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हिंदी की समकालीन कविता किस मर्ज की दवा है


जबकि ईमानदारी अजूबों की तरह अपनी संख्या घटाने लगी है और लगभग ऐसी ही चर्चा पाने लगी है, ऐसे बेईमान समय में भी कवियों से कविता में ईमानदारी की अपील की जाती रही हैं। हमारी हर कोशिश भी उसी प्रक्रिया का एक हिस्सा है- इस संशय के साथ कि हम कितने ईमानदार हैं। कविता के इसी अंधकारकाल में हम हरे प्रकाश उपाध्याय की दो कविताएँ प्रकाशित कर रहे हैं।

हिंदी की समकालीन कविता

वक्तव्य- हरेप्रकाश उपाध्याय
Hare Prakash Upadhyay
कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है
अपनी कविता के बारे में या किसी की कविता के बारे में और आज की आलोचना के बारे में कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं है। यह तब और, जब निरपेक्ष होकर वस्तुगत ढंग से कुछ कहना चाहें। दरअसल आज का समय और हमारे मन इतने प्रदूषित और ‘राजनीतिग्रस्त’ हो चुके हैं कि हम कविता में या कविता के बारे में कुछ कहने या सुनने के पहले यह सोचने लगते हैं कि जो कहना है या कहा जा रहा है या जो कह रहा है वह किन स्वार्थों, संपर्कों और सुविधाओं को दुरूस्त करेगा। यह वह दौर है जिसमें हम बहुत सारे नितांत वैयक्तिक स्वार्थों की वजह से या जानबूझकर ही बिगाड़ कर लेते हैं पर बिगाड़ की डर से ईमान की बात कतई नहीं करते। ऐसा व्यवहार हम कविता में प्रकट कर रहे हैं और कविता के बाहर भी। यह अनायास नहीं है कि मौजूदा कविता पर निष्प्रभावी होने और उस पर पूर्ववर्ती कविता या किसी और प्रभाव के होने की बाद कभी फतवे के तौर पर, कभी दबे स्वर में की जा रही है। यहाँ कहना चाहिए कि न कविता ईमानदार है, न कविता पर की जानेवाली बातों में ही कोई जान है। ठीक है कि आज की कविता कई तरह के नए अनुभवों को लाने की कोशिश में है, पर किन्हीं वजहों से उसमें साफगोई या ईमानदारी नहीं है। वाचालता और झूठी प्रतिबद्धता चाहे हो। इस आसंग में आज जो कविता धड़ाधड़ पुरस्कृत हो रही है और उसके बारे में जो अनुसंशाएँ सामने आ रही हैं उसपर गौर करने की ज़रूरत है। लगता है, हमने लगभग यह मान लिया है कि कविता कर्म भी मौजूदा राजनीतिक कर्म की तरह बगैर दगाबाजी के सफल नहीं हो सकता। कभी मुक्तिबोध जैसे कवि पूछते थे, “पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?” आज कोई कवि किसी साहित्यिक से यही सवाल पूछे तो जिससे सवाल पूछा जायेगा वह इसे निश्चित तौर पर एक मजाक मानेगा या व्यंग्य। दरअसल हाल-फिलहाल में राजनीति का सम्बंध सिद्धांत या विचारधारा की जगह मजाक या व्यंग्य से ही जुड़ गया है। बताइए मधु कोड़ा, लालू, मायावती जैसे अधिकांश नेता अपनी ही जनता के साथ जिसका उन्होंने विश्वास जीता है, मजाक नहीं तो क्या कर रहे हैं? और आज का मीडिया हद से हद उन पर व्यंग्य कर रहा है, नहीं तो वह भी किन्हीं न किन्हीं मजाकों में ही तो मुब्तिला है। बताइए कि इस तरह के फ्राडिज्म एक सघन और ईमानदार काव्यानुभव में क्यों नहीं बदल रहे? दरअसल हम जैसे-जैसे नई-नई तकनीक पर अपना अधिकार पा रहे हैं- क्रूरता, भ्रष्टाचार और दगाबाजी की भी नई-नई तकनीकों में महारत हो रहे हैं। हम दरअसल एक नौटंकी कर रहे हैं और कोई एक ईमानदार अवलोकनकर्ता नहीं है जो खड़ा हो और कह सके , बस बहुत हो चुका। हर मौके पर ताली बजाने वाले बहुत हैं। आज के आलोचकों को इस रूप में भी देखना चाहें तो देख सकते हैं। बहुतों को लग सकता है कि मैं यह सतही आरोप लगा रहा हूँ। अगर मैं ऐसा कर रहा हूँ तो किसी कविता को ही अंततः इसके प्रमाण देने होंगे। बेशक ये आरोप मैं अपनी कविता पर भी कर रहा हूँ। कविता में सच मुखर हो मेरी यही कामना और कोशिश है। यह काम कोई आलोचना चाहकर भी नहीं कर या करा सकती। कविता को जो करना है, खुद करना होगा। उसे पहले एक बेबाक भाषा में ढलना होगा। धूमिल को उद्धृत करना चाहूँगा कि कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।
कवियो ! यह ससुरी हिंदी की समकालीन कविता
किस मर्ज की दवा है
एक तो यह अपने लिखाने में ही
तुम्हें निचोड़ लेती है
जल्दी पकड़ में ही नहीं आती
कभी आती है तो इस तरह
कि तुम कई-कई दिन बेचैन रहते हो
पागलों की तरह लगे रहते हो
एक ही धुन को पकड़े रहते हो
ऐसा कि प्रेमिका का कॉल भी तुम्हें बुरा लगने लगता है

यह अलग बात है कि
इस कविता का थोड़ा सा प्यार पाकर
तुम बहुत खुश हो लेते हो
पर इसे लिखने से
न तुम्हें रंडी न दलाल न सेठ न घुसखोर
न संत न कसाई
न नेता न अभिनेता
यहां तक कि गली का कुत्ता तक तुम्हें भाव नहीं देता
सब तुम पर हँसते हैं
सबकी भौंहें तुम पर तनी रहती हैं

न तन मिलता है न धन
न कहीं आग लगती है न किसी की प्यास बुझती है
उल्टे साले दो कौड़ी के दंतचिआर
तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं ताली बजाते हैं

और तुम लिखते जाते हो गर्मागर्म कविताएं
जिसे तुम्हीं पढ़ते हो
और सिर्फ तुम्हीं पढ़ते हो
और खुश होते हो
और अकड़ जाते हो
तुम्हें लगता है
तुम धरती को घुमा दोगे उसकी सही दिशा में
सब चीजों को बदल दोगे
पर अंतत: कुछ होता-हव्वाता नहीं
सारी सड़ी चीजें मार कविताओं के बीच गंधाती रहती हैं।
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रास्ते रोकनेवाले

