प्रतियोगिता की नवीं कविता एक गज़ल है, जिसे लिखा है हिन्द-युग्म से बहुत लम्बे समय से जुड़ीं युवा कवयित्री अनुराधा शर्मा ने।
पुरुस्कृत कविता: ग़ज़ल
जिस्म से रूह को ले कर निकला....
याद का जब भी कबूतर निकला.....
मुझको तोड़ा गया सच कहने पर,
आईने जैसा मुक़द्दर निकला....
झील के जैसा लगा, था मुझको,
छू के देखा तो समंदर निकला.....
उन निगाहों मे नशा कितना है,
हर दफ़ा पहले से बढ़कर निकला.....
इश्क़ का शहर अजब है मौला,
जो मिला हमको वो बेघर निकला,....
हमला करता था अंधेरे में,
धूप मे आँख चुरा कर निकला....
ताजपोशी में, कुंवर से कहना,
बीरबल से ही था, अकबर निकला....
हाथ फिर वो ना आ पाया, मेरे,
ख्वाब चादर से जो बाहर निकला....
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।






