरा यार हो कर गया


उसका तसव्वुर जो ज़हन से हो कर गया ........
मेरा फिर कत्ल हुआ मैं फिर से मर गया ................

जबसे अटका हैं वो कहीं गोसा-ए-जिगर में ,
इसका असर भी याद नहीं उसका भी असर गया ....

दुनिया वालो बेकार हैं मेरी ज़री पर रोक लगाना
सूरज हूँ जब चाहे चढ़ जाऊँ जब चाहे उतर गया ...............

महफिल मैं कराहते हुए देखा जो उसको
खुश हूँ की ना मेरा कोई वार बेअसर गया

जो साथ नहीं तू मेरे तो यूँ काटी हैं जिंदगी
कभी यहाँ रुक गया कभी वहाँ ठहर गया

इबादत-ए खुदा के तौर तरीके बदल जाते हैं …
जिस कूचे-गली से मेरा यार हो कर गया

जबसे पी लिया हैं तेरे झूठे प्याले से पानी ....
हर शराब का असर मुझ पर बेअसर गया ...

हैसियत दिखाने को एक ज़र्रा हटा जगह से ....
कई गाँव तबाह हुए एक शहर बिखर गया ...

तराना-ए-ख़ुशी वो सुना कर गया हैं “अनु”
थकी-थकी इस रूह को और बीमार कर गया

--अनुराधा शर्मा