तुम रास्ते रोकते हो
कई बार यह इस तरह सहज हो जाता है तुम्हारे लिए कि
तुम जानते भी नहीं हो कि
तुम रास्ते रोकते हो
तुम लगे रहते हो
हरदम सोचते रहते हो
कि किस तरह उसका निकलना बंद कर दो
किसी भी तरफ

तुम इस बात में अपनी काबिलियत समझते हो
कि तुम एक भी रास्ते नहीं रहने देते हो उसके
उसकी परेशानी छटपटाहट देखकर
तुम्हारी आक्रामकता बढ़ती जाती है
तुम्हारे भीतर एक राक्षस अट्टाहास करने लगता है
तुम्हारी भुजाएं दस हो जाती हैं
तुम ऐंठ कर बोलने लगते हो
तुम इसी में खपाते हो अपने को
और एक दिन तुम पाते हो
कि वह तो निकल ही गया
एक रास्ते से

जब वह तुम्हारी पकड़ से बाहर चला जाता है
तुम्हारे देखते-देखते
और तुम वहीं खड़े रह जाते हो
वह आगे निकल जाता है
तब तुम्हें लगता है
कि तुमने रास्ते रोकने की जगह
अपना एक रास्ता बनाया होता
तो वह कितना काम का होता आज तुम्हारे
वैसे तुम्हें कई बार ऐसा कुछ भी नहीं लगता
तुम किस तरह और किस कदर पिछड़े हो यह तुम देख ही नहीं पाते
तुम्हे बहुत तो अपने शिकार का बहक जाना ही दिखता है
तुम बस थोड़ा सा पछताते हो
और फिर किसी के रास्ते रोकने लगते हो
तुम्हें इस काम में मजा आता है
या नहीं भी आता है आदतवश

तुम बस लगे रहते हो
अगला शिकार भी एक दिन अपना रास्ता निकाल लेता है
और फिर तुम अगले को शिकार बनाते हो
और इस तरह शिकार बनाते-बनाते
तुम एक दिन खुद नियती के शिकार हो जाते हो
तो जिनके अब तक तुम रास्ते रोकते रहे हो
वे ही तुम पर तरस खाते हैं
पर शायद तुम यह बात कभी जान नहीं पाते हो...।

हरे प्रकाश की इस स्त्री को आप जानते हैं?


हरेप्रकाश उपाध्याय का ज़िक्र आज के उन कवियों में होता हैं जिनकी कविताओं में समय अपने समस्त हाहाकार के साथ खुद को दर्ज़ करता है। हमने कुछ महीने पहले इनकी बहुत सी कविताओं से आपको रूबरू करवाया था। आज हम इनकी जिन कविताओं का ज़िक्र कर रहे हैं, उनमें बुराई या यूँ कहें कि तथाकथित बुराई अपनी पूरी नग्नता के साथ सजीव है। जहाँ 'क्या आप एक ऐसी स्त्री को जानते हैं' मध्यमवर्गीय शादीशुदा महिलाओं के परिवारों के बाहर की ज़िंदगियों और संबंधों की परत उघाड़ती है। उसे और समझने की कोशिश करती दीखती है; ऐसी स्त्रियों के सच को बुराई और अच्छाई के तराज़ू पर तौलती भी है। वहीं 'बुराई के पक्ष' दुनिया में बुराई के नाम से मशहूर चीज़ों के पक्ष में तर्क पेश करती है।

'क्या आप एक ऐसी स्त्री को जानते हैं'

हम प्रेम नहीं करते
यानी हमारी भावनाएँ आत्मघाती नहीं हैं
उम्र में मुझसे वह थोड़ी सी ज़्यादा ही बड़ी है
और मैं बच्चों-सी विनम्रता से पेश आता हूँ
बच्चों-सी मेरी ज़िद पर वह माँ-सी मोहब्बत करती है

मेरा यक़ीन है
उससे दोस्तों जैसा बोलूँ तो ख़ुश ही होगी वह
वह थोड़ा और खुलेगी शायद
बुरा तो नहीं ही मानेगी
आख़िर उसके एकान्त का साथी हूँ मैं
लेकिन पता नहीं क्यों बड़ों की तरह ही देता हूँ आदर
पाँव उसके बड़े सुंदर हैं उसके चेहरे से ज़्यादा
कितना अच्छा होता पाँवों के भी आईने होते
तो मैं आईना होता
और उतारता उसके पाँवों के अक्स अपनी आत्मा में

कभी-कभी सोचता हूँ तो लगता है
उसके प्रति मेरी यह जो विनम्रता है
कहीं उसे चिढ़ाती तो नहीं होगी
पर अपनी इस आदत का क्या करूँ
क्या करूँ आख़िर इसका मैं
मैं कभी-कभी उसे छूना चाहता हूँ
फूलों की तरह नहीं, तकिये की तरह
कैसे दबाकर रख लेते हैं गोद में वैसे
उसकी त्वचा पर अपनी त्वचा फेरना चाहता हूँ
मिले रोम-रोम पसीना जैसे पानी में पानी मिलता है
उसके होठों को अपने होठों से
अपने हो...ठों से हल्के छू लेना चाहता हूँ
पर वह क्या चाहती है
क्या वह भी चाहती है?

कैसा भी मौसम हो कैसी भी हवा
उसके भीतर अपने गीत हैं अपना चाँद अपना सूरज
हमारी सारी मुलाक़ातें
एकान्त की वे रातें सब उसके सूरज-चाँद की मोहताज रही हैं
देह के माधुर्य की वे सारी चर्चाएँ उसके मौसम की उपज हैं

मुझे चिढ़ है और ख़ूब आश्चर्य
कि वह इतनी अपनी धूप, अपनी नमी और हवाएँ
कैसे बना लेती है
उसे इस प्रकृति के समानान्तर अपनी प्रकृति की ज़रूरत ही क्यों है
वह क्या चाहती है
आख़िर उसकी और मेरी रुचियों और ज़रूरतों की तमाम भिन्नताओं के बावजूद
वह क्या है कि हमारा केन्द्र एक हो रहा है
आख़िर वह क्या है जो मुझे बेईमान बनाता है
अपनी कक्षा में छोड़कर उन तमाम हमउम्र और चुलबुली लड़कियों को
मैं इस मैदान में जो बीहड़ जैसा है क्यों आया हूँ
वह कैसी स्त्री है
जिसकी चुनरी पर छपी परछाइयों को चाँद की तरह विभोर निहार रहा हूँ

वह मुझे क्यों खेंचे है
क्या उधार है उसका मेरे पास
क्या पाना है मुझे उसके पास
उसे उसके घोड़े जैसे पति का प्यार नहीं मिला
कभी वह यों ही कह देती है
और उदास सी हो जाती है
उसकी उदासी में इतना चटख रंग क्यों है खू़न जैसा
वह अपने पति से मिलने की तमाम रातों के बाद
मुझे फोन करती है
और जो मैं उससे चिढ़ा-चिढ़ा बैठा रहता हूँ
क्यों काँप जाते हैं मेरे पैर घनघोर शराबी की तरह

ओल्ड माँक का अद्धा चढ़ाकर सोचता हूँ
शशि जिन्हें कहते हैं विषकन्याएँ
क्या वे भी ऐसी ही होती हैं
ऐसी औरत से आप प्रेम नहीं कर सकते तो क्या
क्या घृणा कर सकते हैं?
यदि प्रेम और घृणा दोनों नहीं कर सकते
तो क्या कर सकते हैं
क्या वही जो मैं कर रहा हूँ इन दिनों

क्या आप एक ऐसी स्त्री को जानते हैं?


'बुराई के पक्ष में'

कृपया बुरा न मानें
इसे बुरे समय का प्रभाव तो क़तई नहीं
दरअसल यह शाश्वत हक़ीक़त है
कि काम नहीं आई
बुरे वक्त में अच्छाइयाँ
धरे रह गये नीति-वचन उपदेश
सारी अच्छी चीज़ें पड़ गयीं ओछी
ईमानदारी की बात यह कि बुरी चीज़ें
बुरे लोग, बुरी बातें और बुरे दोस्तों ने बचाईं जान अक़सर
उँगली थामकर उठाया साहस दिया
अच्छी चीज़ों और अच्छे लोगों और अच्छे रास्तों ने बुरे समय में
अक़सर साथ छोड़ दिया

बचपन से ही
काम आती रही बुराइयाँ
बुरी माँओं ने पिलाया हमें अपना दूध
थोड़ा-बहुत अपने बच्चों से चुराकर
बुरे मर्दों ने खरीदी हमारे लिए अच्छी कमीज़ें
मेले-हाटों के लिए दिया जेब-ख़र्च

गली के हरामज़ादे कहे गए वे छोकरे
जिन्होंने बात-बात पर गाली-गलौज़
और मारपीट से ही किया हमारा स्वागत
उन्होंने भगाया हमारे भीतर का लिज़लिज़ापन
और किया बाहर से दृढ़
हमें नपुंसक होने से बचाया
बददिमाग़ और बुरे माने गये साथियों ने
सिखाया लड़ना और अड़ना
बुरे लोगों ने पढ़ाया
ज़िन्दगी का व्यावहारिक पाठ
जो हर चक्रव्यूह में आया काम हमारे
हमारी परेशानियों ने
किया संगठित हमें

सच ने नहीं, झूठ ने दिया संबल
जब थक गए पाँव
झूठ बोलकर हमने माँगी मदद जो मिली
झूठे कहलाए बाद में
झूठ ने किया पहले काम आसान

आत्महत्या से बचाया हमें उन छोरियों के प्रेम ने
जो बुरी मानी गईं अक़सर
हमारे समाज ने बदचलन कहा जिन्हें

बुरी स्त्रियों और सबसे सतही मुंबईया फ़िल्मों ने
सिखाया करना प्रेम
बुरे गुरुओं ने सिखाया
लिखना सच्चे प्रेम-पत्र
दो कौड़ी के लेमनचूस के लालच में पड़ जाने वाले लौंडों ने
पहुँचाया उन प्रेम-पत्रों को
सही मुक़ाम तक

जब परेशानी, अभाव, भागमभाग
और बदबूदार पसीने ने घेरा हमें
छोड़ दिया गोरी चमड़ी वाली उन ख़ुशबूदार प्रेमिकाओं ने साथ
बुरी औरतों ने थामा ऐसे वक़्त में हाथ
हमें अराजक और कुंठित होने से बचाया
हमारी कामनाओं को किया तृप्त
बुरी शराब ने साथ दिया बुरे दिनों में
उबारा हमें घोर अवसाद से
स्वाभिमान और हिम्मत की शमा जलायी
हमारे भीतर के अँधेरों में
दो कौड़ी की बीड़ियों को फूँकते हुए
चढ़े हम पहाड़ जैसे जीवन की ऊँचाई
गंदे नालों और नदियों का पानी का आया वक़्त पर
बोतलों में बंद महँगे मिनरल वाटर नहीं

भूख से तड़पते लोगों के काम आए
बुरे भोजन
कूड़े पर सड़ते फल और सब्जियाँ
सबसे सस्ते गाजर और टमाटर

हमारे एकाकीपन को दूर किया
बैठे-ठाले लोगों ने
गपोड़ियों ने बचाया संवाद और हास्य
निरंतर आत्मकेंद्रित और नीरस होती दुनिया में

और जल्दी ही भुला देने के इस दौर में
मुझे मेरी बुराइयों को लेकर ही
शिद्दत से याद करते हैं उस क़स्बे के लोग
जहां से भागकर आया हूँ दिल्ली!

(इसे भड़ास ने सर्वश्रेष्ठ भड़ासी कविता माना है)

खिलाड़ी दोस्त


इन दिनों मैं आपको युवा कवि हरेप्रकाश उपाध्याय के पहले कविता-संग्रह 'खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएँ' से अपनी पसंद की कविताएँ पढ़वा रहा हूँ। 53 कविताओं में से लगभग 10 कविताएँ आप पढ़ चुके हैं। आज मैं इस संग्रह से जो कविता आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ, वह शीर्षक कविता है। और मेरे दृष्टिकोण में हरेप्रकाश के अनुभवों का व्यापक विस्तार है यह कविता।

'खिलाड़ी दोस्त'

खिलाड़ी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले ही सावधान कर दूँ कि
मेरा इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ़ नहीं है
जो ज़िन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है जो
खेल को ही ज़िन्दगी समझते हैं
जो कहीं भी खेलना शुरू कर देते हैं
जो अक़सर पारम्परिक मैदानों के बाहर
ग़ैर पारम्परिक खेल खेलते रहते हैं

वे दोस्त
खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेल
जब भी जहाँ
मौक़ा मिलता है पदाने लगते हैं
पत्ते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आँखों पर कसकर बाँध देते हैं रूमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं

वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फँसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौड़ाएँगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक़सर
हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताक़त आँकते रहते हैं
अक़सर थके हुए दौर में
भूला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आँसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं क़ीमत
हमारे हारने की

सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सँभाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं

दोस्त अवसर देखते रहते हैं
काम आने का
और मुश्किल समय में अक़सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम

हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं ख़ैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयाँ देखकर
हताश नहीं होते
वे मूँछों में लिथड़ाती मुस्कान बिखेरते हैं

दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम

उठाकर हमें मैदान में खड़ा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का छिलना
ताली बजाते रहते हैं वे
मूँगफली खाते रहते हैं
और कहते हैं
धीरे-धीरे सीख जाओगे खेल

जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं, कहाँ-कहाँ भागोगे
'भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे'

खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाड़ी दोस्त से ही
अक़सर खेलते हैं खेल!


यह कविता इस संग्रह से मेरी अंतिम प्रस्तुति थी। इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि मुझे इस संग्रह की 11 कविताएँ ही पसंद है। कहीं तो अंत करना था। इस संग्रह की चर्चा यहीं रोक रहा हूँ। हरे प्रकाश भी कहीं जा नहीं रहे। आगे उनकी नई कविताओं के साथ मैं हाज़िर होऊँगा।

अगले महीने किसी अन्य युवा कवि की कविताओं की चर्चा करूँगा, ताकि नवधर्मी रचनाकार अच्छा पढ़ सकें और उन्हें बहुत अच्छा लिखने की प्रेरणा मिले।

आदमी होने की निराशा


युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताओं के शब्द बहुत जाने-पहचाने हैं, अपने आसपास के लगते हैं। उन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि ये तो मेरे ही शब्द हैं। परंतु उन शब्दों की कई लेयरों में जो काव्यात्मकता छिपी है, वो उनको ख़ास कवि बनाती है।

'व्यथा वृत्त'

कथित उत्तर-आधुनिक सदी में
वह आदमी
आदमी होने की निराशा भोग रहा था

कहता जा-जाकर हित मित्रों से
कि उसे दुख है, दिक़्क़त है
जो चाहिए उसकी क़िल्लत है-
कोई उसकी नहीं सुनता
कि भूखा रह जाता है वह
और उसे कोई नहीं पूछता

कि वह काम करते-करते
थक जाता है
और आराम के लिए
कोई नहीं कहता
कहता कि वह रोता रहता है
तो दुनिया हँसने लगती है
इस बात का उसे दुख है
उसे दुख है कि लोग हँसी को
हँसी की तरह नहीं हँसते
उसे दुख था तो वह निराश था
अपने मन की व्यथा-कथा
उसने सबसे कही

उन सबसे जिन पर उसे
भरोसा था कि
वे उसे प्यार करते हैं
उसने कहा
हाल यही रहा तो
वो नहीं रहेगा
उसने रो-रोकर कहा
कि वह कुछ कर लेगा
कि कोई उसकी नहीं सुनता

वैसे उसकी सुनते तो सब
बल्कि कई तो सुनते हुए
उसके साथ-साथ रोने लगते
मगर जब सचमुच ही
उसकी आत्मा दरकने लगती
तब इगी-दुगी तक हँसने लगते
कि वह नौटंकी कर रहा है
आख़िर उसे क्या दुख हो सकता है
सब कुछ तो भरा है उसके यहाँ

यह ठीक था
सब कुछ भरा था उसके यहाँ
लेकिन वह जहाँ भी हाथ डालता
ख़ालीपन ही पाता
लोग उसकी इसी बात का
भरोसा नहीं करते
हालाँकि अपने-अपने जीवन में
सबका यही अनुभव था
लेकिन इसे सार्वजनिक करने को
कोई तैयार न था

सब चाहते तो थे
कि एक-दूसरे के कन्धे पर
अपना माथा रखकर
मिल-जुलकर रोएँ
पर सब अपने-अपने कन्धे बचाना चाहते
और आँसू तो कतई नहीं दिखाना चाहते
सब दुखी थे और ख़ुश थे
वही दुख को दुख की तरह
कहने और नहीं सहने का
साहस कर रहा था
इसलिए हास्यास्पद हो रहा था
यह बात वह समझ रहा था अच्छी तरह
इसलिए वह जिस-तिस से लड़ पड़ता
ग़ैरो से वह शिक़ायत करता
मगर अपनों के प्रति
उसका ग़ुस्सा ख़ास था
और ख़तरनाक था
और चूँकि वह औरों से हटकर था
इसलिए सब उससे हटकर रहना चाहते
इस बात से वह और दुखी था

जब उससे अपना दुख
देखा नहीं गया
और दूसरों का दुख कीचड़ की तरह
उसके सामने फैला ही रहा

घूम-घूमकर अपने सभी हित मित्रों को
वह प्रणाम कर आया
जिनके जो छोटे-मोटे कर्ज़ थे
चुका आया
जो नहीं चुका सकता था उसके लिए
माफ़ी माँग आया
और गाँव से बाहर नहर के कछार पर
ज़हर खाकर
छटपटाकर मर गया
वह मर गया तो भोज हुआ
उस भोज में
अपने-पराये
कौए, बिलार, भालू, राक्षस सबने
डकार कर जलेबी-पूरी खायी

एक ब्राह्मण ले गया उसकी बछिया खोलकर!

पिता को लेना पड़ा चश्मा तब भी नहीं दिखीं बच्चियाँ


इन दिनों आपको मैं मिलवा रहा हूँ हिन्द-युग्म के नये अतिथि कवि हरेप्रकाश उपाध्याय से। हरे प्रकाश की कविताओं में सच अपने सभी नकाबों से बाहर आकर सीधे पाठकों से संवाद करने लगता है। रिश्ते, समाज, आचरण, व्यवहार, तंत्र सभी की जाँच ठोंक-बजाकर करते हैं हरे प्रकाश।

'पिता'

पिता जब बहुत बड़े हो गये
और बूढ़े
तो चीज़ें उन्हें छोटी दिखने लगीं
बहुत-बहुत छोटी

आख़िरकार पिता को
लेना पड़ा चश्मा

चश्मे से चीज़ें
उन्हें बड़ी दिखाई देनी लगीं
पर चीज़ें
जितनी थीं और
जिस रूप में
ठीक वैसा
उतना देखना चाहते थे पिता

वे बुढ़ापे में
देखना चाहते थे
हमें अपने बेटे के रूप में
बच्चों को 'बच्चे' के रूप में
जबकि हम
उनके चश्मे से 'बाप' दिखने लगे थे
और बच्चे 'सयाने'


हरे प्रकाश उपाध्याय के पहले काव्य-संग्रह ''खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएँ'' में एक कविता 'बच्चियाँ : कुछ दृश्य' नाम से है, जिसमें क्षणिका रूप में १० लघुकविताएँ हैं। प्रस्तुत २ झलकियाँ-

१॰ बच्चियों के 'दूध'
पी गये बच्चे सारे
वे 'पानी पीकर' सो रही हैं...
उठेंगी अभी
सारे अभावों को देंगी बुहार
आँखों से पानी
और छाती से दूध उतार
पानी और दूध की क़िल्लत दूर करेंगी
बच्चियाँ

२॰ बच्चियाँ
टीवी देख रही हैं
टीवी में
सीता राम का ब्याह हो रहा है

अभी बजेगी दरवाज़े की घंटी
कोई आएगा थुलथुल
एक चीकट मेहमान
सोफ़े पर पसर जायेगा
बच्चियाँ किचन में घुस
चाय बनाएँगी
पकौड़े छानेंगी

स्वयंवर का धनुष टूटते-टूटते
हो ही जाता है कोई अड़भंग
कोई पूरा ब्याह
कहाँ देख पाती हैं बच्चियाँ!


लोहे के साथ बिक जाते हैं लुहार


आपने हिन्द-युग्म के वर्तमान अतिथि कवि हरे प्रकाश उपाध्याय की पिछली कविता में लोहार, चमार का शाश्वत सच देखा। अगली कविता उसी लुहार की नियति के कारण खोजने की कोशिश है। आप भी पढ़िए-

'लुहार'

लोहे का स्वाद भले न जानते हों
पर लोहे के बारे में
सबसे ज़्यादा जानते हैं लुहार
मसलन लुहार ही जानते हैं
कि लोहे को कब
और कैसे लाल करना चाहिए
और उन पर कितनी चोट करनी चाहिए

वे जनाते हैं
कि किस लोहे में कितना लोहा है
और कौन-सा लोहा
अच्छा रहेगा कुदाल के लिए
और कौन-सा बन्दूक की नाल के लिए
वे जानते हैं कि कितना लगता है लोहा
लगाम के लिए

वे महज़
लोहे के बारे में जानते ही नहीं
लोहे को गढ़ते-सँवारते
ख़ुद लोहे में समा जाते हैं
और इन्तज़ार करते हैं
कि कोई लोहा लोहे को काटकर
उन्हें बाहर निकालेगा
हालाँकि लोहा काटने का गुर वे ही जानते हैं
लोहे को
जब बेचता है लोहे का सौदागर
तो बिक जाते हैं लुहार
और इस भट्टी से उस भट्टी
भटकते रहते हैं!


इनकी कविताओं में वर्तमान खौफ़नाक, खूनी और विभत्स चेहरा लिये ज़िंदा हूँ। यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि चल-फिर रहा है, पूरी अकड़ के साथ। 'ख़बरें छप रही हैं', 'महान आत्माएँ' और 'हम पत्थर हो रहे हैं' में वही सच दात-निपोरे हँस रहा है।

'हम पत्थर हो रहे हैं'

कितने लाख लोग दुनिया के भीख माँग रहे हैं
कितने अपाहिज हो गये हैं मेरी तरह
कितने प्रेमियों के साथ दग़ा हो गया है
बस यही बचा है सुनने-बताने को

मेरी तरह कितने ही लोग
इन ख़बरों में हाय-हाय कर रहे हैं
हाय-हाय की दहला देने वाली चीखें
घुटी-घुटी हैं
न जाने कौन इनका गला घोंट रहा है

मैं सोचता हूँ
निकलूँ और दौड़ू सड़कों पर
अपने तमाम ख़तरों के बावज़ूद
चिल्लाऊँ शोर मचाऊँ
कि पड़े सोये लोगों की नींद में खलल
पृथ्वी की छाती में
कील ठोका जा रहा है
और अज़ीब-सी बात है कि मेरे साथी सब सो रहे हैं
बस चिल्लाने का काम ही मेरे वश में है
जो मैं नहीं कर रहा हूँ
नहीं तो करने को बचा ही क्या है
भरोसाहीन इस दौर में

निराशा की यह घनी शाम
दुख की बूँदा-बाँदी
तुम्हारी यादें
गलीज़ ज़िन्दगी की ऊब
और एक सख़्तजान बुढ़िया की क़ैद
जो उल्लास के हल्के पत्तों के संगीत से भी
चौंक जाती है और चीखने लगती है
इन सबसे बिंधा
कितना असहाय हो रहा हूँ मैं
कहीं कोई भरोसा नहीं
पता नहीं किस भय से काँप रहा हूँ मैं

सारी चिट्ठियाँ अनुत्तरित चली जाती हैं
कहीं से कोई लौटकर नहीं आता
दोस्त मतलबी हो गये हैं
देखो मैं ही अपनी कुंठाओं में
कितना उलझ गया हूँ

संवेदना के सब दरवाज़ों को
उपेक्षा की घुन खाये जा रही हैं
बेकार के हाथ इतने नाराज़ हैं
कि पीठ की उदासी हाँक नहीं सकते

हम लगातार अपरिचित होते जा रहे हैं
हमारे पाँव उन गलियों का रास्ता भूल रहे हैं
जिनमें चलकर वे बढ़े हैं
देखो तुम ही इस गली से गयी
तो कहाँ लौटी फिर!

घास के उन घोंसलों की उदासी तुम भूल गयी
जिन्हें हम अपने उदास दिनों में देखने जाते थे
और लौटते हुए तय करते थे
परिन्दों की गरमाहट लौटाएँगे
किसी-न-किसी दिन इन घोंसलों को
देखो हम किस क़दर भूले सब कुछ
कि ख़ुद को ही भूल गये

हमें प्यास लगी है
और हमें कुएँ की याद नहीं
हम एक पत्थर की ओर बढ़ रहे हैं
पूरी बेचैनी के साथ..........।


और पूरी बेचैनी से इंतज़ार कीजिए आगामी रचनाओं का॰॰॰



इस बरस फिर लोहार लोहा पीटेगा, चमार जूता सिएगा


अभी कुछ दिन पहले मैंने आपको युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताओं से मिलवाया था, और यह वादा किया था कि उनकी अन्य कविताओं से आपको रूबरू करवाऊँगा। 'खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएँ' में से जब मैं कुछ कविताएँ चुनने की कोशिश करता हूँ तो विफल हो जाता हूँ। हरे प्रकाश की किसी भी कविता को उनकी प्रतिनिधि कविता कहा जा सकता है। इनकी कविता के शब्द बहुत सहज ढंग से पाठक के मन में उतरते हैं। प्रथम दृष्टया यह लगता है कि यह आम आदमी की कविता है। कलम उठाने बैठ जाये तो पहली दफा लिखने वाला भी ऐसी कविताएँ लिख सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है। साधारण शब्दों में जो कथ्य-बयानी है, वह इन्हें बड़ा बनाती है। इनके साधारण पात्र, साधारण बिम्ब, साधाराण उपमाएँ बस प्रतीक भर हैं जो दुनिया भर की बिडम्बनाएँ समेटे हैं। एक कविता पढ़ते चलिए-

'इस बरस फिर'

इस बरस फिर बारिश होगी
मगर पानी
सब बह जाएगा समुद्र में
बता रहे हैं मौसम विज्ञानी
इस बरस पौधों की जड़ सूख जाएगी
मछली के कंठ में पड़ेगा अकाल
ऐन बारिश के मौसम में

इस बरस फिर ठंड होगी
और ठिठुरेंगे फुटपाथी
महलों में वसन्त उतरेगा इस बरस फिर
जाड़े के मौसम में
बिने जाएँगे कम्बल
मगर उसे व्यापारी हाक़िम-हुक़्मरान
धनवान ओढ़ेंगे
सरकार बजट में लिख रही है यह बात

इस बरस फिर आयेगा
वसन्त
मगर तुम कोपल नहीं फोड़ पाओगे बुचानी मुहर

इस बरस फिर
लगन आयेगा बता रहे हैं पंडी जी
मगर तुम्हारी बिटिया के बिआह का संजोग नहीं है करीमन मोची
इस बरस फिर तुम जाड़े में ठिठुरोगे
गरमी में जलोगे
बरसात में बिना पानी मरोगे सराप रहे हैं मालिक
अपने आदमियों को।

बढ़ई इस बरस चीरेगा लकड़ी
लोहार लोहा पीटेगा
चमार जूता सिएगा
और पंडीजी कमाएँगे जजमनिका
बेदमन्त्र बाँचेंगे
पोथी को हिफ़ाज़त से रखेंगे
और सबकुछ हो पिछले बरस की तरह
आशीर्वाद देंगे ब्रह्मा, विष्णु, महेश....!



बाकी फिर कभी॰॰॰॰

हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताओं के सीधेपन में युगीन जटिलताएँ लिपटी हैं


कविता प्रेमियो,

Hare Prakash Upadhyayहिन्द-युग्म कोशिश करता रहा है कि हिन्दी कविता के हस्ताक्षरों से आपको मिलवाया जाय। इसलिए समय-समय पर हम हिन्दी कविता में उदाहरण बन चुके कवियों को आमंत्रित करते रहते हैं। अब तक इस रास्ते आप कुमार विश्वास, उदय प्रकाश और नाज़िम नक़वी से रुबरू हो चुके हैं। इस बार हम एक युवा कवि से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं, जो कविता में तो ६-७ सालों से हाथ-पाँव मार रहे हैं लेकिन उसका प्रथम काव्य-संग्रह 'खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएँ' भारतीय ज्ञानपीठ से लगभग १५ दिन पहले ही आया है। ये हैं हरे प्रकाश उपाध्याय। ५ जनवरी १९८१ को भोजपुर बिहार के गाँव 'बैसाडीह' में जन्मे हरे प्रकाश ने जैसे-तैसे बी॰ए॰ की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में एक मीडिया संस्थान में छोटी सी नौकरी कर रहे हैं और साहिबाबाद (ग़ाजियाबाद, उ॰प्र॰) में निवास रहे हैं। 'अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार' से सम्मानित हैं। इस संग्रह के आने से पहले भी बहुत सी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। हिन्द-युग्म पर अतिथि कवि की कविताओं के प्रकाशन का उद्देश्य यही होता है कि अच्छा साहित्य इंटरनेटीय पाठकों तक पहुँचे, साथ ही साथ नव रचनाकारों को लिखने की प्रेरणा व ऊर्जा मिले।


'खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएँ' संग्रह में कवि हरे प्रकाश उपाध्याय की ५३ कविताएँ संकलित हैं। इस संग्रह पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ आलोचक डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी कहते हैं-

हरे प्रकाश उपाध्याय हिन्दी की नयी पीढ़ी के संवेदनशील एवं सजग कवि हैं। कविताएँ स्वगत या एकालाप शैली में नहीं हैं। एकालाप या स्वगत शैली में ही कवि सम्प्रेषणीयता का तिरस्कार कर सकता है, इस गुमान में कि वह गहरी बात कर रहा है। गहरी बात कहने वाले शमशेर कहते थे- बात बोलेगी। लेकिन अनेक कवियों की बात बोलती नहीं। हरे प्रकाश गूँगी कविताओं के कवि नहीं हैं। वे पाठकों से सीधे और सीधी बात करते हैं। कविताओं के ज़रिए वे पाठकों को सवाल पूछने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे सवाल जो ऐतेहासिक एवं सांस्कृतिक संवेदना को धार देते हैं। शैली और वाक्यों के इस सीधेपन में हमारे समय की युगीन जटिलताएँ लिपटी हैं और कविताएँ उन जटिल परतों को उद्‍घाटित करती हैं। फलतः इन कविताओं को पढ़ना अपने समय और अपने समय की समस्याओं को पढ़ना है।
विवादी समय में पूछना बहुत ज़रूरी है / यह पूछो कि पानी में अब कितना पानी है / आग में कितनी आग है, आकाश अब भी कितना आकाश है।
सवाल जितना सीधा है, उतनी सीधी भाषा है और उतना ही अनिवार्य है। शायद मानव इतिहास का अभूतपूर्व संकट, यानी पंच महाभूतात्मक संकट। इस सवाल के ज़रिए आप आज की उस मानवघाती अपसंस्कृति तह पहुँच जाएँगे जो मनुष्य से उसके पंचमहाभूतों तक को छीनकर सीधे बाज़ार में बेचने का उपक्रम कर रही है।


विश्वनाथ जिस कविता की बात कर रहे हैं, ज़रा वह कविता पढ़ते चलें-

पूछो तो

Kavita-Sangrah: Khiladi Dost Tatha Anya Kavitayenकब तक मौन रहोगे
विवादी समय में यह पूछना बहुत ज़रूरी है
पूछो तो अब
यह पूछो कि पानी में
अब कितना पानी है
आग में कितनी आग
आकाश अब भी कितना आकाश है

पूछो तो यह पूछो
कि कितना बह गया है भागीरथी में पानी
कितना बचा है हिमालय में
पूछो कि नदियों का सारा मीठा पानी
आखिर क्यों जा डूबता है
सागर के खारे पानी में
पूछो

मित्रो, मैं पूछता हूँ
आदमी का पानी
कब उड़ जाता है
मेरी-तुम्हारी आँखों में
बचा है अब कितना पानी
खोजो कहीं चुल्लू भर ही पानी
डूब मरने के लिए
पानी के इस अकाल समय में
नाविकों और मछलियों से कहो

वे अपने भीतर बचाए रखें पानी
उन्हें दुनिया को पार लगाना है
जंगलों से कहो वे आग बचाएँ
ठंडी पड़ती जा रही है यह दुनिया
ख़त्म हो रही है आत्मा की ऊष्मा

देर मत करो पूछो
आग दिल की बुझ रही है
धुआँ-धुआँ हो जाए छाती इससे पहले
मित्रो, ठंड से जमते इस बर्फ़ीले समय में
आग पर सवाल पूछो
माचिस तीली की टकराहट की भाषा में

तय कर लो
आग कहाँ और कितनी ज़रूरी है
क्या जलना चाहिए आग में
क्या बचना चाहिए आग से

पूछो आकाश से तो
क्यों भागता जाता है ऊपर
हमसे क्यों छिनी जा रही है क़द की ऊँचाई
हाथ बढ़ाओ और
आकाश से सवाल पूछो
कि हमसे भागकर कहाँ जाओगे
तुम हमारे क़द पर कब तक ओले गिराओगे

मित्रो, उससे इतना ज़रूर पूछो कि
हमारे हिस्से की धूप
हमारे हिस्से की बिजली
हमारे हिस्से का पानी
हमारे हिस्से की चाँदनी का
जो मार लेते हो रोज़ थोड़ा-थोड़ा हिस्सा
उसे कब वापस करोगे

मित्रो, यह ज़िन्दगी है
आग पानी आकाशा
बार-बार पूछो इससे

हमेशा बचाकर रखो एक सवाल
पूछने की हिम्मत और विश्वास


डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी आगे कहते हैं-

हरे प्रकाश उपाध्याय ज़मीनी हक़ी‌क़त के कवि है, जिस ज़मीन पर उनकी संवेदना उगी है वह मूलतः उनके गाँव-जवार की है। कविताओं के पात्र अधिकांश गाँव के- विशेषतः नारियाँ और उनमें लड़कियाँ और वृद्धाएँ हैं। उनका वर्णन, विवरण और यत्किंचित चित्रण कथात्मक है। आज की अच्छी कविता में जो कथात्मकता आ गयी है उसका उपयोग-प्रयोग कवित्व को समृद्ध करता है।

फूल

तेतरी ने फूल गढ़ा है
अपने घर के बाहर
अपनी मिट्टी की दीवार पर

फूल बहुत सुंदर है
बहुत सच्चा लगता है
गली से आते-जाते लोगों को
वह बहुत अच्छा लगता है

पर कैसी भी हवा चले
तेतरी के बिन दरवाजे घर में
फूल की सुगन्ध कोई, कभी नहीं आती
घर के भीतर तो
कालिख भरा धुआँ फैला रहता है
जो तेतरी की आँखों में पानी
भरता रहता है

यह कैसा मज़ाक़ है
कि तेतरी के हाथ से
बने फूल
हँसते हैं
और तेतरी के हाथ
हँसी को तरसते हैं !


इस युवा कवि का भाव बोध व्यापक है। वह एकाग्र'' या एकान्तिक नहीं। शब्द शब्द मात्र ध्वनि मात्र नहीं हैं; वे रक्त, मज्जा, अस्थि के रूप हैं। कविता पढ़ना काग़ज़ से निकलकर शब्दों के सेतु पारकर उस समाज में पहुँच जाना है जहाँ सब कुछ तहस-नहस हो रहा है। फिर भी जहाँ गाँव की औरतें दिन का इंतज़ार कर रही हैं। ज़ाहिर है कि यह दिन सामान्य नहीं, हमारे समय के घटना-विहीन (आन्दोलन विहीन) अन्धकार को दूर करके मानवीय भविष्य का दिन है।

दिन होगा

दिन होगा तो
औरतें चौखट लाँघ
चली जाएँगी नदी तक
और अँचरा में बाँध कर लाएँगी
पानी की धार
रात चाहे जितनी हो गहरी
औरतें बड़ी बेकली से कर रही हैं
दिन का इंतज़ार

दिन होगा
तो करेंगी वे दुनिया की
नये तरीक़े से झाड़-बुहार
रात की धूल और ओस
झटक आएँगी बस्ती के बाहर

औरतें ठीक-ठीक नहीं जानतीं
दिन कैसे होगा
कैसे बीतेगी यह रात
वे महज़ इतना जानती हैं
कि पूरब में जब खिलेगा लाल फूल
और सन्नाटा टूटेगा
मुर्गा बोलेगा तो बिहान होगा

कहते हैं वैज्ञानिक
जब यह धरती
घूम जाएगी थोड़ी-सी अक्ष पर
तो दिन होगा
कुछ होगा तो दिन होगा
रात से ऊबे हुए बच्चे
पाँव चला रहे हैं
और इसे लगकर धरती हिल रही है
लगता है
अब दिन होगा!


आप देखेंगे कि ऐतिहासिक परिवर्तन (क्रान्ति) ठेठ ग्रामीण संस्कृति के रीति-रिवाज़ रचना-सन्दर्भ में आश्‍‌वस्त करती है। यथार्थ हमारी धरती का है तो समाधान और बदलाव भी हमारे ही ऐतिहासिक सांस्कृतिक सन्दर्भ में होगा, उसकी भाषा और काव्य-यात्रा भी हमारी होगी- 'खिलाड़ी दोस्त'तो हमारे दौर की उपज है।

मुझे हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएँ अच्छी लगती हैं। अगर ये ख़ुद उस विज्ञापनी अपसंस्कृति के शिकार नहीं हुए, जिसका ये कविताएँ विरोध करती हैं तो आगे चलकर बेहतर कविताएँ रचेंगे।

--डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी


घड़ी

दुनिया की सभी घड़ियाँ
एक-सा समय नहीं देतीं
हमारे देश में अभी कुछ बजता है
तो इंग्लैंड में कुछ
फ्रांस में कुछ
अमेरिका में कुछ....


यहाँ तक कि
एक देश के भीतर भी सभी
घड़ियों में एक-सा समय नहीं बजता
समलन हुक्मरान की कलाई पर कुछ बजता है
मज़दूर की कलाई पर कुछ
अफ़सरान की कलाई पर कुछ

मन्दिर की घड़ी में जो बजता है
ठीक-ठीक वही चर्च की घड़ी में नहीं बजता है
मस्जिद की घड़ी को मौलवी
अपने हिसाब से चलाता है
और सबसे अलग समय देती है
संसद की घड़ी

कुछ लोग अपनी घड़ी
अपनी जेब में रखते हैं
और अपना समय
अपने हिसाब से देखते हैं
पूछने पर अपनी मर्ज़ी से
कभी ग़लत
कभी सही बताते हैं।

मोहनदास करमचन्द गाँधी
अपनी घड़ी अपनी कमर में कसकर
उनके लिए लड़ते थे
जिनके पास घड़ी नहीं थी
और जब मारे गये वे
उनकी घड़ी बिगाड़ दी
उनके चेलों-चपाटों ने
कहना कठिन है अब उनकी घड़ी कहाँ है
और कौन-कौन पुर्ज़े ठीक हैं उसके

हमारी घड़ी
अकसर बिगड़ी रहती है
हमारा समय गड़बड़ चलता है
हमारे धनवान पड़ोसी के घर में
जो घड़ी है
उसे हमारी-आपकी क्या पड़ी है!


इस बार आपने मेरे और विश्वनाथ त्रिपाठी की पसंद की कविताएँ पढ़ी। पढ़िए मेरी पसंद की कविता।

किसी अन्य की रचना को अपना कहने का जोखिम ना लें, इंटरनेट आपकी चोरी पकड़ लेगा


कल दोपहर के भोजन के बाद १५ मिनट की झपकी लेने के लिए हाथ-पाँव फैलाया ही था कि कोरियर वाले ने दरवाजा खटखटाया। वो हरेप्रकाश उपाध्याय का कविता-संग्रह लेकर आया था। आप सबको पता है कि भारतीय ज्ञानपीठ लोकोदय ग्रंथांक नाम से उभरते रचनाकारों का पहला संग्रह प्रकाशित करता है। साल २००८ के लिए ज्ञानपीठ ने ७ कविता-पुस्तकों को प्रकाशन के लिए चुना था, जिसमें हरे प्रकाश उपाध्याय की 'खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएँ' संग्रह भी शामिल था। मैंने सोचा कि सोकर १५ मिनट खराब करने से बढ़िया है कि इस संग्रह को पढ़कर आनंद के कुछ गोते लगा लूँ।

मैंने यह संग्रह हरे प्रकाश से इसलिए भी मँगाया था कि हिन्द-युग्म पर इसमें चुनिंदा कविताएँ प्रकाशित करूँ ताकि नये लिखने वालों को प्रेरणा और मार्गदर्शन भी मिले। पढ़ते-पढ़ते ४३वें पृष्ठ पर पहुँचा, जिसपर एक कविता छपी थी 'हमारे गाँव में लड़कियाँ'। उसे पढ़ा, दुबारा पढ़ा। पढ़कर कुछ याद आ रहा था। लेकिन समझ नहीं पा रहा था कि क्या? दीमाग पर काफी ज़ोर देने के बाद समझ में आया कि शायद इस कविता को पहले कहीं पढ़ा है। बहुत ज़ोर लगाया तो ऐसा लगा कि हिन्द-युग्म पर ही पढ़ा है। लेकिन फिर खुद ही अपनी बात को खारिज किया कि जब हरे प्रकाश अपनी कोई कविता हमें भेजी ही नहीं, फिर मैंने हिन्द-युग्म पर कब प्रकाशित कर दिया? मैं उनके ब्लॉग पर पहुँचा, वहाँ भी यह कविता नहीं थी।

थोड़ी देर बात मेरे दीमाग की बत्ती जली और याद आया कि इसी तरह की कविता पिछले साल के अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विवेक पाण्डेय ने प्रकाशित करने को भेजी थी। मैंने महिला दिवस २००८ का विशेष अंक खोलकर पढ़ा, तो पाया कि दोनों कविताओं के अक्षर-अक्षर समान हैं। पढ़ने का सारा मज़ा किरकिरा हो गया था। मैंने हरेप्रकाश को फोन लगाया, उनको बताया कि आपका संग्रह मिल गया है और आपकी यह कविता विवेक कुमार पाण्डेय नाम से हिन्द-युग्म पर प्रकाशित है। मैंने कहा कि यह कैसे संभव है? उन्होंने बताया कि साहित्यिक-त्रैमासिक 'कथन' में यह कविता ४-५ साल पहले प्रकाशित हुई थी, विवेक ने वहीं से लिया होगा। मैंने जीमेल में विवेक पाण्डेय का नं॰ तलाशा और उनको मामला बताया। उन्होंने कहा कि वे अपने एक और मित्र के साथ मिलकर कविता लिखते हैं। हो सकता है उन्होंने कहीं पढ़ी हो और यह कविता मुझे दी हो। मैंने कहा कि उनसे पूछकर बताइए।

यह संभव हो भी सकता है। क्योंकि मनीष वंदेमातरम् (जो युग्म के कवि भी हैं) मेरे बहुत से मित्रों के लिए प्रेम कविताएँ लिखते हैं जिन्हें हमारे दोस्त लोग किसी लड़की को इम्प्रेस करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। सीना तानकर कहते हैं कि यह कविता मैंने तुम्हारे लिए लिखी है, तुम्हारी याद में लिखी है। किसी अन्य की रचना का इस तरह का इस्तेमाल तो बहुधा होता है और यह लेखन खासा प्रचलित है। लेकिन किसी अन्य की रचना कहीं पढ़कर अपने नाम से किसी वैश्विक मंच पर भेजना तो बहुत खतरनाक है। हमारे पुराने पाठकों को याद होगा कि डॉ॰ मीनू नाम की एक कवयित्री ने यूनिकवि प्रतियोगिता में प्रियंवद की बहुचर्चित कहानी 'खरगोश' का एक हिस्सा कविता की शक्ल में भेज दिया था, जिसके प्रकाशित होते ही उस कविता के पहले पाठक अवनीश गौतम ने बता दिया था कि यह प्रियंवद की कहानी का हिस्सा है। जिसके बाद सूरज प्रकाश ने फोन करके प्रियंवद को यह घटना बताई थी। बाद ने हिन्द-युग्म ने एक खेद-पत्र प्रकाशित किया था।

मुझे यह बताते हुए अच्छा भी लग रहा है कि इसे इंटरनेट की उपयोगिता ही कहेंगे कि इस तरह की चोरिया पकड़ में आ जा रही हैं। इस तरह की घटनाएँ नई नहीं हैं, लेकिन इंटरनेट पर लेखक, पाठक के आ जाने से आप चोरी को बहुत दिन तक नहीं छुपा सकते।

फिर मैंने 'कथन' के उस समय के संपादक रमेश उपाध्याय का संपर्क-सूत्र जुगाड़ा और उनसे फोनकर पूछा कि 'हमारे गाँव में लड़किया' आपने कब प्रकाशित की थी, ज़रा अपनी फाइल देखकर बता दें। उन्होंने ढूँढ़कर बताया कि इसे उन्होंने कथन के अप्रैल-जून २००४ के अंक में प्रकाशित किया था।

इसके बाद हमारे पास विवेक कुमार पाण्डेय का माफीनामा भी आ गया है, हम प्रकाशित कर रहे हैं।

(हम यह माफीनामा इसलिए भी प्रकाशित कर रहे हैं, क्योंकि यह विवेक की इच्छा है। हमारा उद्देश्य कि आगे कोई और यह गलती न दोहराये।)

मैं अपने पाठकों-कवियों से अपील करूँगा कि कृपया अपनी स्वरचित रचनाएँ ही अपने नाम से कहीं प्रकाशित करें या करवायें। हो सकता है कि आपको कुछ समय के लिए वाहवाही मिल जाये, लेकिन आप लम्बे समय तक निंदा के भागी बन जायेंगे। यदि आपकी चोरी प्रमाणित हो जाती है और लेखक तथा प्रकाशक चाहे तो आप के ख़िलाफ़ कॉपीराइट का मुकदमा दर्ज़ करा सकता है और हज़ारों-लाखों रुपयों का जुर्माना के चक्कर में पड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए विवेक कुमार पाण्डेय ने हरे प्रकाश उपाध्याय की इस कविता को १ साल से अधिक समय तक अपने नाम से इस्तेमाल करने की गलती की है।